Vayu Purana
177
अध्याय 177 / 232

Adhyaya 177

18 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

अध्याय 177

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे पिङ्गलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्सप्तत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: भूतीश्वरं ततो गच्छेत्सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम् ।दर्शनाद् एव राजेन्द्र यस्य पापं प्रणश्यति

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe piṅgaleśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭsaptatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 177 śrīmārkaṇḍeya uvāca: bhūtīśvaraṃ tato gacchetsarvatīrtheṣvanuttamam / darśanād eva rājendra yasya pāpaṃ praṇaśyati

हिन्दी अर्थ

राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिये अब्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया था, उस यज्ञ की वेदी के मध्य भाग से पुनवंसु का प्रादुर्भाव हुआ था जिसके कारण पुतवंसु परम विद्वानू धर्मंश, दानशील हवन कर्ता ये । उन पुनवंसु के दो जुड़वा सन्‍्तान उत्पन्न हुए--ऐसोी प्रसिद्धि है, जिनके नाम अपने बाहुबल तथा बाणों से कभी पराजित न होनेवाले आहुक तथा आहुकी थे-ये दो के दोनों बुद्धिमानों

English

(Defective verse) Bhajamana begot of Srhjayl other sons also, viz. Ayutayutajit, Sahasrajit, Sataji.t and Vamaka. Out of those who were born of Bhajamana, king Devavrdha performed a severe penance.

अध्याय 177

श्लोक 2

तत्र स्थाने पुरा पार्थ देवदेवेन शूलिना ।उद्धूलनं कृतं गात्रे तेन भूतीश्वरं तु तत्

tatra sthāne purā pārtha devadevena śūlinā / uddhūlanaṃ kṛtaṃ gātre tena bhūtīśvaraṃ tu tat

हिन्दी अर्थ

में अग्रगण्य थे। उस आहुक के लिये पुराने लोग कुछ श्लोकों का गान करते हैं। जिनका आशय इस प्रकार है। वे महाराज आहुक मेघों के समान भीषण रव करनेवाले, समस्त रणसामग्रियों से सुसज्जित, प्रत्येक अवयरवों से सुसंगंठित, ध्वजाओं और कवचों से सुरक्षित, दस सहस्र रथों से तथा सुन्दर श्वेत वर्ण के परिच्छद से सुशोभित, किशोर अवस्थावाले, दस सहृश्त अस्सी अदवों से परिवेष्टित होकर रण में माक्रमण करते थे । उसके वंश में उत्पन्न होनेवाले में से कोई भी ऐसा नहीं हुआ, जो भअसत्यवादी

English

He had this thought in his mind, 'May a son endowed with all good qualities be born to me 5. After concentrating on this in Yoga, he touched the waters of the river Parnasa. 3 4

अध्याय 177

श्लोक 3

पुष्ये वा जन्मनक्षत्रे अमावास्यां विशेषतः ।भूतीश्वरे नरः स्नात्वा कुलकोटिं समुद्धरेत्

puṣye vā janmanakṣatre amāvāsyāṃ viśeṣataḥ / bhūtīśvare naraḥ snātvā kulakoṭiṃ samuddharet

हिन्दी अर्थ

नाशुचिर्नाष्यधर्मात्मा नाविद्वान्न कृशोइभवत् । आहुकस्य धृतिः पुत्र इत्येबमनुशुभुम

English

On being touched by him, the river, the most excellent of all rivers, desired for the welfare of the king.

अध्याय 177

श्लोक 4

तत्र स्थाने तु यो भक्त्या कुरुते ह्यङ्गगुण्ठनम् ।तस्य यत्फलमुद्दिष्टं तच्छृणुष्व नराधिप

tatra sthāne tu yo bhaktyā kurute hyaṅgaguṇṭhanam / tasya yatphalamuddiṣṭaṃ tacchṛṇuṣva narādhipa

हिन्दी अर्थ

पुरव॑त्थां दिशि नागानां भोजस्य प्रतिमोइ्भवत् । रूप्यकाचनकक्षाणां सहल्लाण्यकविशति: आहुकश्रा55हुकास्धाय स्वसारं त्वाहुकी ददो । आहुकान्धस्य दुहिता द्वो पुत्रों संबमुवतुः ३१२७ देवकश्योग्रसेनश्च देवगर्भसमाव॒भों । देवकस्य सुता वीरा जज्षिरे त्रिदशोपमाः १२८ देवानामपि देवश्च सुदेवो देवरड्िजजिता । तेषां स्वसारः सप्ता55सन्वसुदेवाय तां ददो १२६ वकदेवोपदेवा व तथाइस्या देवरक्षिता श्रीदेवा शान्तिदिवा च महादेवा तथा5परा १३०

English

Anxiously engrossed in thought, the river decided thus: <C I do not find any woman in whom a son like this, endowed with all good qualities, will He born to the king Devavrdha. Hence I shall myself become his wife (Sahavrata— a woman who performs holy rites in one's company). She assu¬ med hands 1 (i.e. human form) in accordance with her intention.

अध्याय 177

श्लोक 5

यावन्तो भूतिकणिका गात्रे लग्नाः शिवालये ।तावद्वर्षसहस्राणि शिवलोके महीयते

yāvanto bhūtikaṇikā gātre lagnāḥ śivālaye / tāvadvarṣasahasrāṇi śivaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

सप्तमी देवकी तासां सुनामा चारुदर्शना नवोग्रसेनस्थ सुताः कंसस्तेषां तु पूर्व॑जः १३१

English

Taking the form of a girl, Savitrl(the rivcr)rcpeated the

अध्याय 177

श्लोक 6

सर्वेषामेव स्नानानां भस्मस्नानं परं स्मृतम् ।पुराणैर् ऋषिभिः प्रोक्तं सर्वशास्त्रेष्वनुत्तमम्

sarveṣāmeva snānānāṃ bhasmasnānaṃ paraṃ smṛtam / purāṇair ṛṣibhiḥ proktaṃ sarvaśāstreṣvanuttamam

हिन्दी अर्थ

हो यज्ञादि का अनुष्ठान न करता हो, एक सहस्त्र से कम दान करनेवाला हो, अ्पवित्र हो, अधर्मी हो मूं हो अथवा दुबंल शरीर वाला हो अर्थात् उसके बंश में उत्पस्न होनेवाले सब उपयुक्त सब अवगुणों से सर्वथा रहित थे। उस महाराज आहुक के पुत्र घृत हुए--ऐसा हम लोगों ने सुना है।११८-१२३॥ आहुक ने पूर्थ दिशा में सुवर्ण भौर चाँदी के आभूषणों से घुसज्जित इक्क्रीस सहस्न हाथियों की बलवान् सेना लेकर भोजराज की समानता की थी, इसी प्रकार उत्तर दिशा में भी उतनी ही सेनाएँ लेकर भोजराज के ऊपर आक्रमण कियाँ था, जिसमें उसकी किकणी (प्र के घुंघुछ) उठ पड़ी थी-- ऐसी प्रसिद्धि है। उस महराज आहुक ने अपनी बहिन आहु ही को आहुकान्ध को समर्पित किया था, उसके संबोग से आहुकान्घ को एक पुत्री तथा दो पुत्र उत्पन्त हुए । उन दोनों पुत्रों के नाम देवक तथा उम्रसेन

English

This chapter corresponds to Bd. 3.71. Hcncc only versc-numbcrs of this chapter arc mentioned for comparison.

अध्याय 177

श्लोक 7

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं चापि यः सदा ।स्नानं करोति चाग्नेयं पापं तस्य प्रणश्यति

ekakālaṃ dvikālaṃ vā trikālaṃ cāpi yaḥ sadā / snānaṃ karoti cāgneyaṃ pāpaṃ tasya praṇaśyati

हिन्दी अर्थ

थे, ये दोनों पुत्र देवताओं के गर्भ (बच्चों) के समान प्रभावशाली तथा सुन्दर थे ।२४-१२७३। देवक के जो पुत्र उत्पन्न हुए वे देवताओं के समान प्रभावशालौ, सुन्दर तथा शूरबीर थे, इनके नाम थे देवदेव, सुहैव और देवरडिजता । उनकी स्रात बहनें भी थीं. जिन्हें उन्‍होंने वघुदेव को सप्रपित किया था, उनके नाम थे, वृऊदेवा, उपदेवा, देवरसिता, श्रौदेवा, शान्तिदेवा, महादेवा तथा देवकी । देवकी इन सबों में देखने में

English

The list of sons in Bd.P. (vv. 3-6) differs. It gives the names of the sons as follows: Nimloci, Kirnkana, Dhr§ti, Parapuranjaya.

अध्याय 177

श्लोक 8

दिव्यस्नानाद्वरं स्नानं वायव्यं भरतर्षभ ।वायव्यादुत्तमं ब्राह्म्यं वरं ब्राह्म्यात् तु वारुणम्

divyasnānādvaraṃ snānaṃ vāyavyaṃ bharatarṣabha / vāyavyāduttamaṃ brāhmyaṃ varaṃ brāhmyāt tu vāruṇam

हिन्दी अर्थ

परम सुरुदरी थी । उम्रसेन के नव पुत्र थे जिनमें कंस सबसे बड़ा था ।१३८-१३९१। उन सबों के नाम थे, न्यग्रोष, सुनामा, कद्वशंकु, भूमय, सुतनु, राष्ट्रपाल, युद्धात्तष्ट और पुष्टिमान्। इन नवों भाइयों की पाँच बहिनें भी थीं, जिनके नाम थे कमंवती, धमंवती, शत्तांकु, राष्ट्रपाला और सुन्दरी कंत्बो । उम्रसेन महानू (+तेषां स्वसारः पञचेव कर्मंथमंवतो तथा । शतांक़्राष्ट्रपाला च कह्ना चंव वराड्रना

English

The river Banas in Rajasthan—a tributary to Chambal. De 146.

अध्याय 177

श्लोक 9

आग्नेयं वारुणाच्छ्रेष्ठं यस्मादुक्तं स्वयम्भुवा ।तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ह्याग्नेयं स्नानम् आचरेत्

āgneyaṃ vāruṇācchreṣṭhaṃ yasmāduktaṃ svayambhuvā / tasmātsarvaprayatnena hyāgneyaṃ snānam ācaret

हिन्दी अर्थ

भजमानस्य पुत्रस्तु रथिमुख्यों विदु्रथः राज्याधिदेवः श्रश्व विदुरश्च सुतोषभवत्

English

Has,a translated here is obscure. Bd. 3.71.11 reads h T Ulha for hosla hereof. It means (in Bd. P.) II '(her emotional attachment) welled up in her

अध्याय 177

श्लोक 10

युधिष्ठिर उवाच: आग्नेयं वारुणं ब्राह्म्यं वायव्यं दिव्यमेव च ।किमुक्तं श्रोतुम् इच्छामि परं कौतूहलं हि मे

yudhiṣṭhira uvāca: āgneyaṃ vāruṇaṃ brāhmyaṃ vāyavyaṃ divyameva ca / kimuktaṃ śrotum icchāmi paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

कृतबर्मा कृतस्तेषां शतधन्वा तु मध्यमः । देवाहुश्व वनाहें श्र भिषस्द्वेतरथश्न यः ११२६ सुदान्तभ्रव धियान्तश्न नाकवान्कनको:द्धूवः । देवाहेश्व सुतो विद्वाञुजज्ञ कम्बलबहिषः १४० असमोजाः सुतस्तस्य सुसमोजाशभ्र विश्वुतः। अजावपुत्राय ततः प्रददावसमोजसे सुदंध्द व सुरूप वर कृष्ण इत्यन्धकाः स्मृताः द ॥ १४ १ » अन्धकानामिमं वंश कीतंयानस्तु नित्यशः । आत्मनों विपुल॑ वंश लभते नात्र संशयः १४२

English

Gandharl gave birth toSumitra and Mitranandana. Madri gave birth to the sons Yudhajit, Devamldhusa and Anamitra. The two (last mentioned) were excellent men. Nighna was Anamitra's son. Nighna had two sons.

अध्याय 177

श्लोक 11

मार्कण्डेय उवाच: आग्नेयं भस्मना स्नानमवगाह्य च वारुणम् ।आपोहिष्ठेति च ब्राह्म्यं वायव्यं गोरजः स्मृतम्

mārkaṇḍeya uvāca: āgneyaṃ bhasmanā snānamavagāhya ca vāruṇam / āpohiṣṭheti ca brāhmyaṃ vāyavyaṃ gorajaḥ smṛtam

हिन्दी अर्थ

सम्ततियों वाला विज्यात कुक्कुर वंशीय राजा थे । इन परम तेजस्वी कुक्‍्कुरों के वंश विवरण को जो मनुष्य स्मरण रखता है, वह अपने विपुल वंश का पालन तथा उत्तम सनन्‍्तानों वाला होता है ।१३२- है रेट) भजमान के पुत्र रथारोहियों में श्रेष्ठ विदृरथ हुए, उनके राज्याधिदेव शुर और विदुर नामक पुत्र हुए। इनमें से शुर के महाबलशाली पुत्र हुए, जिनके नाम वात, निवात, शोणित, श्वेतवाहन, शमी;

English

They were the blessed Prasena and Sakrajit. Surya" (the Sun-god) was an intimate bosom friend of Sakrajit. 3

अध्याय 177

श्लोक 12

सूर्ये दृष्टे तु यत्स्नानं गङ्गातोयेन तत्समम् ।तत्स्नानं पञ्चमं प्रोक्तं दिव्यं पाण्डवसत्तम

sūrye dṛṣṭe tu yatsnānaṃ gaṅgātoyena tatsamam / tatsnānaṃ pañcamaṃ proktaṃ divyaṃ pāṇḍavasattama

हिन्दी अर्थ

गदवर्मा, निदात और शक्रजितू थे इनमें से समी का पुत्र प्रतिक्षिप्त था, प्रतिक्षिप्त का पुत्र स्वयम्भोज हुआ । स्वयम्भोज से हृदिक नामक पुत्र हुआ, हृदिक के दशा भयानक पराक्रमशाली पुत्र हुए, उनमें सबसे बढ़े पुत्र का नाम कृतवर्मा था, उससे मझला शतधन्वा हुआ, अन्य पुत्रों के नाम देवाहें, वनाहं, भिषक्, द्वंतरथ, सुदान्त, धियान्त, नाकवान् और कनकोज्भरव थे ।!३५-१३९॥ै। इनमें सुदेवाहं का प्रश्न परम विद्वान कम्बलहिष उतपस्‍न हुआ, उसके असमोजा और सुसमोजा नामक दो पुत्र थे। इनमें असमौजा को कोई पुत्र नहीं था, कष्ण ने उसे सुदंष्ट्र और सुरूप नामक दो पुत्र दिये थे--अन्धकों का वंश विवरण इतना कहा जाता है । अन्धकों के इस वंशविवरण का नित्य कीत॑न करनेवाला मनुष्य इस लोक में अपने वंश का विपुल विस्तारक होता है--इसमें संदेह नहीं ।(४०-१४२। शूर ने अस्मकी में देवमीदुष को उत्पन्त किया। माषी में देवमाटठुष

English

lasydnvaye sumahabhojaycmarlikabaldh in the text is obscure. Bd. 3.71.18 reads:

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श्लोक 13

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नात्वा भूतीश्वरे तु यः ।पूजयेद् देवमीशानं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः

tasmātsarvaprayatnena snātvā bhūtīśvare tu yaḥ / pūjayed devamīśānaṃ sa bāhyābhyantaraḥ śuciḥ

हिन्दी अर्थ

घनुद्िचिल्वस्तगंतग्रस्थो ह. पुस्तके नास्ति । नास्तीदमर्ध घ. पुस्तके ।

English

Pu r va in the text is wrong. Surya (as in A and Bd. P.) is accepted here as the following verses also confirm it.

अध्याय 177

श्लोक 14

तत्र स्थाने तु ये नित्यं ध्यायन्ति परमं पदम् ।सूक्ष्मं चातीन्द्रियं नित्यं ते धन्या नात्र संशयः

tatra sthāne tu ye nityaṃ dhyāyanti paramaṃ padam / sūkṣmaṃ cātīndriyaṃ nityaṃ te dhanyā nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

अस्मक्यां जनयामास शूरो वे देबमीुषम् । माष्यां तु जनयामास शुरो वे देवमाहुष॑म् भाष्यां तु जक्षिरे शुराज्भोजायां पुरुषा दंश । बासुदेवों महाबाहु:पूर्व मानकदुन्दुभिः . १४४ जज्ञे तस्य प्रसुतस्य दुन्दुभिः प्राणदद्विवि । आनकानों च सल्लाद सुमहानभवदिवि १४५ पपात पुष्पवर्ष च श्रस्य भवने महत् । मनुष्यलोके कृत्स्नेडपि रूपे नास्ति समो भुवि

English

Compare the Story of the Syamaniaka gem in Bh.P. X. Chs. 56 and 57; Bd. 3.71.22-99.

अध्याय 177

श्लोक 15

मुक्तितीर्थं तु तत्तीर्थं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम् ।दर्शनादेव यस्यैव पापं याति महत्क्षयम्

muktitīrthaṃ tu tattīrthaṃ sarvatīrtheṣvanuttamam / darśanādeva yasyaiva pāpaṃ yāti mahatkṣayam

हिन्दी अर्थ

यस्या55सोत्पुरुषाग्रधस्य कीर्तिश्रन्द्रसमसो यथा । वेदभागस्ततो जज्ञे ततो देवश्रवाः पुन

English

Once, at the close of a night, the king who was driving in his chariot, got down near the bank (of a river) in order to perform the worship of the Sun with water libation.

अध्याय 177

श्लोक 16

जायते पूजया राज्यं तत्र स्तुत्वा महेश्वरम् ।जपेन पापसंशुद्धिर्ध्यानेनानन्त्यमश्नुते

jāyate pūjayā rājyaṃ tatra stutvā maheśvaram / japena pāpasaṃśuddhirdhyānenānantyamaśnute

हिन्दी अर्थ

अनादिष्टिकडश्चेव नन्‍्वनश्चेव भडज्जिनः । श्यामः शमीको गण्ड्षश्रत्वारस्तु बराड्रनाः पथा च श्रतवेदा च श्रुतकीर्ति: श्रुतश्षवा । राजाधिदेवी च तथा पञचता वीरमातर १४६ पृथां दुहितरं चक्र कुन्तिस्तां पाण्ड्रावहत् । अनपत्याय वृद्धाय कुन्तिभोजाय तां ददों १५०

English

While he was worshipping, Vivasvan, the Sun-god, the

अध्याय 177

श्लोक 17

ॐ ज्योतिः स्वरूपम् अनादिमध्यम् अनुत्पाद्यमानम् अनुचार्यमाणाक्षरम् ।सर्वभूतस्थितं शिवं सर्वयोगेश्वरं सर्वलोकेश्वरं मोहशोकहीनं महाज्ञानगम्यम्

oṃ jyotiḥ svarūpam anādimadhyam anutpādyamānam anucāryamāṇākṣaram / sarvabhūtasthitaṃ śivaṃ sarvayogeśvaraṃ sarvalokeśvaraṃ mohaśokahīnaṃ mahājñānagamyam

हिन्दी अर्थ

पुथा जज्ञे ततः पुत्रांसत्रीनग्निसमतेजसः । लोके5प्रतिरथान्वी राञ्शक्रतुल्यपराक्रमान्

English

The Sun-god thereupon gave him t } Out of affection, the king Sah J prascna M t.

अध्याय 177

श्लोक 18

तत्र तीर्थे तु यो गत्वा स्नानं कुर्यान्नरेश्वर ।अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।एवम्भूतं न जानन्ति मोक्षापेक्षणिका नराः

tatra tīrthe tu yo gatvā snānaṃ kuryānnareśvara / aśvamedhasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ / evambhūtaṃ na jānanti mokṣāpekṣaṇikā narāḥ

हिन्दी अर्थ

धर्माग्ुधिष्टिरं पुत्र मार्ताच्च वृकोदरम् । इन्द्राउनंजयं चेव पृथा पुत्नानजीजनत् १५३ की उत्पत्ति हुई भोजपुन्नी भाषों ने उन्हीं शूर के संयोग से दस पुरुषों (पुत्रों) को जन्म दिया। इनमें वधुदेव महाबलशाली थे, इनकी ख्याति पृवंकाल में आनकदृन्दुभि ताम से थी । जिस समय उतका जन्म हुआ था उस समय आकाश में दुन्दुभि ओर मृदंग की अति मनोहर शम्मीर ध्वनि होने लगी थी, शूंर के राजभवन में आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी थी । सम्पूर्ण मत्यंलोक में वासुदेव के समान रूपवान कीई

English

The clouds shower at the P™P C " e. f ofany where the jewel Syamantaka is present. There

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।