Chandogya Upanishad
128
अध्याय 128 / 154

Adhyāya 128

प्रपाठक खण्ड 128

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 128

श्लोक 7.15.1

॥ प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँसमर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः

|| prāṇo vā āśāyā bhūyānyathā vā arā nābhau samarpitā evamasminprāṇe sarvam̐samarpitaṃ prāṇaḥ prāṇena yāti prāṇaḥ prāṇaṃ dadāti prāṇāya dadāti prāṇo ha pitā prāṇo mātā prāṇo bhrātā prāṇaḥ svasā prāṇa ācāryaḥ prāṇo brāhmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

निष्ठा गुरुशुभरषादिस्तत्परसव निष्ठा गुरुश्श्रूषा आदिक कहते ह । उसमे बरहमविज्ञानके ल्यि तत्पर कति ही जानने योग्य है यदा वे करोस्यथ निस्तिष्ठति नाङ्कत्वा निस्तिष्ठति सनल्कुमार-- “जित समय मनुष्य करता है उस समय बह निष्ठा भी करने रगता है; बिना कयि किसी निष्ठा नदीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान्‌ होता है ¦ अतः छति़ी दी विरोषद्पते

English

'Spirit (prâna) is better than hope. As the spokes of a wheel hold to the nave , so does all this (beginning with names and ending in hope) hold to spirit. That spirit moves by the spirit, it gives spirit to the spirit. Father means spirit, mother is spirit, brother is spirit, sister is spirit, tutor is spirit, Brâhmana is spirit.

अध्याय 128

श्लोक 7.15.2

स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किंचिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति

sa yadi pitaraṃ vā mātaraṃ vā bhrātaraṃ vā svasāraṃ vācāryaṃ vā brāhmaṇaṃ vā kiṃcidbhṛśamiva pratyāha dhiktvāstvityevainamāhuḥ pitṛhā vai tvamasi mātṛhā vai tvamasi bhrātṛhā vai tvamasi svasṛhā vai tvamasyācāryahā vai tvamasi brāhmaṇahā vai tvamasīti

हिन्दी अर्थ

यदा वै करोति। कृतिरिन्दरि- निस समय मवुष्य करता है। यसंयमधित्तेकाग्रताकरणं च । 'हृति' इन्दियसंयम ५ ॥ त सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि एकायता करनेको फ सुख ही जानने योग्य है यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं र्ग्ध्वा करोति सुखमेव रुच्ध्वा करोति सुखं स्वैव विजिज्ञासि-

English

'For if one says anything unbecoming to a father, mother, brother, sister, tutor or Brâhmana, then people say, Shame on thee! thou hast offended thy father, mother, brother, sister, tutor, or a Brâhmana.

अध्याय 128

श्लोक 7.15.3

अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति

atha yadyapyenānutkrāntaprāṇāñchūlena samāsaṃ vyatiṣaṃdahennaivainaṃ brūyuḥ pitṛhāsīti na mātṛhāsīti na bhrātṛhāsīti na svasṛhāsīti nācāryahāsīti na brāhmaṇahāsīti

हिन्दी अर्थ

सनलुमार- “जब मनुष्यको घुख प्राप्त होता है तमी वह कता ह; विना घुल मिले को नहीं करता, अप्तु घुल पाकर ( पनिकी जशा रखकर) ह करता है; अतः घुल्की ही विशेषरूपसे निज्ञासा करनी चादिये।' सापि कृतिर्यदा सुखं रमते वह ङृति भी, निसं समय घुल मिरुता है अर्थात्‌ जिस समय पसा मानता है कि ज्ञे आगे बतलाया सनसुमार-- ननिश्वव जो ममा है वही घुख है, अस्प घुल नदी है । ख भूमा ही मूमाकी दौ विरोषरूपसे जिज्ञासा करनी चारय ॥ नारद -- भगवन्‌ चै मूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञसा

English

'But, if after the spirit has departed from them, one shoves them together with a poker, and burns them to pieces, no one would say, Thou offendest thy father, mother, brother, sister, tutor or a Brâhmana.

अध्याय 128

श्लोक 7.15.4

प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत

prāṇo hyevaitāni sarvāṇi bhavati sa vā eṣa evaṃ paśyannevaṃ manvāna evaṃ vijānannativādī bhavati taṃ cedbrūyurativādyasītyativādyasmīti brūyānnāpahnuvīta

हिन्दी अर्थ

यो वै भूमा महन्निरतिशयं निश्चय जो मूमा है-- महान्‌, 8 निरतिशय जीर बहु--ये ईइसके बह्धिति पर्थायास्तत्सुखम्‌ । पर्याय ई वही ख है । उससे भूमाके स्वरूयका प्रतिपादन ्िर्षणोऽसौ भूमेत्याद-- यह भूमा,भिन सेबर ह ,

English

'Spirit then is all this. He who sees this, perceives this, and understands this, becomes an ativâdin . If people say to such a man, Thou art an ativâdin, he may say, I am an ativâdin; he need not deny it.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।