Vayu Purana
212
अध्याय 212 / 232

Adhyaya 212

10 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ10 श्लोक

अध्याय 212

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मुण्डितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकादशोत्तरद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २१२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि देवस्य चरितं महत् ।श्रुतमात्रेण येनाशु सर्वपापैः प्रमुच्यते

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe muṇḍitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikādaśottaradviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 212 śrīmārkaṇḍeya uvāca: athānyat sampravakṣyāmi devasya caritaṃ mahat / śrutamātreṇa yenāśu sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

त्यक्त्वा देहानायुषोन्ते कृतार्थान्पुण्यॉल्लोकान्धप्राप्य यथेष्टं चरिष्यथ ४ १ एते ते नेमिषेया वे इष्ट्वा सुष्ट्वा च वे तदा जम्सुश्वावभृथस्नाताः स्वर्ग सर्वे तु सत्रिण: एव्मेतच्चतुष्पादं पुराणं लोकसंमतम् । उवाच भगवान्साक्षाद्वायुलोकिहिते रतः

English

"I shall recount to you how the creation functions (again). The order of the creation should be known (to occur) as (it took place) before.

अध्याय 212

श्लोक 2

भिक्षुरूपं परं कृत्वा देवदेवो महेश्वरः ।एकशालां गतो ग्रामं भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः

bhikṣurūpaṃ paraṃ kṛtvā devadevo maheśvaraḥ / ekaśālāṃ gato grāmaṃ bhikṣārthī kṣutpipāsitaḥ

हिन्दी अर्थ

नंमिषे सत्रमासाद्य मुनिभ्यो मुनिसत्तमाः तत्यसादादसंदिग्धं भुतोत्पत्तिलयानि च ४६ प्राधानिकीमिमां सष्टि तथवेश्वरकारिताम् । सम्यग्विदित्वा सेधावी न मोहमधिमच्छति ९४७

English

I shall mention what is seen and what can be inferred. I shall mention cogent arguments. From it (the principle of creative function), all words recede without reaching it along with the mind (i.e. the mind cannot conceive it, the words cannot express it).

अध्याय 212

श्लोक 3

अक्षसूत्रोद्यतकरो भस्मगुण्ठितविग्रहः ।स्फुरत्त्रिशूलो विश्वेशो जटाकुण्डलभूषितः

akṣasūtrodyatakaro bhasmaguṇṭhitavigrahaḥ / sphurattriśūlo viśveśo jaṭākuṇḍalabhūṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

............ नल. प न 2 चतनन७ अिरननभगनग नीच पाए ॑छजन-णओ?ओ9७७०७ आओ तिडिनणणीक पाणण+।ण ++ "है समस्त भूत चय एक ही साथ उत्पन्न होते हैं, वे ही इन्द्रियों के नाम से भी विख्यात हैं । उन भूत समूहों से अन्यान्य भूत भेदों की उत्पत्ति होती है इस प्रकार सृष्टि का प्रवतंन होता है। है ऋषिवन्द ! सृष्टि की यह कथा परम विस्तृत एवं महान् है। मेरी ज॑ंसी कुछ बुद्धि थी, ज॑मसा मैंने सुना था, वैसा आप लोगों के सम्मुख बतला चुका, उसे उक्त प्रकार से ही समझिए। नेभिषारण्यवासी महषियों ने सुत से लोक को स्थिति

English

Just as the unmanifest is invisible and incomprehensi¬ ble, (the objects of creation too) are invisible and incomprehen¬ sible. When the Vikdrai (evolutes) become dissolved they are seen nowhere. The Gunas attain equilibrium and the created things recede.

अध्याय 212

श्लोक 4

कृत्तिवासा महाकायो महाहिकृतभूषणः ।वादयन्वै डमरुकं डिण्डिमप्रतिमं शुभम्

kṛttivāsā mahākāyo mahāhikṛtabhūṣaṇaḥ / vādayanvai ḍamarukaṃ ḍiṇḍimapratimaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

उत्पत्ति, एवं विनाश की उक्त वार्ता सुनने के उपरान्त उस दीघंकालीन यज्ञ में अवभृथ स्नान किया और पृण्य लोकों को प्राप्त किया । उसी प्रकार आप लोग भी विधिपूर्वक देवादि की पूजा अर्चा कर, यज्ञास्त में अवभूथ स्नान से शुद्धि लाभ कर, दीर्घायु के उपभोग के उपरान्त शरीरों को छोड़कर पुण्यप्रद लोकों को प्राप्त करोगे और वहाँ कृतकत्य होकर यथेच्छ विहार करोगे यज्ञकर्ता नेमिषारण्यवासी महर्षियों से जिस

English

Pradhana stands on a similar footing with Purusas. The Dharmas and the Adharmas of living beings too merge in Avyakla (the Unmanifest).

अध्याय 212

श्लोक 5

कपालपाणिर्भगवान्बालकैर् बहुभिर् वृतः ।क्वचिद्गायन्हसंश्चैव नृत्यन्वदन् क्वचित् क्वचित्

kapālapāṇirbhagavānbālakair bahubhir vṛtaḥ / kvacidgāyanhasaṃścaiva nṛtyanvadan kvacit kvacit

हिन्दी अर्थ

प्रकार यज्ञादि का अनुष्ठान कर, प्रजाओं की सृष्टि कर, यज्ञस्नात में अवभूथ स्नान के उपरान्त स्वर्ग को प्राप्त किया था उसी प्रकार द्विजवर्य वन्द तुम लोग भी अनेक प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान कर स्वर्ग को प्राप्त करोगे ।३६-४३। कथा वस्तुपरिग्रहात्मक (वर्ण्यं विषयों की सूची) प्रक्रिया, अनुषज्ञ, उपोद्घात एवं उपसंहार इन चार पादों से उपबृ हित लोक सम्मत इस महापुराण को लोक कल्याण में निरत साक्षात् भगवान् वायु ने यज्ञ के प्रसद्भ में मुनियों से कहा था। उन्हीं की कपा से प्राप्त, इस असन्दिग्ध, भूतों की उत्पत्ति एवं विनाश की कथा से युक्त लोक की प्रधान सृष्टि एवं ईदवर कारिता को भलो भाँति जानकर मेधावी पुरुष मोह वच्चय नहीं होता ।४४-४७। जो विद्वान ब्राह्मण इस पुरातन इतिहास को सुनता है या दूसरों को सुनाता है,

English

Their Dharma of the nature of Sattva gets settled in the Guna of Sattva, while Adharma of the nature of Tamas (darkness) abides in the Guna Tamas.

अध्याय 212

श्लोक 6

यत्र यत्र गृहे देवो लीलया डिण्डमं न्यसेत् ।भाराक्रान्तं गृहं पार्थ तत्रतत्र विनश्यति

yatra yatra gṛhe devo līlayā ḍiṇḍamaṃ nyaset / bhārākrāntaṃ gṛhaṃ pārtha tatratatra vinaśyati

हिन्दी अर्थ

स्थानेषु स महेखस्य मोदते शाश्वतीः समा: । ब्रह्मसायों (यु) ज्यगो भुत्वा ब्रह्मणा सह मोक्ष्यते

English

These two Gunas arc devoid of distinction when the Gunas are in the state of equilibrium. In all the functions of Pradhana the activities will be backed by the intellect.

अध्याय 212

श्लोक 7

एवं सम्प्रचरन् देवो वेष्टितो बहुभिर् जनैः ।दृश्यादृश्येन रूपेण निर्जगाम बहिः प्रभुः

evaṃ sampracaran devo veṣṭito bahubhir janaiḥ / dṛśyādṛśyena rūpeṇa nirjagāma bahiḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

तेषां कौतिमतां कौति प्रजेशानां महात्मनान् 2 । प्रथयन्पृथिवीशानां ब्रह्ममुयाय गच्छति ॥५०+ धग्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदश्च संमतस् । कृष्णद्ववायनेनोक्त पुराणं ब्रह्मवादिनः ॥५ १ मन्वन्तरेश्वराणां च यः कीति प्रथयेदिमाम् । देवतानामृषीणां व भुरिद्रविणतेजसाम् ॥।

English

The Ksetrajna will preside over those Gunas without the (intermediary) intellect. Thus the Pura (physical body) will be attained through Abhimana (the act of identification).

अध्याय 212

श्लोक 8

इतश्चेतश्च धावन्तं न पश्यन्ति यदा जनाः ।विस्मितास्ते स्थिताः शम्भुर्भविष्यति ततो ऽस्तुवन्

itaścetaśca dhāvantaṃ na paśyanti yadā janāḥ / vismitāste sthitāḥ śambhurbhaviṣyati tato 'stuvan

हिन्दी अर्थ

स सर्वेमुच्यते पाप: पुण्यं च महदाप्नुयात् ५२ यश्चेदं श्रावयेद्विद्वान्सदा पर्वणि पर्वणि । धूतपाप्सा जितस्वर्गों ब्रह्मभुयाय कल्पते

English

When it becomes necessary to function both 1 the Ksetra and Ksetrajna begin to interact mutually; they become united together in the relationship of Bhojya (that which has to be enjoyed) and Bhoktr (the enjoyer).

अध्याय 212

श्लोक 9

तेषां तु स्तुवतां भक्त्या शङ्करं जगतां पतिम् ।डिण्डिरूपो हि भगवांस्तदासौ प्रत्यदृश्यत

teṣāṃ tu stuvatāṃ bhaktyā śaṅkaraṃ jagatāṃ patim / ḍiṇḍirūpo hi bhagavāṃstadāsau pratyadṛśyata

हिन्दी अर्थ

यश्चेदं भ्रावयेच्छाद़े ब्राह्मणान्पादमन्ततः । अक्षय सार्वकामीय॑ पित् स्तच्चोपतिष्ठति ५४ अथवा शिष्यों को पढ़ाता है, वह महेन्द्र के स्थान को प्राप्त कर अनण्त काल पर्यन्त सुख का अनुभव करता है । ब्रह्म साम्राज्य प्राप्त कर बहा के साथ मुक्ति लाभ करता है। परम ऐश्वयंशाली प्रजापतियों की यशोगाथाओं का, जो वास्तव में इस समस्त भूमण्डल के अधीरवर हैं, गान कर प्राणी ब्रह्मत्व की प्राप्ति करता है। कृष्ण- हैपायन वेद व्यास रचित इस परम यशोदायक, आयु प्रदाता, पुण्पप्रद, वेदों द्वारा सम्मानित पुराण को ब्रह्मवेता

English

The only refuge for them is the Avyakta. Stabilised in the state of equilibrium, the group of Gunas become presided over by the Ksetrajna (at the time of the beginning of creation) and then their equilibrium is upset. Then both Ksetra and Ksetrajna reach the state of

अध्याय 212

श्लोक 10

तदाप्रभृति देवेशो डिण्डिमेश्वर उच्यते ।दर्शनात् स्पर्शनाद् राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते

tadāprabhṛti deveśo ḍiṇḍimeśvara ucyate / darśanāt sparśanād rājan sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

लोग जानते हैं ।जो इन मन्‍्वन्तरेश्वरों की यशोगाथा का वर्णन करता है, परम ऐश्वयेशाली, तेजस्वी

English

The twcntyfour principles of the nature of Gunas beginning with Mahat and ending with Viiefa (which are called Vikaras) attain the Ksetrajna, Pradhana and Purusa.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।