Chandogya Upanishad
36
अध्याय 36 / 154

Adhyāya 36

प्रपाठक खण्ड 36

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 36

श्लोक 2.23.1

॥ त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसँस्थोऽमृतत्वमेति

|| trayo dharmaskandhā yajño'dhyayanaṃ dānamiti prathamastapa eva dvitīyo brahmacāryācāryakulavāsī tṛtīyo'tyantamātmānamācāryakule'vasādayansarva ete puṇyalokā bhavanti brahmasam̐stho'mṛtatvameti

हिन्दी अर्थ

उत्रास्मिल्लोके यजमानोऽ्द- लोको निष्क्रीतः स्यात्ततस्ते यहाँ -इस रोकरमे यजमान मँ मध्याह्सवनमें रृद्रसम्बन्ध सामयान पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाजलघनेना- मध्याहसवनका आरम्भ करनेसे पूव यजमान दक्षिणाग्नि पीठे उत्तराभिमुख वैखकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है

English

There are three branches of the law. Sacrifice, study, and charity are the first ,

अध्याय 36

श्लोक 2.23.2

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्र्वन्त भूर्भुवः स्वरिति

prajāpatirlokānabhyatapattebhyo'bhitaptebhyastrayī vidyā samprāsravattāmabhyatapattasyā abhitaptāyā etānyakṣarāṇi samprāsrvanta bhūrbhuvaḥ svariti

हिन्दी अर्थ

घनेनोदट्ुख उपविश्य स रोद्र के पीठेकी ओर उत्तराभिमुख बैठ (= कर यजमान वैराज्यपदकी प्राप्तिके सामाभिगायति यजमानो रुद्र खयि रुद्देवतासम्बन्धी सामका गान है वायो ! तम अन्तरिक्षछोकका द्वार खोर दो, जिससे कि वैराज्यपदकीःप्राप्तिके ल्यि हम वुम्हारा दरशन कर सके तदनन्तर यजमान इस मन्त्रहमारा हवन करता हे--अन्तरिक्ष- से रहनेवालि अन्तरिक्षरोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है । मुञ्च यन- मानको तुम अन्तरिक्ष कोककी प्राप्ति कृराओ । थह निश्चय ही यज-

English

Austerity the second, and to dwell as a Brahmakârin in the house of a tutor, always mortifying the body in the house of a tutor, is the third. All these obtain the worlds of the blessed; but the Brahmasamstha alone (he who is firmly grounded in Brahman) obtains immortality.

अध्याय 36

श्लोक 2.23.3

तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः सम्प्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक्संतृण्णोंकार एवेदँ सर्वमोंकार एवेदँ सर्वम्

tānyabhyatapattebhyo'bhitaptebhya oṃkāraḥ samprāsravattadyathā śaṅkunā sarvāṇi parṇāni saṃtṛṇṇānyevamoṃkāreṇa sarvā vāksaṃtṛṇṇoṃkāra evedam̐ sarvamoṃkāra evedam̐ sarvam

हिन्दी अर्थ

यहो यजमान, श्ये जायु समाप्त होनेप अन्तरिक्षरोक प्राप्त कर्गा स्वाहाः एसा कहकर हवन करता है जर 'छोकद्वारकी अगंश- को दूर्‌ करो" एेसा कहकर उत्थान करता है रुद्रगण उसे मध्याहसवन्‌ अन्तरिक्षक्षित इत्यादि समा- “अन्तरिक्ष्षतेः इयादि मोका अर्थं पोँचवे ओर ठे मन्त्रके नम्‌ ॥ ८-१० ॥ समान है ॥ ८-१० ॥ तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पू यजमान आहवनीयाग्निके पीठे उत्तराभिुख ैठकर आदित्य ओर विधेदेवसम्बन्धी सामका गान्‌ करता है ११ तथाहवनीयस्योदड्घुख उप- तथा आहवनीयाग्नके पीठे उत्त-

English

Pragâpati brooded on the worlds. From them, thus brooded on, the threefold knowledge (sacrifice) issued forth. He brooded on it, and from it, thus brooded on, issued the three syllables, Bhûh, Bhuvah, Svah.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।