अध्याय 86
श्लोक 1
इहै कह्यो सुत ! बेद चहूँ ।श्रीरघुबीर-चरन-चिंतन तजि नाहिन ठौर कहूँ
ihai kahyo suta ! beda cahū~ | śrīraghubīra-carana-ciṃtana taji nāhina ṭhaura kahū~
अध्याय 86
इहै कह्यो सुत ! बेद चहूँ ।श्रीरघुबीर-चरन-चिंतन तजि नाहिन ठौर कहूँ
ihai kahyo suta ! beda cahū~ | śrīraghubīra-carana-ciṃtana taji nāhina ṭhaura kahū~
अध्याय 86
जाके चरन बिरंचि सेइ सिधि पाई संकरहूँ ।सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तेउ भजन करत अजहूँ
jāke carana biraṃci sei sidhi pāī saṃkarahū~ | suka-sanakādi mukuta bicarata teu bhajana karata ajahū~
अध्याय 86
जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ ।हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-बचन-मनहूँ
jadyapi parama capala śrī saṃtata, thira na rahati katahū~ | hari-pada-paṃkaja pāi acala bhai, karama-bacana-manahū~
अध्याय 86
करुनासिंधु, भगत-चिंतामनि, सोभा सेवतहूँ ।और सकल सुर, असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ
karunāsiṃdhu, bhagata-ciṃtāmani, sobhā sevatahū~ | aura sakala sura, asura-īsa saba khāye uraga chahū~
अध्याय 86
सुरुचि कह्यो सोइ सत्य तात अति परुष बचन जबहूँ ।तुलसिदास रघुनाथ-बिमुख नहिं मिटइ बिपति कबहूँ
suruci kahyo soi satya tāta ati paruṣa bacana jabahū~ | tulasidāsa raghunātha-bimukha nahiṃ miṭai bipati kabahū~
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.