Chandogya Upanishad
62
अध्याय 62 / 154

Adhyāya 62

प्रपाठक खण्ड 62

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 62

श्लोक 4.6.1

॥ अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते ग आभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश

|| agniṣṭe pādaṃ vakteti sa ha śvobhūte ga ābhiprasthāpayāṃcakāra tā yatrābhi sāyaṃ babhūvustatrāgnimupasamādhāya gā uparudhya samidhamādhāya paścādagneḥ prāṅupopaviveśa

हिन्दी अर्थ

ते पुनः संभूयोचुहोपकोस- तव॒ उन्होने पुनः एक पाथ क कहा-उपकोसल है सोम्य रषा सोभ्य ते तवासमदामिः यह हमने तेरे परति अपनी विचय आचाय ओर उपकोञ्चटका संवाद भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद्‌ इव सोम्य ते मुखं भाति को नु लानुशदासेति को नु माुशिष्याद्धो सोम्य तेरा मुख ब्रहमवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुञ्े किसने उपदेश किया है ९ अनी सुद्धे कौन उपदेश करता, एसा कहकर क्ह मानो उसे छिपने ल्गा । फिर अगिनर्योकी ओर संकेत करके बोख--

English

'Agni will declare to you another foot of Brahman.' (After these words of the bull), Satyakâma, on the morrow, drove the cows (toward the house of the teacher). And when they came towards the evening, he lighted a fire, penned the cows, laid wood on the fire, and sat down behind the fire, looking to the east.

अध्याय 62

श्लोक 4.6.2

तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव

tamagnirabhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva

हिन्दी अर्थ

इदमिति ह प्रतिजज्ञे खोकान्वाव किर सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपरश्च आपो तव उसंने “यह बताया है" एेसा कहकर उत्तर दिया । इसपर आचारयने कहा-- ह सोम्य उन्होने तो. वज्ञे केवरु रोका ही उपदेश किया दहै; अब र्मे तुञ्ञे वह बतरता ह जिसे जाननेवाकेसे

English

Then Agni (the fire) said to him: 'Satyakâma!' He replied: 'Sir.'

अध्याय 62

श्लोक 4.6.3

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम

brahmaṇaḥ somya te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca pṛthivī kalāntarikṣaṃ kalā dyauḥ kalā samudraḥ kalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇo'nantavānnāma

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मविद इव सोम्य ते भरुखं प्रसन्नं भाति, कोलु = नभयूद्ऽयुक्तवानकाक्ाभीन्द- आचार्यका उपदे - नेत्रस्थित पुरुषक्नौ उपासना होवाचेतदमृतमभयमेतदृब्रह्मेति । तयद्यप्यस्मिन्स- “यह जो नेत्रम पुरुष दिखाई देता है यह मात्मा है देसा उसने कहा ह अमृत है, अमय है जर ब्रह्म है ।' उस ( पुरुषके स्थानह्प नत्र) मे यदि धत या जल हके तो वह पलकों ही चला जाता ३

English

Agni said: 'Friend, I will declare unto you one foot of Brahman.' 'Declare it, Sir,' he replied. He said to him: 'The earth is one quarter, the sky is one quarter, the heaven is one quarter, the ocean is one quarter. This is a foot of Brahman, consisting of four quarters, and called Anantavat (endless).'

अध्याय 62

श्लोक 4.6.4

स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते

sa ya etamevaṃ vidvām̐ścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇo'nantavānityupāste'nantavānasmim̐lloke bhavatyanantavato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvām̐ścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇo'nantavānityupāste

हिन्दी अर्थ

य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते जिनका वाद्य इन्द्रियमा निदरृ् हो गया है उन ब्रह्मचर्यादि साघन- यह नेत्रके अन्तग॑त दृष्टिका द्रष्ट समाधान-यह कोई दोष नही ह, क्योंकि ेसा कहकर आचारथने सुखाकाशषूप द्र्टका ही “जो

English

'He who knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Anantavat, becomes endless in this world. He conquers the endless worlds, whoever knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Anantavat. Next: IV, 7 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।