अध्याय 110
श्लोक 1
कहु केहि कहिय कृपानिधे! भव-जनित बिपति अति ।इंद्रिय सकल बिकल सदा, निज निज सुभाउ रति
kahu kehi kahiya kṛpānidhe! bhava-janita bipati ati | iṃdriya sakala bikala sadā, nija nija subhāu rati
अध्याय 110
कहु केहि कहिय कृपानिधे! भव-जनित बिपति अति ।इंद्रिय सकल बिकल सदा, निज निज सुभाउ रति
kahu kehi kahiya kṛpānidhe! bhava-janita bipati ati | iṃdriya sakala bikala sadā, nija nija subhāu rati
अध्याय 110
जे सुख-संपति, सरग-नरक संतत सँग लागी ।हरि! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी
je sukha-saṃpati, saraga-naraka saṃtata sa~ga lāgī | hari! parihari soi jatana karata mana mora abhāgī
अध्याय 110
मैं अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे ।जो न द्रवहु रघुबीर धीर, दुख काहे न लागे
maiṃ ati dīna, dayālu deva suni mana anurāge | jo na dravahu raghubīra dhīra, dukha kāhe na lāge
अध्याय 110
जद्यपि मैं अपराध-भवन, दुख-समन मुरारे ।तुलसिदास कहँ आस यहै, बहु पतित उधारे
jadyapi maiṃ aparādha-bhavana, dukha-samana murāre | tulasidāsa kaha~ āsa yahai, bahu patita udhāre
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.