अध्याय 137
श्लोक 1
जौपै कृपा रघुपति कृपालुकी, बैर औरके कहा सरै ।होइ न बाँको बार भगतको, जो कोउ कोटि उपाय करै
jaupai kṛpā raghupati kṛpālukī, baira aurake kahā sarai | hoi na bā~ko bāra bhagatako, jo kou koṭi upāya karai
अध्याय 137
जौपै कृपा रघुपति कृपालुकी, बैर औरके कहा सरै ।होइ न बाँको बार भगतको, जो कोउ कोटि उपाय करै
jaupai kṛpā raghupati kṛpālukī, baira aurake kahā sarai | hoi na bā~ko bāra bhagatako, jo kou koṭi upāya karai
अध्याय 137
तकै नीचु जो मीचु साधुकी, सो पामर तेहि मीचु मरै ।बेद-बिदित प्रहलाद-कथा सुनि, को न भगति-पथ पाउँ धरै
takai nīcu jo mīcu sādhukī, so pāmara tehi mīcu marai | beda-bidita prahalāda-kathā suni, ko na bhagati-patha pāu~ dharai
अध्याय 137
गज उधारि हरि थप्यो बिभीषन, ध्रुव अबिचल कबहूँ न टरै ।अंबरीष की साप सुरति करि, अजहुँ महामुनि ग्लानि गरै
gaja udhāri hari thapyo bibhīṣana, dhruva abicala kabahū~ na ṭarai | aṃbarīṣa kī sāpa surati kari, ajahu~ mahāmuni glāni garai
अध्याय 137
सौं धौं कहा जु न कियो सुजोधन, अबुध आपने मान जरै ।प्रभु-प्रसाद सौभाग्य बिजय-जस, पांडवनै बरिआइ बरै
sauṃ dhauṃ kahā ju na kiyo sujodhana, abudha āpane māna jarai | prabhu-prasāda saubhāgya bijaya-jasa, pāṃḍavanai bariāi barai
अध्याय 137
जोइ जोइ कूप खनैगो परकहँ, सो सठ फिरि तेहि कूप परै ।सपनेहुँ सुख न संतद्रोहीकहँ, सुरतरु सोउ बिष-फरनि फरै
joi joi kūpa khanaigo parakaha~, so saṭha phiri tehi kūpa parai | sapanehu~ sukha na saṃtadrohīkaha~, surataru sou biṣa-pharani pharai
अध्याय 137
हैं काके द्वै सीस ईसके जो हठि जनकी सीवँ चरै ।तुलसिदास रघुबीर-बाहुबल सदा अभय काहू न डरै
haiṃ kāke dvai sīsa īsake jo haṭhi janakī sīva~ carai | tulasidāsa raghubīra-bāhubala sadā abhaya kāhū na ḍarai
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded
धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.