अध्याय 67
श्लोक 4.11.1
॥ अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति
|| atha hainaṃ gārhapatyo'nuśaśāsa pṛthivyagnirannamāditya iti ya eṣa āditye puruṣo dṛśyate so'hamasmi sa evāhamasmīti
हिन्दी अर्थ
जो कोई वसिष्ठको जानता है वह स्वनातिर्योम वसिष्ठ होता है; योह दे वसिष्ठं वसित तम- जो कोई वसिष्ट--भवन्त माच्छदयिदठतमं : = बसनेवाे भर्थात् आच्छादन करने- व वालेको अथवा अत्यन्त ॒वघुमान् भतिष्ठित होता है; र 8 ¢ ३॥ क न नीः योह वै प्रतिष्ठां वेद सं जो कोई प्रतषठाको जानता दे अस्सि्लोकेऽपुभ्मिश्च परे प्रति- द इस रोक ओर् प्ररोकर्म
English
After that the Gârhapatya fire taught him Earth, fire, food, and the sun (these are my forms, or forms of Brahman). The person that is seen in the sun, I am he, I am he indeed .