Chandogya Upanishad
24
अध्याय 24 / 154

Adhyāya 24

प्रपाठक खण्ड 24

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 24

श्लोक 2.11.1

॥ मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम्

|| mano hiṃkāro vākprastāvaścakṣurudgīthaḥ śrotraṃ pratihāraḥ prāṇo nidhanametadgāyatraṃ prāṇeṣu protam

हिन्दी अर्थ

अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेधो जायते स बादर एकत्रित होते है-- यह हकार है । मेव उलत्न होता ै- यह प्रस्ताव है । जरः षरसता है- यह उदुगीथ है । बिजली चमक्षी ओर कट़कती है- यह पतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता है-- अभ्राण्यन्म्रणान्भेष उद्क- ज्षारण कनके कारण बादल. का नाम “अग्नः है तथा नर्ते से्ततवात्‌ । उक्ताथमन्यत्‌ । करनेवाले होनेसे वे “मेषः करति

English

The hiṅkâra is mind, the prastâva speech, the udgîtha sight, the pratihâra hearing, the nidhana breath. That is the Gâyatra Sâman, as interwoven in the (five) prânas .

अध्याय 24

श्लोक 2.11.2

स एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्व्रतम्

sa evametadgāyatraṃ prāṇeṣu protaṃ veda prāṇī bhavati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā mahāmanāḥ syāttadvratam

हिन्दी अर्थ

वति महान्‌ प्रजया पशुभिभवति महान्कीर्त्या वषन्तं वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूप सामको पर्जन्यम अनुस्यूत जानता है वह विरम जोर सुरूप पु्मोका अवरोध करता ह, पूणे आयुकन प्रा होता दे, उञ्ज्वरु जीवन व्यतीत करता हे, प्रना ओर विरूपं सूपांशाजावि- वह बकरी खीर मेड आदि विरूप एवं सुरूप पञ्ु्ओका अवरोष तीन्‌ परुनवरुन्े ्ाभोती- कता है, अर्थात्‌ उन भा कएता

English

He who thus knows this Gâyatra interwoven in the prânas, keeps his senses, reaches the full life, he lives long , becomes great with children and cattle, great by fame. The rule of him who thus meditates on the Gâyatra is, 'Be not high-minded.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।