Garuda Purana
118
अध्याय 118 / 317

Book 1 - Adhyaya 119

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 118

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे ऽखण्डद्वादशीव्रतकथनंनामाष्टादशोत्तर शततमो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ११९ ब्रह्मोवाच ।अगस्त्यार्घ्यव्रतं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।अप्राप्ते भास्करे कन्यां सति भागे त्रिभिर्दिनैः

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe 'khaṇḍadvādaśīvratakathanaṃnāmāṣṭādaśottara śatatamo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 119 brahmovāca / agastyārghyavrataṃ vakṣye bhuktimuktipradāyakam / aprāpte bhāskare kanyāṃ sati bhāge tribhirdinaiḥ

हिन्दी अर्थ

स्त्री, राजा, अग्नि, सर्प, स्वाध्याय, शत्रुको सेवा, भोग और आस्वादमें कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा जो विश्वास करेगा? अविश्वसनीयपर विश्वास तथा विश्वस्त प्राणीपर अधिक विश्वास नहीं करना

English

RV. 10.103.4.

अध्याय 118

श्लोक 2

अर्घ्यं दद्यादगस्त्याय मूर्तिं संपूज्य वै मुने ! ।काशपुष्पमयीं कुम्भे प्रदोषे कृतजागरः

arghyaṃ dadyādagastyāya mūrtiṃ saṃpūjya vai mune ! / kāśapuṣpamayīṃ kumbhe pradoṣe kṛtajāgaraḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए, क्योंकि विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह मनुष्यको समूल नष्ट कर देता है। जो मनुष्य शत्रुके साथ संधि करके आश्वस्त रहता है, वह निश्चित ही वृक्षको शाखाके अग्रभागपर सोये

English

Sacrificial twigs shall be soaked in honey, ghee and curd and offered in the fire.The twigs for the diffcreiit planets shall be of the following trees as in the previous order Arka, Palasa, Khadira Apfunarga®, Pippala, Udumbara» SnmT®, Durva and Kua grass.

अध्याय 118

श्लोक 3

दध्यक्षताद्यैः संपूज्य उपोष्य फलपुष्पकैः ।पञ्चवर्णसमायुक्तं हेमरौप्यसमन्वितम्

dadhyakṣatādyaiḥ saṃpūjya upoṣya phalapuṣpakaiḥ / pañcavarṇasamāyuktaṃ hemaraupyasamanvitam

हिन्दी अर्थ

हुए मनुष्यके समान गिरनेके पश्चात् ही जागता है

English

VS. 19.75.

अध्याय 118

श्लोक 4

सप्तधान्ययुतं पात्रं दधिचन्दनचर्चितम् ।अगस्त्यः खनमानेति मन्त्रेणार्घ्यं प्रिदापयेत्

saptadhānyayutaṃ pātraṃ dadhicandanacarcitam / agastyaḥ khanamāneti mantreṇārghyaṃ pridāpayet

हिन्दी अर्थ

प्राणीको अत्यन्त सरल अथवा अत्यन्त कठोर नहीं होना चाहिए, क्योंकि सरल स्वभावसे सरल और कठोर स्वभावसे कठोर शत्रुको नष्ट किया जा सकता है। अत्यन्त सरल तथा अत्यन्त कोमल

English

Ibid. 1.6.3.

अध्याय 118

श्लोक 5

खासपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव ! ।मित्रावारुणयोः पुत्त्रो कुम्भयोने नमो ऽस्तु ते

khāsapuṣpapratīkāśa agnimārutasambhava ! / mitrāvāruṇayoḥ puttro kumbhayone namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

नहीं होना चाहिए। सरल अर्थात् सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढे तो यथास्थितिमें खड़े रहते हैं।

English

Ibid. 1.6.3.

अध्याय 118

श्लोक 6

शूद्रस्त्र्यादिरनेनैव त्यजेद्धान्यं फलं रसम् ।दद्याद्द्विजातये कुम्भं सहिरण्यं सदक्षिणम् ।भोजयेच्च द्विजान्सप्त वर्षं कृत्वा तु सर्वभाक्

śūdrastryādiranenaiva tyajeddhānyaṃ phalaṃ rasam / dadyāddvijātaye kumbhaṃ sahiraṇyaṃ sadakṣiṇam / bhojayecca dvijānsapta varṣaṃ kṛtvā tu sarvabhāk

हिन्दी अर्थ

होती है। किंतु गधा, उँट, बकरी एवं भेड़की फलसे परिपूर्ण वृक्ष एवं गुणवान् व्यक्ति विनम्र

English

Ibid. 1.6.3.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।