Chandogya Upanishad
39
अध्याय 39 / 154

Adhyāya 39

प्रपाठक खण्ड 39

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 39

श्लोक 3.2.1

॥ अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूँष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृत आपः

|| atha ye'sya dakṣiṇā raśmayastā evāsya dakṣiṇā madhunāḍyo yajūm̐ṣyeva madhukṛto yajurveda eva puṣpaṃ tā amṛta āpaḥ

हिन्दी अर्थ

स य तदेवममृतं वेदादित्यानामेवेको भूल वह, जो इस प्रकार इस ॒असेतको जानता है, आदि्योमिसे दी कोई एक होकर वरुणकी दी प्रषानतासे इस अमृतकरो देखकर तृत हो जाता है । बह इस रूपसे ही उदासीन होता है ओर इसीसे उद्योगी वह्‌ आदित्य जितने समयतक ॒दक्षिणसे उदित होता ओर उत्तरं अस्त होता है उपसे दूने समयतक पशचिमसे उदित होता ओर पूर्वमे अस्त होता रहता है । इतने समयतक वह॒ आदिर्योक दी आधिपत्य

English

The southern rays of the sun are the honey-cells on the right. The Yagus verses are the bees, the Yagur-veda sacrifice is the flower, the water (of the sacrificial libations) is the nectar (of the flower).

अध्याय 39

श्लोक 3.2.2

तानि वा एतानि यजूँष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोजायत

tāni vā etāni yajūm̐ṣyetaṃ yajurvedamabhyatapam̐stasyābhitaptasya yaśasteja indriyaṃ vīryamannādyam̐rasojāyata

हिन्दी अर्थ

द्विगुणकाठात्यये पूवस्मातपूव॑स्माद्‌- आक्षेपः द्विगुणोत्तरोत्तरेण का- पूदयास्तमयकारस्य तुल्यत्वं हि मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुथं अमृतक्री उपासना अथ यच्चतुथममुतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन तथा जो चौथा अशत है, मरुद्गण सोमक प्रथानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैँ । देवगण न तो खाते है जर न पीते है, वे इस अग्रृतफो देखकर दी तृप्त हो नति ह

English

Those very Yagus verses (as bees) brooded over the Yagur-veda sacrifice (the flower); and from it, thus brooded on, sprang as its (nectar) essence, fame, glory of countenance, vigour, strength, and health.

अध्याय 39

श्लोक 3.2.3

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लँ रूपम्

tadvyakṣarattadādityamabhito'śrayattadvā etadyadetadādityasya śuklam̐ rūpam

हिन्दी अर्थ

वे इस रूपको रक्षित करके ही उदासीन होते है ओर शसीसे उद्यमशीरु हो जाते है स य एतदेवममृतं वेद्‌ मरुतामेवेको भूत्वा सोमे- वह, जो इख प्रकार इस अमृतो जानता है, मर्तोमिसे ही कोई एक होकर सोमक प्रधानतासे ही इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है । बह इस रूपसे दी उदासीन ही

English

That flowed forth and went towards the sun. And that forms what we call the white (sukla) light of the sun. Next: III, 3 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।