Vayu Purana
174
अध्याय 174 / 232

Adhyaya 174

11 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ11 श्लोक

अध्याय 174

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शुद्धेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रिसप्तत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७४ श्रीमार्कण्डेय उवाच: गोपेश्वरं ततो गच्छेदुत्तरे नर्मदातटे ।यत्र स्नानेन चैकेन मुच्यन्ते पातकैर् नराः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śuddheśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma trisaptatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 174 śrīmārkaṇḍeya uvāca: gopeśvaraṃ tato gaccheduttare narmadātaṭe / yatra snānena caikena mucyante pātakair narāḥ

हिन्दी अर्थ

गुणान्देवावधस्थापि कौतंयन्तो महात्मनः । यथेव शूणुते दूरात्संपश्यति तथान्तिकात् बनच्नुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवेदेवावधः समः। पुरुषाः पचषष्टिश्न सहर्नाणि च सप्ततिः ॥॥ क्‍ येड्मृतत्वमनृप्राप्ता बच्ुदंबावधादपि:

English

In all the seven continents he is seen moving about with his sword drawn and the excellent bows and arrows kept ready as well as seated in his chariot. Though he is the king, he behaves as though he is the follower.*

अध्याय 174

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा कुरुते प्राणसंक्षयम् ।बर्हियुक्तेन यानेन स गच्छेच्छिवमन्दिरे

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā kurute prāṇasaṃkṣayam / barhiyuktena yānena sa gacchecchivamandire

हिन्दी अर्थ

यज्वा दानपतिर्वीरो ब्रह्मण्यः सत्यवाग्बुध: कीतिमांश्व महाभागः सात्वतानाों महारथ १६ तस्यास्ववाये सुमहाभो जयेमातिकाबला: । गान्धारी चंव माद्री च वुष्णेभायें ब॒भृवतुः

English

While he was protecting the subjects righteously, none of his subjects lost his wealth, no one was grief-stricken and no one had any confusion, thanks to the prowess of that great king".

अध्याय 174

श्लोक 3

क्रीडित्वा सुचिरं कालं शिवलोके नराधिप ।इह मानुष्यतां प्राप्य राजा भवति वीर्यवान्

krīḍitvā suciraṃ kālaṃ śivaloke narādhipa / iha mānuṣyatāṃ prāpya rājā bhavati vīryavān

हिन्दी अर्थ

गान्धारी जनयामास सुमित्र सिन्ननन्दनम् । साद्री युधाजित॑ पुत्र सा तु व देवमीदृषम् १८ आंतुर होकर यह विचार किया कि 'मेरी जानकारी में ऐसो कोई स्त्री नहीं है, जिसमें राजा देवावृध के संकल्प के अनुसार सर्वगुणसम्पन्न पुत्र उत्पर्त हों, अतः अब मैं स्वयं ही इसकी सहधर्भिणी बन रही हूँ । राजा ने जिस प्रकार की भावना की थी उसी के अनुसार नदी से स्वमेव उसके हाथों का प्रार्दभाव हुआ

English

That king became the sole monarch and emperor of the seven continents for eightyfive thousand years.

अध्याय 174

श्लोक 4

हस्त्यश्वरथसम्पन्नो दासीदाससमन्वितः ।पूज्यमानो नरेन्द्रैश्च जीवेद्वर्षशतं नरः

hastyaśvarathasampanno dāsīdāsasamanvitaḥ / pūjyamāno narendraiśca jīvedvarṣaśataṃ naraḥ

हिन्दी अर्थ

तदनस्तर सावित्री कुमार होकर उसने सुन्दर शब्दों में राजा के प्रति अपनी चिन्ता (अनुरक्ति) प्रकट की, राजा ने उसकी इच्छा पूति की। उदारचेता राजा देवावध ने उस कुमारी में एक तेजस्वी पुत्र का गर्भाधान किया सरिताओं में श्रेष्ठ पर्णाशा ते नव सहिने में जिस प्रकार के पुत्र को इच्छा राजा देवावृध को थी उसी प्रकार का स्वंगुण सम्पन्न पुत्र उत्पन्न किया। पुराणों की कथाओं के जाननेवाले

English

(In his realm) he himself was the protector of cattle and the fields. As a Yogin, Arjuna became Parjanya (Lord of clouds and rains) and showered in plenty.

अध्याय 174

श्लोक 5

सम्प्राप्ते कार्त्तिके मासि नवम्यां शुक्लपक्षतः ।सोपवासः शुचिर्भूत्वा दीपकांस्तत्र दापयेत्

samprāpte kārttike māsi navamyāṃ śuklapakṣataḥ / sopavāsaḥ śucirbhūtvā dīpakāṃstatra dāpayet

हिन्दी अर्थ

विद्वान् ब्राह्मण लोग उस वंश के प्रसंग में महात्मा राजा देवाब॒ध के गुणों और वंशों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वह राजा देवावध दूर से जैसा सुना जाता था कि वैसा ही समीप में जाने पर प्रत्यक्ष दिखाई पढ़ता था। राजा देवावध देवताओं के समान गुणशाली था। बश्न् मानव समाज में सर्वेश्रेष्ठ था। इस वंश के पेंसठ सहस्न सत्तर मनुष्यों ने अमृतत्व की प्राप्ति को । बच्नु गुणों में देवावध से भी बढ़ा चढ़ा था ।॥११-१५॥। वह यज्ञ करनेवाला, दानियों का स्वामी, वीर, ब्राह्मणप्रतिपालक, बुद्धिमान् सत्यवादी, कीतिमान् महाभाग्यशाली एवं सात्वत के वंश में उत्पन्न होनेवालों में एकमात्र महारथी था उसके वंश में महान् भोंज (?) वंशीय एवं आतिकाबलों (?) की उत्पत्ति हुई थी। गान्धारोी और माद्री-ये दो वष्णि की स्त्रियाँ थीं। इनमें से

English

With his thousand arms rendered tough by frequent contact with the bowstring, he shone like the Sun with his thousands of autumnal rays.

अध्याय 174

श्लोक 6

गन्धपुष्पैः समभ्यर्च्य रात्रौ कुर्वीत जागरम् ।तस्य यत्फलमुद्दिष्टं तच्छृणुष्व नराधिप

gandhapuṣpaiḥ samabhyarcya rātrau kurvīta jāgaram / tasya yatphalamuddiṣṭaṃ tacchṛṇuṣva narādhipa

हिन्दी अर्थ

प्रसेनभ्र प्रहाभागः शुक्षजिच्च सुताबुभौ । तस्य शुक्रजितः सूर्य: सखा प्राणसमो5भवत्

English

Having conquered the royal assembly of (the serpent king) Karkotaka in Mahismall with a thousand elephants, he established his capital there.

अध्याय 174

श्लोक 7

यावत्पुण्यं फलं संख्या दीपकानां तथैव च ।तावद्युगसहस्राणि शिवलोके महीयते

yāvatpuṇyaṃ phalaṃ saṃkhyā dīpakānāṃ tathaiva ca / tāvadyugasahasrāṇi śivaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

अथ राजा बविवस्वन्तमुबाच स्थितमग्रतः । यथव व्योस्नि पश्यामि त्वामहूं ज्योतिषां पते... तेजोमण्डलिनं चेव तथवाध्यग्रतः स्थितम् । को विशेषों विवस्व॑स्ते सख्येनोपगतेन वे .. रेड एतच्छ त्वा स भगवान्मणिरत्नं स्थमन्तकम् । स्वकण्ठादवमुच्याथ बबन्ध नपतेस्तदा २५

English

(Defective) The lotus-eyed king used to check the for¬ ceful (speedy) waves of the sea during the rainy season (when the sea is stormy). In a happy mood, he sportingly spewed out water and made an (artificial) rainy season.

अध्याय 174

श्लोक 8

तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र लिङ्गपूरणकं विधिम् ।तथैव पद्मकैश्चैव दधिभक्तैस्तथैव च

tasmiṃstīrthe tu rājendra liṅgapūraṇakaṃ vidhim / tathaiva padmakaiścaiva dadhibhaktaistathaiva ca

हिन्दी अर्थ

तमतिप्रस्थितं भूयों विवस्वन्‍्तं स शक़जित् । प्रोवाचाग्निसवर्णा त्वं येन लोकान्प्रयास्थति(सि)॥ तदेब मणिरत्नं तन्‍्मां भवानदातुमहंति द द

English

Shaken and tossed about by him during his (water- sports), Narmada, wearing garlands with golden fillets approached the king in an apprehensive mannar, with eyebrows like waves producing the gentle (murmuring) soun

अध्याय 174

श्लोक 9

यस्तु कुर्यान् नरश्रेष्ठ तस्य पुण्यफलं शृणु ।यावन्ति तिलसंख्यानि दधिभक्तं तथैव च

yastu kuryān naraśreṣṭha tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu / yāvanti tilasaṃkhyāni dadhibhaktaṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

स्पमन्तक नाम मणि दत्तवांस्तस्य भास्कर: । स तसाबध्य नगरं प्रविवेश महीपतिः २८ गान्धारी ने सुमित्र मित्रनन्दन और माद्री ने युधाजित देवमीढुष और अनमित्र नामक पुत्रों को उत्पन्न किया-- वे दोनों पुरुष श्रेष्ठ थे । अनमित्र का पुत्र निध्त हुआ, निध्न के दो पुत्र हुए, महाभाग्यशाली प्रसेन और शक्रजित् । उस शक्रजित् के सूयय प्राणों के समान परम मिन्र थे।!६-२०। एक बार कभी प्रातःकाल के समय रथारोहियों में श्रेष्ठ वह शक्रजित सूय की उपासना करने के लिए अपने लिये अपने रथपर सवार होकर जलाशय

English

Giant fishes and great serpents concealed under great billows were crushed and scattered in the flood of foam, the eddies and whirlpools which were unbearably furious.

अध्याय 174

श्लोक 10

पद्मसंख्या शिवे लोके मोदते कालमीप्सितम् ।तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र यत्किंचिद् दीयते नृप

padmasaṃkhyā śive loke modate kālamīpsitam / tasmiṃstīrthe tu rājendra yatkiṃcid dīyate nṛpa

हिन्दी अर्थ

के जल का स्पश करने निकला । जिस समय वह उपासना कर रहा था, उस समय अस्पष्ट रूप धारण कर अपने तेजोमण्डल से समन्त्रित होकर भगवान् संयेनाराण उसके आगे उपस्थित हुए। सूये के आगे तपस्थित देखकर राजा ने कहा ज्योतिर्गणों के स्वामिन् ! मैं आकादह्य मण्डल में आपको जिस प्रकार तेजोमय देखता हूँ, उसी प्रकार इस समय भी देख रहा हूँ, तो फिर भगवन् ! आपके

English

Agitating it by means of his thousand arms, the king made the ocean resemble the milky sea churned by Devas and Asuras. (Defective verse) On seeing the terrible, prominent king, the (aquatic beings) were afraid that the ocean was once again being churned by the Mandara mountain for the sake of Amrla (nectar) and at once felt uprooted (utpafita in A ).

अध्याय 174

श्लोक 11

सर्वं कोटिगुणं तस्य संख्यातुं वा न शक्यते ।एवं ते कथितं सर्वं सर्वतीर्थमनुत्तमम्

sarvaṃ koṭiguṇaṃ tasya saṃkhyātuṃ vā na śakyate / evaṃ te kathitaṃ sarvaṃ sarvatīrthamanuttamam

हिन्दी अर्थ

मित्र रूप में उपस्थित होने की विशेषता क्या है? शक्रजित की यह बात सुनकर भगवान् सुर्यनारायण ने अपने कण्ठ से स्थमन्तक नामक उत्तम मणि को छोड़कर राजा के कण्ठ में बाँध दिया, उस समय राजा ने सूर्य नारायण को शरीर घारण किये हुए देखा । उस अनृपम तेजस्विनी प्रतिमा को उन्होंने एक मुह॒तं तक उसी प्रकार देखा ।२१-२६। तदनन्तर सूर्य को गमनोद्यत देखकर छाक्रजित ने कहा, 'भगवन् ! आप अशिन के समान परमतैजोमय हैं, आपने जिस प्रकाशमान मणि से इतने प्रकाश युक्त होकर आप समस्त लोकों में भ्रमण करते हैं, उसी सुन्दर मणि को मुझे प्रदान करने की क्रपा करें ।! शक्रजित की इस याचना पर भगवान् सूर्य नारायण ने अपना स्यथमन्तक नामक मणि राजा को प्रदान कर दिया। महीपति ने उस सुन्दर मणि को बाँध क्र

English

Great serpents bent down their heads and stood mo¬ tionless like the stumps of the plantain trees standing still in the evening hours, when the wind does not blow.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।