Harivamsha Purana
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अध्याय 2 / 318

Parva 1, Adhyāya 2

57 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ57 श्लोक

अध्याय 2

श्लोक 1

स सृष्टासु प्रजास्वेवमापवो वै प्रजापतिः ।लेभे वै पुरुषः पत्नीं शतरूपामयोनिजाम्

sa sṛṣṭāsu prajāsvevamāpavo vai prajāpatiḥ | lebhe vai puruṣaḥ patnīṃ śatarūpāmayonijām

हिन्दी अर्थ

५ध्याय; -ााण | प्रजापतिकी उत्पत्तिका वर्णन बैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय! इस प्रकार (अयोनिज—मानसिक) प्रजाओंकी रचना हो जानेपर वह आपव प्रजापति (ब्रह्मा) ही (अपनी देहके दो भाग करके एक भागसे मनु नामक) पुरुष बन गये और उन्होंने देहके दूसरे भागसे बनी हुई अयोनिजा शतरूपाको पत्नीरूपमें स्वीकार किया

अध्याय 2

श्लोक 2

आपवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठतः ।धर्मेणैव महाराज शतरूपा व्यजायत

āpavasya mahimnā tu divamāvṛtya tiṣṭhataḥ | dharmeṇaiva mahārāja śatarūpā vyajāyata

हिन्दी अर्थ

महाराज ! अपनी महिमासे दुलोकको व्याप्त करके स्थित हुए मनुके धर्मसे ही उनकी पत्नी शतरूपाकी उत्पत्ति हुई

अध्याय 2

श्लोक 3

सा तु वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् ।भर्तारं दीप्ततपसं पुरुषं प्रत्यपद्यत

sā tu varṣāyutaṃ taptvā tapaḥ paramaduścaram | bhartāraṃ dīptatapasaṃ puruṣaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

वह शतरूपा दस हजार वर्षोतक परम दुष्कर तप करके (संतानकी कामनासे) तपसे चमकते हुए अपने स्वामी वैराज पुरुषके पास आयाीं

अध्याय 2

श्लोक 4

स वै स्वायम्भुवस्तात पुरुषो मनुरुच्यते ।तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते

sa vai svāyambhuvastāta puruṣo manurucyate | tasyaikasaptatiyugaṃ manvantaramihocyate

हिन्दी अर्थ

तात! वे पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उन (-के अधिकार)-का (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगरूप) इकहत्तर चतुर्युगोंका समय इस संसारमें मन्वन्तर कहलाता है (यह मन्वन्तर संध्या और संध्यांशके कारण इकहत्तर चतुर्युगोंसे भी कुछ अधिक समयका होता है ।)

अध्याय 2

श्लोक 5

वैराजात् पुरुषाद् वीरं शतरूपा व्यजायत ।प्रियव्रतोत्तानपादौ वीरात् काम्या व्यजायत

vairājāt puruṣād vīraṃ śatarūpā vyajāyata | priyavratottānapādau vīrāt kāmyā vyajāyata

हिन्दी अर्थ

वैराज पुरुष मनुसे उनकी पत्नी शतरूपाने वीर नामक पुत्रको जन्म दिया और वीरसे उनकी पत्नी काम्याने प्रियब्रत तथा उत्तानपादको उत्पन्न किया

अध्याय 2

श्लोक 6

काम्या नाम महाबाहो कर्दमस्य प्रजापतेः ।काम्यापुत्रास्तु चत्त्वारः संराट्कुक्षिर्विराट् प्रभुः ।प्रियव्रतं समासाद्य पतिं सा सुषुवे सुतान्

kāmyā nāma mahābāho kardamasya prajāpateḥ | kāmyāputrāstu cattvāraḥ saṃrāṭkukṣirvirāṭ prabhuḥ | priyavrataṃ samāsādya patiṃ sā suṣuve sutān

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! कर्दम प्रजापतिकी एक काम्या नामवाली पुत्री थी, उस काम्याके सम्राट, कुक्षि, विराट और प्रभु नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उस काम्याने प्रियब्रतको पतिरूपमें पाकर इन पुत्रोंको उत्पन्न किया था

अध्याय 2

श्लोक 7

उत्तानपादं जग्राह पुत्रमत्रिः प्रजापतिः ।उत्तानपादाच्चतुरः सूनृताजनयत् सुतान्

uttānapādaṃ jagrāha putramatriḥ prajāpatiḥ | uttānapādāccaturaḥ sūnṛtājanayat sutān

हिन्दी अर्थ

प्रजापति अत्रिने उत्तानपादको पुत्ररूपमें ग्रहण कर लिया। उत्तानपादसे उनकी पत्नी सूनृताने चार पुत्रोंको उत्पन्न किया

अध्याय 2

श्लोक 8

धर्मस्य कन्या सुश्रोणी सूनृता नाम विश्रुता ।उत्पन्ना वाजिमेधेन ध्रुवस्य जननी शुभा

dharmasya kanyā suśroṇī sūnṛtā nāma viśrutā | utpannā vājimedhena dhruvasya jananī śubhā

हिन्दी अर्थ

धर्मकी एक सूनृता नामसे प्रसिद्ध सुन्दर कटिवाली पुत्री थी, वह धर्मके यहाँ अध्मेघ यज्से प्रकट हुई थी, यही कल्याणकारिणी सूनृता ध्रुवकी माता थी

अध्याय 2

श्लोक 9

ध्रुवं व कीर्तिमन्तं च शिवं शान्तमयस्पतिम् ।उत्तानपादोऽजनवाॅय्त् सूनृतायां प्रजापतिः

dhruvaṃ va kīrtimantaṃ ca śivaṃ śāntamayaspatim | uttānapādo'janavāॅyt sūnṛtāyāṃ prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजापति उत्तानपादने सूनृता नामवाली पत्नीसे ध्रुव, कीर्तिमान, शान्तस्वरूप शिव और अयस्पति नामक पुत्रको उत्पन्न किया था

अध्याय 2

श्लोक 10

ध्रुवो वर्षसहस्त्राणि त्रीणि दिव्यानि भारत ।तपस्तेपे महाराज प्रार्थयन् सुमहद् यशः

dhruvo varṣasahastrāṇi trīṇi divyāni bhārata | tapastepe mahārāja prārthayan sumahad yaśaḥ

हिन्दी अर्थ

भरतवंशी महाराज! ध्रुवने जिनका नाम महायश* है, उन भगवान्‌ नारायणको पानेकी इच्छासे तीन हजार दिव्य वर्षोतक तप किया था

अध्याय 2

श्लोक 11

तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतः स्थानमप्रतिमं भुवि ।अचलं चैव पुरतः सप्तर्षीणां प्रजापतिः

tasmai brahmā dadau prītaḥ sthānamapratimaṃ bhuvi | acalaṃ caiva purataḥ saptarṣīṇāṃ prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

१०) है। प्रजापालक भगवान्‌ ब्रह्मा (विष्णु)-ने श्रुवपर प्रसन्न होकर उनको सपर्षियोंके सम्मुख एक अलौकिक, अचल स्थान प्रदान किया

अध्याय 2

श्लोक 12

तस्यातिमात्रामृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य च ।देवासुराणामाचार्यः श्लोकमप्युशना जगौ

tasyātimātrāmṛddhiṃ ca mahimānaṃ nirīkṣya ca | devāsurāṇāmācāryaḥ ślokamapyuśanā jagau

हिन्दी अर्थ

ध्रुवकी बड़ी भारी समृद्धि और महिमाको देखकर देवता और असुरोंके आचार्य शुक्राचार्यने* इस श्लोकका गान किया—

अध्याय 2

श्लोक 13

अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहो बलम् ।यदेनं पुरतः कृत्वा भुवं सप्तर्षयः स्थिताः

aho'sya tapaso vīryamaho śrutamaho balam | yadenaṃ purataḥ kṛtvā bhuvaṃ saptarṣayaḥ sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

इन ध्रुवके तपोबलकों देखकर आश्चर्य होता है, इनका शास्त्रज्ञान भी विस्मयविमुग्ध कर देता है और इनकी शक्ति भी अद्धुत है, तभी तो ये सपर्षि भी इनको अपने आगे स्थापित करके स्थित हैं '

अध्याय 2

श्लोक 14

तस्माच्छ्लिष्टिं च भव्यं च ध्रुवाच्छम्भुर्व्यजायत ।श्लिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान्

tasmācchliṣṭiṃ ca bhavyaṃ ca dhruvācchambhurvyajāyata | śliṣṭerādhatta succhāyā pañca putrānakalmaṣān

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

उन ध्रुवसे शम्भु नामवाली स्त्रीने श्लिष्टि और भव्य नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया। श्लिष्टिसे सुच्छाया (नामकी पत्नी) -ने रिपु, रिपुझय, पुण्य, वृकल और वृकतेजा—पाँच निष्पाप पुत्रोंको उत्पन्न किया। रिपुसे उनकी बृहती नामकी पत्नीने सब देवताओंके तेजसे परिपूर्ण चाक्षुष नामक पुत्रको उत्पन्न किया

अध्याय 2

श्लोक 15

रिपुं रिपुञ्जयं पुण्यं वृकलं वृकतेजसम् ।रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम्

ripuṃ ripuñjayaṃ puṇyaṃ vṛkalaṃ vṛkatejasam | riporādhatta bṛhatī cākṣuṣaṃ sarvatejasam

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 2

श्लोक 16

अजीजनत् पुष्करिण्यां वीरण्यां चाक्षुषो मनुम् ।प्रजापतेरात्मजायामरण्यस्य महात्मनः

ajījanat puṣkariṇyāṃ vīraṇyāṃ cākṣuṣo manum | prajāpaterātmajāyāmaraṇyasya mahātmanaḥ

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

चाक्षुषने वीरणकी पुत्री पुष्करिणीके गर्भसे मनु नामक पुत्रको उत्पन्न किया। वैराज प्रजापतिके वंशमें उत्पन्न हुए इन परम तेजस्वी मनुसे महात्मा अरण्यकी पुत्री नड्वलाद्वारा दस श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए

अध्याय 2

श्लोक 17

मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः ।कन्यायामभवञ्छ्रेष्ठा वैराजस्य प्रजापतेः

manorajāyanta daśa naḍvalāyāṃ mahaujasaḥ | kanyāyāmabhavañchreṣṭhā vairājasya prajāpateḥ

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 2

श्लोक 18

ऊरुः पुरुः शतद्युम्नस्तस्तपस्वी सत्यवान् कविः ।अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव

ūruḥ puruḥ śatadyumnastastapasvī satyavān kaviḥ | agniṣṭudatirātraśca sudyumnaśceti te nava

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

ऊरु, पुरु, शतदुम्न, तपस्वी, सत्यवानू, कवि, अग्रिष्ठव, अतिरात्र और सुद्युम्न-ये नौ और दसवाँ अभिमन्यु—ये नड्वलाके पुत्र कहे जाते हैं। ऊरुसे अग्रिकी कन्याने अड्भ, सुमना, ख्याति, क्रतु, अड्ञिरा और गय नामक उत्तम कान्तिवाले छः पुत्रोंको उत्पन्न किया था

अध्याय 2

श्लोक 19

अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायाः सुताः स्मृताः ।ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान् ।अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम्

abhimanyuśca daśamo naḍvalāyāḥ sutāḥ smṛtāḥ | ūrorajanayat putrān ṣaḍāgneyī mahāprabhān | aṅgaṃ sumanasaṃ khyātiṃ kratumaṅgirasaṃ gayam

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 2

श्लोक 20

अङ्गात् सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत ।अपचारात्तु वेनस्य प्रकोपः सुमहानभूत्

aṅgāt sunīthāpatyaṃ vai venamekamajāyata | apacārāttu venasya prakopaḥ sumahānabhūt

हिन्दी अर्थ

अज्ञसे (मृत्युकी पुत्री) सुनीथाने वेन नामक एक पुत्रको उत्पन्न किया था। वेन अत्याचारी था (देवता, धर्म आदिसे द्रोह रखता था), अतएव ऋषियोंको उसपर बड़ा क्रोध आया

अध्याय 2

श्लोक 21

प्रजार्थमृषयो यस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम् ।वेनस्य पाणौ मथिते बभूव मुनिभिः पृथुः

prajārthamṛṣayo yasya mamanthurdakṣiṇaṃ karam | venasya pāṇau mathite babhūva munibhiḥ pṛthuḥ

हिन्दी अर्थ

(ऋषियोंके कोपसे नष्ट हुए) वेनके दाहिने हाथको मुनियोंने संतान उत्पन्न करनेके लिये मथा, तब मुनियोंके मधे हुए वेनके दाहिने हाथसे पृथुकी उत्पत्ति हुई

अध्याय 2

श्लोक 22

तं दृष्ट्वा ऋषयः प्राहुरेष वै मुदिताः प्रजाः ।करिष्यति महातेजा यशश्च प्राप्स्यते महत्

taṃ dṛṣṭvā ṛṣayaḥ prāhureṣa vai muditāḥ prajāḥ | kariṣyati mahātejā yaśaśca prāpsyate mahat

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने उसको देखकर कहा-'यह पृथु प्रजाओंको प्रसन्न करेगा और इस महातेजस्वीको उत्तम यशकी प्राप्ति होगी'

अध्याय 2

श्लोक 23

स धन्वी कवची खड्गी तेजसा निर्दहन्निव ।पृथुर्वैन्यस्तदा चेमां ररक्ष क्षत्रपूर्वजः

sa dhanvī kavacī khaḍgī tejasā nirdahanniva | pṛthurvainyastadā cemāṃ rarakṣa kṣatrapūrvajaḥ

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

तब वे क्षत्रिय-जातिमें प्रथम उत्पन्न हुए वेनके पुत्र पृथु धनुष, कवच और तलवार धारणकर अपने तेजसे (डाकू, अधर्मी आदि दुष्ट पुरुषोंको) भस्म-सा करते हुए इस पृथ्वीकी रक्षा करने लगे॥ रे ॥ लिये और असुरोंका क्षय करनेके लिये बृहस्पति ही दूसरे शरीरसे ंको मोहमें डाल रखा है। र५ पृथु राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होनेवाले राजाओंमें प्रथम भूपति हैं। (उन्हींके यज्ञमें अग्रिसे राजाओंकी स्तुति करनेमें) चतुर सूत तथा (राजाओंकी वंशावली पढ़नेमें) प्रवीण मागध प्रकट हुए थे

अध्याय 2

श्लोक 24

राजसूयाभिषिक्तानामाद्यः स वसुधाधिपः ।तस्माच्चैव समुत्पन्नौ निपुणौ सुतमागधौ

rājasūyābhiṣiktānāmādyaḥ sa vasudhādhipaḥ | tasmāccaiva samutpannau nipuṇau sutamāgadhau

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 2

श्लोक 25

तेनेयं गौर्महाराज दुग्धा सस्यानि भारत ।प्रजानां वृत्तिकामेन देवैः सर्षिगणैः सह

teneyaṃ gaurmahārāja dugdhā sasyāni bhārata | prajānāṃ vṛttikāmena devaiḥ sarṣigaṇaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

भरतवंशी महाराज! प्रजाओंको आजीविका देनेकी इच्छावाले पृथुने देवता और ऋषियोंकी मण्डलियोंको साथमें ले गौरूपिणी पृथ्वीसे अन्न (आदि सकल वस्तुओं) -को दुहा था

अध्याय 2

श्लोक 26

पितृभिर्दानवैश्चैव गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।सर्पैः पुण्यजनैश्चैव वीरुद्भिः पर्वतैस्तथा

pitṛbhirdānavaiścaiva gandharvaiḥ sāpsarogaṇaiḥ | sarpaiḥ puṇyajanaiścaiva vīrudbhiḥ parvataistathā

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

(पृथुके समय) पितर, दानव, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, यक्ष, वृक्ष और पर्वतोंने अपने-अपने पात्रोंमें* दुहा था। पृथ्वीने उनको इच्छानुसार दूध दिया था और उस दूधसे उन सबने अपने प्राणोंको धारण किया था

अध्याय 2

श्लोक 27

तेषु तेषु च पाशेषु दुह्यमाना वसुन्धरा ।प्रादाद् यथेप्सितं क्षीरं तेन प्राणानधारयन्

teṣu teṣu ca pāśeṣu duhyamānā vasundharā | prādād yathepsitaṃ kṣīraṃ tena prāṇānadhārayan

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 2

श्लोक 28

पृथुपुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्द्धिपालितौ ।शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्धानाद व्यजायत

pṛthuputrau tu dharmajñau jajñāte'ntarddhipālitau | śikhaṇḍinī havirdhānamantardhānāda vyajāyata

हिन्दी अर्थ

पृथुके अन्तर्धान और पालित—ये दो धर्मज्ञ पुत्र हुए और अन्तर्धानसे शिखण्डिनीने हविर्धान नामक पुत्रको उत्पन्न किया

अध्याय 2

श्लोक 29

हविर्धानात्षडाग्नेयी धिषणाजनयत्सुतान् ।प्राचीनबर्हिषं शुक्लं गयं कृष्णं व्रजाजिनौ

havirdhānātṣaḍāgneyī dhiṣaṇājanayatsutān | prācīnabarhiṣaṃ śuklaṃ gayaṃ kṛṣṇaṃ vrajājinau

हिन्दी अर्थ

हविर्धानसे अग्निकी पुत्री धिषणाने प्राचीनबर्हि, शुक्ल, गय, कृष्ण, ब्रज और अजिन नामवाले छः: पुत्रोंको उत्पन्न किया

अध्याय 2

श्लोक 30

प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत्प्रजापतिः ।हविर्धानान्महाराज येन संवर्द्धिता प्रजाः

prācīnabarhirbhagavān mahānāsītprajāpatiḥ | havirdhānānmahārāja yena saṃvarddhitā prajāḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज ! भगवान्‌ ग प्राचीनबर्हिं, जिन्होंने प्रजाओंका पालन एवं संवर्धन किया था, अपने पिंता हविर्धानसे बढ़कर प्रजापालक हुए

अध्याय 2

श्लोक 31

प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां जनमेजय ।प्राचीनबर्हिर्भगवान् पृथिवीतलचारिणः

prācīnāgrāḥ kuśāstasya pṛthivyāṃ janamejaya | prācīnabarhirbhagavān pṛthivītalacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! उनके यज्ञ करते समय बिछे हुए प्राचीनाग्र कुश समस्त भूमण्डलपर फैलकर उनके महत्त्वको प्रकट कर रहे थे, अतएव उनका नाम भगवान्‌ प्राचीनबर्हिं है

अध्याय 2

श्लोक 32

समुद्रतनयायां तु कृतदारोऽभवत्प्रभुः ।महतस्तपसः पारे सवर्णायां महीपतिः

samudratanayāyāṃ tu kṛtadāro'bhavatprabhuḥ | mahatastapasaḥ pāre savarṇāyāṃ mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

महीपति प्रभु प्राचीनबर्हिने बड़ा भारी तप करनेके पश्चात्‌ समुद्रकी पुत्री सबणकि साथ विवाह किया

अध्याय 2

श्लोक 33

सवर्णाऽऽधत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः ।सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः

savarṇā''dhatta sāmudrī daśa prācīnabarhiṣaḥ | sarve pracetaso nāma dhanurvedasya pāragāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राचीनबर्हिसे समुद्रकी पुत्री सवर्णनि दस पुत्र उत्पन्न किये, उन दसोंका ' प्रचेता' यह एक ही नाम था। वे सब धनुर्वेदके पारगामी थे

अध्याय 2

श्लोक 34

अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः ।दशवर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः

apṛthagdharmacaraṇāste'tapyanta mahattapaḥ | daśavarṣasahasrāṇi samudrasalileśayāḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब प्रचेतागण एक साथ समान धर्म-कर्मका आचरण करते थे और एक-से शीलवाले थे, उन्होंने समुद्रके जलमें प्रवेश करके दस हजार वर्षोतक बड़ी भारी तपस्या की

अध्याय 2

श्लोक 35

तपश्चरत्सु पृथिवीं प्रचेतस्सु महीरुहाः ।अरक्ष्यमाणामावव्रुर्बभूवाथ प्रजाक्षयः

tapaścaratsu pṛthivīṃ pracetassu mahīruhāḥ | arakṣyamāṇāmāvavrurbabhūvātha prajākṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

जब प्रचेतागण तप कर रहे थे, तब अरक्षित पड़ी हुई पृथ्वीको वृक्षोंने चारों ओरसे ढक दिया, इससे प्रजाओंका नाश होने लगा

अध्याय 2

श्लोक 36

नाशकन्मारुतो वातुं वृतं खमभवद् द्रुमैः ।दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः

nāśakanmāruto vātuṃ vṛtaṃ khamabhavad drumaiḥ | daśavarṣasahasrāṇi na śekuśceṣṭituṃ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

ने कौन-कौन-सा दूध दुहा था, इसका विस्तृत वर्णन आगे पाँचवें तर षण्णां भग इतीरणा ॥ है। ये छः वस्तुएँ जिनमें पूर्णरूपसे हों ऐसे योगी महात्मा आदिके दस हजार वर्षोमें वृक्षोंनें आकाशतकको परेर लिया, तब वायुका चलना बंद हो गया और प्रजाओंका चेष्टा करना (हाथ-पैर हिलाना) भी बंद होने नगा

अध्याय 2

श्लोक 37

तदुपश्रुत्य तपसा युक्ताः सर्वे प्रचेतसः ।मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजञ्जातमन्यवः

tadupaśrutya tapasā yuktāḥ sarve pracetasaḥ | mukhebhyo vāyumagniṃ ca te'sṛjañjātamanyavaḥ

हिन्दी अर्थ

अपनी तपस्या (ज्ञानदृष्टि>-से इन सब त्नातोंको जानकर सब प्रचेता इसका उपाय करनेके लिये उद्यत हो गये और उन्होंने क्रोधमें भरकर अपने मुखोंसे त्रायु और अग्रिको प्रकट किया

अध्याय 2

श्लोक 38

उन्मूलानथ तान्कृत्वा वृक्षान्वायुरशोषयत् ।तानग्निरदहद्घोरं एवमासीद् द्रुमक्षयः

unmūlānatha tānkṛtvā vṛkṣānvāyuraśoṣayat | tānagniradahadghoraṃ evamāsīd drumakṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

वायुने वृक्षोंको जड़से उखाड़कर उनको सुखा दिया, तब अग्ि प्रचण्ड होकर उन वृक्षोंको जलाने लगी, इस प्रकार वृक्षोंका नाश डोने लगा

अध्याय 2

श्लोक 39

द्रुमक्षयमथो बुद्ध्वा किञ्चिच्छिष्टेषु शाखिषु ।उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन्

drumakṣayamatho buddhvā kiñcicchiṣṭeṣu śākhiṣu | upagamyābravīdetān rājā somaḥ prajāpatīn

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जलते-जलते जब कुछ ही तरुक्ष बाकी बचे, तब वृक्षोंके संहारकी बातको जानकर न वृक्षोंके राजा सोम प्रजापति प्रचेताओंके पास जाकर बोले—

अध्याय 2

श्लोक 40

कोपं यच्छत राजानः सर्वे प्राचीनबर्हिषः ।वृक्षशून्या कृता पृथ्वी शाम्येतामग्निमारुतौ

kopaṃ yacchata rājānaḥ sarve prācīnabarhiṣaḥ | vṛkṣaśūnyā kṛtā pṛthvī śāmyetāmagnimārutau

हिन्दी अर्थ

प्राचीनबर्हिके पुत्र प्रचेताओ ! तुमने तो पृथ्वीको वृक्षोंसे शून्य ही कर डाला। राजाओ! अब अपने क्रोधको रोको तथा इन अग्ि और पवनको शान्त करो

अध्याय 2

श्लोक 41

रत्नभूता च कन्येयं वृक्षाणां वरवर्णिनी ।भविष्यं जानता तत्त्वं धृता गर्भेण वै मया

ratnabhūtā ca kanyeyaṃ vṛkṣāṇāṃ varavarṇinī | bhaviṣyaṃ jānatā tattvaṃ dhṛtā garbheṇa vai mayā

हिन्दी अर्थ

यह वृक्षोंकी र्रस्वरूपा सुन्दरी कन्या है। मैंने भविष्यके तत्त्वको जानकर इसे अपने गर्भमें स्थापित कर लिया था*

अध्याय 2

श्लोक 42

मारिषा नाम कन्येयं वृक्षाणामिति निर्मिता ।भार्या वोऽस्तु महाभागाः सोमवंशविवर्द्धिनी

māriṣā nāma kanyeyaṃ vṛkṣāṇāmiti nirmitā | bhāryā vo'stu mahābhāgāḥ somavaṃśavivarddhinī

हिन्दी अर्थ

यह मारिषा नामवाली कन्या वुक्षोंके वीर्य अर्थात्‌ सारांशसे रची गयी है। महाभाग ! इस सोमवंशकी वृद्धि करनेवाली वृक्षोंकी कन्याको तुम भार्यरूपमें ग्रहण करो

अध्याय 2

श्लोक 43

युष्माकं तेजसोऽर्द्धेन मम चार्द्धेन तेजसः ।अस्यामुत्पत्स्यते पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः

yuṣmākaṃ tejaso'rddhena mama cārddhena tejasaḥ | asyāmutpatsyate putro dakṣo nāma prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे और मेंरे देनोंके तेजके आधे-आधे भागके द्वारा इस कन्याके ार्भसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा—दक्ष प्रजापति

अध्याय 2

श्लोक 44

य इमां दग्धभूयिष्ठां युष्मत्तेजोमयेन वै ।अग्निनाग्निसमो भूयः प्रजाः संवर्धयिष्यति

ya imāṃ dagdhabhūyiṣṭhāṃ yuṣmattejomayena vai | agnināgnisamo bhūyaḥ prajāḥ saṃvardhayiṣyati

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे तपरूपी अग्रिसे अग्रिके समान ही प्रतापी वह दक्ष अधिकांश जली हुई इस पृथ्वीपर फिर प्रजाओंकी वृद्धि करेगा'

अध्याय 2

श्लोक 45

ततः सोमस्य वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः ।संहृत्य कोपं वृक्षेभ्यः पत्नीं धर्मेण मारिषाम्

tataḥ somasya vacanājjagṛhuste pracetasaḥ | saṃhṛtya kopaṃ vṛkṣebhyaḥ patnīṃ dharmeṇa māriṣām

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके इस प्रकार कहनेपर उन प्रचेताओंने वृक्षोंकी ओरसे अपने क्रोधको समेट लिया और मारिषाको विवाहरूपी धर्मके द्वारा पत्नीरूपमें ग्रहण कर लिया

अध्याय 2

श्लोक 46

मारिषायां ततस्ते वै मनसा गर्भमादधुः ।दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः ।दक्षो जज्ञे महातेजाः सोमस्यांशेन भारत

māriṣāyāṃ tataste vai manasā garbhamādadhuḥ | daśabhyastu pracetobhyo māriṣāyāṃ prajāpatiḥ | dakṣo jajñe mahātejāḥ somasyāṃśena bhārata

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उन प्रचेताओंने अपने मनसे मारिषामें गर्भ स्थापित किया। भरतवंशी राजन्‌! इस प्रकार चन्द्रमाके अंशसे दस प्रचेताओंके द्वारा मारिषाके गर्भसे महातेजस्वी दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए

अध्याय 2

श्लोक 47

पुत्रानुत्पादयामास सोमवंशविवर्धनान् ।अचरांश्च चरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदः ।स दृष्ट्वा मनसा दक्षः पश्चादप्यसृजत् स्त्रियः

putrānutpādayāmāsa somavaṃśavivardhanān | acarāṃśca carāṃścaiva dvipado'tha catuṣpadaḥ | sa dṛṣṭvā manasā dakṣaḥ paścādapyasṛjat striyaḥ

हिन्दी अर्थ

नके कारण सूर्यमें पहुँचा दिया, इसी प्रकार पृथ्वीका सारभूत [ वीर्य सोमने अपने गर्भमें धारण कर लिया, यह बात ठीक में प्रविष्ट हो जाती है' इस श्रुतिसे भी ओषधियोंके साररूपसे [का यह वचन ठीक ही है कि “मैंने इन वृक्षोंकी कन्याको इध्याय: + २७ तब उन दक्षप्रजापतिने चन्द्रमाके वंशको बढ़ानेवाले पुत्र उत्पन्न किये और स्थावर, जड्जम, दो पैरवाले, चार पैरवाले रचनेयोग्य प्राणियोंकी सृष्टिके लिये मनमें विचारकर पीछे स्त्रियोंकी भी रचना की

अध्याय 2

श्लोक 48

ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।शिष्टाः सोमाय राज्ञेऽथ नक्षत्राख्या ददौ प्रभुः

dadau sa daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa | śiṣṭāḥ somāya rājñe'tha nakṣatrākhyā dadau prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभु दक्षने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कन्याएँ कश्यपको और शेष बची हुई नक्षत्रसम्बन्धी नामवाली सत्ताईस कन्याएँ राजा चन्द्रमाको दे दीं

अध्याय 2

श्लोक 49

तासु देवाः खगा नागा गावो दितिजदानवाः ।गन्धर्वाप्सरसश्चैव जज्ञिरेऽन्याश्च जातयः

tāsu devāḥ khagā nāgā gāvo ditijadānavāḥ | gandharvāpsarasaścaiva jajñire'nyāśca jātayaḥ

हिन्दी अर्थ

उन कन्याओंसे देवता, पक्षी, सर्प, गौएँ, दैत्य-दानव-गन्धर्व, अप्सराएँ तथा अन्य जातियोंके प्राणी उत्पन्न हुए

अध्याय 2

श्लोक 50

ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रजा मैथुनसम्भवाः ।सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते

tataḥ prabhṛti rājendra prajā maithunasambhavāḥ | saṅkalpāddarśanātsparśātpūrveṣāṃ sṛṣṭirucyate

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! तभीसे प्रजाएँ मैथुनद्वारा उत्पन्न होने लगीं । इससे पहले प्राणियोंकी उत्पत्ति संकल्प, * दर्शन और स्पर्शसे होती थी-ऐसा कहा जाता है

अध्याय 2

श्लोक 51

देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।सम्भवः कथितः पूर्वं दक्षस्य च महात्मनः

devānāṃ dānavānāṃ ca gandharvoragarakṣasām | sambhavaḥ kathitaḥ pūrvaṃ dakṣasya ca mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने कहा—मुने ! आपने पहले भी देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षस तथा महात्मा दक्षकी उत्पत्तिका वर्णन किया है

अध्याय 2

श्लोक 52

अङ्गुष्ठाद् ब्रह्मणो जातो दक्षः प्रोक्तस्त्वयानघ ।वामाङ्गुष्ठात् तथा चैव तस्य पत्नी व्यजायत

aṅguṣṭhād brahmaṇo jāto dakṣaḥ proktastvayānagha | vāmāṅguṣṭhāt tathā caiva tasya patnī vyajāyata

हिन्दी अर्थ

निष्पाप महर्षे! वहाँ आपने कहा है कि ब्रह्माजीके (दाहिने) अंगूठेसे दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीके बायें अंगूठेसे दक्षकी पत्नी उत्पन्न हुईं

अध्याय 2

श्लोक 53

कथं प्राचेतसत्वं स पुनर्लेभे महातपाः ।एतन्मे संशयं विप्र सम्यगाख्यातुमर्हसि ।दौहित्रश्चैव सोमस्य कथं श्वशुरतां गतः

kathaṃ prācetasatvaṃ sa punarlebhe mahātapāḥ | etanme saṃśayaṃ vipra samyagākhyātumarhasi | dauhitraścaiva somasya kathaṃ śvaśuratāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

वे महातपस्वी दक्ष फिर प्रचेताओंके पुत्र कैसे हुए ? चन्द्रमाके नाती दक्ष फिर उनके श्रशुर कैसे बन गये ? विप्रवर ! मेरे इन संदेहोंको भली प्रकार व्याख्या करके आप दूर कर दीजिये

अध्याय 2

श्लोक 54

उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यौ भूतेषु पार्थिव ।ऋषयोऽत्र न मुह्यन्ति विद्वांसश्चैव ये जनाः

utpattiśca nirodhaśca nityau bhūteṣu pārthiva | ṛṣayo'tra na muhyanti vidvāṃsaścaiva ye janāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—पृथ्वीनाथ! जन्म और मृत्यु—ये समस्त प्राणियोंके लिये नित्य (स्वाभाविक) हैं । इस विषयमें ऋषियोंको कभी मोह नहीं होता। जो विद्वान्‌ पुरुष हैं, वे भी इस विषयमें मोहित नहीं होते

अध्याय 2

श्लोक 55

युगे युगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो नृप ।पुनश्चैव निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति

yuge yuge bhavantyete sarve dakṣādayo nṛpa | punaścaiva nirudhyante vidvāṃstatra na muhyati

हिन्दी अर्थ

नरेथर! ये दक्ष आदि सब लोग प्रत्येक युगमें उत्पन्न होते और मरते रहते हैं, अत: विद्वान पुरुष इस विषयमें मोहको नहीं प्राप्त होते हैं

अध्याय 2

श्लोक 56

ज्यैष्ठ्यं कानिष्ठ्यमप्येषां पूर्वे नासीज्जनाधिप ।तप एव गरीयोऽभूत्प्रभावश्चैव कारणम्

jyaiṣṭhyaṃ kāniṣṭhyamapyeṣāṃ pūrve nāsījjanādhipa | tapa eva garīyo'bhūtprabhāvaścaiva kāraṇam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! पहले इनमें ज्येष्ठता और कनिष्ठताका अर्थात्‌ पहले-पीछे उत्पन्न होनेका कोई विचार नहीं था, तप ही इनकी दृष्टिमें गरिष्ठ था और प्रभाव ही इनमें सम्बन्ध होनेका कारण होता था

अध्याय 2

श्लोक 57

इमां विसृष्टिं दक्षस्य यो विद्यात्सचराचराम् ।प्रजावानापदुत्तीर्णः स्वर्गलोके महीयते

imāṃ visṛṣṭiṃ dakṣasya yo vidyātsacarācarām | prajāvānāpaduttīrṇaḥ svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य चर तथा अचर प्राणियों सहित इस दक्ष प्रजापतिकी सृष्टिके तत्त्वको जानता है, वह संतानवान्‌ होता है और आपत्तियोंके पार हो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठापूर्वक रहता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.