अध्याय 307
श्लोक 1
नारद उवाच ।भगवन् देवदेवेश भूतभव्यजगत्प्रभो ।कवचं च श्रुतं दिव्यं गायत्रीमन्त्रविग्रहम्
nārada uvāca | bhagavan devadeveśa bhūtabhavyajagatprabho | kavacaṃ ca śrutaṃ divyaṃ gāyatrīmantravigraham
अध्याय 307
नारद उवाच ।भगवन् देवदेवेश भूतभव्यजगत्प्रभो ।कवचं च श्रुतं दिव्यं गायत्रीमन्त्रविग्रहम्
nārada uvāca | bhagavan devadeveśa bhūtabhavyajagatprabho | kavacaṃ ca śrutaṃ divyaṃ gāyatrīmantravigraham
अध्याय 307
अधुना श्रोतुमिच्छामि गायत्रीहृदयं परम् ।यद्धारणाद्भवेत्युण्यं गायत्रीजपतोऽखिलम्
adhunā śrotumicchāmi gāyatrīhṛdayaṃ param | yaddhāraṇādbhavetyuṇyaṃ gāyatrījapato'khilam
अध्याय 307
श्रीनारायण उवाच ।देव्याश्च हृदयं प्रोक्तं नारदाथर्वणे स्फुटम् ।तदेवाहं प्रवक्ष्यामि रहस्यातिरहस्यकम्
śrīnārāyaṇa uvāca | devyāśca hṛdayaṃ proktaṃ nāradātharvaṇe sphuṭam | tadevāhaṃ pravakṣyāmi rahasyātirahasyakam
अध्याय 307
विराड्रूपां महादेवीं गायत्रीं वेदमातरम् ।ध्यात्वा तस्यास्त्वथाङ्गेषु ध्यायेदेताश्च देवताः
virāḍrūpāṃ mahādevīṃ gāyatrīṃ vedamātaram | dhyātvā tasyāstvathāṅgeṣu dhyāyedetāśca devatāḥ
अध्याय 307
पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्याद्भावयेत्स्वतनौ तथा ।देवीरूपे निजे देहे तन्मयत्वाय साधकः
piṇḍabrahmāṇḍayoraikyādbhāvayetsvatanau tathā | devīrūpe nije dehe tanmayatvāya sādhakaḥ
अध्याय 307
नादेवोऽभ्यर्चयेद्देवमिति वेदविदो विदुः ।ततोऽभेदाय काये स्वे भावयेद्देवता इमाः
nādevo'bhyarcayeddevamiti vedavido viduḥ | tato'bhedāya kāye sve bhāvayeddevatā imāḥ
अध्याय 307
अथ तत्सम्प्रवक्ष्यामि तन्मयत्वमथो भवेत् ।गायत्रीहृदयस्यास्याप्यहमेव ऋषिः स्मृतः
atha tatsampravakṣyāmi tanmayatvamatho bhavet | gāyatrīhṛdayasyāsyāpyahameva ṛṣiḥ smṛtaḥ
अध्याय 307
गायत्रीच्छन्द उद्दिष्टं देवता परमेश्वरी ।पूर्वोक्तेन प्रकारेण कुर्यादङ्गानि षट्क्रमात् ।आसने विजने देशे ध्यायेदेकाग्रमानसः
gāyatrīcchanda uddiṣṭaṃ devatā parameśvarī | pūrvoktena prakāreṇa kuryādaṅgāni ṣaṭkramāt | āsane vijane deśe dhyāyedekāgramānasaḥ
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated with Nilakantha Bhashya recension.