Agni Purana
180
अध्याय 180 / 381

Adhyaya 180

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 180

श्लोक 1

पञ्चमीव्रतानि अग्निर् उवाच पञ्चमीव्रतकं वक्ष्ये आरोग्यस्वर्गमोक्षदं(१) ।नभोनभस्याश्विने च कार्त्तिके शुक्लपक्षके

pañcamīvratāni agnir uvāca pañcamīvratakaṃ vakṣye ārogyasvargamokṣadaṃ(1) / nabhonabhasyāśvine ca kārttike śuklapakṣake

हिन्दी अर्थ

साथ वास करता है, उसीको “उपवास” समझना चाहिए। उपवास करनेवाले पुरुषको काँसेके बर्तन, मांस, मसूर, चना, कोदो, साग, मधु, पराये अन्न तथा स्त्री-सम्भोगका त्याग करना

English

(A city of the shape) of the face of a vajrasQci (diamond needle) or having two or three easy ways is not favourable. The frontage of a city resembling (the shape of) a bow or vajrandga is beneficiary.

अध्याय 180

श्लोक 2

वासुकिस्तक्षकः पूज्यः कालीयो मणिभद्रकः ।ऐरावतो धृतराष्ट्रः कर्कोटकधनञ्जयौ

vāsukistakṣakaḥ pūjyaḥ kālīyo maṇibhadrakaḥ / airāvato dhṛtarāṣṭraḥ karkoṭakadhanañjayau

हिन्दी अर्थ

चाहिए। उपवासकालमें फूल, अलंकार, सुन्दर वस्त्र, धूप, सुगन्ध, अङ्गराग, दाँत धोनेके लिये मञ्जन तथा दाँतौन-इन सब वस्तुओंका सेवन अच्छा नहीं माना गया है । प्रातःकाल जलसे मुँह धो, कुल्ला करके, पञ्चगव्य लेकर व्रत प्रारम्भ कर

English

(A city of the shape) of the face of a vajrasQci (diamond needle) or having two or three easy ways is not favourable. The frontage of a city resembling (the shape of) a bow or vajrandga is beneficiary.

अध्याय 180

श्लोक 3

एते प्रयच्छन्त्यभयमायुर्विद्यायशः श्रियं

ete prayacchantyabhayamāyurvidyāyaśaḥ śriyaṃ //

हिन्दी अर्थ

अनेक बार जल पीने, पान खाने, दिनमें सोने तथा मैथुन करनेसे उपवास (व्रत) दूषित हो जाता है। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा, अग्निहोत्र, संतोष तथा

English

(A city of the shape) of the face of a vajrasQci (diamond needle) or having two or three easy ways is not favourable. The frontage of a city resembling (the shape of) a bow or vajrandga is beneficiary.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।