Agni Purana
334
अध्याय 334 / 381

Adhyaya 335

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 334

श्लोक 1

शिक्षानिरूपणम् अग्निर् उवाच वक्ष्ये शिक्षान्त्रिषष्टिः स्युर्वर्णा वा चतुराधिकाः ।स्वरा विंशतिरेकश् च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः

śikṣānirūpaṇam agnir uvāca vakṣye śikṣāntriṣaṣṭiḥ syurvarṇā vā caturādhikāḥ / svarā viṃśatirekaś ca sparśānāṃ pañcaviṃśatiḥ

हिन्दी अर्थ

रीतिके चार भेद उपलब्ध होते हैं-पाञ्चाली, गौड़ी, वैदर्भी और लाटी और इन चारोंके पृथक्-पृथक् लक्षण भी दिये हैं। यद्यपि वामनने इन चार भेदोंमेंसे “लाटी 'को ग्रहण नहीं किया है, तथापि परवर्ती आलोचकोंने लाटीपर भी विचार किया है । वामनने ' पाञ्चाली 'का लक्षण किया है-—'माधुर्यसौकुमार्योपपन्ना पाञ्चाली ।' अर्थात् “माधुर्य तथा सौकुमार्य गुणसे सम्पन्न रचना “पाञ्चाली रीति” है।' अग्निपुराणमें “उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली हस्वविग्रहा।'-यों कहकर छोटे समासवाली मृदु रचनाको 'पाञ्चाली' बताया गया है। इसकी मृदुताको ही वामनने ' माधुर्य' नामसे व्यक्त किया है । छोटे समासवाली रचनामें कर्कशताका अभाव होता है, अतः वह 'सुकुमार' मानी गयी है। इसी गुणका वामनने ' सौकुमार्य ' शब्दसे बोध कराया है । व्यासजीने लंबे समासवाली रचनाको 'गौड़ीया' कहा है; उसीको शब्दान्तरसे वामनने ' ओजःकान्तिमती ' कहकर व्यक्त किया है। दीर्घसमासवाली रचनामें ही ' ओज' और 'कान्ति' नामक गुण प्रकट होते हैं। जो समाससे शून्य तथा कोमल संदर्भवाली रचना होती है, उसको 'वैदर्भी' कहा गया है। वैदर्भीके इसी लक्षणको वामनने

English

Tait. Sam.2.3.10.2.

अध्याय 334

श्लोक 2

यादयश् च स्मृता ह्य् अष्टौ चत्वारश् च समाः स्मृताः ।अनुस्वारो विसर्गश् च पौख्यौ चापि परान्वितौ

yādayaś ca smṛtā hy aṣṭau catvāraś ca samāḥ smṛtāḥ / anusvāro visargaś ca paukhyau cāpi parānvitau

हिन्दी अर्थ

'समग्रगुणोपेता' कहकर व्यक्त किया है। उनकी रायमें वैदर्भी रीति सम्पूर्ण दोषोंसे रहित और समग्र गुणोंसे गुम्फित होती है। यथा --

English

One will never get fear by offering oblations to ( the gods of) the protection class. O Rama! one will never be born by offering oblations to (the gods of) the apardjita (unconquered) class.

अध्याय 334

श्लोक 3

दुष्पृष्टश्चेति विज्ञेया ऌकारः प्लुत एव च ।रङ्गश् च खे अरं प्रोक्तं(१) हकारः पञ्चमैर् युतः

duṣpṛṣṭaśceti vijñeyā ḷkāraḥ pluta eva ca / raṅgaś ca khe araṃ proktaṃ(1) hakāraḥ pañcamair yutaḥ

हिन्दी अर्थ

भरतमुनिने वृत्तियोंकी उत्पत्ति भगवान् नारायणसे बतायी है और उनके चार भेद किये हैं-' भारती ', ' सात्वती', 'कैशिकी' तथा ' आरभटी '। ' भारती 'का प्राकट्य ऋग्वेदसे, ' सात्वती 'का यजुर्वेदसे, ' कैशिकी 'का सामवेदसे और ' आरभटी'का अथर्ववेदसे आविर्भाव माना है । जो प्रधान वाणी पुरुषद्वारा प्रयोगमें लायी जानेवाली, स्त्रीरहित, संस्कृत वाक्योंसे युक्त तथा भरतमुनिके शिष्योंसे प्रयुक्त है, वह “भारती ' नामवाली वृत्ति है; उसके चार अङ्ग हैं-प्ररोचना, आमुख, वीथी और प्रहसन (द्रष्टव्यः-नाट्यशास्त्रका बीसवाँ अध्याय) । भरतमुनिके ' नाट्यशास्त्र' (अध्याय २२)-में 'सामान्य-अभिनय-निरूपणों'के प्रसङ्गमें ' अभिनय 'के तीन स्वरूप वर्णित हैं- वाचिक, आङ्गिक और सात्त्विक। नाट्यमें सत्त्वकी प्रतिष्ठा है। सत्त्वका रूप अव्यक्त है। वह नवों रसोंमें स्थित रहता है । युवावस्थामें स्त्रियोंके मुख और अङ्गमें जो सात्त्विक विकार अधिकतर प्रकट होते हैं, उन्हें 'अलंकार' कहा गया है। वे अलंकार भावोंके आश्रित होते हैं । उनमेंसे पहले तीन “अङ्गज अलंकार ' हैं, दस “स्वाभाविक अलंकार' हैं और सात ' अयत्नज' हैं। वे सब-के-सब रस और भावसे

English

One will ward off untimely death by offering oblations to ( the gods of) the life-giving class. One will get welfare everywhere by offering oblations to (the gods of) the welfare class.

अध्याय 334

श्लोक 4

अन्तस्थाभिः समायुक्त औरस्यः कण्ठ्य एव सः ।आत्मबुद्ध्या समस्यर्थं मनोयुक्ते विवक्षया

antasthābhiḥ samāyukta aurasyaḥ kaṇṭhya eva saḥ / ātmabuddhyā samasyarthaṃ manoyukte vivakṣayā

हिन्दी अर्थ

उपबुंहित होते हैं। भाव, हाव और हेला-ये परस्पर उदित हो, शरीरमें प्रकृतिस्थ होकर रहते हैं। ये तीनों सत्त्वके ही भेद हैं और अङ्गज अलंकार हैं । “सत्त्व देहात्मक होता है। “सत्त्व 'से ' भाव'का उत्थान होता है, ' भाव 'से हाव 'का और ' हाव 'से ' हेला'का उद्भव कहा गया है। वाणी, अङ्ग और मुखरागके द्वारा तथा सत्त्व और अभिनयके द्वारा कविके आन्तरिक अभिप्रायको भावित (प्रकट) करनेवाला तत्त्व ' भाव’ कहलाता है। लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिञ्चित, मोट्टायित, कुट्टमित, बिब्बोक, ललित और विहतये दस

English

One will get united with good fortune (by propitiating the gods of) happiness and armour group. One will remove the defects of a building by offering oblations to the class of deities presiding over the foundations of a house.

अध्याय 334

श्लोक 5

मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ।१ वर्गमुखे अरं प्रोक्तमिति ख॥ :प् १९६ मारुतस्तूरसि चरन् मन्त्रं(१) जनयति स्वरं

manaḥ kāyāgnimāhanti sa prerayati mārutam / 1 vargamukhe araṃ proktamiti kha.. :p 196 mārutastūrasi caran mantraṃ(1) janayati svaraṃ

हिन्दी अर्थ

स्त्रियोंके स्वभावज चेष्टाविशेष या अलंकरण हैं। इनका विशद विवेचन श्लोक १२-२५ तक उपलब्ध होता है। शोभा, कान्ति, दीसि, माधुर्य, धैर्य, प्रागल्भ्य तथा औदार्य--ये अयत्नज अलंकरण' हैं। इन सबका विवेचन श्लोक २६-३० तक उपलब्ध होता है । पुरुषमें शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाम्भीर्य, ललित, औदार्य और तेज-ये आठ सात्त्विक भाव प्रकट होते हैं । यहाँ लीला-विलास आदि जो स्त्रियोंके अलंकरण कहे गये हैं, उनकी संख्या दस है; किंतु अग्निपुराणमें व्यासजीने ' क्रीडित' और ' केलि'-इन दोकी उद्भावना करके स्त्रियोंके स्वभावज अलंकरणोंको बारह बताया है। परवर्ती साहित्यदर्पणकारने इनके अतिरिक्त छः नूतन भावोंकी उद्भावना करके इन सबकी संख्या अठारहतक पहुँचा दी है। व्यासजीने दिग्दर्शनके लिये लीला, विलास आदि कुछ ही भावोंके संक्षिप्त लक्षण दिये हैं, किंतु कविराज विश्वनाथने अठारहों भावों या अलंकरणोंके उदाहरणसहित विस्तृत लक्षण प्रस्तुत किये हैं।

English

In the same way one will remove all the defects by ofiering oblations to ( the gods of) the Raudra class. Oblations (arc to be offered to) these ten classes in eighteen propitiatory (rites).

अध्याय 334

श्लोक 6

प्रातःसवनयोगस्तु छन्दो गायत्रमाश्रितम् ।कण्ठे माध्यन्दिनयुतं मध्यमन्त्रेषु भानुगम्

prātaḥsavanayogastu chando gāyatramāśritam / kaṇṭhe mādhyandinayutaṃ madhyamantreṣu bhānugam

हिन्दी अर्थ

आदिके मिश्रणको ' किलकिञ्चित' माना गया है। चित्तके किसी गर्वयुक्त विकारको 'बिब्बोक' कहते हैं। (इस भावके उदय होनेपर अभीष्ट वस्तुमें भी अनादर प्रकट किया जाता है।)

English

One will never be afflicted by serpents by offering oblations with (the hymn) supamastviP! (The hymn) indrena daitmfp confers all the pleasures.

अध्याय 334

श्लोक 7

तारन्तार्तीयसवनं(२) शीर्षण्यं जागतानुगम् ।सोदीर्णो मूर्ध्न्यभिहितो वक्रमापद्य मारुतः

tārantārtīyasavanaṃ(2) śīrṣaṇyaṃ jāgatānugam / sodīrṇo mūrdhnyabhihito vakramāpadya mārutaḥ

हिन्दी अर्थ

सौकुमार्य्यजनित चेष्टा-विशेषको 'ललित' कहते हैं । सिर, हाथ, वक्षःस्थल, पार्थभाग--ये क्रमशः अङ्ग हैं। भ्रूलता (भौंह) आदिको प्रत्यङ्ग या “उपाङ्ग' जाना जाता है। अङ्ग-प्रत्यङ्गोंके प्रयलजनित कर्म (चेष्टाविशेष)-के बिना नृत्य आदिका प्रयोग सफल नहीं होता। वह कहीं मुख्यरूपसे और कहीं वक्ररूपसे साधित होता है। आकम्पित,

English

(Thchymn) devd manttaP confers all the pleasures. (The hymn) yamaa lohdi" is excellent for removing (the effects of) bad dreams.

अध्याय 334

श्लोक 8

वर्णान् जनयते तेषां विभागः पञ्चधा स्मृतः ।स्वरतः कालतः स्थानात् प्रयत्नार्थप्रदानतः

varṇān janayate teṣāṃ vibhāgaḥ pañcadhā smṛtaḥ / svarataḥ kālataḥ sthānāt prayatnārthapradānataḥ

हिन्दी अर्थ

लोलित-ये तेरह प्रकारके शिर:कर्म जानने चाहिए। भ्रूकर्म सातः प्रकारका होता है। भूसंचालनके कर्मोमें पातन आदि कर्म मुख्य हैं। रस, स्थायी भाव एवं संचारी भावके सम्बन्धसे दृष्टिरका

English

It produces the letters; their division is remembered as fivefold: by vowel, by time, by place, by effort, by meaning-giving;

अध्याय 334

श्लोक 9

अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस् तथा ।जिह्वामूलञ्च दन्ताश् च नासिकौष्ठौ च तालु च

aṣṭau sthānāni varṇānāmuraḥ kaṇṭhaḥ śiras tathā / jihvāmūlañca dantāś ca nāsikauṣṭhau ca tālu ca

हिन्दी अर्थ

'अभिनय' तीन प्रकारका होता है। उसके भी छत्तीस भेद होते हैं-जिनमें दस भेद रससे प्रादुर्भूत होते हैं। कनीनिकाका कर्म भ्रमण एवं चलनादिके भेदसे नौ” प्रकारका माना गया है। मुखके छः" तथा नासिकाकर्मके छः एवं निःश्वासके नौ भेद माने जाते हैं। ओष्ठकर्मके छः", पादकर्मके छः“ चिबुक-क्रियाके सात एवं ग्रीवाकर्मके नौ” भेद बताये गये हैं। हस्तका

English

eight are the places of letters: chest, throat, head, root of tongue, teeth, nose, lips and palate.

अध्याय 334

श्लोक 10

स्वभावश् च विवृत्तिश् च शषसा रेफ एव च ।जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः

svabhāvaś ca vivṛttiś ca śaṣasā repha eva ca / jihvāmūlamupadhmā ca gatiraṣṭavidhoṣmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

१. ' नाट्यशास्त्र'के आठवें अध्यायमें श्लोक १७ से ४० तक शिरःसंचालनके विविध प्रकारोंकी विशद व्याख्या दृष्टिगोचर होती है। ' आकम्पित' आदि जो तेरह प्रकार हैं, उनके नाममात्र अग्निपुराणमें वहींसे ज्यों-के-त्यों ले लिये गये हैं । इन सबके लक्षणोंका विवेचन वहीं द्रष्टव्य है।

English

Natural state and openness: sha, sha, sa and ra; the tongue-root and upadhmaniya — eightfold is the movement of the sibilant;

अध्याय 334

श्लोक 11

पद्यो भावप्रसन्धानमुकारादि परम्पदं ।स्वरान्तं तादृशं विद्याद्यदन्यद्व्यक्तमूष्मणः

padyo bhāvaprasandhānamukārādi parampadaṃ / svarāntaṃ tādṛśaṃ vidyādyadanyadvyaktamūṣmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

२. 'भ्रूसंचालन'के जिन सात कर्मोंकी यहाँ चर्चा की गयी है, उनके नाम “नाट्यशास्त्र'में इस प्रकार उपलब्ध होते हैं--उत्क्षेप, पातन, भ्रुकुटी, चतुर, कुञ्चित, रेचित तथा सहज। दोनों ओरकी भौंहोंको एक साथ या बारी-बारीसे ऊपरको उठाना 'उत्क्षेप' है। इसी तरह उन्हें एक साथ या एक-एक करके नीचे लाना 'पातन' है। भौंहोंके मूलभागको ऊपर उठाना ' भ्रुकुटी' कही गयी है। दोनों ओरकी मनोहर और विस्तृत भौंहोंको तनिक-सा उठानेसे ' चतुर 'कर्म सम्पादित होता है। एक या दोनों भौंहोंको मृदुलभावसे सिकोड्ना' कुञ्चित' कहा गया है। एक ही भौंहके ललितउत्क्षेपसे 'रेचित'का सम्पादन होता है और भौंहोंका जो स्वाभाविक कर्म है, उसे 'सहज' कहा गया है। (नाट्य० ८। ११८-१२३)

English

the verse, the joining of feeling, beginning with "u" the supreme state; ending with a vowel such as that one should know; whatever else is manifest of the sibilant.

अध्याय 334

श्लोक 12

ऊतीर्थादागतं(३) दग्धमपवर्णञ्च भक्षितं ।एवमुच्चारणं पापमेवमुच्चारणं शुभम्

ūtīrthādāgataṃ(3) dagdhamapavarṇañca bhakṣitaṃ / evamuccāraṇaṃ pāpamevamuccāraṇaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

३. कान्ता, भयानका, हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री, वीरा तथा बीभत्सा-ये आठ 'रसदृष्टियाँ' हैं। खिग्धा, हृष्टा, दीना, क्रुद्धा, दूसा, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता-ये आठ 'स्थायिभाव-सम्बन्धिनी' दृष्टियाँ हैं। शून्या, मलिना, श्रान्ता, ललिता, ग्लाना, शङ्किता, विषण्णा, मुकुला, कुञ्चिता, अभितप्ता, जिह्मा, ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विशोका, त्रस्ता तथा मदिरा-ये संचारीभावसे सम्बन्ध रखनेवाली बीस प्रकारकी दृष्टियाँ हैं । इन सबका विवेचन ' नाट्यशास्त्र में बड़े विस्तारके साथ

English

What comes from a wrong place is burned and mispronounced and eaten (swallowed); thus pronunciation is sin; thus pronunciation is auspicious —

अध्याय 334

श्लोक 13

अतीर्थादागतं द्रव्यं साम्नायं सुव्यवस्थितं ।सुस्वरेण सुवक्त्रेण प्रयुक्तं ब्रह्मराजनि

atīrthādāgataṃ dravyaṃ sāmnāyaṃ suvyavasthitaṃ / susvareṇa suvaktreṇa prayuktaṃ brahmarājani

हिन्दी अर्थ

किया गया है । (द्रष्टव्य-अध्याय आठ, श्लोक ४१-११४ तक) ४. भ्रमण, वलन, पात, चलन, सम्प्रवेशन, विवर्तन, समुद्वृत्त, निष्कास तथा प्राकृत-ये कनीनिकाके नौ कर्म हैं। नेत्रपुटके भीतर दोनों पुतलियोंका मण्डलाकार आवर्तन ' भ्रमण” माना गया है। त्रिकोणगमन 'वलन' कहलाता है। नीचेकी ओर खिसकना ' पातन' है। उनके कम्पनको 'चलन' जानना चाहिए। उनको भीतर घुसा देना 'प्रवेशन' कहलाता है। कटाक्ष करनेकी क्रियाको “विवर्तन ' कहते हैं पुतलियोंका ऊँचे उठना ' समुद्वत्त' कहलाता है, निकलना 'निष्काम' है और स्वाभाविकरूपसे उनकी स्थिति 'प्राकृत' कहलाती है।

English

what comes from the right place is well arranged with the Veda tradition, used with a good voice and good mouth, to the Brahmin-king.

अध्याय 334

श्लोक 14

न करालो न लम्वोष्ठो नाव्यक्तो नानुनासिकः ।गद्गदो बहुजिह्वश् च न वर्णान् वक्तुम् अर्हति

na karālo na lamvoṣṭho nāvyakto nānunāsikaḥ / gadgado bahujihvaś ca na varṇān vaktum arhati

हिन्दी अर्थ

५. विधुत, विनिवृत्त, निर्भुग्न, भुग्न, निवृत्त तथा उद्वाहि-ये मुखके छः कर्म हैं । (द्रष्टव्य-अध्याय ८, श्लोक १५३ से ५७ तक)

English

One who is dreadful, long-lipped, unclear, nasal, stammering or many-tongued is not fit to speak the letters.

अध्याय 334

श्लोक 15

एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिन्ताः ।१ मात्रमिति ख॥ २ भावन्तार्तीयसवनमिति ख॥ ३ कुतीर्थादागतमिति ट॥ ।क्षतीर्थदागतमिति ख॥ :प् १९७ सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते

evaṃ varṇāḥ prayoktavyā nāvyaktā na ca pīḍintāḥ / 1 mātramiti kha.. 2 bhāvantārtīyasavanamiti kha.. 3 kutīrthādāgatamiti ṭa.. / kṣatīrthadāgatamiti kha.. :p 197 samyagvarṇaprayogeṇa brahmaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

६. नता, मन्दा, विकृष्टा, सोच्छ्वासा, विघूर्णिता तथा स्वाभाविकी -ये छः प्रकारकी 'नासिका' मानी गयी हैं। (इसका लक्षण द्रष्टव्य--नाट्य० ८, श्लोक १२९-१३६ तक)

English

Thus letters should be used, neither unclear nor pressed; by right use of letters one is honored in Brahma's world.

अध्याय 334

श्लोक 16

उदात्तश्चानुदात्तश् च स्वरितश् च स्वरास्त्रयः ।ह्रस्वो दीर्घः प्लुत इति कालतो नियमावधि

udāttaścānudāttaś ca svaritaś ca svarāstrayaḥ / hrasvo dīrghaḥ pluta iti kālato niyamāvadhi

हिन्दी अर्थ

७. विवर्तन, कम्पन, विसर्ग, विनिगूहन, संदष्टक तथा समुदर-ये ' ओष्ठ के छः कर्म हैं। (दरष्टव्य-अध्याय ८, श्लोक १४१-१४७)

English

Udatta, anudatta and svarita are the three accents; short, long and prolonged by time up to the limit of rule.

अध्याय 334

श्लोक 17

कण्ठ्या वहाविचुयशास्तालव्या ओष्ठजा वुपु ।स्युर्मूर्धन्या ऋहुरसाः(१) दन्त्याः ऌ+ओलसाः स्मृताः

kaṇṭhyā vahāvicuyaśāstālavyā oṣṭhajā vupu / syurmūrdhanyā ṛhurasāḥ(1) dantyāḥ ḷ+olasāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

८. नाट्यशास्त्रमें 'पादकर्म 'के छः भेदोंका उल्लेख है। उद्धट्टित, सम, अग्रतलसंचर, अञ्चित, कुञ्चित तथा सूचीपाद-ये उन छहोंके नाम हैं। (द्रष्टव्य-अध्याय ९, श्लोक २६५-२८०) ९. कुट्टन, खण्डन, छिन्न, चुक्कित, लेहन, सम तथा दन्तक्रियादष्ट-ये सात प्रकारकी “चिबुकक्रिया' हैं। (द्रष्टव्य--अध्याय ८, श्लोक १४७-१५३)

English

Guttural are a, ha, visarga, ka-series; palatal e, i, cha-series, ya, sha; labial u, pa-series, va; cerebral ri, ra, sha; dental lri, la, sa are remembered;

अध्याय 334

श्लोक 18

जिह्वामूले तु ह्वः प्रोक्तो दन्त्योष्ठो वः स्मृतो बुधैः ।एदैतौ कण्टतालव्यौ ओ औ कण्ठ्यौष्ठजौ स्मृतौ

jihvāmūle tu hvaḥ prokto dantyoṣṭho vaḥ smṛto budhaiḥ / edaitau kaṇṭatālavyau o au kaṇṭhyauṣṭhajau smṛtau

हिन्दी अर्थ

१०. समा, नता, उन्नता, त्श्रा, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता, वलिता और निवृत्ता-ये 'ग्रीवा' के नौ भेद हैं। (द्रष्टव्य--श्लोक १७०-१७६)

English

at the root of the tongue "h" is told; the dental-labial is "v" by the wise; e and ai guttural-palatal; o and au guttural-labial are remembered;

अध्याय 334

श्लोक 19

अर्धमात्रा तु कण्ठस्य एकारैकारयोर्भवेत् ।अयोगवाहा विज्ञेया आश्रयस्थानभागिनः

ardhamātrā tu kaṇṭhasya ekāraikārayorbhavet / ayogavāhā vijñeyā āśrayasthānabhāginaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकारका होता है। पताक, त्रिपताक, कर्तरीमुख, अर्द्धचन्द्र, उत्कराल, शुकतुण्ड, मुष्टि, शिखर, कपित्थ, कटकामुख, सूच्यास्य, पद्मकोष, अतिशिरा, मृगशीर्षक, कामूल, कालपद्म, चतुर, भ्रमर, ताम्रचूड-' असंयुत हस्त'के ये चौबीस भेद कहे गये हैं!

English

half a mora of the guttural belongs to e and ai; the ayogavaha are to be known as sharing the place of support.

अध्याय 334

श्लोक 20

अचो ऽस्पृष्टापणस्त्वीषन्नोमाः स्पृष्ता हलःस्मृताः ।शेषाः स्पृष्टा हलः प्रोक्ता निबोधात्र प्रधानतः

aco 'spṛṣṭāpaṇastvīṣannomāḥ spṛṣtā halaḥsmṛtāḥ / śeṣāḥ spṛṣṭā halaḥ proktā nibodhātra pradhānataḥ

हिन्दी अर्थ

“संयुत हस्त'के तेरह भेद माने जाते हैं- अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटक, वर्धमान,

English

Vowels are untouched; semivowels slightly; stops are the touched consonants; the rest are said to be touched consonants — know this chiefly.

अध्याय 334

श्लोक 21

अमो ऽनुनासिकानक्रौ नादिमौ हसषः स्मृताः ।ईषन्नादोपणयशः श्वासिनश् च थकादयः ।ईषच्छासं स्वरं विद्याद्दीर्घमेतत् प्रचक्षते

amo 'nunāsikānakrau nādimau hasaṣaḥ smṛtāḥ / īṣannādopaṇayaśaḥ śvāsinaś ca thakādayaḥ / īṣacchāsaṃ svaraṃ vidyāddīrghametat pracakṣate

हिन्दी अर्थ

असङ्ग, निषध, दोल, पुष्पपुट, मकर, गजदन्त एवं बहिःस्तम्भ। संयुत करके परिवरद्धनसे इसके अन्य भेद भी होते हैं वक्षःस्थलका अभिनय आभुग्ननर्तन आदि भेदोंसे पाँच! प्रकारका होता है। उदरकर्मः अनतिक्षाम, खल्व तथा पूर्ण-तीन प्रकारके होते हैं। पार्श्वभागोंके पाँच” कर्म तथा जङ्घाके" भी

English

The nasals and "m"; the first of the voiced and ha, sha, sa; slightly voiced the semivowels; the thakara and the rest unvoiced; know slightly breathy vowel — they call it long.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।