अध्याय 220
श्लोक 1
करिय सँभार, कोसलराय! ।और ठौर न और गति, अवलंब नाम बिहाय
kariya sa~bhāra, kosalarāya! | aura ṭhaura na aura gati, avalaṃba nāma bihāya
अध्याय 220
करिय सँभार, कोसलराय! ।और ठौर न और गति, अवलंब नाम बिहाय
kariya sa~bhāra, kosalarāya! | aura ṭhaura na aura gati, avalaṃba nāma bihāya
अध्याय 220
बूझि अपनी आपनो हित आप वाप न माय ।राम! राउर नाम गुर, सुर, स्वामि, सखा, सहाय
būjhi apanī āpano hita āpa vāpa na māya | rāma! rāura nāma gura, sura, svāmi, sakhā, sahāya
अध्याय 220
रामराज न चलै मानस-मलिनके छल छाय ।कोप तेहि कलिकाल कायर मुपहिं घालत घाय
rāmarāja na calai mānasa-malinake chala chāya | kopa tehi kalikāla kāyara mupahiṃ ghālata ghāya
अध्याय 220
लेत केहरिको वयर ज्यों भेक हनि गोमाय ।त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय
leta kehariko vayara jyoṃ bheka hani gomāya | tyoṃhi rāma-gulāma jāni nikāma deta kudāya
अध्याय 220
अकनि याके कपट-करतब, अमित अनय-अपाय ।सुखी हरिपुर बसत होत परीछितिहि पछिताय
akani yāke kapaṭa-karataba, amita anaya-apāya | sukhī haripura basata hota parīchitihi pachitāya
अध्याय 220
कृपासिंधु! बिलोकिये, जन-मनकी साँसति साय ।सरन आयो, देव! दीनदयालु! देखन पाय
kṛpāsiṃdhu! bilokiye, jana-manakī sā~sati sāya | sarana āyo, deva! dīnadayālu! dekhana pāya
अध्याय 220
निकट बोलि न बरजिये, बलि जाउँ, हनिय न हाय ।देखिहैं हनुमान गोमुख नाहरनिके न्याय
nikaṭa boli na barajiye, bali jāu~, haniya na hāya | dekhihaiṃ hanumāna gomukha nāharanike nyāya
अध्याय 220
अरुन मुख, भ्रू बिकट, पिंगल नयन रोष-कषाय ।बीर सुमिरि समीरको घटिहै चपल चित चाय
aruna mukha, bhrū bikaṭa, piṃgala nayana roṣa-kaṣāya | bīra sumiri samīrako ghaṭihai capala cita cāya
अध्याय 220
बिनय सुनि बिहँसे अनुजसों बचनके कहि भाय ।'भली कही' कह्यो लखन हूँ हँसि, बने सकल बनाय
binaya suni biha~se anujasoṃ bacanake kahi bhāya | 'bhalī kahī' kahyo lakhana hū~ ha~si, bane sakala banāya
अध्याय 220
दई दीनहिं दादि, सो सुनि सुजन-सदन बधाय ।मिटे संकट-सोच, पोच-प्रपंच, पाप-निकाय
daī dīnahiṃ dādi, so suni sujana-sadana badhāya | miṭe saṃkaṭa-soca, poca-prapaṃca, pāpa-nikāya
अध्याय 220
पेखि प्रीति-प्रतीति जनपर अगुन अनघ अमाय ।दासतुलसी कहत मुनिगन, 'जयति जय उरुगाय'
pekhi prīti-pratīti janapara aguna anagha amāya | dāsatulasī kahata munigana, 'jayati jaya urugāya'
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.