Chandogya Upanishad
28
अध्याय 28 / 154

Adhyāya 28

प्रपाठक खण्ड 28

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 28

श्लोक 2.15.1

॥ अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम्

|| abhrāṇi samplavante sa hiṃkāro megho jāyate sa prastāvo varṣati sa udgītho vidyotate stanayati sa pratihāra udgṛhṇāti tannidhanametadvairūpaṃ parjanye protam

हिन्दी अर्थ

रोम हकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उदृगीथ है, अस्थि तहर है ओर मजा निषन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गम ¦ रोम दकारो देहावयवानां देहके भवयवेमि सर्वभथम होनेके प्राथम्यात्‌ । त्वक्प्रस्ताव कारण लोम दिका है। रोमोके आनन्तर्यात्‌ । मांसथुद्रीथः भनन्तर होनेके कारण त्वचा पसव जया पशुभिभेवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो

English

The mists gather, that is the hiṅkâra; the cloud has risen, that is the prastâva; it rains, that is the udgîtha; it flashes and thunders, that is the pratihâra; it stops, that is the nidhana. That is the Vairûpa Sâman, as interwoven in Parganya, the god of rain.

अध्याय 28

श्लोक 2.15.2

स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपँश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम्

sa ya evametadvairūpaṃ parjanye protaṃ veda virūpām̐śca surūpam̐śca paśūnavarundhe sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā varṣantaṃ na nindettadvratam

हिन्दी अर्थ

वह एरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायजञीय सामको अङ्गोमं अनुस्यूत जानता ह, अह्ञवान्‌ होता ह । वह अङ्गके कारण कुटिरु नदीं होता पूणे युको परापत होता हे, ञ्ज्व जीवन व्यतीत करता हे, प्रना ओर जङ्गी होता है अर्थात्‌ पूरण्ग होता है । अङ्ग अर्थात्‌ हाथ्पोव आदिके द्वारा कुटिर यानी क्गड़ा या अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रति- हार है, चन्द्रमा निषन है- यह राजनसाम देवताभमे अनुस्युत है

English

He who thus knows the Vairûpa as interwoven in Parganya, obtains all kinds of cattle (virûpa), he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Never complain of the rain.' Next: II, 16 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।