Chandogya Upanishad
64
अध्याय 64 / 154

Adhyāya 64

प्रपाठक खण्ड 64

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 64

श्लोक 4.8.1

॥ मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश

|| madguṣṭe pādaṃ vakteti sa ha śvobhūte gā abhiprasthāpayāṃcakāra tā yatrābhi sāyaṃ babhūvustatrāgnimupasamādhāya gā uparudhya samidhamādhāya paścādagneḥ prāṅupopaviveśa

हिन्दी अर्थ

इस अधिकारीका भुक्ति प्रदान करके पारन नहीं कत्रा" इस घन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्य- रहस्य ( उपासना) के प्रकरणम . मरगोपदे्चका प्रघङ्ग होनेके क्षारण, कत्व सामान्याच्च यज्ञे क्षेत उत्पन्नं पूर्वोत्तर प्रकरणा भरण्यकत्वमे यह जो चरता है निश्चय यज्ञ ही है । यह चरता हुआ निश्चय इस सम्पूणं जगत्‌को पवित्र॒ करता है; क्योंकि यह गमन करता हुभा इस समस्त संघारको पवित्र कर देता है इसख्ि यही यज्ञ है । मन ओर

English

'A diver-bird (Madgu, meant for Prâna) will declare to you another foot of Brahman.' (After these words of the Hamsa), Satyakâma, on the morrow, drove the cows onward. And when they came towards the evening, he lighted a fire, penned the cows, laid wood on the fire, and sat down behind the fire, looking toward the east.

अध्याय 64

श्लोक 4.8.2

तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव

taṃ madgurupanipatyābhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva

हिन्दी अर्थ

एवह बा एष वायुर्योऽयं "एष ह वै"--यह वायु ङ पत्यं य्ः। ह बा इति चर्श दे, यश है । द' जीर परसिदधा्थावद्योतको निपातौ । भ वह्यके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि तयोरन्यतरां मनसा सश्स्करोति बह्मा वाचा हाताध्वञुरद्वातान्यतरास यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा

English

Then a diver flew near and said to him 'Satyakâma.' He replied: 'Sir.'

अध्याय 64

श्लोक 4.8.3

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम

brahmaṇaḥ somya te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca prāṇaḥ kalā cakṣuḥ kalā śrotraṃ kalā manaḥ kalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇa āyatanavānnāma

हिन्दी अर्थ

वतनीसस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथेकपाद्रजन्रथो उनसे एक मार्गका व्रह्मा मनक द्वारा संस्कार करता है तथा होता, जध्वं जर उदूगाता ये वाणी दवारा दूसरे माग॑का संस्कार करते है । दि शतरनुवाकरके आारम्म हो जानेपर॒परिषानीया चाके उबारणसे ओर, यदि भातरनुवाक्का भारम्भ होनिके अनन्तर परिधानीया ऋचासे पव ब्रह्मा नहीं वोता ट तो समस्त ऋतिक मिटकर दोन दी मारगोका संस्कार कर देते है । तव को ॥ रोता ।

English

The diver said: 'Friend, I will declare unto you one foot of Brahman! 'Declare it, Sir,' he replied. He said to him: 'Breath is one quarter, the eye is one quarter, the ear is one quarter, the mind is one quarter. This is a foot of Brahman, consisting of four quarters, and called Âyatanavat (having a home). 'He who knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Âyatanavat, becomes possessed of a home in this world. He conquers the worlds which offer a home, whoever knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Âyatanavat.' Next: IV, 9 Sacred Texts | Hinduism

अध्याय 64

श्लोक 4.8.4

स यै एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते

sa yai etamevaṃ vidvām̐ścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇa āyatanavānityupāsta āyatanavānasmim̐lloke bhavatyāyatanavato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvām̐ścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇa āyatanavānityupāste

हिन्दी अर्थ

यन्न-दोषके प्रायध्ितस्यते व्याह्टतियोकी उपासना अत्र ब्रह्मणो मौनं विदितम्‌; यहाँ बरहम मौनका विधान करिया गया, उसका अंश होनेप भजापतिने लोकोको रक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया । उन तप किये जाते हुए ोकोँसे उसने रघ निकारे । प्रथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु ओर दुरोकसे आदियको उद्धत किया

English

He who knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Âyatanavat, becomes possessed of a home in this world. He conquers the worlds which offer a home, whoever knows this and meditates on the foot of Brahman, consisting of four quarters, by the name of Âyatanavat.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।