Agni Purana
181
अध्याय 181 / 381

Adhyaya 181

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 181

श्लोक 1

षष्ठीव्रतानि अग्निर् उवाच षष्ठीव्रतानि वक्ष्यामि कार्त्तिकादौ समाचरेत्(२) ।षष्ट्यां फलाशनो(३) ऽर्घ्याद्यैर् भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात्

ṣaṣṭhīvratāni agnir uvāca ṣaṣṭhīvratāni vakṣyāmi kārttikādau samācaret(2) / ṣaṣṭyāṃ phalāśano(3) 'rghyādyair bhuktimuktimavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

चोरीका अभाव-ये दस नियम सामान्यतः सम्पूर्ण ब्रतोंमें आवश्यक माने गये हैं। ब्रतमें पवित्र ऋचाओंको जपे और अपनी शक्तिके अनुसार हवन करे। व्रती पुरुष प्रतिदिन स्नान तथा परिमित भोजन करे। गुरु, देवता तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया करे। क्षार, शहद, नमक, शराब और मांसको त्याग दे। तिल-मूँग आदिके अतिरिक्त धान्य भी त्याज्य हैं। धान्य (अन्न)-

English

After having worshijpped (the gods) Vi§nu, Siva, Sun and others and bowing down, the founder (of a city) should make the offerings. The goldsmiths and blacksmiths should be provided for at the south-eastern quarter of the city.

अध्याय 181

श्लोक 2

१ आरोग्यमुखमोक्षदमिति ङ॥ २ ऐरावत इत्य् आदिः, कार्त्तकादौ समाचरेदित्यन्तः पाठः झ॥ पुस्तके नास्ति ३ षष्ट्यां मलाशनो ऽर्घ्याद्यैर् इति ट॥ :प् २०७ स्कन्दषष्ठीव्रतं प्रोक्तं भाद्रे षष्ट्यामथाक्षयं ।कृष्णषष्ठीव्रतं वक्ष्ये मार्गशीर्षे चरेच्च तत्(१)

1 ārogyamukhamokṣadamiti ṅa.. 2 airāvata ity ādiḥ, kārttakādau samācaredityantaḥ pāṭhaḥ jha.. pustake nāsti 3 ṣaṣṭyāṃ malāśano 'rghyādyair iti ṭa.. :p 207 skandaṣaṣṭhīvrataṃ proktaṃ bhādre ṣaṣṭyāmathākṣayaṃ / kṛṣṇaṣaṣṭhīvrataṃ vakṣye mārgaśīrṣe carecca tat(1)

हिन्दी अर्थ

में उड़द, कोदो, चीना, देवधान्य, शमीधान्य,

English

After having worshijpped (the gods) Vi§nu, Siva, Sun and others and bowing down, the founder (of a city) should make the offerings. The goldsmiths and blacksmiths should be provided for at the south-eastern quarter of the city.

अध्याय 181

श्लोक 3

अनाहारो वर्षमेकं भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात्

anāhāro varṣamekaṃ bhuktimuktimavāpnuyāt /

हिन्दी अर्थ

माने गये हैं। व्रतमें इनका त्याग कर देना चाहिए। धान, साठीका चावल, मूँग, मटर, तिल, जौ, साँवाँ, तिन्नीका चावल और गेहूँ आदि अन्न व्रतमें उपयोगी हैं। कुम्हड़ा, लौकी, बैंगन, पालक तथा पूतिकाको त्याग दे। चरु, भिक्षामें प्राप्त अन्न, सत्तृके दाने, साग, दही, घी, दूध, साँवाँ, अगहनीका चावल, तिन्नीका चावल, जौका हलुवा तथा मूल तण्डुल--ये हविष्य'

English

After having worshijpped (the gods) Vi§nu, Siva, Sun and others and bowing down, the founder (of a city) should make the offerings. The goldsmiths and blacksmiths should be provided for at the south-eastern quarter of the city.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।