अध्याय 37
श्लोक 2.24.1
॥ ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातः सवनँ रुद्राणां माध्यंदिनँ सवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम्
|| brahmavādino vadanti yadvasūnāṃ prātaḥ savanam̐ rudrāṇāṃ mādhyaṃdinam̐ savanamādityānāṃ ca viśveṣāṃ ca devānāṃ tṛtīyasavanam
हिन्दी अर्थ
ोकका द्वार सोर दो, निससे हम स्वाराग्यप्राप्तिके स्यि तुम्हारा दोन कर से । यह आदि्यसम्बन्धी साम है; अव विवेदेवसम्बन्पौ साम कहते ह --रोकका द्वार सोर दो, निससे हम साप्राज्यप्रापतिके ततपशवात् यजमान इस मन्बदवारा हवन करता है स्वर्गमे रहनेवले दुरोकनिवासी आदि्यको ओर ॒विदवेदवोको नमस्कार हे। सुक्ल यजमानकेो तुम पुण्यरोककी प्रा कराओ यह् निश्चय ही यजमानका रोक ण्ड २७ 1 शाङ्करभाष्याथं २४१ अर्थं पहठेके ही समान है । “विन्दत,
English
The teachers of Brahman (Veda) declare, as the Prâtah-savana (morning-oblation) belongs to the Vasus, the Mâdhyandina-savana (noon-libation) to the Rudras, the third Savana (evening-libation) to the Âdityas and the Visve Devas,