Chandogya Upanishad
66
अध्याय 66 / 154

Adhyāya 66

प्रपाठक खण्ड 66

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 66

श्लोक 4.10.1

॥ उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचार्यमुवास तस्य ह द्वादश वार्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयँस्तं ह स्मैव न समावर्तयति

|| upakosalo ha vai kāmalāyanaḥ satyakāme jābāle brahmacāryamuvāsa tasya ha dvādaśa vārṣāṇyagnīnparicacāra sa ha smānyānantevāsinaḥ samāvartayam̐staṃ ha smaiva na samāvartayati

हिन्दी अर्थ

हो तो “सुवः स्वाहा" एेसा कहकर स्ष्िदधवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ दक्षिणाग्निमे हवन करे, तथा जुहुयात्‌ । तथा सामनिमित्त रेषे एेसा कहकर आहवनीयाग्निमे हवन इस विषयमे रसा समञ्ञना॒चाटिये फि जिस भकार खण ( कार ) से घुवणंको, घुवणंसे चोँदीको, चँरीसे त्रपुको, त्रपुसे सीपेको सीसेतेठोदेको, ओर रोहसे कषक अथवा चमत काको नेहा

English

Upakosala Kâmalâyana dwelt as a Brahmakârin (religious student) in the house of Satyakâma Gâbâla. He tended his fires for twelve years. But the teacher, though he allowed other pupils (after they had learnt the sacred books) to depart to their own homes, did not allow Upakosala to depart.

अध्याय 66

श्लोक 4.10.2

तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासांचक्रे

taṃ jāyovāca tapto brahmacārī kuśalamagnīnparicacārīnmā tvāgnayaḥ paripravocanprabrūhyasmā iti tasmai hāprocyaiva pravāsāṃcakre

हिन्दी अर्थ

जहाँ इस प्रकार जानेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्परवण होता है ¦ इस प्रकार नाननेवाले बरक्षाके उदेरयसे दी यह गाथा प्रसिद्ध हे कि “जह जहो कर्म आदृत्त होता है वहीं वह पर्हैच जाता है एष ह॒ वा उदकप्रवण उदल्‌- जहो इस भकार जाननेवाल ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्पवण- निम्नो दक्षिणोच्छायो यज्ञो । उरी भोर का हमा भौर ब्रह्मा यज्ञं यजमानरसर्वाशश्चत्िजोऽभिरक्षति तस्मादेवं

English

Then his wife said to him: 'This student, who is quite exhausted (with austerities), has carefully tended your fires. Let not the fires themselves blame you, but teach him.' The teacher, however, went away on a journey without having taught him. The student from sorrow was not able to eat. Then the wife of the teacher said to him: 'Student, eat! Why do you not eat?' He said: 'There are many desires in this man here, which lose themselves in different directions. I am full of sorrows, and shall take no food.'

अध्याय 66

श्लोक 4.10.3

स ह व्याधिनानशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधीभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति

sa ha vyādhinānaśituṃ dadhre tamācāryajāyovāca brahmacārinnaśāna kiṃ nu nāśnāsīti sa hovāca bahava ime'sminpuruṣe kāmā nānātyayā vyādhībhiḥ pratipūrṇo'smi nāśiṣyāmīti

हिन्दी अर्थ

पकं मानव बह्मा ही चल्िक्‌ है । निघ पकार युद्धम 4 यद्धार्ओंकी रक्षा करती है उसी प्रकार पेसा लाननेवाला नवा थ यजमान जर अन्य समस्त ॥छविजोकषौ भी सब भरसे रक्षा कता है। मान बो ब्रह्मा मोनाचरणान्म- मोनाचरण करनेसे अथवा मतं करनेके कारण ब्रह्मा मानव ननादवा ानवच्वात्ततो बहयवैक- अतः ज्ञानवान्‌ होनेके श्र

English

The student from sorrow was not able to eat.

अध्याय 66

श्लोक 4.10.4

अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति

atha hāgnayaḥ samūdire tapto brahmacārī kuśalaṃ naḥ paryacārīddhantāsmai prabravāmeti tasmai hocuḥ prāṇo brahma kaṃ brahma khaṃ brahmeti

हिन्दी अर्थ

कर्ताभंकी यानी अपनी पीटपर्‌ चदे हुए योद्धार्भोी सब प्रकारसे रक्षा करती है उसी प्रकार एेसा जानने- श्रीमच्छंकरभगवतः कृतो ऊान्दोग्योपनिषद्ि दिक्सबन्धिनी केवलकर्मिणां संसारगतिः, वैराग्यहैतोर्वक्तव्या सयः सहत्यकारित्वाविशेपे, कथं

English

Thereupon the fires said among themselves: 'This student, who is quite exhausted, has carefully tended us. Well, let us teach him.' They said to him:

अध्याय 66

श्लोक 4.10.5

स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः

sa hovāca vijānāmyahaṃ yatprāṇo brahma kaṃ ca tu khaṃ ca na vijānāmīti te hocuryadvāva kaṃ tadeva khaṃ yadeva khaṃ tadeva kamiti prāṇaṃ ca hāsmai tadākāśaṃ cocuḥ

हिन्दी अर्थ

जो ज्येष्ठ जोर शरष्ठकतो जानता है वह्‌ उयेष्ठ ओर श्रेष्ठ हो जाता है । निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ जौर श्रेष्ठ है रुग्धात्मिका भवति, यया गँ जो कोई ज्येष्ठ--आयुमे प्रथम ओर श्रेष्ठ गुणोमे अधिकको

English

'Breath is Brahman, Ka (pleasure) is Brahman, Kha (ether) is Brahman.' He said: 'I understand that breath is Brahman, but I do not understand Ka or Kha .' They said: 'What is Ka is Kha, what is Kha is Ka .' They therefore taught him Brahman as breath, and as the ether (in the heart) .

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।