Agni Purana
182
अध्याय 182 / 381

Adhyaya 182

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 182

श्लोक 1

सप्तमीव्रतानि अग्निर् उवाच सप्तमीव्रतकं वक्ष्ये सर्वेषां भुक्तिमुक्तिदं(२) ।माघमासे ऽब्जके शुक्ले सूर्यं प्रार्च्य विशोकभाक्

saptamīvratāni agnir uvāca saptamīvratakaṃ vakṣye sarveṣāṃ bhuktimuktidaṃ(2) / māghamāse 'bjake śukle sūryaṃ prārcya viśokabhāk

हिन्दी अर्थ

माने गये हैं । इन्हें ब्रतमें, नक्त्रतमें तथा आग्निहोत्रमें भी उपयोगी बताया गया है। अथवा मांस, मदिरा आदि अपवित्र वस्तुओंको छोड़कर सभी उत्तम वस्तुएँ ब्रतमें हितकर हैं॥ १०--१७॥

English

The houses of professional dancers and courtesans (should be located) in the southern quarter. (The houses) of actors, potters and fishermen (should be located) in the south¬ western quarter.

अध्याय 182

श्लोक 2

सर्वावाप्तिस्तु सप्तभ्यां मासि भाद्रे ऽर्कपूजनात् ।पौषे मासि सिते ऽनश्नन् प्रार्च्यार्कं पापनाशनं

sarvāvāptistu saptabhyāṃ māsi bhādre 'rkapūjanāt / pauṣe māsi site 'naśnan prārcyārkaṃ pāpanāśanaṃ

हिन्दी अर्थ

'प्राजापत्यव्रत'का अनुष्ठान करनेवाला द्विज तीन दिन केवल प्रातःकाल और तीन दिन केवल संध्याकालमें भोजन करे। फिर तीन दिन केवल बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीका दिनमें एक समय भोजन करे; उसके बाद तीन दिनोंतक उपवास करके रहे। (इस प्रकार यह बारह दिनोंका व्रत है।) इसी प्रकार ' अतिकृच्छ-

English

The houses of professional dancers and courtesans (should be located) in the southern quarter. (The houses) of actors, potters and fishermen (should be located) in the south¬ western quarter.

अध्याय 182

श्लोक 3

कृष्णपक्षे तु माघस्य सर्वावाप्तिस्तु सप्तमी ।फाल्गुने तु सिते नन्दा सप्तमी चार्कपूजनात्

kṛṣṇapakṣe tu māghasya sarvāvāptistu saptamī / phālgune tu site nandā saptamī cārkapūjanāt

हिन्दी अर्थ

व्रत'का अनुष्ठान करनेवाला द्विज पूर्ववत् तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिनोंतक बिना माँगे प्राप्त हुए अन्नरका एक-एक ग्रास भोजन करे तथा अन्तिम दिनोंमें उपवास

English

The houses of professional dancers and courtesans (should be located) in the southern quarter. (The houses) of actors, potters and fishermen (should be located) in the south¬ western quarter.

अध्याय 182

श्लोक 4

मार्गशीर्षे सिते प्रार्च्य सप्तमी चापराजिता ।मार्गशीर्षे सिते चाव्दं पुत्रीया सप्तमी स्त्रियाः

mārgaśīrṣe site prārcya saptamī cāparājitā / mārgaśīrṣe site cāvdaṃ putrīyā saptamī striyāḥ

हिन्दी अर्थ

करे। गायका मूत्र, गोबर, दूध, दही, घी तथा कुशका जल --इन सबको मिलाकर प्रथम दिन पीये। फिर दूसरे दिन उपवास करे-यह 'सांतपनकृच्छु' नामक व्रत है। उपर्युक्त द्रव्योंका पृथक्-पृथक् एक-एक दिनके क्रमसे छः दिनोंतक सेवन करके सातवें दिन उपवास करे-इस प्रकार यह एक सप्ताहका व्रत 'महासांतपन- कृच्छु” कहलाता है, जो पापोंका नाश करनेवाला

English

The houses of professional dancers and courtesans (should be located) in the southern quarter. (The houses) of actors, potters and fishermen (should be located) in the south¬ western quarter.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।