Chandogya Upanishad
61
अध्याय 61 / 154

Adhyāya 61

प्रपाठक खण्ड 61

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 61

श्लोक 4.5.1

॥ अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रँ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम्

|| atha hainamṛṣabho'bhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva prāptāḥ somya sahasram̐ smaḥ prāpaya na ācāryakulam

हिन्दी अर्थ

१, दं-पूण॑मास यमे अन्वाहायपचन अथि हविष्य पकाया जाता है; तथा चन्द्रमाके विषयमे “चन्द्रमाको प्रास्त होकर अनन हो जाता है" एेसा श्रुति वाक्य है । इस्यि इन दोनोंका अन्नसे सम्बन्ध है । तदनन्तर उसे आहवनीयाम्निने उपदेश किया--श्राण, भाकारा, यूरोक ओर विदत्‌ ये भेरे चार शरीर है । यह जो विधुतं प दिखायो देता है वह मँ ह वहीभ ह"

English

The bull of the herd (meant for Vâyu) said to him: 'Satyakâma!' He replied: 'Sir!' The bull said: 'We have become a thousand, lead us to the house of the teacher;

अध्याय 61

श्लोक 4.5.2

ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम

brahmaṇaśca te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca prācī dikkalā pratīcī dikkalā dakṣiṇā dikkalodīcī dikkalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇaḥ prakāśavānnāma

हिन्दी अर्थ

स य एतमेवं विद्रानुपास्तेऽपहते पापछ्रत्यां खोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरषाः ्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिश्श्च लोकेऽमुष्मिरच चह परप, नो इसे इस प्रकार जानकर इस ८ चतुर्धा विभक्त अग्न ) को उपासना करता हे, पापकर्मको नष्ट कर देता हे, लोकान्‌ होता हे, पूणं आयुको प्रात होता है तथा उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता काण्ड १६ छाङ्करमाण्याथ ४१५ अथ हैनमाहवनीयोभ्लु शशास तदनन्तर उसे आहवनीयाम्निने प्राण आका्चो चौरविद्युदिति उपदेश क्रिया-- भ्रण, आकाश,

English

'And I will declare to you one foot of Brahman.' 'Declare it, Sir,' he replied. He said to him: 'The eastern region is one quarter, the western region is one quarter, the southern region is one quarter, the northern region is one quarter. This is a foot of Brahman, consisting of the four quarters, and called Prakâsavat (endowed with splendour).

अध्याय 61

श्लोक 4.5.3

स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते

sa ya etamevaṃ vidvām̐ścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇaḥ prakāśavānityupāste prakāśavānasmim̐lloke bhavati prakāśavato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvām̐ścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇaḥ prakāśavānityupāste

हिन्दी अर्थ

ते होच॒रुपकोसलेषा सोभ्य तेऽस्मद्वियासविया ्योऽभ्युवादोपकोसर ३ इति उन्दने कदा-“उपकोसर है सोम्य यह अपनी विधा ओर आत्मवि्या तेरे भति कही । णाच तुचे इनके फलकी प्रापिका मागं बतसवेगे । तदनन्तर उसके आचार्यं साये । उससे आचार्यने कदा-

English

'He who knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Prakâsavat, becomes endowed with splendour in this world. He conquers the resplendent worlds, whoever knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of the four quarters, by the name of Prakâsavat. Next: IV, 6 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।