अध्याय 40
श्लोक 3.3.1
॥ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः
|| atha ye'sya pratyañco raśmayastā evāsya pratīcyo madhunāḍyaḥ sāmānyeva madhukṛtaḥ sāmaveda eva puṣpaṃ tā amṛtā āpaḥ
हिन्दी अर्थ
वह आदित्य जितने समयतक पश्चिमसे उदित होता ओर पूवम अप्त होता है. उससे दूने कार्तक उत्तरसे उदित होता ओर दक्षिणम अत्त होता रहता है । इतने कार्तक वह मरुदूगणके ही आधिपय ओर साध्योके जीवनाश्रयभुत पचम अम्रतकी उपासना अथ यत्प्चमममुतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा तथा जो पांचवा अमृत हे, साध्यगण ब्रह्मी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते है । देवगण न तो सति है ओर न पीते है, वे इस अमृतको देखकर दी तृप्त दो जते है
English
The western rays of the sun are the honey-cells behind. The Sâman verses are the bees, the Sâma-veda sacrifice is the flower, the water is the nectar.