Chandogya Upanishad
9
अध्याय 9 / 154

Adhyāya 9

प्रपाठक खण्ड 9

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 9

श्लोक 1.9.1

॥ अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानकाशः परायणम्

|| asya lokasya kā gatirityākāśa iti hovāca sarvāṇi ha vā imāni bhūtānyākāśādeva samutpadyanta ākāśaṃ pratyastaṃ yantyākāśo hyevaibhyo jyāyānakāśaḥ parāyaṇam

हिन्दी अर्थ

तमेवयुक्तवन्तं ह प्रवाहणो इस प्रकार कहनेवटे उस शा व्यक प्रति जीवर्के पुत्र प्रवाहणे । है शाखवद्य ! तुम्हारा साम निश भिटककी उक्ति-आकाश्च ही सवका जाश्रय ह प्रवाहणकी अनुमति पाकर अस्य ऊोकस्य का गतिरिस्याकाश इति होवाच “स छोकक्ी क्या गति है क्योंकि ये समस्त भूत॒ आकाशसे इसपर प्रबादणने कहा-- आकाशः

English

'What is the origin of this world?' 'Ether , 'he replied. For all these beings take their rise from the ether, and return into the ether. Ether is older than these, ether is their rest.

अध्याय 9

श्लोक 1.9.2

स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयाँसमुद्गीथमुपास्ते

sa eṣa parovarīyānudgīthaḥ sa eṣo'nantaḥ parovarīyo hāsya bhavati parovarīyaso ha lokāñjayati ya etadevaṃ vidvānparovarīyām̐samudgīthamupāste

हिन्दी अर्थ

अस लोकस्य कां गतिरिति आकारोऽइति होवाच प्रवाहणः । आकाशं इति च प्र आत्मा आक्ारासंज्नक उद्रीथकी ध ओर उसकी उपासनाका फल रीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह॒ खोकाञ्जयति य वह यह उद्गीथ परम उक्छृष्ट दहै, यह अनन्त है । जो इसे इष भकार जाननेवाखा विद्वान्‌ इस ॒परमोल्कष्ट ८ परमात्ममृत ) उदृगीथकी , उपासना करता है उसका जीवन परमो्छृष्ट हौ जाता टै ओर वह उत्त-

English

He is indeed the udgîtha (Om = Brahman), greater than great (parovarîyas), he is without end. He who knowing this meditates on the udgîtha, the greater than great, obtains what is greater than great, he conquers the worlds which are greater than great.

अध्याय 9

श्लोक 1.9.3

तँ हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति

tam̐ haitamatidhanvā śaunaka udaraśāṇḍilyāyoktvovāca yāvatta enaṃ prajāyāmudgīthaṃ vediṣyante parovarīyo haibhyastāvadasmim̐lloke jīvanaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

सोऽप्येष वरः परथ बरीयांशच भी 9 अर्थात्‌ पर्‌ ओर ० तः १ यह्‌ उदुगीथ ही परमात्मभा परावगयानुद्राथः परमात्मा सम्पन्न होता ट व तश्हैतमतिधन्वा शोनक उदरशाण्डिस्यायोक्तवो- हेभ्यस्तावदरस्मिह्ोके जीवनं भविष्यति नके पुत्र भतिधन्वाने उस ईइस उदृगीथका उद्रशाण्डिल्यके प्रति निरूपण कर उससे शदा--जबतक मेरी संततिमेसे मेरे वंशज इस उद्‌ गीथक्ञो जानेगे तवतक हस लोकम उनङृ¡ जीवन उत्तरोत्तर उक्कृषटतर

English

Atidhanvan Saunaka, having taught this udgîtha to Udara-sândilya, said: 'As long as they will know in your family this udgîtha, their life in this world will be greater than great.

अध्याय 9

श्लोक 1.9.4

तथामुष्मिँल्लोके लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति

tathāmuṣmim̐lloke loka iti sa ya etamevaṃ vidvānupāste parovarīya eva hāsyāsmim̐lloke jīvanaṃ bhavati tathāmuṣmim̐lloke loka iti loke loka iti

हिन्दी अर्थ

दिं च तमेतभरद्रीथं विद्रानति- तथा इस उद्‌गीथको जाननेवाले क्लौनक उद्राण्डिल्याय शि- । लयके प्रति इस उद्गीधविधाका प्यायतयुद्रीथदशेनयुक्त्वोवाच । वर्णन करक कहा - जवत्फ तै तथामुर्मि्छोके लोक इति। स य एतदेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्नि्टो के जीवनं भवति तथामुरिंटोके लोक इति लोके खोक तथा परलोके भी उसे उक्कृष्टसे उद्कष्ट लोककी प्रापि हरत । जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरूष इसकी उपासना करता है, उका जीवन निश्चय ही इस लोके उ्ृष्टतर -होता है तथा परलोके

English

'And thus also will be their state in the other world.' He who thus knows the udgîtha, and meditates on it thus, his life in this world will be greater than great, and also his state in the other world, yea, in the other world.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।