Harivamsha Purana
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अध्याय 1 / 318

Parva 1, Adhyāya 1

54 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ54 श्लोक

अध्याय 1

श्लोक 1

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्

nārāyaṇaṃ namaskṛtya naraṃ caiva narottamam | devīṃ sarasvatīṃ vyāsaṃ tato jayamudīrayet

हिन्दी अर्थ

ए्र्णमण्ण्माममममममममधठ््््मठ्माम शप्राण। नस कि: पी ँ मी भर री दा । ये " श ( | & भ कि है «न ै क्रिकक एकससससससबनननोी, है हल पी कै. | | लि, ह कक बे ककिल' कक के कि के _ . . . के अन्नहउज जाउजउलहाउ. रिः की भूमिका पर्व है। आदिपर्वके अनुक्रमणिकाध्यायमें महाभारतकों तीन पर्व इस हरिवंश-ग्रन्थमें ही सम्मिलित हैं। यह विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णो: कंसवधस्तथा॥ एतत्पर्वशतं पूर्ण व्यासेनोक्क॑ महात्मना॥ (महा० आदि०,अध्याय २। ८२-८३) सम्पन्न नहीं होता, वैसे ही श्रीमहाभारतका पारायण हरिवंशका पारायण गीता आदिकी तरह स्वतन्त्र भी पदिपर्व (२। ८२)-के आधारपर 'हरिवंशपुराण' तथा ख्यात है। भारतमें चिरकालसे प्रचलित है। विशेषकर यदि | बाधित हो तो हरिवंश-श्रवण ही उसका प्रतिकार प्ये सप्पुटकांस्यपाबविधिक्जचि च पित्रयातिथि: । :. कन्यादानभुजड्केतुकपिला: संतानसौख्यप्रदा: ॥ (बृहत्पाराशरहोराशास्त्र, पूर्वखण्ड १६। १४७) जुहुयाच्च. दशांशेन.. दूर्वामाज्यपरिप्लुताम्‌॥ (मन्त्रमहार्णव, वृद्धसूर्यार्णव ) न अठारहों पुराणोंके सुननेसे मिलता है, वह अकेले तत्फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशय: ॥ (भविष्यपर्व १३५। ४) हाभारतका अज्ञ सिद्ध होता है—तया राजर्षिसत्तम: ' इसके द्वारा बैशम्पायनने आदिपर्वस्थ पूर्वोक्त ्र' पहले कहे जानेकी बात कही है। इससे दोनोंकी एकग्रन्थता ह शकुन्तला' कहा गया है। आकाशवाणीने शकुन्तलाके जिस लास-गमनका कारण पूछा गया है, वह आनुशासनिक पर्वके पी प्रकार और भी कई उदाहरण हैं। ) | महत्त्व है। भगवान्‌ श्रीकृष्णसे सम्बद्ध तथा अन्यान्य ं। उसकी पूरी विधि इस ग्रन्थके अन्तमें दे दी गयी हैं। वह ' कृत्यसार-समुच्चय' ग्रन्थके २२५ वें पृष्ठपर द्वितीयेडह्वि पठेद्‌ विद्वानू धेनुकस्य वधावधि ॥ पारिजातस्य हरणं चतुर्थेडद्वि प्रकीर्तयेत्‌ ॥ जनमेजयस्य वंशस्य भविष्यस्य च वर्णनम्‌ ॥ ससमे दैत्यसैन्यानां विस्तारो यावदेव हि॥ नवमे5ह्वि समाप्ति: स्यात्‌ पारायण उदाहत: ॥ विष्णुपर्वके १३, ४३, ७३, १०६ एवं भविष्यपर्वके चाहिये । है—तृतीये कुण्डिनपुरे रुक्मिणीहरणं तथा ॥ मधोश्चरित्र॑ षष्टे वै सपसमे. पावकस्तुति: ॥ वाचयेदनया रीत्या हरिवंश. यथाक्रमम्‌ ॥ दनुसार प्रतिदिन हरिवंशपर्वके ३५, विष्णुपर्वके १३, था १३५ वें अध्यायपर विश्राम करना चाहिये। शका प्रकाशन-कार्य पूरा हुआ। धार्मिक सदाचार- तथा सजिल्द प्रति अलगसे प्रकाशित की जा रही इसके कई प्रकार, संतान-गोपाल-स्तोत्र, यन्त्र तथा आशा है प्रेमी पाठक-पाठिकाएँ इन सबोंसे लाभ प्रकाशक : | सूची—-राााााण अध्याय. विषय फृषसंख्या| पितरोंके प्रभावको देखनेके लिये मार्कण्डेयजीको दिव्य दृष्टिकी प्राप्ति ९० (९- पितृकल्प—भरद्वाजके पुत्रोंकी कथा, योगभ्रष्ट पुरुषोंकी गति, योगसिद्धिकि अधिकारी पुरुषोंके लक्षण तथा. मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादकी समासि ९७ १०- पितृकल्प—ब्रह्मदत्त और उग्रायुधके वंश तथा पूजनीया चिड़ियाद्वारा शुक्रनीतिका वर्णन ........ ९९ ११- पितृकल्प—मार्कण्डेयजीद्वारा श्राद्धकी महिमाका वर्णन, श्राद्धके फलसे कौशिक-पुत्रोंको उत्तम जन्मकी प्राप्ति ३०९ १२- पितृकल्प—शुचिवाक पक्षीका स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियोंको शाप देना, सुमना पक्षीका अनुग्रहपूर्वक उन्हें शापसे मुक्त करना ..........................-. ३ १३- हंसोंका काम्पिल्यनगरमें ब्रह्मदत्त आदिके रूपमें उत्पन्न होना और चार हंसोंका अपने पितासे आज्ञा लेकर मुक्त हो जाना ........................ है १४ २४- विश्राजका ब्रह्मदत्तका पुत्र बनकर उत्पन्न होना, रानी संनतिका ब्रह्मदत्तसे रूठना, एक ब्राह्मणके कहे हुए श्लोकोंसे ब्रह्मदत्त, पाज्ाल्य और कण्डरीकको अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होना तथा ब्रह्मदत्त आदिका तप करके मुक्त हो जाना... ११७ २५- चन्द्रमाकी उत्पत्ति और राजसूय यज्ञ, देवासुर- संग्राम तथा बुधकी उत्पत्ति ........................ रै२१ २६- महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन,राजा पुरूरबाका त्रेताग्रिकी रचना करना और गन्धर्वोकि लोकमें जाना .......................८.८८८८८८८८८८८८८८८«८« है रे५ २७- पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके वंशका वर्णन, विश्वामित्र और परशुरामकी उत्पत्ति १२८ २८- राजा रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र, इन्द्रका अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर पुन: उसपर प्रतिष्ठित होना श्३२ २९- अनेनाके वंशका वर्णन, धन्वन्तरिका काशिराज धन्वके यहाँ पुत्ररूपमें अवतार, दिवोदासके राज्यकालमें भगवान्‌ शिवकी आज्ञासे गणेश्वर निकुम्भके द्वारा वाराणसीको जनशून्य बनानेका प्रयत्र, वहाँ शिव और पार्वतीका निवास, दिवोदासका वाराणसीपर अधिकार और अलर्ककी प्रशंसा .................. १३६ है) अध्याय विषय... पृष्ठ संख्या] विषय पृष्ठ-संख्या संग्राम और कालनेमिका रणमें आगमन ........ २२३ ४७- कालनेमिका युद्ध और प्रभाव ..................... २२८ ४८- कालनेमि और भगवान्‌ विष्णुका संवाद, श्रीविष्णुद्वार कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्ललोकको प्रस्थान रद ४९- ब्रह्मलोकमें भगवान्‌ विष्णुका सत्कार ............ २४१ ५०- नारायणाश्रममें भगवान्‌ विष्णुका शयन और उत्थान तथा पास आये हुए ब्रह्मा आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछना .......................... रेड ५१- ब्रह्माजीका भगवान्‌ विष्णुसे जगत्‌की वर्तमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध .................... २४९ ५२- भगवान्‌ विष्णु तथा सब देवताओंका मेरुपर्वतकी दिव्य सभामें उपस्थित होना और वहाँ पृथ्वीका भगवान्‌से भार उतारनेके लिये प्रार्थना करना ... २५२ ५३- ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका अंशावतरण.... २५७ ५४- भगवान्‌ विष्णुके प्रति देवर्षि नारदका वचन—भूलोककी वर्तमान अवस्थाका परिचय देकर भगवान्‌को अवतार ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना...... २६४ ५५- भगवान्‌ विष्णुके द्वारा नारदजीके कथनका उत्तर तथा ब्रह्माजीका भगवान्‌से उनके अवतार लेनेयोग्य स्थान और पिता-माता आदिका परिचय देना .... २७१ ( विष्णुपर्व ) १- मड़लाचरण, नारदजीका मथुरामें आकर कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना और कंसका अपने सेवकोंके सामने बढ़-बढ़कर बातें बनाना...... २७६ २- कंसद्वारा देवकीके गर्भके विनाशका प्रयत्र, भगवान्‌ विष्णुका पाताललोकमें स्थित * षड्गर्भ' नामक दैत्योंके जीवोंका आकर्षण करके उन्हें निद्रा देवीके हाथमें देना और देवकीके गर्भमें क्रमशः स्थापित करनेका आदेश देकर अन्य कर्तव्य बताना तथा कार्यसाधनके अनन्तर बढ़नेवाली उस देवीकी महिमाका उल्लेख .....................८८८८८८«««««««««« रे७९ ३- आर्याकी स्तुति ......................८८८८८८८८८८८८८८«८८ २८ '४- कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकस्य और नन्दभवनमें प्रवेश, कंसद्वारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयत्न और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमा-प्रार्थथा और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान २८७ ) अध्याय. विषय... पृष्ठसंख्या| विषय पृष्ठ-संख्या २०- श्रीकृष्णका अलौकिक चरित्र देखकर आशड्जित हुए गोपोंका उनसे प्रश्न और श्रीकृष्णद्वारा उत्तर तथा उनकी रासलीलाका संक्षेपसे वर्णन ....... ३५५ २१- अरिष्टासुरका वध ३५८ २२- कंसकी आशड्डा, उसका रात्रिके समय यदुवंशियोंको बुलाकर भरी सभामें श्रीकृष्ण और विष्णुके प्रभावको बताना, वसुदेवपर कठोर आक्षेप करना तथा अक्रूरको श्रीकृष्ण आदिको बुला लानेके लिये ब्रजमें जानेकी आज्ञा देना .................. ३६ १ २३- अन्धकका कंसको 'मुँहतोड़ उत्तर ................. ३७० २४- केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध ... ३७४ २५- अक्रूरका व्रजमें आकर भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखना और उनके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचना ... ३८० २६- अक्रूरका गोपोंके लिये कंसका आदेश सुनाना और वसुदेव-देवकीकी दयनीय दशा बताकर श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा चलनेके लिये प्रेरित करना, मार्गमें अक्रूरको यमुनाजीके जलमें आश्चर्यमय नागलोक एवं भगवान्‌ अनन्त तथा उनकी गोदमें श्रीकृष्णका दर्शन ......................८८८८८८८८८०८८८००- रे८र्ड २७- श्रीकृष्ण और बलरामका मथुरामें प्रवेश, उनके द्वारा रजकका वध, मालीको वरदान, कुब्जापर कृपा और कंसके धनुषका भजन ................ २८९ २८- कंसकी चिन्ता, उसका रंगशालाको देखना और उसे सुसज्जित करनेका आदेश देना, चाणूर एवं मुष्टिकको तथा कुवलयापीडके महावतको श्रीकृष्ण- बलरामके वधके लिये आज्ञा देना, महावतसे द्रुमिलके द्वारा अपनी उत्पत्तिकी कथा कहना—उसकी माताका सुयामुन पर्वतपर द्रुमिलके साथ समागम तथा उन दोनोंका परस्पर वरदान एवं शाप ... ३९५ २९- नागरिकोंसे भरी रज़शालामें मज्लों तथा प्रेक्षागृहोंकी शोभा, कंस तथा मल्लॉका आगमन, श्रीकृष्ण और बलरामका रड्रद्वारपर पदार्पण, कुवलयापीड,महावत तथा हाथीके पादरक्षकोंका वध और दोनों बन्धुओंका रड़स्थलमें प्रवेश ..........................८८..-.-.-... ४०५ ३०- रज़शालामें मल्लयुद्धके विषयमें श्रीकृष्णके विचार, श्रीकृष्ण और बलदेवके द्वारा चाणूर और मुष्टिक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों भाइयोंका उनके घरमें जाना .......................८.८८८८८८८८८८८«८«८«८८««««««« ०९ ३१- कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप ............ ४१७ रे अध्याय विषय... पृष्ठसंख्या| विषय पृष्ठ-संख्या '४२- जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको पर्वतपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देना, दमघोषकी सम्मतिसे गोमन्तपर्वतमें आग लगाया जाना, पर्वतका जलना तथा बलराम और श्रीकृष्णका पर्वतसे कूदकर राजाओंकी सेनामें आ पहुँचना ४७२ '४३- श्रीकृष्ण और बलरामका जरासंध और उसकी सेनाओंके साथ युद्ध, राजा दरदकी मृत्यु,जरासंधका पराजित होकर पलायन तथा चेदिराज दमघोषके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना .. ४८० '४४- श्रीकृष्णद्वारा शूगालका वध तथा उसके पुत्रका करवीरपुरके राज्यपर अभिषेक ..................... ४८७ '४५- बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमन और स्वागत ...................८८८८-.८८८८्र९र '४६- बलरामजीकी . ब्रजयात्रा तथा. उनके द्वारा यमुनाजीका आकर्षण ...............................-. ९४ '४७- श्रीकृष्णका यादवोंके साथ रुक्मिणी-स्वयंवरके अवसरपर कुण्डिनपुरमें जाना तथा राजा कैशिकद्वारा उनका सत्कार ९९ '४८- श्रीकृष्णके आगमनसे चिन्तित हुए राजाओंकी सभामें जरासंध और सुनीथका भाषण .......... ५०३ '४९- दन्तवक्त्र और शाल्वका भाषण सुनकर भीष्मकका श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना .................८.८८८८८८. ५०७ ५०- क्रथ और कैशिकद्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्णको अपने राज्यका समर्पण, देवराज इन्द्रके आदेशसे सब नरेशोंद्वारा भगवान्‌का राजेन्द्रके पदपर अभिषेक तथा भगवानका सबको आश्वासन देना ......... ५१३ ५१- श्रीकृष्ण और भीष्मकका संवाद, भीष्मकद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका मथुरागमन ... ५२१ ५२- शाल्वके कथनानुसार जरासंध आदि नरेशोंका शाल्वको ही कालयवनके पास दूत बनाकर भेजना .. ५२७ ५.३- कालयवनकी विशेषता, राजा शाल्वका उसके यहाँ दूत बनकर आना और उसे जरासंधका संदेश सुनाना .............................८८८८८८-०८०८—- ३१ ५४- कालयवनका राजाओंका अनुरोध स्वीकार करके श्रीकृष्णपर विजय पानेके लिये मथुराको प्रस्थान ... ५३७ ५५- गरुड़का श्रीकृष्णके निवासयोग्य भूमि देखनेके लिये जाना, मथुरामें राजेन्द्र श्रीकृष्णका स्वागत, श्रीकृष्णद्वारा राजा उग्रसेन तथा मथुरावासियोंका सत्कार एवं गरुड़का लौटकर कुशस्थलीके विषयमें बताना ... ५३८ ५६- श्रीकृष्णकी आज्ञासे यादवोंका द्वारकापुरीको प्रस्थान . ५४८ ह अध्याय विषय... पृष्ठसंख्या| विषय पृष्ठ-संख्या उन्हें गदा मारनेकी धमकी देना ६१० ६९- स्वर्गमें महादेवजीकी परिचर्याके लिये नृत्य-गीत आदि उत्सव, नारदजीका इन्द्रको श्रीकृष्णका पारिजातके लिये प्रार्थनाविषयक संदेश सुनाना और इन्द्रका अनेक कारण बताकर पारिजातको न देनेका विचार प्रकट करना ...................———दि श४ ७०- श्रीकृष्णके द्वारा गदाप्रहारकी धमकी सुनकर कुषित हुए इन्द्रका नारदजीसे उनके बर्तावकी कट आलोचना करना और युद्ध किये बिना पारिजात- वृक्षको न देनेका ही निश्चय करना .............. ६२० ७१- नारदजीके द्वारा श्रीकृष्णकी महत्ताका प्रतिपादन सुनकर भी इन्द्रका उन्हें पारिजात देनेको उद्यत ७९२- श्रीकृष्णका नारदजीको अमरावतीपर आक्रमण करनेका निश्चय बताकर इन्द्रके पास संदेश भेजना, इन्द्र और बृहस्पतिकी बातचीत, बृहस्पतिका कश्यपजीको यह. समाचार. बताना. और कश्यपजीका युद्धकी शान्तिके लिये भगवान्‌ शड्भरकी स्तुति करना ६३० '७३- इन्द्र और श्रीकृष्ण, जयन्त और प्रधयुप्र, प्रवर और सात्यकि तथा ऐरावत और गरुड़का युद्ध ...... ६३९ ७४- रात्रिभें युद्ध स्थगित करके श्रीकृष्णका पारियात्र- पर्वतको वरदान देना, गड़़ाका स्मरण करना, बिल्व और गज़ाजलपर महादेवजीका आवाहन करके उन बिल्वोदकेश्वरकी पूजा और स्तुति करना, महादेवजीका उन्हें अभीष्ट वर देकर दैत्योंको मारनेका आदेश देना तथा पारियात्र- पर्वतपर भगवानूका निवास एवं उनकी प्रतिमाके पूजनकी महिमा ....................८८.८८८८८«८८८८०८४«४«««« दिद ७५- इन्द्र और उपेन्द्रका पुनर्युद्ध, उत्पातोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिका बीचमें आकर दोनोंका युद्ध बंद कराना, फिर सबका स्वर्गमें गमन, अदितिकी आज्ञासे शचीद्वारा उपहार पाकर पारिजातसहित द्वारकागमन, पारिजातसे द्वारकावासियोंकी प्रसन्नता, सत्यभामाके पुण्यक- ब्रतमें प्रतिग्रहके लिये श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका ७६- सत्यभामाद्वारा पुण्यक-ब्रतमें श्रीकृष्णका नारदजीको दान, नारदजीका निष्क्रय लेकर श्रीकृष्णको छोड़ना और उनसे वर पाना, श्रीकृष्णका सगे-सम्बन्धियोंको > ) अध्याय. विषय... पृष्ठसंख्या| विषय पृष्ठ-संख्या उसका पतन, प्रद्यु्रका भानुमतीको लेकर द्वारका पहुँचाना, फिर तीनोंका निकुम्भके साथ युद्ध, उसकी अद्भुत मायाका वर्णन और श्रीकृष्णद्वारा निकुम्भका वध ....................—-.—-«««««««« ७२३ ९१- वज़नाभकी तपस्या और वरप्राप्ति, उसका त्रिभुवन- विजयके लिये उद्योग, इन्द्रकी श्रीकृष्णसे वार्ता, भद्रनामा नटको मुनियोंका वरदान, इन्द्रका हंसोंको आवश्यक कर्तव्य बताकर वज़नाभपुरमें भेजना . ७२९ ९२- हंसोंका वज्पुरमें निवास, हंसीका प्रभावतीको प्र्ुम्के प्रति अनुरक्त कराना, प्रभावतीका हंसीसे प्र्युप्षकी प्राप्ति करानेका अनुरोध, हंसी और वज्नाभका संवाद, हंसोंके मुँहसे सब समाचार सुनकर श्रीकृष्णका नटवेषमें प्रद्युम्न आदि यादवोंको व़पुरमें भेजना ७३३ ९३- नटवेशधारी यादवोंका सुपुर और वज्पुरमें सफल अभिनय करके दानवोंको रिझाकर उनसे उपहार पाना तथा प्रद्युप्रका प्रभावतीके घरमें प्रवेश ... ७३८ ९४-प्रध्युप्न और प्रभावतीका गान्धर्व-विवाह एवं समागम; फिर गद और चन्द्रवतीका तथा साम्ब और गुणवतीका गान्धर्वविवाह .................... ७४ हे ९५-प्र्युप्षका प्रभावतीसे वर्षाका वर्णन करते हुए उसे अपने कुलका परिचय देना ७८ ९६-कश्यपके मना करनेपर भी वज़नाभका त्रिलोक- विजयके लिये प्रस्थान, श्रीकृष्ण और इन्द्रका प्र्युप्षको संदेश देना और उनको संततिके प्रभावका उल्लेख करना, दैत्योंका प्रद्युप्न आदिके पुत्रोंको बंदी बनाना, प्रभावती आदिका पतियोंको तलवार देकर युद्धके लिये भेजना, इन्द्रके द्वारा उनकी सहायता तथा प्रद्युम्रका अद्भुत पराक्रम ...................... 9५३ ९७-प्रधुप्रद्वारा वज़नाभका वध तथा प्रद्युम्नम आदिके पुत्रोंका राज्याभिषेक .........................८८८८८८.-८« 9५८ ९८-इन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा पुन: परिष्कृत की गयी द्वारकापुरीका वर्णन .........................—« ' 9६२ ९९-श्रीकृष्णका द्वारका तथा अन्तःपुरमें प्रवेश और मणिपर्वत एवं पारिजातको यथोचित स्थानमें स्थापित करना ७६८ १००-श्रीकृष्णका समस्त यादवोंसे मिलकर उन्हें सम्मानित करनेके लिये सभामें बुलाना......... ७७० १०१-श्रीकृष्णद्वारा यादवोंका सत्कार तथा नारदजीका यादवोंकी . सभामें . श्रीकृष्णके... प्रभावका है अध्याय चियय .... पृष्ठसंख्या] विषय पृष्ठ-संख्या इससे उषाकी चिन्ता, सखियोंका उसे समझाना, कुम्भाण्डकुमारीके कहनेसे उषाका चित्रलेखाको बुलाकर उसे अपना कष्ट बताना, चित्र- लेखाके बनाये हुए चित्रोंसे उषाका अनिरुद्धको पहचानना और उन्हें लानेके लिये चित्रलेखाका द्वारकाको जाना ८३ ११९-चित्रलेखा और नारदजीका संवाद, चित्रलेखाका नारदजीसे तामसी विद्या ग्रहणकर अनिरुद्धको शोणितपुर ले जाना, उषा और अनिरुद्धका गान्धर्व-विवाह, .... अनिरुद्धका .... बाणासुरके सैनिकों तथा बाणासुरके साथ युद्ध, उनका नागपाशमें बँधकर बंदी होना तथा नारदजीका द्वारका जाना .................८८..८८८८८८८८०८८ ८८ «८८४८४ «« « «।«« ८५२ १२०-अनिरुद्धके द्वारा आयदिवीकी स्तुति और देवीका प्रसन्न होकर उन्हें बन्धनके कष्टसे मुक्त करना ८६७ १२१-अनिरुद्धके अपहरणसे रनिवासमें शोक, श्रीकृष्ण और यादवोंकी चिन्ता, गुप्तचरोंकी नियुक्ति और उनकी विफलता, नारदजीका आगमन और अनिरुद्धका समाचार-निवेदन, श्रीकृष्णके द्वारा गरुड़का आवाहन और स्तवन, गरुड्द्वारा श्रीकृष्णकी .... स्तुति... और... श्रीकृष्णका शोणितपुरको प्रस्थान .....................८८८८८८८-.८८८« ८3२ १२२-श्रीकृष्ण, बलभद्र और प्रद्युक्षका शोणितपुरके लिये प्रस्थान, गरुड़का आहवनीय अग्िको शान्त करना, श्रीकृष्णद्वारा अग्िंगणोंकी पराजय, बाणासुरके सैनिकोंके साथ श्रीकृष्ण आदिका युद्ध, त्रिशिरा ज्वरका आक्रमण और श्रीकृष्णके साथ उसका युद्ध .................८८८८८८८८८८८८८८८४८ ८८८: ८८ १२३-श्रीकृष्णसे पराजित हुए ज्वरका उनकी शरणमें जाना, उनसे वर पाना और उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर रणभूमिसे हट जाना .............. ८९२ १२४-बाणासुरकी सेनाका पलायन, भगवान्‌ शड्जरका अपने गणोंके साथ युद्धके लिये आगमन, भगवान्‌ श्रीकृष्ण और रुद्रका युद्ध तथा बाणासुरका युद्धभूमिमें पदार्पण .................... ८९५ १२५-श्रीकृष्णके जुम्भास्त्रसे भगवान्‌ शड्डरका जैँभाईके वशीभूत होना, ब्रह्माजीके द्वारा शिवजीको विष्णुके साथ उनकी एकताका स्मरण दिलाना तथा ब्रह्माजीके पूछनेपर मार्कण्डेयजीका हरिहरकी २) कि. विषय पृष्ठ-संख्या महिमाका प्रतिपादन .................................. ९७५५ ८- सत्ययुग आदिके परिमाणका वर्णन .............. ९५७ .. ९- प्रलयके पश्चात्‌ एकार्णवके जलमें भगवान्‌ नारायणका शयन .......................८८८८.-८८८८८——९६० १०- एकार्णवमें भगवान्‌ और मार्कण्डेयजीका संवाद ... ९६२ ११- परमात्माके द्वारा भूतोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीको प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिसे एक महान्‌ पद्मका प्रादुर्भाव .................................८...-.. ९६७ १२- नारायणके नाभिकमलके दलोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना .................८८८८८८८०८८८०८००८८८८८८०००पपपपप ९७० १३- मधु और कैटभका ब्रह्माजीके साथ संवाद तथा भगवान्‌ विष्णुके द्वारा वध ......................... ९७१ १४- ब्रह्माजीके तीन पुत्रोंको परम पदकी प्रात, फिर उनके द्वारा मैथुनी सृष्टिका विस्तार, दक्ष- कन्याओंकी संततिका वर्णन ........................ ९७४ १५- जनमेजयके द्वारा महाभारत-वर्णित चरित्रकी प्रशंसा .. ९७९ १६- सृष्टिविषयक वर्णनके प्रसड्भमें ज्ञान और योगका विचार ........................———तर८श १७- मैनाककी स्थिति, मेरुपृष्ठपर परमात्मासे ब्रह्माजीका प्राकट्य, मेरुकी विशालता, ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टि, ब्रह्म और ब्रह्माके स्वरूपका वर्णन, गड्जाका प्रादुर्भाव, सोमकी उत्पत्ति, धर्मके पाद, योग- साधना, ऐश्वर्यसे हानि, वेदोंका प्राकट्य, यज्ञपुरुषका वर्णन, योगवेत्ताकी महिमा, चित्तकी उपलब्धिमें कारण, मोक्ष-सम्बन्धी कर्म करनेका विधान और कर्मफलके त्यागसे मुक्ति ९८५ १८- योगके उपसर्ग (विश्न), योगीकी विष्णुरूपसे स्थिति, कर्मलयसे मुक्ति, सकाम कर्मियोंकी धूममार्गसे गति और पुनरावृत्ति, ज्ञानी एवं योगीको तत्त्वका साक्षात्कार तथा ब्रह्मयुगका वर्णन...... ९९३ १९- योगीकी स्थिति तथा उसके समक्ष आनेवाले विप्नरूप ऐश्वर्योका वर्णन ............................. ९९७ २०- ब्रह्माजीके द्वारा योगधारणपूर्वक की गयी मानसिक सृष्टिका वर्णन ........................-८८८०«८—- ००२ २१- क्षत्रयुगके प्रसंगमें ज्ञानसिद्ध ब्राह्मणोंका वर्णन, प्रजापति दक्षद्वारा प्राणियों एवं चारों वर्णोंकी सृष्टि तथा उनका अपने पुत्रोंको धात्रीका अन्त जाननेके लिये आदेश १००४ २२- दक्षका अपने आधे अद्ञसे स्त्रीरूप होकर बहुत- सी कन्याओंको उत्पन्न करना और उनका धर्म, रे) _ अध्याय, विषय. पृ संख्या! विषय पृष्ठ-संख्या पंखका छेदन ........................८८-८-८८८-«८८८«८«, *ै ०७३ ४१- हिरण्यकशिपुकी तपस्या, वरप्रात्ति, अत्याचार, देवताओंको ब्रह्माजीका आश्वासन, भगवान्‌ विष्णुका नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी सभामें जाना तथा उस सभाका वर्णन .................. १०७५ '४२- भगवान्‌ नरसिंहका देवता, गन्धर्व, अप्सराओं तथा दैत्योंसे सेवित हिरण्यकशिपुको देखना. १०८१ '४३- प्रह्मादको नरसिंह-विग्रहमें समस्त त्रिलोकीकादर्शन १०८२ ४४- दैत्यों तथा हिरण्यकशिपुद्वारा नूसिंहपर विभिन्न अस्त्रोिंका प्रहार .......................८८८८८८८८८८८८८ ८,८०८ है ०८ '४५- दैत्योंद्वारा किये गये प्रहारों और रची गयी मायाओंकी निष्फलता ...........................-.-. है ०८६ '४६- दैत्योंके विनाशकी सूचना देनेवाले महान्‌ उत्पात, हिरण्यकशिपुका गदा लेकर धावा करना तथा उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशोंका कम्पित होना ........................८.८.८.. है ०८९ '४७- देवताओंके अनुरोधसे भगवान्‌ नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा देवताओं और ब्रह्माजीद्वारा उनकी स्तुति .......................... १०९४ ४८- वामनावतारका उपक्रम, बलिका अभिषेक तथा दैत्योंका उनसे त्रैलोक्य-विजयके लिये अनुरोध.. १०९७ '४९- देवताओंके साथ युद्धके लिये दैत्योंकी तैयारी .. ११०० ५०- पुलोमा, हयग्रीव, प्रह्मदा और शम्बरासुरका युद्धके लिये उद्योग १००४ ५१- अनुहाद, विरोचन, कुजम्भ, असिलोमा, वृत्र, एकचक्र, वृत्रश्राता, राहु, विप्रचित्ति, केशी, वृषपर्वा तथा बलिका युद्धके लिये तैयार होकर आगे बढ़ना .................८...८८८८८८८८८८८० ८४०८ ८८४४४ «८ «« है ००७ ५२- इन्द्र आदि देवताओं और लोकपालोंका युद्धके लिये उद्योग और प्रस्थान १११६ ५३- देवताओं और असुरोंका द्वन्दयुद्ध, भीषण उत्पात, ब्रह्माजी तथा सनकादि योगेश्वरोंका युद्ध देखनेके लिये आगमन ..................८८-८८.८-..«८८«««««««« है है २५ ५४- देवताओं और असुरोंके युद्धका यज्ञके रूपमें वर्णन, दोनों सेनाओंका तुमुलयुद्ध तथा सावित्र और ध्रुवकी पराजय ११२९ ५५- नमुचिद्वारा धर नामक वसुकी, मयासुरद्वारा त्वष्टाकी, वायुदेवद्दारा पुलोमाकी, हयग्रीवद्वारा पूषा देवताकी, शम्बरासुरद्वारा भगकी तथा चन्द्रदेवद्वारा समूची दैत्यसेनाकी पराजय ..........................-.-«——है रै ३५ रद) अध्याय. विषय... पृष्ठसंख्या) विषय पृष्ठ-संख्या ७२- विराट्रूपधारी वामनपर आक्रमण करनेवाले दैत्योंके नाम, रूप और आयुधोंका परिचय, भगवान्‌का तीनों लोकोंको नापकर राज्यका विभाजन करना, बलिको पातालका राज्य दे मर्यादा बाँधकर उन्हें वहाँ भेजना, जीविकाकी व्यवस्था करना, नारदजीका बलिको मोक्षविंशक स्तोत्रका उपदेश देना, उसके प्रभावसे बलिका बन्धन-मुक्त होना और उस स्तोत्रकी महिमा ........................८८८८८८«.८—- ै२१३े ७३- रुक्मिणी देवीकी भगवान्‌ श्रीकृष्णसे पुत्रके लिये प्रथा और भगवानूका उन्हें आश्वासन देते हुए कैलास जानेका विचार प्रकट करना............ १२२१ ७४- भगवान्‌ श्रीकृष्णका यादवसभामें अपनी कैलासयात्राका विचार प्रकट करते हुए नगरकी रक्षाके लिये यादवोंको सावधान रहनेका आदेश देना....... १२२५ ७५- भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सात्यकि और उद्धवसे नगरकी रक्षाके विषयमें बातचीत तथा बलराम आदि यादवोंको भी रक्षाका भार सौंपकर उनका कैलासयात्राके लिये उद्यत होना ................. १२२७ ७६- गरुड्पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें जाना, मार्गमें देवताओं-मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति . १२३० ७७- देवताओंसहित श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें ऋऋषियोंद्वारा आतिथ्य-सत्कार ......................८८८८८८८«««« «««।«« है २३३ ७८- भगवान्‌ श्रीकृष्णकी समाधि, महानू कोलाहल और उनके पास भागते हुए मृग आदिका आगमन ..... १२३५ ७९- भगवान्‌ श्रीकृष्णके समक्ष दो पिशाचोंका आगमन १२३७ ८०- घण्टाकर्ण और भगवान्‌ श्रीकृष्णका एक-दूसरेको अपना परिचय देना तथा घण्टाकर्णद्वारा भगवान्‌ विष्णुका स्तवन एवं समाधि-लाभ ............. १२४० ८१- पिशाचको समाधि-अवस्थामें भगवान्‌ विष्णुका साक्षात्कार १२४७ ८२- घण्टाकर्णद्वारा भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति ......... १२४९ ८ ३- घण्टाकर्णद्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्णको उपहार-समर्पण, भगवान्‌का उसे वर देना और एक मरे हुए ब्राह्मणको जीवित करना ..................८८८.८.. हैरे५४ ८४-श्रीकृष्णका. कैलासपर पहुँचकर वहाँ बारह वर्षोके लिये कठोर तपस्यामें संलग्र होना .... १२५७ ८५- भगवान्‌ श्रीकृष्णके समीप इन्द्र आदि देवताओं तथा उमासहित भगवान्‌ शिवका आगमन.... १२५९ ८६- पिशाचों, मुनियों और अप्सराओंके साथ उमासहित भगवान्‌ शड्जरका श्रीकृष्णके समीप गमन .... १२६१ 2 अध्याय विषय... पृष्ठसंख्या| विषय सृष्ठ-संख्या जनार्दनसहित उन दोनोंका विवाह तथा तीनों कुमारोंकी धर्मनिष्ठा १३०५ १०६-हंस और डिम्भककी मृगया ................... १३०८ १०७-सेनासहित हंस और डिम्भकका पुष्कर-तटपर विश्राम, महर्षि कश्यपके वैष्णवसत्रका दर्शन तथा दुर्वासा आदि यतियोंके समुदायमें जाकर उनके प्रति अपनी अश्रद्धाका प्रदर्शन......... १३०९ १०८-हंस और डिम्भकटद्वारा संन्यासकी निन्‍्दा तथा जनारददनद्वारा संन्यास-आश्रमका मण्डन........ १३१२ १०९-दुर्वासाका रोष, हंसद्वारा उनका तिरस्कार, दुर्बासाद्वारा उन दोनोंके लिये शाप और जनार्दनके लिये वरदान श्३१४ ११०-दुर्बासा आदि मुनियोंका द्वारकागमन ......... १३१६ १११-श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका.. कारण पूछना, दुर्वासाका भगवान्‌की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका. प्रतिवाद करके. अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना १३१७ ११२-भगवान्‌ श्रीकृष्णकी हंस और डिम्भकके वधके लिये प्रतिज्ञा तथा क्षमा-प्रार्थनापूर्वक उनका यतियोंको भोजन कराना ................ १३२३ ११३-जनार्दनका हंसको समझाना; किंतु हंसका उनकी बात न मानकर उन्हें दूत बनाकर द्वारकाको भेजना श३२६ ११४-जनार्दनकी भगवद्दर्शनविषयक उत्कण्ठा....... १३२८ ११५-जनार्दनका सुधर्मा-सभामें जाकर भगवान्‌ श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवनपूर्वक हंस. और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका ..... उपहास करना श्३३२ ११६-श्रीकृष्णका जनार्दनको संदेश देकर लौटाना .. १३३५ ११७-सात्यकिसहित जनार्दनका शाल्वनगरमें जाना, हंससे मिलना. तथा. हंसका. जनार्दनसे कार्यसिद्धिके विषयमें पूछना .................... १३३६ ११८-जनार्दनका हंसको श्रीकृष्णदर्शनजनित अपना उल्लास बताना, द्वारकामें हंसके संदेशकी प्रतिक्रियाका वर्णन करके उसे राजसूय न करनेकी सलाह देना, हंसका उसे रोषपूर्वक ध्) अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या १३४-हरिवंशमें वर्णित वृत्तान्तोंका संग्रह ........... १३८३ १३५-हरिवंश-श्रवणकी... दक्षिण, फल. एवं माहात्म्यका वर्णन ...........................८८८- है३८५ श्रीहरिवंशमाहात्म्य १- हरिवंश-श्रवणका. माहात्म्य, . नारीके. पाँच दोष और हरिवंश-श्रवणसे उनकी निवृत्ति, पाठके. उत्तम, मध्यम आदि भेद तथा गोब्रतकी विधि १३८७ २-१) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल.......... . १३९० ३-(२) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल.......... १३९४ ४- नवाहब्रती श्रोताओंके पालन करने. योग्य नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुओंका उल्लेख, न्यायविरुद्ध कथाश्रवण करनेवालोंकी दुर्गति, कथामें विप्न॒ डालनेके कारण एक नारीको नरकयातना एवं राक्षसयोनिकी प्राप्ति तथा श्रोताओंके चौदह भेद १३९६ ५- हरिवंशके नवाह-पारायणका उद्यापन, उसमें किये. जानेवाले दान, पुस्तक-पूजा और वाचकपूजन आदिका विधान एवं माहात्म्य. १४०१ ६- हरिवंश आरम्भ करनेके लिये उत्तम मास, तिथि, नक्षत्र आदिका. निर्देश, देवपूजन, व्यासपूजन तथा कथा-समापिपर दी जानेवाली दक्षिणा एवं दान आदिका उल्लेख तथा श्रवणका माहात्म्य १४०४ ( संतानगोपाल-मन्त्रविधि ) १- संतानगोपालमन्त्रविधि: (१) ..................... है ४०८ २- संतानगोपालमन्त्र (२) ................... रैं0९ ३- सनत्कुमारोक्त संतानगोपालमन्त्र (३) ........... श४०९ ४- संतानगोपालस्तोत्रम्‌.................................-. हैरेशरे ५- श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रम्‌ .......................८.८८८... है ६- वन्ध्यानां पुत्रोत्पत्यर्थ संतानगोपालमन्त्रविधि: ... १४२० दि त्मने नम: गो हरिवंश: वंशपर्व ) 5ध्याय:———-ााााण ाद, वृष्णिवंशियोंका विस्तृत चरित्र र्थना और आदिसृष्टिका वर्णन बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनरायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदि जीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण)-को और (इन नर-नारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराणादि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे

English

Having bowed to Narayana and Nara, the best of men, and to the goddess Sarasvati — then let one recite the word Jaya (victory).

अध्याय 1

श्लोक 2

द्वैपायनोष्ठपुटनिःसृतमप्रमेयं पुण्यम्पवित्रमथ पापहरं शिवं च ।यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन

dvaipāyanoṣṭhapuṭaniḥsṛtamaprameyaṃ puṇyampavitramatha pāpaharaṃ śivaṃ ca | yo bhārataṃ samadhigacchati vācyamānaṃ kiṃ tasya puṣkarajalairabhiṣecanena

हिन्दी अर्थ

(सौति कहते हैं—) जो व्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय), पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है, उसे पुष्कर तीर्थके जलमें स्रान करनेकी क्या आवश्यकता है? (महाभासत-कथा उससे भी अधिक पावन है)

अध्याय 1

श्लोक 3

जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहदयनन्दनो व्यासः ।यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत् पिबति

jayati parāśarasūnuḥ satyavatīhadayanandano vyāsaḥ | yasyāsyakamalagalitaṃ vāṅmayamamṛtaṃ jagat pibati

हिन्दी अर्थ

माता सत्यवतीके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले उन पराशर-पुत्र व्यासकी जय हो, जिनके , मुखारविन्दसे निकले हुए वाड्मयरूपी अमृतका सारा संसार पान करता है

अध्याय 1

श्लोक 4

यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे बहुविश्रुताय ।पुण्यां च भारतकथां शृणुयाच्च तद्वत् तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव

yo gośataṃ kanakaśṛṅgamayaṃ dadāti viprāya vedaviduṣe bahuviśrutāya | puṇyāṃ ca bhāratakathāṃ śṛṇuyācca tadvat tulyaṃ phalaṃ bhavati tasya ca tasya caiva

हिन्दी अर्थ

जो गौओंके सींगमें सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणको प्रतिदिन सौ गौएँ दान देता है और जो पुण्यदायिनी महाभारत-कथाका श्रवणमात्र करता है-इन दोनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है

अध्याय 1

श्लोक 5

शताश्वमेधस्य यदत्र पुण्यं चतुःसहस्रस्य शतक्रतोश्च ।भवेदनन्तं हरिवंशदानात् प्रकीर्तितं व्यासमहर्षिणा च

śatāśvamedhasya yadatra puṇyaṃ catuḥsahasrasya śatakratośca | bhavedanantaṃ harivaṃśadānāt prakīrtitaṃ vyāsamaharṣiṇā ca

हिन्दी अर्थ

जो चार हजार अक्षय अन्नसत्रोंसे युक्त तथा इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाले हैं, उन सौ अध्मेध यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे इस लोकमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही अनन्त पुण्य इस हरिवंश- ग्रन्थका दान करनेसे उपलब्ध होता है। यह बात महर्षि व्यासजीने कही है

अध्याय 1

श्लोक 6

यद् वाजपेयेन तु राजसूयाद् दृष्टं फलं हस्तिरथेन चान्यत् ।तल्लभ्यते व्यासवचः प्रमाणं गीतं च वाल्मीकिमहर्षिणा च

yad vājapeyena tu rājasūyād dṛṣṭaṃ phalaṃ hastirathena cānyat | tallabhyate vyāsavacaḥ pramāṇaṃ gītaṃ ca vālmīkimaharṣiṇā ca

हिन्दी अर्थ

वाजपेय और राजसूय यज्ञोंके अनुष्ठानसे तथा हाथी जुते हुए रथके दानसे जिस फलकी प्राप्ति देखी या बतायी गयी है, वही फल हरिवंश-ग्रन्थका दान करनेसे मिल जाता है। इसमें व्यासजीका वचन प्रमाण है तथा महर्षि वाल्मीकिने भी इसी माहात्म्यका गान किया है

अध्याय 1

श्लोक 7

यो हरिवंशं लेखयति यथाविधिना महातपाः सपदि ।च जयति हरिपदकमलं मधुपो हि यथा रसेन लुब्धः

yo harivaṃśaṃ lekhayati yathāvidhinā mahātapāḥ sapadi | ca jayati haripadakamalaṃ madhupo hi yathā rasena lubdhaḥ

हिन्दी अर्थ

जो महातपस्वी पुरुष शास्त्रीय विधिके अनुसार हरिवंशको लिखता या लिखवाता है, वह रसपर लुभाये हुए भँवरेके समान भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरण- कमलॉंपर पहुँच जाता है

अध्याय 1

श्लोक 8

पितामहाद्यं प्रवदन्ति षष्ठं महर्षिमक्षय्यविभूतियुक्तम् ।नारायणस्यांशजमेकपुत्रं द्वैपायनं वेद महानिधानम्

pitāmahādyaṃ pravadanti ṣaṣṭhaṃ maharṣimakṣayyavibhūtiyuktam | nārāyaṇasyāṃśajamekaputraṃ dvaipāyanaṃ veda mahānidhānam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके आदि कारण श्रीनारायणको जिनसे ऊपरकी छठी * पीढ़ी का पुरुष बताते हैं, जो अक्षय विभूतियोंसे युक्त तथा नारायणके अंशसे प्रकट हैं, एकमात्र शुकदेव ही जिनके पुत्र हैं (अथवा जो अपने पिता पराशरके एक ही पुत्र हैं), वैदिक ज्ञानके महानिधिस्वरूप उन महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी मैं उपासना करता हूँ

अध्याय 1

श्लोक 9

आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् ।ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्

ādyaṃ puruṣamīśānaṃ puruhūtaṃ puruṣṭutam | ṛtamekākṣaraṃ brahma vyaktāvyaktaṃ sanātanam

श्लोक 9–12 का हिन्दी अर्थ

नैमिषारण्यकी बात है, सम्पूर्ण शास्त्री विशेषज्ञ, धर्मात्मा एवं कुलपति महामुनि शौनकने सबके आदि कारण, अन्तर्यामी पुरुष, पुरुहूत (बहुत-से यजमानोंद्वारा दी गयी आहुतिको ग्रहण करनेवाले), पुरुष्टुत (बहुसंख्यक उपासकों द्वारा स्तुत्य), ऋत (सत्यस्वरूप), एकाक्षर (प्रणवमय अथवा एक अविनाशी), ब्रह्म (परमात्मा), व्यक्ताव्यक्तस्वरूप, सनातन, असत्‌ ( कार्यरूप), सदसत्‌ (कारण और कार्यरूप), अखिल विश्वमय, सत्‌ और असत्‌—दोनोंसे पर (विलक्षण), कारण और कार्य दोनोंके ख्रष्टा, पुरातन, सर्वोत्कृष्ट, अविकारी, मड्लकारी, मज़लरूप, सर्वव्यापी, सबके द्वारा वरणीय, पापरहित, परम पवित्र, इन्द्रियोंके प्रेरक तथा समस्त चराचर जगत्‌के गुरु श्रीहरिको प्रणाम करके लोमहर्षण सूतके पुत्र उग्रश्रवासे इस प्रकार पूछा

अध्याय 1

श्लोक 10

असच्च सदसच्चैव यद्विश्वं सदसत्परम् ।परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम्

asacca sadasaccaiva yadviśvaṃ sadasatparam | parāvarāṇāṃ sraṣṭāraṃ purāṇaṃ paramavyayam

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 11

मङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् ।नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिम्

maṅgalyaṃ maṅgalaṃ viṣṇuṃ vareṇyamanaghaṃ śucim | namaskṛtya hṛṣīkeśaṃ carācaraguruṃ harim

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 12

नैमिषारण्ये कुलपतिः शौनकस्तु महामुनिः ।सौतिं पप्रच्छ धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः

naimiṣāraṇye kulapatiḥ śaunakastu mahāmuniḥ | sautiṃ papraccha dharmātmā sarvaśāstraviśāradaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 13

सौते सुमहदख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।भारतानां च सर्वेषां पार्थिवानां तथैव च

saute sumahadakhyānaṃ bhavatā parikīrtitam | bhāratānāṃ ca sarveṣāṃ pārthivānāṃ tathaiva ca

श्लोक 13–17 का हिन्दी अर्थ

प्रकार गणना करनेपर श्रीनारायणदेव व्यासजीसे छठी पीढ़ी ऊपरके है, वह वेद-वेदाज़का पारगामी ऋषि कुलपति कहलाता है। 5ध्याय; * श्९ शौनकजीने कहा—सूतनन्दन ! आपने भरतवंशियों, अन्य सब राजाओं, देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों, दैत्यों, सिद्धों तथा गुह्कोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह बहुत बड़ा उपाख्यान (महाभारत) कह सुनाया। आपने (ऋषि-महर्षियोंके) अद्भुत कर्म, (शूरवीरोंके ) बल-विक्रम, धर्मतत्त्वके निर्णय, विचित्र-विचित्र कथा- प्रसद्ध तथा (द्रोण आदिके) श्रेष्ठ एवं परम उत्तम जन्म- वृत्तान्त आदि प्राचीन एवं पुण्यप्रद विषयोंका अपनी मधुर वाणीद्वारा वर्णन किया है। उग्रश्नवाजी ! मन और कानोंको सुख देनेवाला यह प्रसद्ध मुझे अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है। लोमहर्षणकुमार ! आपने महाभारत सुनाते समय कुरुवंशियोंके ही जन्मका विशेषरूपसे वर्णन किया है, वृष्णि तथा अन्धकवंशके वीरोंके जन्मका नहीं; अत: अब आप उन सबके जन्म-कर्मका भी वर्णन कीजिये

अध्याय 1

श्लोक 14

देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।दैत्यानामथ सिद्धानां गुह्यकानां तथैव च

devānāṃ dānavānāṃ ca gandharvoragarakṣasām | daityānāmatha siddhānāṃ guhyakānāṃ tathaiva ca

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 15

अत्यद्भुतानि कर्माणि विक्रमा धर्मनिश्चयाः ।विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्र्यमनुत्तमम्

atyadbhutāni karmāṇi vikramā dharmaniścayāḥ | vicitrāśca kathāyogā janma cāgryamanuttamam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 16

कथितं भवता पुण्यं पुराणं श्लक्ष्णया गिरा ।मनःकर्णसुखं सौते प्रीणात्यमृतसम्मितम्

kathitaṃ bhavatā puṇyaṃ purāṇaṃ ślakṣṇayā girā | manaḥkarṇasukhaṃ saute prīṇātyamṛtasammitam

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 17

तत्र जन्म कुरूणां वै त्वयोक्तं लौमहर्षणे ।न तु वृष्ण्यन्धकानां च तद् भवान् वक्तुमर्हति

tatra janma kurūṇāṃ vai tvayoktaṃ laumaharṣaṇe | na tu vṛṣṇyandhakānāṃ ca tad bhavān vaktumarhati

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 18

जनमेजयेन यत्प्रष्टः शिष्यो व्यासस्य धर्मवित् ।तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि वृष्णीनां वंशमादितः

janamejayena yatpraṣṭaḥ śiṣyo vyāsasya dharmavit | tat te'haṃ sampravakṣyāmi vṛṣṇīnāṃ vaṃśamāditaḥ

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

सूत-पुत्र उग्रश्नरवाने कहा—शौनकजी ! जनमेजयने व्यासजीके धर्मवेत्ता शिष्य वैशम्पायनजीसे जो कुछ पूछा था, उसीके अनुसार मैं आरम्भसे ही वृष्णियोंके वंशका आपसे वर्णन करता हूँ। भरतवंशी राजाओंके इतिहासको पूर्णरूपसे सुनकर भरतनन्दन महाबुद्धिमान्‌ जनमेजयने वैशम्पायनजीसे कहा

अध्याय 1

श्लोक 19

श्रुत्वेतिहासं कार्त्स्न्येन भारतानां स भारतः ।जनमेजयो महाप्राज्ञो वैशम्पायनमब्रवीत्

śrutvetihāsaṃ kārtsnyena bhāratānāṃ sa bhārataḥ | janamejayo mahāprājño vaiśampāyanamabravīt

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 20

महाभारतमाख्यानं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम् ।कथितं भवता पूर्वं विस्तरेण मया श्रुतम्

mahābhāratamākhyānaṃ bahvarthaṃ śrutivistaram | kathitaṃ bhavatā pūrvaṃ vistareṇa mayā śrutam

श्लोक 20–25 का हिन्दी अर्थ

जनमेजयने कहा—मुने! आपने पहले वेदके अर्थको स्पष्ट करके विस्तृतरूपमें वर्णन करनेवाली, (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि) अनेक अर्थोंसे भरी हुई जो महाभारतकी कथा विस्तारपूर्वक कही, उसको मैंने सुन लिया । उस महाभारत-कथामें आपने बहुत-से पुरुषश्रेष्ठ शूरोंका वर्णन किया तथा बहुत-से वृष्णि और अन्धकवंशी महारथियोंके नाम और कर्म भी बताये । द्विजोत्तम ! उनके उत्तम कर्मोका भी आपने उन-उन स्थलोंमें संक्षिपरूपसे वर्णन किया है। प्रभो ! अब आप उनको विस्तारपूर्वक सुनाइये। आपने पहले जो संक्षिप्रूपसे वर्णन किया, उससे मेरी तृप्ति नहीं हुई है। ये वृष्णि और पाण्डव एक ही राशि (कुटुम्ब)-के माने जाते हैं। तपोधन! आप वंशोंकी कथा कहनेमें चतुर हैं और उनकी सब बातोंको आपने प्रत्यक्ष देखा है। अतएव उनके कुलका आप विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। महामुने! जिस-जिसके कुलमें जो-जो उत्पन्न हुए हों, उन सबको मैं जानना चाहता हूँ; अतएव प्रजापतिसे आरम्भ करके पूर्वकालमें उनकी जिस प्रकार सृष्टि हुई है, उन सबका विचार करके आप मुझे पूर्णरूपसे सब कथा सुनाइये

अध्याय 1

श्लोक 21

तत्र शूराः समाख्याता बहवः पुरुषर्षभाः ।नामभिः कर्मभिश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथाः

tatra śūrāḥ samākhyātā bahavaḥ puruṣarṣabhāḥ | nāmabhiḥ karmabhiścaiva vṛṣṇyandhakamahārathāḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 22

तेषां कर्मावदातानि त्वयोक्तानि द्विजोत्तम ।तत्र तत्र समासेन विस्तरेणैव मे प्रभो

teṣāṃ karmāvadātāni tvayoktāni dvijottama | tatra tatra samāsena vistareṇaiva me prabho

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 23

न च मे तप्तिरस्तीह कथ्यमाने पुरातने ।एकश्चैव मतो राशिर्वृष्णयः पाण्डवास्तथा

na ca me taptirastīha kathyamāne purātane | ekaścaiva mato rāśirvṛṣṇayaḥ pāṇḍavāstathā

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 24

भवांश्च वंशकुशलस्तेषां प्रत्यक्षदर्शिवान् ।कथयस्व कुलं तेषां विस्तरेण तपोधन

bhavāṃśca vaṃśakuśalasteṣāṃ pratyakṣadarśivān | kathayasva kulaṃ teṣāṃ vistareṇa tapodhana

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 25

यस्य यस्यान्वये ये ये तांस्तानिच्छामि वेदितुम् ।स त्वं सर्वमशेषेण कथयस्व महामुने ।तेषां पूर्वविसृष्टिं च विचिन्त्येमां प्रजापतेः

yasya yasyānvaye ye ye tāṃstānicchāmi veditum | sa tvaṃ sarvamaśeṣeṇa kathayasva mahāmune | teṣāṃ pūrvavisṛṣṭiṃ ca vicintyemāṃ prajāpateḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 26

सत्कृत्य परिपृष्टस्तु स महात्मा महातपाः ।विस्तरेणानुपूर्व्या च कथयामास तां कथाम्

satkṛtya paripṛṣṭastu sa mahātmā mahātapāḥ | vistareṇānupūrvyā ca kathayāmāsa tāṃ kathām

हिन्दी अर्थ

उग्रश्नरवाने कहा—जब सत्कारपूर्वक उनसे यह बात पूछी गयी, तब वे महातपस्वी महात्मा वैशम्पायन क्रमश: और विस्तारके साथ उस वंशावलिकी कथा कहने लगे

अध्याय 1

श्लोक 27

शृणु राजन् कथां दिव्यां पुण्यां पापप्रमोचनीम् ।कथ्यमानां मया चित्रां बह्वर्थां श्रुतिसम्मिताम्

śṛṇu rājan kathāṃ divyāṃ puṇyāṃ pāpapramocanīm | kathyamānāṃ mayā citrāṃ bahvarthāṃ śrutisammitām

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! सुनो, यह (वृष्णिवंशियोंके जन्मकी ) कथा अलौकिक, पुण्यमयी और पापोंसे मुक्त करनेवाली है, इसमें (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि) अनेक पुरुषार्थोंका उपदेश है, इस वेदके समान माननीय तथा आश्चर्यमयी कथाका मैं आपसे वर्णन करता हूँ

अध्याय 1

श्लोक 28

यश्चेमां धारयेद् वापि शृणुयाद् वाऽप्यभीक्ष्णशः ।स्ववंशधारणं कृत्वा स्वर्गलोके महीयते

yaścemāṃ dhārayed vāpi śṛṇuyād vā'pyabhīkṣṇaśaḥ | svavaṃśadhāraṇaṃ kṛtvā svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

जो इस कथाको अपने हदयमें धारण करता है या इसको पुस्तकके रूपमें अपने घरमें स्थापित करता है अथवा बार-बार इसको सुनता है, वह (इस लोकमें) अपने वंशको स्थापित कर अन्तमें स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है

अध्याय 1

श्लोक 29

अव्यक्तं कारणं यत् तन्नित्यं सदसदात्मकम् ।प्रधानं पुरुषं तस्मान्निर्ममे विश्वमीश्वरम्

avyaktaṃ kāraṇaṃ yat tannityaṃ sadasadātmakam | pradhānaṃ puruṣaṃ tasmānnirmame viśvamīśvaram

हिन्दी अर्थ

जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है, उसीको "प्रधान' कहते हैं। सर्वशक्तिमान्‌ पुरुषने उसीसे इस विश्वका निर्माण किया है

अध्याय 1

श्लोक 30

तं वै विद्धि महाराज ब्रह्माणममितौजसम् ।स्रष्टारं सर्वभूतानां नारायणपरायणम्

taṃ vai viddhi mahārāja brahmāṇamamitaujasam | sraṣṭāraṃ sarvabhūtānāṃ nārāyaṇaparāyaṇam

हिन्दी अर्थ

महाराज! तुम अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको ही पुरुष समझो । वे समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा भगवान्‌ नारायणके आश्रित हैं

अध्याय 1

श्लोक 31

अहङ्कारस्तु महतस्तस्माद् भूतानि जज्ञिरे ।भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति सर्गः सनातनः

ahaṅkārastu mahatastasmād bhūtāni jajñire | bhūtabhedāśca bhūtebhya iti sargaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

(प्रकृतिसे महत्त्व, ) महत्तत्तसे अहंकार तथा अहंकारसे सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए। भूतोंके जो स्थूल भेद हैं, वे भी उन सूक्ष्म भूतोंसे ही प्रकट हुए हैं। यह (अनादिकालसे प्रवाहरूपसे चला आनेवाला) सनातन सर्ग है

अध्याय 1

श्लोक 32

विस्तरावयवं चैव यथाप्रज्ञं यथाश्रुति ।कीर्त्यमानं शृणु मया पूर्वेषां कीर्तिवर्धनम्

vistarāvayavaṃ caiva yathāprajñaṃ yathāśruti | kīrtyamānaṃ śṛṇu mayā pūrveṣāṃ kīrtivardhanam

हिन्दी अर्थ

अब जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुजनोंसे सुन रखा है, उसके अनुसार मैं भूतसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन आरम्भ करता हूँ, सुनो । यह प्रसंग पूर्वजोंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाला है

अध्याय 1

श्लोक 33

धन्यं यशस्यं शत्रुघ्नं स्वर्ग्यमायुःप्रवर्धनम् ।कीर्तनं स्थिरकीर्तीनां सर्वेषां पुण्यकर्मणाम्

dhanyaṃ yaśasyaṃ śatrughnaṃ svargyamāyuḥpravardhanam | kīrtanaṃ sthirakīrtīnāṃ sarveṣāṃ puṇyakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

स्थिर कीर्तिवाले उन समस्त पुण्यकर्मा पूर्वजोंके यशका कीर्तन धन और यशकी वृद्धि करनेवाला, शत्रुओंका नाशक, स्वर्गकी प्रासि करानेवाला तथा आयु बढ़ानेवाला है

अध्याय 1

श्लोक 34

तस्मात्कल्पाय ते कल्पः समग्रं शुचये शुचिः ।आ वृष्णिवंशाद् वक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम्

tasmātkalpāya te kalpaḥ samagraṃ śucaye śuciḥ | ā vṛṣṇivaṃśād vakṣyāmi bhūtasargamanuttamam

हिन्दी अर्थ

तुम इस विषयकों हदयंगम करनेमें समर्थ और शुद्ध हो और मैं इसका वर्णन करनेमें समर्थ हूँ। अत: पत्ित्र होकर आरम्भसे वृष्णिवंशपर्यन्त परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन करूँगा

अध्याय 1

श्लोक 35

ततः स्वयम्भूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्

tataḥ svayambhūrbhagavān sisṛkṣurvividhāḥ prajāḥ | apa eva sasarjādau tāsu vīryamavāsṛjat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर स्वयम्भू भगवान्‌ नारायणने नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे सबसे पहले जलकी ही सृष्टि की। फिर उस जलमें अपनी शक्तिका आधान किया

अध्याय 1

श्लोक 36

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः

āpo nārā iti proktā āpo vai narasūnavaḥ | ayanaṃ tasya tāḥ pūrvaṃ tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

5ध्याय: + २१ जलका दूसरा नाम है नार, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान्‌ नरसे हुई है। वह जल पूर्वकालमें भगवान्‌का अयन हुआ, इसलिये वे 'नारायण' कहलाते हैं

अध्याय 1

श्लोक 37

हिरण्यवर्णमभवत् तदण्डमुदकेशयम् ।तत्र जज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयम्भूरिति नः श्रुतम्

hiraṇyavarṇamabhavat tadaṇḍamudakeśayam | tatra jajñe svayaṃ brahmā svayambhūriti naḥ śrutam

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ने जलमें जो अपनी शक्तिका आधान किया था, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ, वह दीर्घकालतक जलमें ही स्थित था। उसीमें स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए—ऐसा हमने सुना है

अध्याय 1

श्लोक 38

हिरण्यगर्भो भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।तदण्डमकरोद् द्वैधं दिवं भुवमथापि च

hiraṇyagarbho bhagavānuṣitvā parivatsaram | tadaṇḍamakarod dvaidhaṃ divaṃ bhuvamathāpi ca

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ हिरण्यगर्भने उस अण्डमें एक वर्षतक निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये। फिर एक टुकड़ेसे द्युलोक बनाया और दूसरेसे भूलोक

अध्याय 1

श्लोक 39

तयोः शकलयोर्मध्ये आकाशमसृजत् प्रभुः ।अप्सु पारिप्लवां पृथ्वीं दिशश्च दशधा दधे

tayoḥ śakalayormadhye ākāśamasṛjat prabhuḥ | apsu pāriplavāṃ pṛthvīṃ diśaśca daśadhā dadhe

हिन्दी अर्थ

उन दोनों टुकड़ों के बीचमें भगवान्‌ ब्रह्मने आकाश (अवकाश) -की सृष्टि की। जलके ऊपर तैरती हुई पृथ्वीको स्थापित किया। फिर दसों दिशाएँ निश्चित कीं

अध्याय 1

श्लोक 40

तत्र कालं मनो वाचं कामं क्रोधमथो रतिम् ।ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां स्रष्टुमिच्छन् प्रजापतीन्

tatra kālaṃ mano vācaṃ kāmaṃ krodhamatho ratim | sasarja sṛṣṭiṃ tadrūpāṃ sraṣṭumicchan prajāpatīn

हिन्दी अर्थ

उस ब्रह्माण्डके भीतर ही उन्होंने काल, मन, वाणी, काम, क्रोध तथा रति आदि भावोंकी सृष्टि की। फिर इन भावोंके अनुरूप सृष्टि करनेकी इच्छावाले ब्रह्माजीने निम्नाद्धित (सात) प्रजापतियोंको उत्पन्न किया

अध्याय 1

श्लोक 41

मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।वसिष्ठं च महातेजाः सोऽसृजत्सप्त मानसान्

marīcimatryaṅgirasaṃ pulastyaṃ pulahaṃ kratum | vasiṣṭhaṃ ca mahātejāḥ so'sṛjatsapta mānasān

हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अड्जिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ । महातेजस्वी ब्रह्माने इन सातोंकी अपने मन (संकल्प)-से सृष्टि की (अत: ये उनके मानस पुत्र हैं)

अध्याय 1

श्लोक 42

सप्त ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।नारायणात्मकानां वै सप्तानां ब्रह्मजन्मनाम्

sapta brahmāṇa ityete purāṇe niścayaṃ gatāḥ | nārāyaṇātmakānāṃ vai saptānāṃ brahmajanmanām

श्लोक 42–43 का हिन्दी अर्थ

पुराणोंमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं । भगवान्‌ नारायणमें मन लगाये रहनेवाले इन सात ब्राह्मणोंकी सृष्टिक अनन्तर ब्रह्माजीने अपने रोषसे रुद्रको प्रकट किया। फिर पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान्‌ सनत्कुमारजीको उत्पन्न किया

अध्याय 1

श्लोक 43

ततोऽसृजत्पुनर्ब्रह्मा रुद्रं रोषात्मसम्भवम् ।सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम्

tato'sṛjatpunarbrahmā rudraṃ roṣātmasambhavam | sanatkumāraṃ ca vibhuṃ pūrveṣāmapi pūrvajam

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 44

सप्तैते जनयन्ति स्म प्रजा रुद्रश्च भारत ।स्कन्दः सनत्कुमारश्च तेजः सङ्क्षिप्य तिष्ठतः

saptaite janayanti sma prajā rudraśca bhārata | skandaḥ sanatkumāraśca tejaḥ saṅkṣipya tiṣṭhataḥ

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! ये मरीचि आदि सात ऋषि तथा रुद्रदेव प्रजाकी सृष्टि करने लगे। स्कन्द और सनत्कुमार—ये दोनों अपने तेजका संवरण करके रहते हैं

अध्याय 1

श्लोक 45

तेषां सप्त महावंशा दिव्या देवगणान्विताः ।क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलङ्कृताः

teṣāṃ sapta mahāvaṃśā divyā devagaṇānvitāḥ | kriyāvantaḥ prajāvanto maharṣibhiralaṅkṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

उक्त सात महर्षियोंके सात बड़े-बड़े दिव्य वंश हैं । देवता भी इन्हीं वंशोंके अन्तर्गत हैं। उन सातों वंशोंके लोग कर्मनिष्ठ एवं संतानवान्‌ हैं। उन वंशोंको बड़े-बड़े ऋषियोंने सुशोभित किया है

अध्याय 1

श्लोक 46

विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च ।वयांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं च ससर्ज ह

vidyuto'śanimeghāṃśca rohitendradhanūṃṣi ca | vayāṃsi ca sasarjādau parjanyaṃ ca sasarja ha

हिन्दी अर्थ

इसके बाद ब्रह्माजीने पहले विद्युत, वत्र, मेघ, रोहित (सीधा) इन्द्र-धनुष, पक्षिसमुदाय तथा पर्जन्यकी सृष्टि की

अध्याय 1

श्लोक 47

ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ।मुखाद् देवानजनयत्पितॄंश्चेशोऽपि वक्षसः

ṛco yajūṃṣi sāmāni nirmame yajñasiddhaye | mukhād devānajanayatpitṝṃśceśo'pi vakṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

फिर ब्रह्माजीने यज्ञकी सिद्धिके लिये (नित्यसिद्ध) ऋक, यजु: और सामका आविष्कार किया। फिर ऐश्वर्यशील ब्रह्माने अपने मुखसे देवताओंको और वक्ष:स्थलसे पितरोंको प्रकट किया ॥ '

अध्याय 1

श्लोक 48

प्रजनाच्च मनुष्यान् वै जघनान्निर्ममेऽसुरान् ।साध्यानजनयद् देवानित्येवमनुशुश्रुम

prajanācca manuṣyān vai jaghanānnirmame'surān | sādhyānajanayad devānityevamanuśuśruma

हिन्दी अर्थ

फिर उन्होंने उपस्थेन्द्रियसे मनुष्योंको और जंघाओंसे असुरोंको उत्पन्न किया। तदनन्तर उन्होंने साध्य नामक प्राचीन देवताओंको प्रकट किया, ऐसा हमने सुना है

अध्याय 1

श्लोक 49

उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।आपवस्य प्रजासर्गं सृजतो हि प्रजापतेः

uccāvacāni bhūtāni gātrebhyastasya jajñire | āpavasya prajāsargaṃ sṛjato hi prajāpateḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि रचते हुए उन आपव (अर्थात्‌ जलमें प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्माके अज्जों मेंसे उच्च तथा साधारण श्रेणीके बहुत-से प्राणी प्रकट हुए

अध्याय 1

श्लोक 50

सृज्यमानाः प्रजा नैव विवर्धन्ते यदा तदा ।द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्

sṛjyamānāḥ prajā naiva vivardhante yadā tadā | dvidhā kṛtvā''tmano dehamardhena puruṣo'bhavat

श्लोक 50–51 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वे आपव प्रजापति (मानसिक) प्रजाओंको रच रहे थे; परंतु वे प्रजाएँ जब (अधिक) न बढ़ीं, तब वे अपने शरीरके दो भाग कर, एक भागसे पुरुष और दूसरे भागसे नारी हो गये और (उस नारीने गाय, घोड़ी आदि जिस-जिस रूपको धारण किया, पुरुषने उसी जातिके बैल, घोड़े आदिका रूप धारण किया, ) इस प्रकार उन्होंने उस नारीमें अनेक प्रकारकी मैथुनी-प्रजाओंको रचा। इस प्रकार वे पुरुष और नारी अपनी महिमासे स्वर्ग और पृथ्वीपर व्याप्त हो गये

अध्याय 1

श्लोक 51

अर्धेन नारी तस्यां स ससृजे विविधाः प्रजाः ।दिवं च पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य तिष्ठतः

ardhena nārī tasyāṃ sa sasṛje vividhāḥ prajāḥ | divaṃ ca pṛthivīṃ caiva mahimnā vyāpya tiṣṭhataḥ

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 1

श्लोक 52

विराजमसृजद्विष्णुः सोऽसृजत्पुरुषं विराट् ।पुरुषं तं मनुं विद्धि तद् वै मन्वन्तरं स्मृतम्

virājamasṛjadviṣṇuḥ so'sṛjatpuruṣaṃ virāṭ | puruṣaṃ taṃ manuṃ viddhi tad vai manvantaraṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णुने विराट पुरुष (आपव प्रजापति या ब्रह्मा)-की सृष्टि की थी और विराटने पुरुषकी। उस वैराज पुरुषको तुम मनु समझो (और उनकी स्त्रीको शतरूपा) । मनुके समयको ही मन्वन्तरकाल कहा गया है

अध्याय 1

श्लोक 53

द्वितीयमापवस्यैतन्मनोरन्तरमुच्यते ।स वैराजः प्रजासर्गे ससर्ज पुरुषः प्रभुः ।नारायणविसर्गः स प्रजास्तस्याप्ययोनिजाः

dvitīyamāpavasyaitanmanorantaramucyate | sa vairājaḥ prajāsarge sasarja puruṣaḥ prabhuḥ | nārāyaṇavisargaḥ sa prajāstasyāpyayonijāḥ

हिन्दी अर्थ

आपवपुत्र मनुकी जो यह दूसरी योनिज सृष्टि है, यहींसे मन्वन्तरका आरम्भ बताया जाता है। इस प्रकार शक्तिशाली वैराज पुरुष (मनु) -ने प्रजासर्गकी सृष्टि की । आपव प्रजापतिको नारायणसर्ग कहा गया है (क्योंकि वे नारायणसे ही प्रकट हुए हैं) । उनकी अयोनिजा प्रजा प्रथम सर्ग है (और मनुकी योनिजा प्रजा द्वितीय सर्ग)

अध्याय 1

श्लोक 54

आयुष्मान् कीर्तिमान् धन्यः प्रजावाञ्छ्रुतवांस्तथा ।आदिसर्गं विदित्वेमं यथेष्टां गतिमाप्नुयात्

āyuṣmān kīrtimān dhanyaḥ prajāvāñchrutavāṃstathā | ādisargaṃ viditvemaṃ yatheṣṭāṃ gatimāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

जो इस आदि सृष्टिको इस प्रकार जान लेता है, वह आयुष्मानू, कीर्तिमान, धन्यवादका पात्र, संतानवान्‌ और विद्वान्‌ होता है, उसे इच्छानुसार उत्तम गति प्राप्त होती है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.