Vayu Purana
152
अध्याय 152 / 232

Adhyaya 152

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 152

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे श्वेतवाराहतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १५२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेद् धरापाल भार्गलेश्वरम् उत्तमम् ।शङ्करं जगतः प्राणं स्मृतमात्राघनाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śvetavārāhatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikapañcāśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 152 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacched dharāpāla bhārgaleśvaram uttamam / śaṅkaraṃ jagataḥ prāṇaṃ smṛtamātrāghanāśanam

हिन्दी अर्थ

त्रिदिबं यान्ति ते सर्दे पिण्डदा इति च श्रुति: । ब्रह्महां च कृतध्नश्च महापातकिनश्र ये

English

Hence the Pitrs always desire Magha. Those who are devoted to Pitrs and deities attain the greatest goal.

अध्याय 152

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम् ।अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram / aśvamedhasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

ते सर्वे निष्कृति यानिति गयायां पिण्डपातनातु। ब्रह्मध्नस्य सुरापस्य बालब॒द्धगुरुद्र हः नाशमायाति वे पापं गयायामनुयाति यः । यनज्ञास्ता पातयेत्पिण्ड त॑ नयेद्रत्रहय शाश्वतम् ३८

English

Listen to a detailed account of all those Sraddhas which Yama mentioned to Sasabindu. They are to be performed under different constellations severally. 2

अध्याय 152

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यः कश्चित् प्राणत्यागं करिष्यति ।अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम्

tatra tīrthe tu yaḥ kaścit prāṇatyāgaṃ kariṣyati / anivartikā gatistasya rudralokādasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

दुलंभं त्रिषु लोकेषु नास्ति तीर्थ गयासममन् । नरकस्था दिव॑ यान्ति स्वर्गंस्था मोक्षसाप्नुयु:ः

English

He who maintains the sacrificial fires for ever and per¬ forms a Sraddha (when the Moon is) in conjuction with the Krttika constellation, becomes free from worries and ailments along with his children.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।