अध्याय 161
श्लोक 1
तो सों प्रभु जो पै कहूँ कोउ होतो ।तौ सहि निपट निरादर निसिदिन, रटि लटि ऐसो घटि को तो
to soṃ prabhu jo pai kahū~ kou hoto | tau sahi nipaṭa nirādara nisidina, raṭi laṭi aiso ghaṭi ko to
अध्याय 161
तो सों प्रभु जो पै कहूँ कोउ होतो ।तौ सहि निपट निरादर निसिदिन, रटि लटि ऐसो घटि को तो
to soṃ prabhu jo pai kahū~ kou hoto | tau sahi nipaṭa nirādara nisidina, raṭi laṭi aiso ghaṭi ko to
अध्याय 161
कृपा-सुधा-जलदान माँगिबो कहौं सो साँच निसोतो ।स्वाति-सनेह-सलिल-सुख चाहत चित-चातक सो पोतो
kṛpā-sudhā-jaladāna mā~gibo kahauṃ so sā~ca nisoto | svāti-saneha-salila-sukha cāhata cita-cātaka so poto
अध्याय 161
काल-करम-बस मन कुमनोरथ कबहुँ कबहुँ कुछ भो तो ।ज्यों मुदमय बसि मीन बारि तजि उछरि भभरि लेत गोतो
kāla-karama-basa mana kumanoratha kabahu~ kabahu~ kucha bho to | jyoṃ mudamaya basi mīna bāri taji uchari bhabhari leta goto
अध्याय 161
जितो दुराव दासतुलसी उर क्यों कहि आवत ओतो ।तेरे राज राय दशरथके, लयो वयो बिनु जोतो
jito durāva dāsatulasī ura kyoṃ kahi āvata oto | tere rāja rāya daśarathake, layo vayo binu joto
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.