Agni Purana
333
अध्याय 333 / 381

Adhyaya 334

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 333

श्लोक 1

प्रस्तारनिरूपणम् अग्निर् उवाच छन्दो ऽत्र सिद्धं गाथा स्यात् पादे सर्व गुरौ तथा ।प्रस्तार आद्यगाथोनः परतुल्यो ऽथ पूर्वगः

prastāranirūpaṇam agnir uvāca chando 'tra siddhaṃ gāthā syāt pāde sarva gurau tathā / prastāra ādyagāthonaḥ paratulyo 'tha pūrvagaḥ

हिन्दी अर्थ

संक्षि्तकार, पात तथा वस्तूत्थापन॥ ५--११॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'रीतिनिरूपण' नामक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

See , note 6.

अध्याय 333

श्लोक 2

१ ग्रहवसो वसादिति ग॥ २ चण्डवृष्टिप्रयानक इति ट॥ :प् १९५ नष्टमध्ये समे ऽङ्केनः समे ऽर्ध विषमे गुरुः ।प्रतिलोमगुणं नाद्यं द्विरुद्दिष्टग एकनुत्

1 grahavaso vasāditi ga.. 2 caṇḍavṛṣṭiprayānaka iti ṭa.. :p 195 naṣṭamadhye same 'ṅkenaḥ same 'rdha viṣame guruḥ / pratilomaguṇaṃ nādyaṃ dviruddiṣṭaga ekanut

हिन्दी अर्थ

“रीतिरात्मा काव्यस्य ।'--इस सूत्रके द्वारा रीतिको 'काव्यका आत्मा' कहा है और विशिष्ट पद-रचनाका नाम 'रीति' दिया है। अग्निपुराणमें

English

See , note 6.

अध्याय 333

श्लोक 3

सङ्ख्याद्विरर्धे रूपे तु शून्यं शून्ये द्विरीरितं ।तावदर्धतद्गुणितं द्विद्व्यूनञ्च तदन्ततः

saṅkhyādvirardhe rūpe tu śūnyaṃ śūnye dvirīritaṃ / tāvadardhatadguṇitaṃ dvidvyūnañca tadantataḥ

हिन्दी अर्थ

नृत्य आदिमें उपयोगी आङ्गिक कर्म अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठ! अब मैं ललित, विहृत, क्रीडित तथा केलि-ये ' अभिनय' में नृत्य आदिके समय शरीरसे होनेवाली नायिकाओंके यौवनकालमें सहजभावसे प्रकट विशेष चेष्टाको तथा अङ्ग-प्रत्यङ्गके कर्मको होनेवाले बारह अलंकार हैं। आवरणसे आवृत बताता हूँ। इसे विद्वान् पुरुष ' आङ्गिक कर्म' स्थानमें प्रियजनोंकी चेष्टाके अनुकरणको ' लीला' मानते हैं। यह सब कुछ प्रायः अबलाजनोंके कहते हैं। प्रियजनके दर्शन आदिसे जो मुख और आश्रित होनेपर 'विच्छित्ति'-विशेषका पोषक नेत्र आदिको चेष्टाओंमें कुछ विशेष चमत्कार होता है। लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, लक्षित होता है, उसको सहृदयजन “विलास'

English

See , note 6.

अध्याय 333

श्लोक 4

परे पूर्णं परे पूर्णं मेरुप्रस्तारतो भवेत् ।नगसंख्या वृत्तसंख्या चाध्वाङ्गुलमधोर्धतः ।सङ्ख्यैव द्विगुणैकोना छन्दःसारो ऽयमीरितः

pare pūrṇaṃ pare pūrṇaṃ meruprastārato bhavet / nagasaṃkhyā vṛttasaṃkhyā cādhvāṅgulamadhordhataḥ / saṅkhyaiva dviguṇaikonā chandaḥsāro 'yamīritaḥ

हिन्दी अर्थ

किलकिञ्चित, मोट्टायित, कुट्टमित, बिब्बोक, कहते हैं। हर्षसे होनेवाले हास और शुष्क रुदन

English

See , note 6.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।