Agni Purana
273
अध्याय 273 / 381

Adhyaya 274

51 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ51 श्लोक

अध्याय 273

श्लोक 1

अथ चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः यदुवंशवर्णनं अग्निर् उवाच यदोरासन्पञ्च पुत्रा ज्येष्ठस्तेषु सहस्रजित्

atha catuḥsaptatyadhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ yaduvaṃśavarṇanaṃ agnir uvāca yadorāsanpañca putrā jyeṣṭhasteṣu sahasrajit /

हिन्दी अर्थ

धन्वन्तरि कहते हैं-- सुश्रुत! अब मैं आत्रेयके द्वारा वर्णित मृतसंजीवनकारक दिव्य सिद्ध योगोंको कहता हूँ, जो सम्पूर्ण व्याधियोंका विनाश करनेवाले हैं आत्रेयने कहा-वातज्चरमें बिल्वादि पञ्चमूल बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटल एवं अरणीका काढ़ा दे और पाचनके लिये पिप्पलीमूल,

English

Nabhaga had two sons, that were VaUyas, who became brahmins (later on). Karuas (were born) from Karua, who were of the warrior caste that were invincible.

अध्याय 273

श्लोक 2

धर्मनेत्रो हैहयस्य धर्मनेत्रस्य संहनः

dharmanetro haihayasya dharmanetrasya saṃhanaḥ

हिन्दी अर्थ

गिलोय और सोंठ-इनका क्राथ दे। आँवला, अभया (बड़ी हरै), पीपल एवं चित्रक-यह आमलक्यादि क्वाथ सब प्रकारके ज्चरोंका नाश करनेवाला है। बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा,

English

The three kings Drdlaiva, Dad and Kapila (were the sons) of Dhundhumara. Haryafva and F!ramodaka (were bom) from DrdHafva.

अध्याय 273

श्लोक 3

महिमा संहनस्यासीन्महिम्नओ भद्रसेनकः ।भद्रसेनाद् दुर्गमो ऽभूद्दुर्गमात्कनको ऽभवत्

mahimā saṃhanasyāsīnmahimnao bhadrasenakaḥ / bhadrasenād durgamo 'bhūddurgamātkanako 'bhavat

हिन्दी अर्थ

बृहती (बड़ी कटेर) और कण्टकारिका (छोटी कटेर)-ये दशमूल कहे गये हैं। इनका क्राथ तथा कुशके मूलका क्वाथ ज्वर, अपाचन, पार्श्वशूल और कास (खाँसी)-का नाश करनेवाला है। गिलोय, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चिरायता और सोंठ-यह “पञ्चभद्र क्काथ' वात और पित्तज्चरमें

English

See W. P. IV. 2 40.

अध्याय 273

श्लोक 4

कनकात् कृतवीर्यस्तु कृताग्निः करवीरकः ।कृतौजाश् च चतुर्थो ऽभूत् कृतवीर्यात्तु सो ऽर्जुनः

kanakāt kṛtavīryastu kṛtāgniḥ karavīrakaḥ / kṛtaujāś ca caturtho 'bhūt kṛtavīryāttu so 'rjunaḥ

हिन्दी अर्थ

निशोथ, विशाला (इन्द्रवारुणी), कुटकी, त्रिफला और अमलतास-इनका क्वाथ यवक्षार मिलाकर पिलावे। यह विरेचक और सम्पूर्ण ज्वरोको शान्त करनेवाला है। देवदारु, खरेटी,

English

Nikumbha (was born) from Haryalva and Saihhatasva from Nikumbha. Akrava and Rari&lva were the two sons of Samhatva.

अध्याय 273

श्लोक 5

दत्तो ऽर्जुनाय तपते सप्तद्वीपमहीशताम् ।ददौ बाहुसहस्रञ्च अजेयत्वं रणे ऽरिणा

datto 'rjunāya tapate saptadvīpamahīśatām / dadau bāhusahasrañca ajeyatvaṃ raṇe 'riṇā

हिन्दी अर्थ

अडूसा, त्रिफला और व्योष (सोंठ, काली मिर्च, पीपल), पद्मकाष्ठ, वायविडङ्ग और मिश्री-इन सबका समान भाग चूर्ण पाँच प्रकारके कास-रोगोंका मर्दन करता है। रोगी मनुष्य हृदयरोग, ग्रहणी, पार्श्वरोग, हिक्का, श्वास और कासरोगके विनाशके लिये दशमूल, कचूर, रास्ना, पीपल, बिल्व, पोकरमूल, काकड़ासिंगी, भुई आँवला, भार्गी, गिलोय और पान-इनसे

English

Yuvanaiva (was the son) of Rankiva. Mandhktr (was born) from Yuvanaiva. Purukutsawas (born) fromMandhatr. Mucukunda (was his) second (son).

अध्याय 273

श्लोक 6

अधर्मे वर्तमानस्य विष्णुहस्तान्मृतिर्ध्रुवा ।दश यज्ञसहस्राणि सो ऽर्जुनः कृतवान्नृपाः

adharme vartamānasya viṣṇuhastānmṛtirdhruvā / daśa yajñasahasrāṇi so 'rjunaḥ kṛtavānnṛpāḥ

हिन्दी अर्थ

विधिवत् सिद्ध किया हुआ क्वाथ या यवागूका पान करे। मुलहठी (चूर्ण)-के साथ मधु, शर्कराके साथ पीपल, गुड्के साथ नागर (सोंठ) और तीनों लवण (सेंधानमक, विड्नमक और

English

Trasadasyu and Sambhuta (were born) from Purukutsa through Narmada. Sudhanva was (bom) from Sambhuta. Then Tridhanva (was born) from Sudhanva.

अध्याय 273

श्लोक 7

अनष्टद्रव्यता राष्ट्रे तस्य संस्मरणादभूत् ।न नूनं कार्त्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति वै नृपः

anaṣṭadravyatā rāṣṭre tasya saṃsmaraṇādabhūt / na nūnaṃ kārttavīryasya gatiṃ yāsyanti vai nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

कालानमक)-ये हिक्का (हिचकी)-का नाश करनेवाले हैं। कारवी अजाजी (कालाजीरा, सफेदजीरा), काली मिर्च, मुनक्का, वृक्षाम्ल (इमली), अनारदाना, कालानमक और गुड इन सबके समानभागसे तैयार चूर्णका शहदके साथ निर्मित 'कारव्यादि बटी' सब प्रकारके अरुचिरोगोंका नाश करती है। अदरखके रसके साथ मधु मिलाकर रोगीको पिलाये। इससे

English

Taruna (was born) from Tridhanva and Satyavrata (was) his son. Satyaratha (was bom) from Satyavrata. Hariscandra (was) his son.

अध्याय 273

श्लोक 8

यज्ञैर् दानैस्तपोभिश् च विक्रमेण श्रुतेन च ।कर्तवीर्यस्य च शतं पुत्राणां पञ्च वै पराः

yajñair dānaistapobhiś ca vikrameṇa śrutena ca / kartavīryasya ca śataṃ putrāṇāṃ pañca vai parāḥ

हिन्दी अर्थ

अरुचि, श्वास, कास, प्रतिश्याय (जुकाम) और कफविकारोंका नाश होता है

English

Bhagiratha (was born) from Dilipa. He brought down the Ganges (from the heaven). Nabhaga (was born) from Bhagiratha and Ambarla from Nabhaga.

अध्याय 273

श्लोक 9

सूरसेनश् च सूरश् च धृष्टोक्तः कृष्ण एव च ।जयध्वजश् च नामासीदावन्त्यो नृपतिर्महान्

sūrasenaś ca sūraś ca dhṛṣṭoktaḥ kṛṣṇa eva ca / jayadhvajaś ca nāmāsīdāvantyo nṛpatirmahān

हिन्दी अर्थ

वट-वराङ्कूर, काकड़ासिंगी, शिलाजीत, लोध, अनारदाना और मुलहठी-इनका चूर्ण बनाकर उस चूर्णके समान मात्रामें मिश्री मिला मधुके साथ अवलेह (चटनी)-का निर्माण करे। इस “वटशुङ्गादि'के अवलेहको चावलके पानीके साथ लिया जाय तो उससे प्यास और छर्दि (वमन)- का प्रशमन होता है। गिलोय, अडूसा, लोध और

English

Sindhudpa (was bom) from Ambarisa. Srutayu is known to be his son. Rtuparpa was (born) from Srutayu. Kalmapada (was) his son.

अध्याय 273

श्लोक 10

जयध्वजात्तालजङ्घस्तालजङ्घात्ततः सुताः ।हैहयानां कुलाः पञ्च भोजाश्चावन्तयस् तथा

jayadhvajāttālajaṅghastālajaṅghāttataḥ sutāḥ / haihayānāṃ kulāḥ pañca bhojāścāvantayas tathā

हिन्दी अर्थ

पीपल -इनका चूर्ण शहदके साथ कफयुक्त रक्त, प्यास, खाँसी एवं ज्वरको नष्ट करनेवाला है। इसी प्रकार समभाग मधुसे मिश्रित अडूसेका रस और ताम्रभस्म कासको नष्ट करता है । शिरीषपुष्पके

English

Sarvakarma (was born) from Kalmaapada. Anaranya was (bom) from him. Nighna (was born) from Anarariya, Anamitra (from Anaranya) and Raghu (from Anamitra).

अध्याय 273

श्लोक 11

वीतिहोत्राः स्वयं जाताः शौण्डिकेयास्तथैव च ।वीतिहोत्रादनन्तो ऽभुदनन्ताद्दुर्जयो नृपः

vītihotrāḥ svayaṃ jātāḥ śauṇḍikeyāstathaiva ca / vītihotrādananto 'bhudanantāddurjayo nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वरसमें भावित सफेद मिर्चका चूर्ण कासमें (तथा सर्पविषमें) हितकर है। मसूर सभी प्रकारकी वेदनाको नष्ट करनेवाला है तथा चौंराईका साग पित्तदोषको दूर करनेवाला है। मेउड़, शारिवा, सेरुकी एवं अङ्कोल-ये विषनाशक औषध हैं। सोंठ, गिलोय, छोटी कटेरी, पोकरमूल, पीपलामूल और पीपल-इनका क्वाथ मूर्छा और मदात्यय रोगमें लेना चाहिए। हींग, कालानमक एवं व्योष

English

The list here omits certain names. See Vi. P. IV. 3. 25.

अध्याय 273

श्लोक 12

क्रोष्टोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातो हरिः स्वयम् ।क्रोष्टोस्तु वृजिनीवांश् च स्वाहाभूद्वृजिनीवतः

kroṣṭorvaṃśaṃ pravakṣyāmi yatra jāto hariḥ svayam / kroṣṭostu vṛjinīvāṃś ca svāhābhūdvṛjinīvataḥ

हिन्दी अर्थ

लेकर चार सेर घृत और घृतसे चौगुने गोमूत्रमें सिद्ध करनेपर उन्मादका नाश करते हैं। शङ्खपुष्पी, वच और मीठा कूटसे सिद्ध ब्राह्मी रसको मिलाकर इन सबकी गुटिका बना ले तो वह

English

The names of the wives of Sagara difler frmn Vi, P. IV. 4. 1.

अध्याय 273

श्लोक 13

स्वाहापुत्रओ रुषद्गुश् च(१) तस्य चित्ररथः सुतः ।शशविन्दुश्चित्ररथाच्चक्रवर्ती हरौ रतः

svāhāputrao ruṣadguś ca(1) tasya citrarathaḥ sutaḥ / śaśavinduścitrarathāccakravartī harau rataḥ

हिन्दी अर्थ

पुराने उन्माद और अपस्मार रोगका नाश करती है और उत्तम मेधावर्धक औषध है। हरैंके साथ पञ्चगव्य या घृतका प्रयोग कुष्ठनाशक है। परवलकी पत्ती, त्रिफला, नीमकी छाल, गिलोय, पृश्रिपर्णी, अडूसेके पत्ते तथा करझ--इनसे सिद्ध किया घृत कुष्ठरोगका मर्दन करता है। इसे 'वज्रक' कहते हैं। नीमकी छाल, परवल, कण्टकारि-पञ्चाङ्ग, गिलोय और अडूसा-सबको दस-दस पल

English

Kusa and Lava, the furtherers of the family, (were) the sons of Rama through Sita. Atithi was born from Ku4a. Nisadha (was) his son.

अध्याय 273

श्लोक 14

शशविन्दोश् च पुत्त्राणां शतानामभवच्छतम् ।धीमतां चारुरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम्

śaśavindoś ca puttrāṇāṃ śatānāmabhavacchatam / dhīmatāṃ cārurūpāṇāṃ bhūridraviṇatejasām

हिन्दी अर्थ

लेकर भलीभाँति कूट ले। फिर सोलह सेर जलमें क्राथ बनाकर उसमें सेरभर घृत और (बीस तोले) त्रिफला-चूर्णका कल्क बनाकर डाल दे और चतुर्थांश शेष रहनेतक पकाये। यह

English

Devanika (was born) from S\idhanva and Ahinasva was his son. Sahasralva (was bora) from Ahinasva and Candra- loka was born then.

अध्याय 273

श्लोक 15

पृथुश्रवाः प्रधानो ऽभूत्तस्य पुत्रः सुयज्ञकः ।सुयज्ञस्योशनाः पुत्रस्तितिक्षुरुशनःसुतः

pṛthuśravāḥ pradhāno 'bhūttasya putraḥ suyajñakaḥ / suyajñasyośanāḥ putrastitikṣuruśanaḥsutaḥ

हिन्दी अर्थ

“पञ्चतिक्त घृत' कुष्ठनाशक है। यह अस्सी प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग और बीस प्रकारके कफरोग, खाँसी, पीनस (बिगडी जुकाम), बवासीर और ब्रणरोगोंका नाश करता है। जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर डालता है,

English

Tarapida (was born ) from Candraloka. Candraparvata fwas born) from him. Bhanuratha (was born) from Candragiri ( parvata). Srutayu vas his son. These are known to be the descendants of the Iksvakii family that bore (the name of) the Solar race.

अध्याय 273

श्लोक 16

तितिक्षोस्तु मरुत्तो ऽभूत्तस्मात्कम्बलवर्हिषः ।पञ्चाशद्रुक्मकवचाद्रुक्मेषुः पृथुरुक्मकः

titikṣostu marutto 'bhūttasmātkambalavarhiṣaḥ / pañcāśadrukmakavacādrukmeṣuḥ pṛthurukmakaḥ

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार यह योगराज निःसंदेह अन्य रोगोंका भी विनाश कर देता है॥ १३--२४ ३ ॥

English

From Titikshu Marutta; from him Kambalabarhisha; fifty from Rukmakavacha; Rukmeshu, Prithurukmaka;

अध्याय 273

श्लोक 17

१ विषांशुश्चेति ज॥ :प् १५ हविर्ज्यामघः पापघ्नो ज्यामघः स्त्रीजितो ऽभवत् ।सेव्यायां ज्यामघादासीद्विदर्भस्तस्य कौशिकः

1 viṣāṃśuśceti ja.. :p 15 havirjyāmaghaḥ pāpaghno jyāmaghaḥ strījito 'bhavat / sevyāyāṃ jyāmaghādāsīdvidarbhastasya kauśikaḥ

हिन्दी अर्थ

उपदंशकी शान्तिके लिये त्रिफलाके क्लाथ या भृङ्गराजके रससे ब्रणोंका प्रक्षालन करे (धोये)। परवलकी पत्तीके चूर्णके साथ अनारकी छालका चूर्ण अथवा गजपीपर या त्रिफलाका चूर्ण पाउडरके रूपमें ही उसपर छोडे। त्रिफला, लोहचूर्ण,

English

Havis, Jyamagha the sin-destroyer; Jyamagha was ruled by a wife. On Shaibya by Jyamagha was Vidarbha; his Kaushika;

अध्याय 273

श्लोक 18

लोमपादः क्रथः श्रेष्ठात् कृतिः(१) स्याल्लोमपदतः ।कौशिकस्य चिदिः पुत्रस्तस्माच्चैद्या नृपाः स्मृताः

lomapādaḥ krathaḥ śreṣṭhāt kṛtiḥ(1) syāllomapadataḥ / kauśikasya cidiḥ putrastasmāccaidyā nṛpāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

कालीमिर्च और सैन्धव-नमकसहित पकाये हुए तैलके मर्दनसे वमनकी शान्ति होती है। दुग्ध, मार्कव-रस, मुलहठी और नील कमल -इनको दो सेर लेकर तबतक पकाये, जबतक एक पाव

English

Lomapada, Kratha; from Shreshtha Kriti; from Lomapada...; Chidi the son of Kaushika; from him the Chaidya kings are remembered.

अध्याय 273

श्लोक 19

क्रथाद्विदर्भपुत्राश् च कुन्तिः कुन्तेस्तु धृष्टकः ।धृष्टस्य निधृतिस्तस्य उदर्काख्यो विदूरथः

krathādvidarbhaputrāś ca kuntiḥ kuntestu dhṛṣṭakaḥ / dhṛṣṭasya nidhṛtistasya udarkākhyo vidūrathaḥ

हिन्दी अर्थ

तैल शेष रह जाय। इस तैलका नस्य (वृद्धावस्थाके चिहू) पलित (बाल पकने)-का नाशक है। नीमकी छाल, परवलकी पत्ती, त्रिफला, गिलोय, खैरकी छाल, अडूसा अथवा चिरायता, पाठा, त्रिफला और लाल चन्दन-ये दोनों योग ज्वरको नष्ट करते हैं तथा कुष्ठ, फोड़ा-फुन्सी, चकत्ते आदिको भी मिटा देते हैं। परवलकी पत्ती, गिलोय, चिरायता, अडूसा, मजीठ एवं पित्तपापड़ा--

English

From Kratha, the sons of Vidarbha; Kunti, and of Kunti, Dhrishtaka; of Dhrishta Nidhriti; his Udarka named Vidura-ratha;

अध्याय 273

श्लोक 20

दशार्हपुत्रो व्योमस्तु व्योमाज्जीमूत उच्यते ।जीमूतपुत्रो विकलस्तस्य भीमरथः सुतः

daśārhaputro vyomastu vyomājjīmūta ucyate / jīmūtaputro vikalastasya bhīmarathaḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

इनके क्काथमें खदिर मिलाकर लिया जाय तो वह ज्वर तथा विस्फोटक रोगोंको शान्त करता है

English

Dasharha's son Vyoma; from Vyoma Jimuta is said; Jimuta's son Vikala; his son Bhimaratha;

अध्याय 273

श्लोक 21

भीमरथान्नवरथस्ततो दृढरथो ऽभवत् ।शकुन्तिश् च दृढरथात् शकुन्तेश् च करम्भकः

bhīmarathānnavarathastato dṛḍharatho 'bhavat / śakuntiś ca dṛḍharathāt śakunteś ca karambhakaḥ

हिन्दी अर्थ

रोगोंमें हितकर है। महुवा और नीमकी पत्तीका लेप व्रणशोधक होता है। त्रिफला (आँवला, हर्रा, बहेरा), खैर (कत्था), दारुहल्दी, बरगदको छाल, बरियार, कुशा, नीमके पत्ते तथा मूलीके पत्ते-इनका क्वाथ शरीरके बाह्य-शोधनके लिये हितकर है। करञ्ज, नीम तथा मेउड़का रस घावके कृमियोंको नष्ट करता है। धायका फूल,

English

from Bhimaratha Navaratha; then Dridharatha; from Dridharatha Shakuni, and from Shakuni Karambhaka;

अध्याय 273

श्लोक 22

करम्भाद्देवलातो ऽभूत्(२) देवक्षेत्रश् च तत्सुतः ।देवक्षेत्रान्मधुर्नाम मधोर्द्रवरसो ऽभवत्

karambhāddevalāto 'bhūt(2) devakṣetraś ca tatsutaḥ / devakṣetrānmadhurnāma madhordravaraso 'bhavat

हिन्दी अर्थ

देवदारु तथा मेदाका घृतसहित लेप व्रणरोपण (घावको भरनेवाला) है। गुग्गुल, त्रिफला, पीपल, सोंठ, मिर्च, पीपर-इनका समान भाग ले और इन सबके समान घृत मिलाकर प्रयोग करे। इस

English

from Karambha Devarata, and Devakshetra his son; from Devakshetra Madhu by name; from Madhu Dravarasa;

अध्याय 273

श्लोक 23

द्रवरसात् पुरुहूतो ऽभूज्जन्तुरासीत्तु तत्सुतः ।गुणी तु यादवो राजा जन्तुपुत्रस्तु सात्त्वतः

dravarasāt puruhūto 'bhūjjanturāsīttu tatsutaḥ / guṇī tu yādavo rājā jantuputrastu sāttvataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयोगसे मनुष्य नाड़ीव्रण, दुष्टब्रण, शूल और भगन्दर आदि रोगोंको दूर करे। गोमूत्रमें भिगोकर शुद्ध की हुई हरीतकी (छोटी हरै) -को (रेडीके) तेलमें भूनकर सेंधा नमकके साथ प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे। ऐसी हरीतकी कफ और वातसे होनेवाले रोगोंको नष्ट करती है। सोंठ, मिर्च, पीपल और त्रिफलाका क्वाथ यवक्षार और लवण मिलाकर पीये। कफप्रधान और वातप्रधान

English

from Dravarasa Puruhuta; Jantu was his son; Guni the Yadava king; Jantu's son was Satvata;

अध्याय 273

श्लोक 24

सात्त्वताद्भजमानस्तु वृष्णिरन्धक एव च ।देवावृधश् च चत्वारस्तेषां वंशास्तु विश्रुताः(३)

sāttvatādbhajamānastu vṛṣṇirandhaka eva ca / devāvṛdhaś ca catvārasteṣāṃ vaṃśāstu viśrutāḥ(3)

हिन्दी अर्थ

प्रकृतिवाले मनुष्योंके लिये यह विरेचन है और कफवृद्धिको दूर करता है। पीपल, पीपलामूल, वच, चित्रक, सोंठ-इनका क्वाथ अथवा किसी प्रकारका पेय बनाकर पीये। यह आमवातका

English

from Satvata Bhajamana, Vrishni, Andhaka and Devavridha — four; their lines are famed.

अध्याय 273

श्लोक 25

भजमानस्य वाह्यो ऽभूद्वृष्टिः कृमिर्निमिस् तथा ।देवावृधाद्वभ्रुरासीत्तस्य श्लोको ऽत्र गीयते

bhajamānasya vāhyo 'bhūdvṛṣṭiḥ kṛmirnimis tathā / devāvṛdhādvabhrurāsīttasya śloko 'tra gīyate

हिन्दी अर्थ

नाशक है । रासतर, गिलोय, रेंडको छाल, देवदारु और सोंठ-इनका क्काथ सर्वाङ्ग-वात तथा संधि, अस्थि और मज्जागत आमवातमें पीना चाहिए। अथवा सोंठके जलके साथ दशमूल-क्काथ पीना चाहिए। सोंठ एवं गोखरूका क्वाथ प्रतिदिन प्रात:-प्रातः सेवन किया जाय तो वह आमवातके सहित कटिशूल और पाण्डुरोगका नाश करता है। शाखा एवं पत्रसहित प्रसारिणी (छुईमुई)-का

English

Of Bhajamana: Bahya, Vrishti, Krimi and Nimi; from Devavridha Babhru; a verse about him is sung here:

अध्याय 273

श्लोक 26

यथैव शृणुमो दूरात् गुणांस्तद्वत्समन्तिकात् ।वभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर् देवावृधःसमः

yathaiva śṛṇumo dūrāt guṇāṃstadvatsamantikāt / vabhruḥ śreṣṭho manuṣyāṇāṃ devair devāvṛdhaḥsamaḥ

हिन्दी अर्थ

तैल भी उक्त रोगमें लाभकर है। गिलोयका स्वरस, कल्क, चूर्ण या क्राथ दीर्घकालतक सेवन करके रोगी वातरक्त-रोगसे छुटकारा पा जाता है। वर्धमान पिप्पली या गुड़के साथ हरैका सेवन

English

"As we hear his virtues from afar, so from near: Babhru is best of men, Devavridha equal to the gods."

अध्याय 273

श्लोक 27

चत्वारश् च सुता वभ्रोर्वासुदेवपरा नृपाः ।१ धृतिरिति ञ॥ २ देवरातो ऽभुदिति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ज॥ , ञ॥ , ट॥ , च ३ विस्तृता इति क॥ , छ॥ , च :प् १६ कुहुरो भजमानस्तु(१) शिनिः कम्बलवर्हिषः

catvāraś ca sutā vabhrorvāsudevaparā nṛpāḥ / 1 dhṛtiriti ña.. 2 devarāto 'bhuditi kha.. , ga.. , gha.. , ja.. , ña.. , ṭa.. , ca 3 vistṛtā iti ka.. , cha.. , ca :p 16 kuhuro bhajamānastu(1) śiniḥ kambalavarhiṣaḥ

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। (यह भी वात-रक्तनाशक है।) पटोलपत्र, त्रिफला, राई, कुटकी और गिलोय-- इनका पाक तैयार करके उसके सेवनसे दाहयुक्त वात-रक्तरोग शीघ्र नष्ट होता है। गुग्गुलको ठंढे- गरमजलसे और त्रिफलाको समशीतोष्ण जलसे,

English

Four sons of Babhru, kings devoted to Vasudeva: Kuhura, Bhajamana, Shini, Kambalabarhisha.

अध्याय 273

श्लोक 28

कुहुरस्य(२) सुतो धृष्णुधृष्णोस्तु तनयो धृतिः ।धृतेः कपोतरोमाभूत्तस्य पुत्रस्तु तित्तिरिः

kuhurasya(2) suto dhṛṣṇudhṛṣṇostu tanayo dhṛtiḥ / dhṛteḥ kapotaromābhūttasya putrastu tittiriḥ

हिन्दी अर्थ

गोखरूका क्वाथ हींग तथा लवणके साथ लेनेपर वह वातजनित पीड़ाको शीघ्र ही दूर कर देता है। एक तोला पीपलामूल, सैन्धव, सौवर्चल,

English

Kuhura's son Dhrishnu; Dhrishnu's son Dhriti; from Dhriti Kapotaroma; his son Tittiri;

अध्याय 273

श्लोक 29

तित्तिरेस्तु नरः पुत्रस्तस्य चन्दनदुन्दुभिः ।पुनर्वसुस्तस्य पुत्र आहुकश्चाहुकीसुतः

tittirestu naraḥ putrastasya candanadundubhiḥ / punarvasustasya putra āhukaścāhukīsutaḥ

हिन्दी अर्थ

और काकड़ासिंगी-इनको बेरके समान गुटिका बनाये और काँजीके साथ उसका सेवन करे। शोथ तथा उससे हुए पाकमें भी इसका सेवन करे। उदरवृद्धिमें भी निशोथका प्रयोग विहित है। दारुहल्दी, पुनर्नवा तथा सोंठ-इनसे सिद्ध किया हुआ दुग्ध शोथनाशक है तथा मदार, गदहपूर्ना एवं चिरायताके क्काथसे सेक (करनेपर) शोथका हरण होता है

English

Tittiri's son Nara, his Chandanadundubhi; Punarvasu his son; Ahuka and the son of Ahuki;

अध्याय 273

श्लोक 30

आहुकाद्देवको जज्ञे उग्रसेनस्ततो ऽभवत् ।देववानुपदेवश् च देवकस्य सुताः स्मृताः

āhukāddevako jajñe ugrasenastato 'bhavat / devavānupadevaś ca devakasya sutāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य त्रिकट्युक्त घृतको तिगुने पलाशभस्म- युक्त जलमें सिद्ध करके पीता है, उसका अर्शरोग निस्संदेह नष्ट हो जाता है। फूल प्रियङ्गु, कमल,

English

from Ahuka Devaka was born; then Ugrasena; Devavan and Upadeva are remembered as Devaka's sons;

अध्याय 273

श्लोक 31

तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ ।देवकी श्रुतदेवी च मित्रदेवी यथोधरा

teṣāṃ svasāraḥ saptāsan vasudevāya tā dadau / devakī śrutadevī ca mitradevī yathodharā

हिन्दी अर्थ

दुग्ध, देवदारु और वचसे सिद्ध चौगुना कटुद्रव्ययुक्त तैल मर्दन करनेसे (या जलके साथ ही पीसकर लेप करनेसे) गलगण्ड और गण्डमाल-रोगोंका नाश हो जाता है कचूर, नागकेसर, कुमुदका पकाया हुआ क्वाथ तथा क्षीरविदारी, पीपल और अडूसाका कल्क दूधके साथ पकाकर लेनेसे क्षयरोगमें लाभ होता है

English

they had seven sisters, whom he gave to Vasudeva: Devaki, Shrutadevi, Mitradevi, Yashodhara,

अध्याय 273

श्लोक 32

श्रीदेवी सत्यदेवी च सुरापी चेति सप्तमी ।नवोग्रसेनस्य सुताः कंसस्तेषाञ्च पूर्वजः

śrīdevī satyadevī ca surāpī ceti saptamī / navograsenasya sutāḥ kaṃsasteṣāñca pūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

हींग, कूठ, चित्रक और अजवाइन--इनके क्रमशः

English

Shridevi, Satyadevi and Surapi the seventh. Nine sons of Ugrasena, of whom Kamsa was the eldest:

अध्याय 273

श्लोक 33

न्यग्रोधश् च सुनामा च कङ्कः शङ्कुश् च भूमिपः ।सुतनूराष्ट्रपालश् च युद्धमुष्टिः सुमुष्टिकः

nyagrodhaś ca sunāmā ca kaṅkaḥ śaṅkuś ca bhūmipaḥ / sutanūrāṣṭrapālaś ca yuddhamuṣṭiḥ sumuṣṭikaḥ

हिन्दी अर्थ

भाग ग्रहण करके चूर्ण बनावे । वह चूर्ण गुल्मरोग, उदररोग, शूल और कासरोगको दूर करता है। त्रिफला और चित्ता-इनका चूर्ण गोमूत्रके साथ पीसकर गुटिका बना ले। यह गुटिका गुल्म और प्लीहा आदिका नाश करनेवाली है। अडूसा, नीम और परवलके पत्तोंके चूर्णका त्रिफलाके

English

Nyagrodha and Sunama, Kanka and Shanku the king, Sutanu, Rashtrapala, Yuddhamushti, Sumushtika.

अध्याय 273

श्लोक 34

भजमानस्य पुत्रो ऽथ रथमुख्यो विदूरथः ।राजाधिदेवः शूरश् च विदूरथसुतो ऽभवत्

bhajamānasya putro 'tha rathamukhyo vidūrathaḥ / rājādhidevaḥ śūraś ca vidūrathasuto 'bhavat

हिन्दी अर्थ

साथ सेवन करनेपर वात-पित्त रोगोंका शमन होता है। वायविडङ्गका चूर्ण शहदके साथ लिया जाय तो वह कृमिनाशक है। विडङ्ग, सेंधानमक, यवक्षार एवं गोमूत्रके साथ ली गयी हरै भी

English

Bhajamana's son was Viduratha, chief of charioteers; Rajadhideva and Shura were sons of Viduratha;

अध्याय 273

श्लोक 35

राजाधिदेवपुत्रौ द्वौ शोणाश् चः श्वेतवाहनः ।शोणाश्वस्य सुताः पञ्च शमी शत्रुजिदादयः(३)

rājādhidevaputrau dvau śoṇāś caḥ śvetavāhanaḥ / śoṇāśvasya sutāḥ pañca śamī śatrujidādayaḥ(3)

हिन्दी अर्थ

(कृमिघ्न है)। शल्लकी (शालविशेष), बेर, जामुन, प्रियाल, आम्र और अर्जुन-इन वृक्षोंकी छालका चूर्ण मधुमें मिलाकर दूधके साथ लेनेसे रक्तातिसार दूर होता है। कच्चे बेलका सूखा गूदा, आमकी छाल, धायका फूल, पाठा, सोंठ और मोचरस (कदली स्वरस) -इन सबका समान भाग लेकर चूर्ण बना ले और गुड़मिश्रित तक्रके साथ पीये। इससे दुस्साध्य अतिसारका भी

English

Rajadhideva's two sons: Shonashva and Shvetavahana; Shonashva's five sons Shami, Shatrujit and others;

अध्याय 273

श्लोक 36

शमीपुत्रः प्रतिक्षेत्रः प्रतिक्षेत्रस्य भोजकः ।भोजस्य हृदिकः पुत्रो ह्य् अदिकस्य दशात्मजाः

śamīputraḥ pratikṣetraḥ pratikṣetrasya bhojakaḥ / bhojasya hṛdikaḥ putro hy adikasya daśātmajāḥ

हिन्दी अर्थ

अवरोध हो जाता है। चाँगेरी, बेर, दहीका पानी, सोंठ और यवक्षार-इनका घृतसहित क्वाथ पीनेसे गुदभ्रंश रोग दूर होता है। वायबिडंग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठा तथा इन्द्रयव इनके

English

Shami's son Pratikshetra; of Pratikshetra Bhoja; Bhoja's son Hridika; Hridika's ten sons:

अध्याय 273

श्लोक 37

कृतवर्मा शतधन्वा देवार्हो भीषणादयः ।१ कुकुरो भजमानस्त्विति क॥ ।सुन्दरो भजमानस्त्विति ज॥ २ कुकुरस्येति क॥ ३ शक्रजिदादय इति ख॥ :प् १७ देवार्हात् कम्बलवर्हिरसमौजास्ततो ऽभवत्

kṛtavarmā śatadhanvā devārho bhīṣaṇādayaḥ / 1 kukuro bhajamānastviti ka.. / sundaro bhajamānastviti ja.. 2 kukurasyeti ka.. 3 śakrajidādaya iti kha.. :p 17 devārhāt kambalavarhirasamaujāstato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

क्वाथमें मिर्चका चूर्ण मिलाकर पीनेसे शोथयुक्त अतिसारका नाश होता है शर्करा, सैन्धव और सोंठके साथ अथवा पीपल, मधु एवं गुड़के सहित प्रतिदिन दो हरैँका भक्षण करे तो इससे मनुष्य सौ वर्ष (अधिक काल)-तक सुखपूर्वक जीवित रह सकता है।

English

Kritavarma, Shatadhanva, Devarha, Bhishana and others; from Devarha Kambalabarhis; from him Asamaujas;

अध्याय 273

श्लोक 38

सुदंष्ट्रश् च सुवासश् च धृष्टो ऽभूदसमौजसः ।गान्धारी चैव माद्री च धृष्टभार्ये बभूवतुः

sudaṃṣṭraś ca suvāsaś ca dhṛṣṭo 'bhūdasamaujasaḥ / gāndhārī caiva mādrī ca dhṛṣṭabhārye babhūvatuḥ

हिन्दी अर्थ

पिप्पलीयुक्त त्रिफला भी मधु और घृतके साथ प्रयोगमें लायी जानेपर वैसा ही फल देती है। आँवलेके स्वरससे भावित आँवलेके चूर्णको

English

Sudamshtra and Suvasa; Dhrishta was of Asamaujas. Gandhari and Madri were Dhrishta's two wives;

अध्याय 273

श्लोक 39

सुमित्रो ऽभूच्च गान्धार्यां माद्री जज्ञे युधाजितम्(१) ।अनमित्रः शिनिर्धृष्टात्ततो वै देवमीढुषः

sumitro 'bhūcca gāndhāryāṃ mādrī jajñe yudhājitam(1) / anamitraḥ śinirdhṛṣṭāttato vai devamīḍhuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

मधु, घृत तथा शर्कराके साथ चाटकर दुग्धपान करे। इससे मनुष्य स्त्रियोंका (प्रिय) प्रभु बन सकता है। उड़द, पीपल, अगहनीका चावल, जौ और गेहुँ-इन सबका चूर्ण समान मात्रामें लेकर घृतमें उसकी पूरी बना ले। उसका भोजन करके शर्करायुक्त मधुर दुग्धपान करे। निस्संदेह इस प्रयोगसे मनुष्य गौरैया पक्षीके समान दस बार स्त्री-सम्भोग करनेमें समर्थ हो सकता है। मजीठ,

English

Sumitra was born of Gandhari; Madri bore Yudhajit. Anamitra, Shini from Dhrishta; then indeed Devamidhusha;

अध्याय 273

श्लोक 40

अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापि प्रसेनकः ।सत्राजितः प्रसेनो ऽथ मणिं सूर्यात्स्यमन्तकम्

anamitrasuto nighno nighnasyāpi prasenakaḥ / satrājitaḥ praseno 'tha maṇiṃ sūryātsyamantakam

हिन्दी अर्थ

थायके फूल, लोध, नीलकमल -इनको दूधके साथ देना चाहिए। यह स्त्रियोंके प्रदररोगको दूर करता है। पीली कटसंरैया, मुलहठी और श्वेतचन्दन-ये भी प्रदररोगनाशक हैं। श्रेतकमल

English

Anamitra's son Nighna; Nighna's Prasenaka. Satrajit and Prasena; the Syamantaka jewel (from the Sun);

अध्याय 273

श्लोक 41

प्राप्यारण्ये चरन्तन्तु सिंहो हत्वाग्रहीन्मणिं ।हतो जाम्बवता सिंहो जाम्बवान् हरिणा जितः

prāpyāraṇye carantantu siṃho hatvāgrahīnmaṇiṃ / hato jāmbavatā siṃho jāmbavān hariṇā jitaḥ

हिन्दी अर्थ

और नीलकमलकी जड़ तथा मुलहठी, शर्करा और तिल-इनका चूर्ण गर्भपातको आशङ्का होनेपर गर्भको स्थिर करनेमें उत्तम योग है। देवदारु, अभ्रक, कूठ, खस और सोंठ-इनको काँजीमें पीसकर तैल मिलाकर लेप करनेसे शिरोरोगका नाश करता है। सैन्धव-लवणको तैलमें सिद्ध करके छान ले। जब तैल थोड़ा गरम रह जाय तो उसको कानमें डालनेसे कर्णशूलका

English

Prasena, having obtained it, went in the forest and a lion killed him and took the jewel; the lion was killed by Jambavan; Jambavan was defeated by Hari;

अध्याय 273

श्लोक 42

तस्मान्मणिं जाम्बवतीं प्राप्यागाद्दारकां पुरीम् ।सत्राजिताय प्रददौ शतधन्वा जघान तम्

tasmānmaṇiṃ jāmbavatīṃ prāpyāgāddārakāṃ purīm / satrājitāya pradadau śatadhanvā jaghāna tam

हिन्दी अर्थ

शमन होता है। लहसुन, अदरख, सहजन और केला-इनमेसे प्रत्येकका रस (कर्णशूलहारी है ।)

English

from him, having obtained the jewel and Jambavati, he went to the city of Dvaraka. He gave it to Satrajit; Shatadhanva killed him.

अध्याय 273

श्लोक 43

हत्वा शतधनुं कृष्णो मणिमादाय कीर्तिभाक् ।बलयादवमुख्याग्रे अक्रूरान्मणिमर्पयेत्

hatvā śatadhanuṃ kṛṣṇo maṇimādāya kīrtibhāk / balayādavamukhyāgre akrūrānmaṇimarpayet

हिन्दी अर्थ

और त्रिफला-इनसे सिद्ध घृतका या इनके सहित घृतका पान तिमिररोगका नाश करनेमें परम उत्तम माना गया है। त्रिफला, त्रिकटु एवं सैन्धवलवण-इनसे सिद्ध किये हुए घृतका पान मनुष्यको करना चाहिए। यह चक्षुष्य (आँखोंके लिये हितकर), हृद्य (हृदयके लिये हितकर), विरेचक, दीपन और कफरोगनाशक है। गायके गोबरके रसके साथ नीलकमलके परागको

English

Having killed Shatadhanva, Krishna, taking the jewel and winning fame, in front of Balarama and the chief Yadavas had Akrura offer the jewel.

अध्याय 273

श्लोक 44

मिथ्याभिशस्तिं कृष्णस्य त्यक्त्वा स्वर्गी च सम्पठन् ।सत्राजितो भङ्गकारः सत्यभामा हरेः प्रिया

mithyābhiśastiṃ kṛṣṇasya tyaktvā svargī ca sampaṭhan / satrājito bhaṅgakāraḥ satyabhāmā hareḥ priyā

हिन्दी अर्थ

गुटिकाका अञ्जन दिनौंधी और रतौंधीके रोगियोंके लिये हितकर है। मुलहठी, बच, पिप्पली-बीज, कुरैयाकी छालका कल्क और नीमका क्राथ घोट देनेसे बह वमनकारक होता है। खूब चिकना

English

Leaving the false accusation against Krishna, one who recites this goes to heaven. Satyabhama, Satrajit's daughter, was Hari's beloved.

अध्याय 273

श्लोक 45

अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे सत्यकस्तु शिनेः सुतः ।सत्यकात्सात्यकिर्जज्ञे युयुधानाद्धुनिर्ह्यभूत्

anamitrācchinirjajñe satyakastu śineḥ sutaḥ / satyakātsātyakirjajñe yuyudhānāddhunirhyabhūt

हिन्दी अर्थ

तथा रेड़ी-जैसे तैलसे स्रिग्ध किया गया या पकाया हुआ यवका पानी विरेचक होता है। किंतु इसका अनुचित प्रयोग मन्दाग्नि, उदरमें भारीपन और अरुचिको उत्पन्न करता है। हरे, सैन्धवलवण और पीपल-इनके समान भागका चूर्ण गर्म जलके साथ ले। यह नाराच-संज्ञक चूर्ण सर्वरोगनाशक तथा विरेचक है॥ ६४--७८॥

English

From Anamitra Shini was born; Satyaka was Shini's son; from Satyaka Satyaki was born; from Yuyudhana Dhuni;

अध्याय 273

श्लोक 46

धुनेर्युगन्धरः पुत्रः स्वाह्यो ऽभुत्(२) स युधाजितः ।ऋषभक्षेत्रकौ तस्य ह्य् ऋषभाच्च स्वफल्ककः

dhuneryugandharaḥ putraḥ svāhyo 'bhut(2) sa yudhājitaḥ / ṛṣabhakṣetrakau tasya hy ṛṣabhācca svaphalkakaḥ

हिन्दी अर्थ

महर्षि आत्रेयने मुनिजनोंके लिये जिन सिद्ध योगोंका वर्णन किया था, समस्त योगोंमें श्रेष्ठ उन सर्वरोगनाशक योगोंका ज्ञान सुश्रुतने प्राप्त किया

English

Dhuni's son Yugandhara; Svahya was Yudhajit's; Rishabha and Kshetraka his; from Rishabha Svaphalka;

अध्याय 273

श्लोक 47

स्वफल्कपुत्रो ह्य् अक्रूरो अकूराच्च सुधन्वकः ।शूरात्तु वसुदेवाद्याः पृथा पाण्डोः प्रियाभवत्

svaphalkaputro hy akrūro akūrācca sudhanvakaḥ / śūrāttu vasudevādyāḥ pṛthā pāṇḍoḥ priyābhavat

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'मृतसंजीवनीकारक सिद्ध योगोंका कथन” नामक दो सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ मृत्युञ्जय योगोंका वर्णन

English

Svaphalka's son Akrura; from Akrura Sudhanvaka; from Shura Vasudeva and the rest; Pritha became Pandu's beloved.

अध्याय 273

श्लोक 48

१ सुधाजितमिति ख॥ , छ॥ च २ स्वान्धोभूदिति ख॥ , छ॥ च ।साक्षो ऽभूदिति ज॥ :प् १८ धर्माद्युधिष्ठिरः पाण्डोर्वायोः कुन्त्यां वृकोदरः ।इन्द्राद्धनञ्जयो माद्र्यां नकुलः सहदेवकः

1 sudhājitamiti kha.. , cha.. ca 2 svāndhobhūditi kha.. , cha.. ca / sākṣo 'bhūditi ja.. :p 18 dharmādyudhiṣṭhiraḥ pāṇḍorvāyoḥ kuntyāṃ vṛkodaraḥ / indrāddhanañjayo mādryāṃ nakulaḥ sahadevakaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं सुश्रुत! अब मैं सौ वर्षतककी आयु दे सकती है। चार तोले, दो मृत्युञ्जय-कल्योंका वर्णन करता हूँ, जो आयु तोले अथवा एक तोलेकी मात्रामें त्रिफलाका देनेवाले एवं सब रोगोंका मर्दन करनेवाले हैं। सेवन वही फल देता है। एक मासतक बिल्व- मधु, घृत, त्रिफला और गिलोयका सेवन करना तैलका नस्य लेनेसे पाँच सौ वर्षकी आयु और

English

From Dharma, Yudhishthira of Pandu; from Vayu on Kunti, Vrikodara; from Indra, Dhananjaya; on Madri Nakula and Sahadeva;

अध्याय 273

श्लोक 49

वसुदेवाच्च रोहिण्यां रामः सारणदुर्गमौ ।वसुदेवाच्च देवक्यामादौ जातः सुसेनकः

vasudevācca rohiṇyāṃ rāmaḥ sāraṇadurgamau / vasudevācca devakyāmādau jātaḥ susenakaḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए। यह रोगको नष्ट करनेवाली है तथा तीन कवित्व-शक्ति उपलब्ध होती है। भिलावा एवं तिलका सेवन रोग, अपमृत्यु और वृद्धावस्थाको दूर करता है। वाकुचीके पञ्चाङ्गके चूर्णको खैर (कत्था)-के क्वाथके साथ छः मासतक प्रयोग करनेसे रोगी कुष्ठपर विजयी होता है। नीली

English

from Vasudeva on Rohini, Rama, Sarana and Durgama; from Vasudeva on Devaki first was born Susenaka;

अध्याय 273

श्लोक 50

कीर्तिमान् भद्रसेनश् च जारुख्यो विष्णुदासकः ।भद्रदेहः कंश एतान् षड्गर्भान्निजघान ह

kīrtimān bhadrasenaś ca jārukhyo viṣṇudāsakaḥ / bhadradehaḥ kaṃśa etān ṣaḍgarbhānnijaghāna ha

हिन्दी अर्थ

कटसरैयाके चूर्णका मधु या दुग्धके साथ सेवन हितकर है। खाँडयुक्त दुग्धका पान करनेवाला सौ वर्षोकी आयु प्राप्त करता है। प्रतिदिन प्रातःकाल मधु, घृत और सोंठका चार तोलेकी

English

Kirtiman, Bhadrasena, Jarukhya, Vishnudasaka and Bhadradeha — Kamsa killed these six embryos.

अध्याय 273

श्लोक 51

ततो बलस्ततः कृष्णः सुभद्रा भद्रभाषिणी ।चारुदेष्णश् च शाम्बाद्याः कृष्णाज्जाम्बवतीसुताः

tato balastataḥ kṛṣṇaḥ subhadrā bhadrabhāṣiṇī / cārudeṣṇaś ca śāmbādyāḥ kṛṣṇājjāmbavatīsutāḥ

हिन्दी अर्थ

मात्रामें सेवन करनेवाला मनुष्य मृत्युविजयी होता है। ब्राह्मीके चूर्णे साथ दूधका सेवन करनेवाले मनुष्यके चेहरेपर झुर्रियाँ नहीं पड़ती हैं और उसके बाल नहीं पकते हैं; वह दीर्घजीवन लाभ करता है। मधुके साथ उच्चटा (भुई आँवला)- को एक तोलेको मात्रामें खाकर दुग्धपान करनेवाला मनुष्य मृत्युपर विजय पाता है। मधु, घी अथवा दूधके साथ मेउड्के रसका सेवन करनेवाला रोग

English

Then Bala, then Krishna, Subhadra of kind speech; Charudeshna, Samba and others were Krishna's sons by Jambavati.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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