Vishnu Purana
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अध्याय 2 / 126

Book 1 - Adhyaya 2

प्रह्लाद चरित्र

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 2

श्लोक 1

न देशकालौ न शुचिर्न चासनम् ।न दिङ्न संख्या न पवित्रमीक्षितम् ।नाग्निर्न चार्को न च वायुरीक्षितः ।तद्भक्तिमात्रं परमं पदं हरेः

na deśakālau na śucirna cāsanam | na diṅna saṃkhyā na pavitramīkṣitam | nāgnirna cārko na ca vāyurīkṣitaḥ | tadbhaktimātraṃ paramaṃ padaṃ hareḥ

हिन्दी अर्थ

न देश-काल, न शुचिता, न आसन; न दिशा, न संख्या, न पवित्र वस्तु; न अग्नि, न सूर्य, न वायु की आवश्यकता है। केवल भक्ति ही हरि की प्राप्ति का सर्वोच्च मार्ग है।

English

Not place, not time, not purity, not posture; not direction, not number, not the sacred are required. Not fire, not sun, not air is needed. Devotion alone is the supreme path to Hari.

अध्याय 2

श्लोक 2

नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे

namaḥ samastabhūtānāmādibhūtāya bhūbhṛte | anekarūparūpāya viṣṇave prabhuviṣṇave

हिन्दी अर्थ

सभी प्राणियों के आदिभूत, पृथ्वी को धारण करने वाले, अनेक रूप धारण करने वाले, और सर्वशक्तिमान विष्णु को नमस्कार।

English

Salutations to Vishnu, the primordial existence of all beings, the bearer of the earth, who has many forms, who is the mighty one.

अध्याय 2

श्लोक 5

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसङ्ज्ञा विधीयते

pṛthivyāṃ trīṇi ratnāni jalamannaṃ subhāṣitam | mūḍhaiḥ pāṣāṇakhaṇḍeṣu ratnasaṅjñā vidhīyate

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी पर तीन रत्न हैं — जल, अन्न और सुभाषित (सुन्दर वचन)। मूढ लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं।

English

On earth there are three jewels: water, food, and well-spoken words. Fools call pieces of stone by the name of jewels.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_viSNupurANa-crit.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।