Garuda Purana
117
अध्याय 117 / 317

Book 1 - Adhyaya 118

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 117

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे ऽनङ्गत्रयोदशीव्रतं नाम सप्तदशोत्तरशततमो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ११८ ब्रह्मोवाच ।व्रतं कैवल्यशमनमखण्डद्वादशीं वदे ।मागशीर्षे सिते पक्षे गव्याशी समुपोषितः

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe 'naṅgatrayodaśīvrataṃ nāma saptadaśottaraśatatamo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 118 brahmovāca / vrataṃ kaivalyaśamanamakhaṇḍadvādaśīṃ vade / māgaśīrṣe site pakṣe gavyāśī samupoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

बालसूर्यके तेज, जलती हुई चिताका धुआँ, वृद्ध स्त्री, बासी दही और झाड्की धूलिका सेवन दीर्घ आयुकी कामना करनेवाले पुरुषको नहीं

English

VSK 11.3.2.

अध्याय 117

श्लोक 2

द्वादश्यां पूजये द्विष्णुं दद्यान्मासचतुष्टयम् ।पञ्चव्रीहियुतं पात्रं विप्रायेदमुदाहरेत्

dvādaśyāṃ pūjaye dviṣṇuṃ dadyānmāsacatuṣṭayam / pañcavrīhiyutaṃ pātraṃ viprāyedamudāharet

हिन्दी अर्थ

हाथी, अश्व, रथ, धान्य तथा गौकी धूलि शुभ

English

RV. 8.44.16.

अध्याय 117

श्लोक 3

सप्तजन्मनि हे विष्णो यन्मया हि व्रतं कृतम् ।भगवंस्त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे

saptajanmani he viṣṇo yanmayā hi vrataṃ kṛtam / bhagavaṃstvatprasādena tadakhaṇḍamihāstu me

हिन्दी अर्थ

धूलिको अशुभ मानना चाहिए। गौकी धूलि, धान्यकी धूलि और पुत्रके अङ्गमें लगी हुई जो धूलि है, वह महान् कल्याणकारी एवं महापातकोंका

English

VS. 15.54.

अध्याय 117

श्लोक 4

यथाखण्डं जगत्सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम ।तथाखिलान्यखण्डानि व्रितानि मम सन्ति वै

yathākhaṇḍaṃ jagatsarvaṃ tvameva puruṣottama / tathākhilānyakhaṇḍāni vritāni mama santi vai

हिन्दी अर्थ

सूप फटकनेसे निकली हुई वायु, नखाग्र (नाखून) -का जल, स्नान किये हुए वस्त्रसे निचोड़ा हुआ जल, केशसे गिरता हुआ जल तथा झाड्को धूलि मनुष्यके पूर्वजन्मके अर्जित पुण्यको भी नष्ट

English

VS. 15.54.

अध्याय 117

श्लोक 5

सक्तुपात्राणि चैत्रादौ श्रावणादौ घृतान्वितान् ।व्रतकृद्वतपूर्णस्तु स्त्रीपुत्रस्वर्गभाग्भवेत्

saktupātrāṇi caitrādau śrāvaṇādau ghṛtānvitān / vratakṛdvatapūrṇastu strīputrasvargabhāgbhavet

हिन्दी अर्थ

कर देती है। ब्राह्मण तथा अग्निके बीचसे, दो ब्राह्मणके बीचसे, पति-पल्लीके बीचसे, स्वामि- स्वामिनीके बीचसे तथा घोड़ा और साँड़के बीचसे नहीं जाना चाहिए।

English

VS. 15.54.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।