Chandogya Upanishad
138
अध्याय 138 / 154

Adhyāya 138

प्रपाठक खण्ड 138

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 138

श्लोक 7.25.1

॥ स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदँ सर्वमित्यथातोऽहंकारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदँ सर्वमिति

|| sa evādhastātsa upariṣṭātsa paścātsa purastātsa dakṣiṇataḥ sa uttarataḥ sa evedam̐ sarvamityathāto'haṃkārādeśa evāhamevādhastādahamupariṣṭādahaṃ paścādahaṃ purastādahaṃ dakṣiṇato'hamuttarato'hamevedam̐ sarvamiti

हिन्दी अर्थ

नितना यह भौतिक आक्षा है उतना दी हदयान्तगंत आकाश है । यलोक ओर प्रथिवी- ये दोनों रोक सम्यक्‌ प्र्ारसे इषके भीतर ही स्थित है । इष प्रकार अग्नि ओर वायु-ये दोना, सूय जीर ऽयमाफाश्नो भोतिकस्तावानेषो- भाकाश्च प्रसिद्ध है उतना ही ऽन्तहंदय आकाशो यरिमिन्न्बष्टव्यं यह॒ हृदयान्तगत आक्षा विजिज्ञासितव्यं चावोचाम । निके विषयमे किं हमने अन्ेषण तं चेदृनरूयुरस्मिशदिदं ब्रह्मपुरे सवश्समाहित सर्वाणि च भूतानि स्वे च कामा यदेतज्नरा वामरोति

English

'The Infinite indeed is below, above, behind, before, right and left--it is indeed all this. 'Now follows the explanation of the Infinite as the I: I am below, I am above, I am behind, before, right and left--I am all this.

अध्याय 138

श्लोक 7.25.2

अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदँ सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड्भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति अथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति

athāta ātmādeśa evātmaivādhastādātmopariṣṭādātmā paścādātmā purastādātmā dakṣiṇata ātmottarata ātmaivedam̐ sarvamiti sa vā eṣa evaṃ paśyannevaṃ manvāna evaṃ vijānannātmaratirātmakrīḍa ātmamithuna ātmānandaḥ sa svarāḍbhavati tasya sarveṣu lokeṣu kāmacāro bhavati atha ye'nyathāto viduranyarājānaste kṣayyalokā bhavanti teṣām̐ sarveṣu lokeṣvakāmacāro bhavati

हिन्दी अर्थ

उ आचार्यसे यदि शिष्यगण करद किं यदि इख बह्मपुरम यह सब समाहित है तथा सम्पूणं भूत भौर समस्त कामनाएं भी सम्यक्‌ प्रकारसे स्थित है तो जिख रमय यह वृद्धावस्थाको प्रा शेता अथवा नष्ट शो तं देवशर कवन्तं ब्रूयुः ह किंतु यदि इस प्रकार कहनेवठे उस भाचार्ंसे सिष्यगण करदं न्तेवासिनोऽस्मिेद्थोक्ते चे्यदि। कि यदि इस बहमपुरमे अर्थात्‌ ब्रक-

English

'Next follows the explanation of the Infinite as the Self: Self is below, above, behind, before, right and left--Self is all this. 'He who sees, perceives, and understands this, loves the Self, delights in the Self, revels in the Self, rejoices in the Self--he becomes a Svarâg, (an autocrat or self-ruler); he is lord and master in all the worlds. 'But those who think differently from this, live in perishable worlds, and have other beings for their rulers.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।