Chandogya Upanishad
25
अध्याय 25 / 154

Adhyāya 25

प्रपाठक खण्ड 25

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 25

श्लोक 2.12.1

॥ अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनँ सँशाम्यति तन्निधनमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतम्

|| abhimanthati sa hiṃkāro dhūmo jāyate sa prastāvo jvalati sa udgītho'ṅgārā bhavanti sa pratihāra upaśāmyati tannidhanam̐ sam̐śāmyati tannidhanametadrathaṃtaramagnau protam

हिन्दी अर्थ

वसन्तो हिकारो भीष्मः परस्तावो वर्षा उद्रीथः वसन्त हकार हे, भ्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद्‌ छतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन दहै- यह तैराज साम चछतुओमिं बसन्तो हकारः प्राथम्यात्‌ । सरवभथम होनेके कारण वसन्त ्रप्मः प्रस्ताव इत्यादि पू- दिकार ह, भष्म भरस्ताव ड इत्यादि

English

The hiṅkâra is, he rubs (the fire-stick); the prastâva, smoke rises; the udgîtha, it burns; the pratihâra, there are glowing coals; the nidhana, it goes down; the nidhana, it is gone out. This is the Rathantara Sâman as interwoven in fire .

अध्याय 25

श्लोक 2.12.2

स य एवमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङ्ग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्

sa ya evametadrathaṃtaramagnau protaṃ veda brahmavarcasyannādo bhavati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā na pratyaṅṅgnimācāmenna niṣṭhīvettadvratam

हिन्दी अर्थ

अजया पशुभिबर्मवचसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीत्यत्‌ न निन्दे त्त- ¦ जो ईस प्रकार इस वैरान सामको ऋतु ओमि अनुस्यूत प्च ओर हतिनके कारण शोभित दता है, ह पूणं भयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वर जीवन व्यतीत करता है, भरना ओर एतहैराजमूतुषु प्रोतं बेद इस वैरान सामको जो ऋतम अनुस्यूत जानता है वह छतुओकि समानं विराजता है । जिस प्रकार

English

He who thus knows this Rathantara interwoven in fire, becomes radiant and strong. He reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. The rule is, 'Do not rinse the mouth or spit before the fire.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।