Vinaya Patrika
191
अध्याय 191 / 279

पद १९१

9 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ9 श्लोक

अध्याय 191

श्लोक 1

एक सनेही साचिलो केवल कोसलपालु ।प्रेम-कनोड़ो रामसो नहिं दूसरो दयालु

eka sanehī sācilo kevala kosalapālu | prema-kanoḍa़o rāmaso nahiṃ dūsaro dayālu

अध्याय 191

श्लोक 2

तन-साथी सब स्वारथी, सुर ब्यवहार-सुजान ।आरत-अधम-अनाथ हित को रघुबीर समान

tana-sāthī saba svārathī, sura byavahāra-sujāna | ārata-adhama-anātha hita ko raghubīra samāna

अध्याय 191

श्लोक 3

नाद निठुर, समचर सिखी, सलिल सनेह न सूर ।ससि सरोग, दिनकरु बड़े, पयद प्रेम-पथ कूर

nāda niṭhura, samacara sikhī, salila saneha na sūra | sasi saroga, dinakaru baḍa़e, payada prema-patha kūra

अध्याय 191

श्लोक 4

जाको मन जासों बँध्यो, ताको सुखदायक सोइ ।सरल सील साहिब सदा सीतापति सरिस न कोइ

jāko mana jāsoṃ ba~dhyo, tāko sukhadāyaka soi | sarala sīla sāhiba sadā sītāpati sarisa na koi

अध्याय 191

श्लोक 5

सुनि सेवा सही को करै, परिहरै को दूषन देखि ।केहि दिवान दिन दीन को आदर-अनुराग बिसेखि

suni sevā sahī ko karai, pariharai ko dūṣana dekhi | kehi divāna dina dīna ko ādara-anurāga bisekhi

अध्याय 191

श्लोक 6

खग-सबरी पितु-मातु ज्यों माने, कपि को किये मीत ।केवट भेंट्यो भरत ज्यों, ऐसो को कहु पतित-पुनीत

khaga-sabarī pitu-mātu jyoṃ māne, kapi ko kiye mīta | kevaṭa bheṃṭyo bharata jyoṃ, aiso ko kahu patita-punīta

अध्याय 191

श्लोक 7

देइ अभागहिं भागु को, को राखै सरन सभीत ।बेद-बिदित बिरुदावली, कबि-कोबिद गावत गीत

dei abhāgahiṃ bhāgu ko, ko rākhai sarana sabhīta | beda-bidita birudāvalī, kabi-kobida gāvata gīta

अध्याय 191

श्लोक 8

कैसेउ पाँवर पातकी, जेहि लई नामकी ओट ।गाँठी बाँध्यो दाम तो, परख्यो न फेरि खर-खोट

kaiseu pā~vara pātakī, jehi laī nāmakī oṭa | gā~ṭhī bā~dhyo dāma to, parakhyo na pheri khara-khoṭa

अध्याय 191

श्लोक 9

मन मलीन, कलि किलबिषी होत सुनत जासु कृत-काज ।सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब-निवाज

mana malīna, kali kilabiṣī hota sunata jāsu kṛta-kāja | so tulasī kiyo āpuno raghubīra garība-nivāja

स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.