Chandogya Upanishad
27
अध्याय 27 / 154

Adhyāya 27

प्रपाठक खण्ड 27

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 27

श्लोक 2.14.1

॥ उद्यन्हिंकार उदितः प्रस्तावो मध्यंदिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद्बृहदादित्ये प्रोतम्

|| udyanhiṃkāra uditaḥ prastāvo madhyaṃdina udgītho'parāhṇaḥ pratihāro'staṃ yannidhanametadbṛhadāditye protam

हिन्दी अर्थ

अजा हिंकारोऽवयः भ्रस्तावो गाव उद्रीथोऽश्वाः बकरी हकार है, मं भरस्ताव है, गो उद्गीथ है, बोडे प्रतार हे ओर पुरुष निषन है--यह रेवतीसाम पडजम अनुस्यूत द अजा हिकार इत्यादि पूर्- (अना हकार? इत्यादि मन्वका अर्थं पूर्ववत्‌ है । यह रेवतीसाम

English

Rising, the sun is the hiṅkâra, risen, he is the prastâva, at noon he is the udgîtha, in the afternoon he is the pratihâra, setting, he is the nidhana. That is the Brihat Sâman as interwoven in the sun .

अध्याय 27

श्लोक 2.14.2

स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम्

sa ya evametadbṛhadāditye protaṃ veda tejasvyannādo bhavati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā tapantaṃ na nindettadvratam

हिन्दी अर्थ

भवति सर्वमायुरेति उ्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिः वति महान्कीत्या पशुन्न निन्देत्तद्त्रतम्‌॥ ॥ वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पञ्चम अनुप्त पद्युमोकी निन्दा न करे यह रेवतीसामोपासकके स्थि यन्ञायन्नीयसामकी उपासना , खोम हिंकारस्तक्पस्तावो माश्समुद्रीथोऽस्थि परति.

English

He who thus knows the Brihat as interwoven in the sun, becomes refulgent and strong, he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Never complain of the heat of the sun.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।