Harivamsha Purana
102
अध्याय 102 / 318

Parva 2, Adhyāya 47

46 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ46 श्लोक

अध्याय 102

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य यादवैः सह रुक्मिणीस्वयंवरावसरे कुण्डिनपुरे गमनम्, राज्ञा कैशिकेन तेषां सत्कारं एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता लोकप्रावृत्तिका नराः ।चक्रायुधगृहं सर्वे लोकपालगृहोपमम्

śrīkṛṣṇasya yādavaiḥ saha rukmiṇīsvayaṃvarāvasare kuṇḍinapure gamanam, rājñā kaiśikena teṣāṃ satkāraṃ etasminnantare prāptā lokaprāvṛttikā narāḥ | cakrāyudhagṛhaṃ sarve lokapālagṛhopamam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी बीचमें जगतमें होनेवाली प्रवृत्तियों अथवा घटनाओंकी सूचना देनेवाले सब लोग मथुरामें आये और लोकपालोंके भवनकी भाँति शोभा पानेवाले चक्रधारी श्रीकृष्णके गृहमें एकत्र हुए

अध्याय 102

श्लोक 2

तेष्वात्ययिकशंसीषु लोकप्रावृत्तिकेष्विह ।कृतसंज्ञा यदुश्रेष्ठाः समेताः कृष्णसंसदि

teṣvātyayikaśaṃsīṣu lokaprāvṛttikeṣviha | kṛtasaṃjñā yaduśreṣṭhāḥ sametāḥ kṛṣṇasaṃsadi

हिन्दी अर्थ

वे लोग विनाशकारी युद्धका समाचार बताना चाहते थे। उनके आ जानेपर आपसका संकेत पाकर समस्त श्रेष्ठ यादव श्रीकृष्णकी सभामें जुट गये

अध्याय 102

श्लोक 3

समागतेषु सर्वेषु यदुमुख्येषु संसदि ।प्रावृत्तिका नराः प्राहुः पार्थिवात्ययिकं वचः

samāgateṣu sarveṣu yadumukhyeṣu saṃsadi | prāvṛttikā narāḥ prāhuḥ pārthivātyayikaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त प्रधान यादवोंके उस सभामें आ जानेपर वे समाचार या सन्देश लानेवाले मनुष्य राजाओंके विनाशका कारणभूत वचन इस प्रकार बोले—

अध्याय 102

श्लोक 4

जनार्दन नरेन्द्राणां पार्थिवानां समागमः ।भविष्यति क्षितीशानां समूढानामनेकशः

janārdana narendrāṇāṃ pārthivānāṃ samāgamaḥ | bhaviṣyati kṣitīśānāṃ samūḍhānāmanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

जनार्दन ! अनेक देशोंके विवाहार्थी पृथ्वीपतियों, शासकों एवं नरेशोंका समागम होनेवाला है

अध्याय 102

श्लोक 5

त्वरितास्तत्र गच्छन्ति नानाजनपदेश्वराः ।कुण्डिने पुण्डरीकाक्ष भोजपुत्रस्य शासनात्

tvaritāstatra gacchanti nānājanapadeśvarāḥ | kuṇḍine puṇḍarīkākṣa bhojaputrasya śāsanāt

हिन्दी अर्थ

कमलनयन! भोजपुत्र रुक्मीका निमन्त्रण पाकर अनेक जनपदोंके राजा बड़ी उतावलीके साथ वहाँ कुण्डिनपुरमें जा रहे हैं

अध्याय 102

श्लोक 6

प्रकाशं स्म कथास्तत्र श्रूयन्ते मनुजेरिताः ।रुक्मिणी किल नामास्ति रुक्मिणः प्रथमा स्वसा

prakāśaṃ sma kathāstatra śrūyante manujeritāḥ | rukmiṇī kila nāmāsti rukmiṇaḥ prathamā svasā

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

जनार्दन ! वहाँ लोगोंके मुँहसे यह बात स्पष्टरूपसे सुनी जाती है कि रुक्मीकी जो बहन है, जिसका नाम रुक्मिणी है, उसका वहाँ स्वयंवर होनेवाला है । इसीलिये ये नरेशगण सेनाओं-सहित वहाँ पधार रहे हैं

अध्याय 102

श्लोक 7

भावी स्वयंवरस्तत्र तस्याः किल जनार्दन ।इत्यर्थमेते सबला गच्छन्ति मनुजाधिपाः

bhāvī svayaṃvarastatra tasyāḥ kila janārdana | ityarthamete sabalā gacchanti manujādhipāḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 8

तस्यास्त्रैलोक्यसुन्दर्यास्तृतीयेऽहनि यादव ।रुक्मभूषणभूषिण्या भविष्यति स्वयंवरः

tasyāstrailokyasundaryāstṛtīye'hani yādava | rukmabhūṣaṇabhūṣiṇyā bhaviṣyati svayaṃvaraḥ

हिन्दी अर्थ

यदुनन्दन! आजसे तीसरे दिन सुवर्णमय आशभूषणोंसे विभूषित रहनेवाली उस त्रिलोकसुन्दरी रुक्मिणीका स्वयंवर होगा

अध्याय 102

श्लोक 9

राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम् ।द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र शिबिराणि महात्मनाम्

rājñāṃ tatra sametānāṃ hastyaśvarathagāminām | drakṣyāmaḥ śataśastatra śibirāṇi mahātmanām

हिन्दी अर्थ

हाथी, घोड़े और रथसे यात्रा करके वहाँ एकत्र हुए महामनस्वी नरेशोंके सैकड़ों शिबिर हमें वहाँ देखनेको मिलेंगे

अध्याय 102

श्लोक 10

सिंहशार्दूलदृप्तानां मत्तद्विरदगामिनाम ।सदा युद्धप्रियाणां हि परस्परममर्षिणाम्

siṃhaśārdūladṛptānāṃ mattadviradagāmināma | sadā yuddhapriyāṇāṃ hi parasparamamarṣiṇām

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

जो सिंह और बाघके समान अपने बलके घमण्डमें भरे रहते हैं, मतवाले हाथियोंके समान चलते हैं, सदा युद्धसे ही प्रेम रखते हैं और आपसमें एक-दूसरेके प्रति अमर्षसे भरे रहते हैं, ऐसे नरेशॉंपर शीघ्र विजय पानेके लिये बहुत-से भूपाल अपने सैन्यसमूहके साथ संगठित होकर यहाँ रुक्मिणीको पानेकी इच्छासे रुके हुए हैं। यदुनन्दन ! क्या हमलोग एकान्तमें रहनेवाले कोल- भील हैं, जो ऐसे अवसरपर उत्साहहीन हो बैठे रहेंगे, हम भी अवश्य उत्साहपूर्वक वहाँ चलेंगे'

अध्याय 102

श्लोक 11

जयाय शीघ्रं सहिता बलौघेन समन्विताः ।निरुद्धाः पृथिवीपालाः किमेकान्तचरा वयम् ।निरुत्साहा भविष्यामो गच्छामो यदुनन्दन

jayāya śīghraṃ sahitā balaughena samanvitāḥ | niruddhāḥ pṛthivīpālāḥ kimekāntacarā vayam | nirutsāhā bhaviṣyāmo gacchāmo yadunandana

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 12

श्रुत्वैतत्केशवो वाक्यं हृदि शल्यमिवार्पितम् ।निर्जगाम यदुश्रेष्ठो यदूनां सहितो बलैः

śrutvaitatkeśavo vākyaṃ hṛdi śalyamivārpitam | nirjagāma yaduśreṣṭho yadūnāṃ sahito balaiḥ

हिन्दी अर्थ

यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको ऐसा लगा, जैसे उनके हदयमें किसीने काँटा-सा चुभो दिया हो। वे यदुत्रेष्ठ गोविन्द यदुवंशियोंकी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले

अध्याय 102

श्लोक 13

यादवास्ते बलोदग्राः सर्वे सङ्ग्रामलालसाः ।निर्ययुः स्यन्दनवरैर्गर्वितास्त्रिदशा इव

yādavāste balodagrāḥ sarve saṅgrāmalālasāḥ | niryayuḥ syandanavarairgarvitāstridaśā iva

हिन्दी अर्थ

वे समस्त यादव, जो बलमें बढ़े-चढ़े थे और संग्रामकी लालसा रखते थे, श्रेष्ठ रथोंद्वारा यात्राके लिये निकले। उस समय वे गर्वीले देवताओंके समान जान पड़ते थे

अध्याय 102

श्लोक 14

बलाग्रेण नियुक्तेन हरिरीशानसम्मतः ।चक्रोद्यतकरः कृष्णो गदापाणिर्व्यरोचत

balāgreṇa niyuktena harirīśānasammataḥ | cakrodyatakaraḥ kṛṣṇo gadāpāṇirvyarocata

हिन्दी अर्थ

अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली श्रेष्ठ सेनाके साथ यात्राके लिये उद्यत हुए भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जो शिवजीके परम प्रिय हैं, एक हाथमें चक्र और दूसरेमें गदा लिये बड़ी शोभा पा रहे थे

अध्याय 102

श्लोक 15

यादवाश्चापरे तत्र वासुदेवानुयायिनः ।रथैरादित्यसङ्काशैः किङ्किणीप्रतिनादितैः

yādavāścāpare tatra vāsudevānuyāyinaḥ | rathairādityasaṅkāśaiḥ kiṅkiṇīpratināditaiḥ

हिन्दी अर्थ

दूसरे यादव भी सूर्यके समान तेजस्वी तथा छोटी-छोटी घण्टियोंके गादसे निनादित रथोंद्वारा भगवान्‌ वासुदेवके पीछे-पीछे त्रहाँ जानेको उद्यत हुए

अध्याय 102

श्लोक 16

उग्रसेनं तु गोविन्दः प्राह निश्चितदर्शनः ।तिष्ठ त्वं नृपशार्दूल भ्रात्रा मे सहितोऽनघ

ugrasenaṃ tu govindaḥ prāha niścitadarśanaḥ | tiṣṭha tvaṃ nṛpaśārdūla bhrātrā me sahito'nagha

हिन्दी अर्थ

उस समय निश्चित दृष्टि खनेवाले भगवान्‌ गोविन्दने राजा उग्रसेनसे कहा—अनघ! नृपश्रेष्ठ ! आप मेरे बड़े भाई बलरामजीके साथ पहीं रहिये

अध्याय 102

श्लोक 17

क्षत्त्रिया विकृतिप्रज्ञाः शास्त्रनिश्चितदर्शनाः ।पुरीं शून्यामिमां वीर जघन्येऽभिपतन्ति ह

kṣattriyā vikṛtiprajñāḥ śāstraniścitadarśanāḥ | purīṃ śūnyāmimāṃ vīra jaghanye'bhipatanti ha

हिन्दी अर्थ

वीर! प्राय: क्षत्रिय छल-कपममें चतुर होते हैं, उनकी दृष्टि राजनीतितक ही सीमित रहती है । कहीं ऐसा न हो कि वे मेरे जानेके पश्चात्‌ इस पुरीको पूनी समझकर इसपर आक्रमण कर दें

अध्याय 102

श्लोक 18

अस्माकं शङ्किताः सर्वे जरासन्धवशानुगाः ।मोदन्ते सुखिनस्तत्र देवलोके यथामराः

asmākaṃ śaṅkitāḥ sarve jarāsandhavaśānugāḥ | modante sukhinastatra devaloke yathāmarāḥ

हिन्दी अर्थ

हमसे गड्रित हो वे सब-के-सब जरासंधके वशवर्ती हो गये हें और देवताओंकी भाँति वे जरासंधके यहाँ बड़े सुख भौर आनन्दसे रहते हैं'

अध्याय 102

श्लोक 19

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ।कृष्णस्नेहेन विकृतं बभाषे वचनामृतम्

tasya tad vacanaṃ śrutvā bhojarājo mahāyaśāḥ | kṛṣṇasnehena vikṛtaṃ babhāṣe vacanāmṛtam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी ह बात सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन उनके नेहसे गदूगद हुई अमृतमयी वाणीमें बोले

अध्याय 102

श्लोक 20

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ।श्रूयतां यदहं त्वद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन

kṛṣṇa kṛṣṇa mahābāho yadūnāṃ nandivarddhana | śrūyatāṃ yadahaṃ tvadya vakṣyāmi ripusūdana

हिन्दी अर्थ

कृष्ण ! कृष्ण ! ! महाबाहो ! !! तुम यादवोंका आनन्द बढ़ानेवाले गो । शत्रुसूदन ! इस समय मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, सको सुनो

अध्याय 102

श्लोक 21

त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ।पुरेऽस्मिन्विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः

tvayā vihīnāḥ sarve sma na śaktāḥ sukhamāsitum | pure'sminviṣayānte vā patihīnā iva striyaḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे बिना हम सब लोग इस नगर गा राज्यमें सुखसे नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह जैसे तिहीन स्त्रियाँ कहीं भी सुखसे नहीं रह पाती हैं

अध्याय 102

श्लोक 22

त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ।बिभीमो नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद

tvatsanāthā vayaṃ tāta tvadbāhubalamāśritāḥ | bibhīmo narendrāṇāṃ sendrāṇāmapi mānada

हिन्दी अर्थ

सरोंको मान देनेवाले तात ! तुमसे ही हमलोग सनाथ हैं । म्हारे बाहुबलका आश्रय लेकर हम नरेन्द्रोंकी तो बात ) कया है? देवेन्द्रसहित देवताओंसे भी नहीं डरते हैं

अध्याय 102

श्लोक 23

विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ।तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ

vijayāya yaduśreṣṭha yatra yatra gamiṣyasi | tatra tvaṃ sahito'smābhirgacchethā yādavarṣabha

हिन्दी अर्थ

दुन्नेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ भी ाओ, वहाँ हम लोगोंके साथ ही चलो '

अध्याय 102

श्लोक 24

तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ।यथेष्टं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम्

tasya rājño vacaḥ śrutvā sasmitaṃ devakīsutaḥ | yatheṣṭaṃ bhavatāmadya tathā kartāsmyasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

राजा ग्रसेनकी यह बात सुनकर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण मुस्कुराते ए बोले-' महाराज! आप लोगोंकी जैसी इच्छा होगी, सा ही मैं करूँगा, इसमें संशय नहीं है'

अध्याय 102

श्लोक 25

एवमुक्त्वा तु वै कृष्णो जगामाशु रथेन वै ।भीष्मकस्य गृहं प्राप्तो लोहितायति भास्करे

evamuktvā tu vai kṛṣṇo jagāmāśu rathena vai | bhīṣmakasya gṛhaṃ prāpto lohitāyati bhāskare

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा हकर श्रीकृष्ण शीघ्र ही रथसे चल दिये और सूर्यका ा लाल होते राजा भीष्मकके घरपर जा पहुँचे

अध्याय 102

श्लोक 26

प्राप्ते राजसमाजे तु शिबिराकीर्णभूतले ।रङ्गं सुविपुलं दृष्ट्वा राजसीं तनुमाविशत्

prāpte rājasamāje tu śibirākīrṇabhūtale | raṅgaṃ suvipulaṃ dṛṣṭvā rājasīṃ tanumāviśat

हिन्दी अर्थ

राजाओंका समाज आ चुका था। उनके शिबिरोंसे कुण्डिनपुरके आस-पासका भूभाग आच्छादित हो गया था। स्वयंवरका रज़स्थल भी बहुत विस्तृत था। उसे देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने राजस प्रकृतिका आश्रय लिया

अध्याय 102

श्लोक 27

वित्रासनार्थं भूपानां प्रकाशार्थं पुरातनम् ।मनसा चिन्तयामास वैनतेयं महाबलम्

vitrāsanārthaṃ bhūpānāṃ prakāśārthaṃ purātanam | manasā cintayāmāsa vainateyaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

उन्होंने राजाओंको डराने और अपने प्रभावको प्रकाशित करनेके लिये पुरातन वाहन महाबली विनता- नन्दन गरुड़का मन-ही-मन चिन्तन किया

अध्याय 102

श्लोक 28

ततश्चिन्तितमात्रस्तु विदित्वा विनतात्मजः ।सुखलक्ष्यँ वपुः कृत्वा निलिल्ये केशवान्तिके

tataścintitamātrastu viditvā vinatātmajaḥ | sukhalakṣya~ vapuḥ kṛtvā nililye keśavāntike

हिन्दी अर्थ

उनके चिन्तन करनेमात्रसे ही उनके मनोभावको जानकर विनता- कुमार गरुड़ सुखपूर्वक देखने योग्य सौम्य शरीर धारण करके श्रीकृष्णके पास छिपे हुए आये

अध्याय 102

श्लोक 29

तस्य पक्षनिपातेन पवनोद्भ्रान्तकारिणा ।कम्पिता मनुजाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि

tasya pakṣanipātena pavanodbhrāntakāriṇā | kampitā manujāḥ sarve nyubjāśca patitā bhuvi

हिन्दी अर्थ

उनका पंखसंचालन वायुको भी उद्भ्रान्त कर देनेवाला था। इसकी हवा लगनेसे वहाँके सारे मनुष्य काँप उठे और औंधे होकर पृथ्वीपर गिर पड़े

अध्याय 102

श्लोक 30

गरुडाभिहताः सर्वे प्रचेष्टन्तो यथोरगाः ।तान् सन्निपतितान् दृष्ट्वा कृष्णो गिरिरिवाचलः

garuḍābhihatāḥ sarve praceṣṭanto yathoragāḥ | tān sannipatitān dṛṣṭvā kṛṣṇo giririvācalaḥ

श्लोक 30–36 का हिन्दी अर्थ

गरुड़के वेगसे आहत होकर पृथ्वीपर गिरे हुए वे सारे मनुष्य सर्पोंके समान छटपटाने लगे। उन सबको गिरा हुआ देख पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए श्रीकृष्णने उस समय पंखकी हवासे ही अनुमान कर लिया कि पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ आ गये। (फिर उन्होंने मन-ही-मन उनका आदर किया) थोड़ी देरमें ही उन्होंने देखा, गरुड़ आ पहुँचे । वे दिव्य पुष्पोंके हार और दिव्य चन्दनसे अलंकृत थे। वे अपने पंखोंके संचालनसे उठी हुई वायुके द्वारा पृथ्वीको भी बारम्बार हिला देते थे। उनके पृष्ठभागमें कुछ दिव्य आयुध सटे हुए थे, जिनसे ऐसा जान पड़ता था कि कुछ सर्प उन्हें चाट रहे हैं। वे मुँह नीचे किये मन-ही-मन अनुभव कर रहे थे कि मुझे भगवान्‌ विष्णुके वरद हस्तका स्पर्श प्राप्त हो रहा है। गरुड़ अपने दोनों पंजोंसे एक विशाल सर्पको खींचे चले आ रहे थे, जिसका रंग श्वेत था। वे सुवर्णमय पंखोंसे सम्पन्न होनेके कारण विविध धातुओंसे युक्त पर्वतके समान प्रतीत होते थे। ये वे ही गरुड़ थे, जिन्होंने एक बार अमृतका अपहरण कर लिया था। वे बड़े-बड़े सर्पराजोंका विनाश करनेमें समर्थ, दैत्यसमूहोंको भयभीत करनेवाले तथा भगवान्‌ विष्णुके ध्वजचिह्न एवं वाहन थे। अपने ध्वज, सचिव तथा संकटकालके साथी धैर्यवान्‌ गरुड़को आया देख भगवान्‌ मधुसूदनको बड़ा हर्ष हुआ। वे दूसरे देवताकी भाँति सामने खड़े थे। इस प्रकार सम्मुख उपस्थित हुए गरुड़से अपने समान शक्तिशालिनी वाणीद्वारा मधुसूदनने इस प्रकार कहा

अध्याय 102

श्लोक 31

स तदा पक्षवातेन मेने पतगसत्तमम् ।ददर्श गरुडं प्राप्तं दिव्यस्रगनुलेपनम्

sa tadā pakṣavātena mene patagasattamam | dadarśa garuḍaṃ prāptaṃ divyasraganulepanam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 32

पक्षवातेन पृथिवीं चालयन्तं मुहुर्मुहुः ।पृष्ठासक्तैः प्रहरणैर्लेलिह्यन्तमिवोरगैः

pakṣavātena pṛthivīṃ cālayantaṃ muhurmuhuḥ | pṛṣṭhāsaktaiḥ praharaṇairlelihyantamivoragaiḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 33

वैष्णवं हस्तसंश्लेषं मन्यमानमवाङ्मुखम् ।चरणाभ्यां प्रकर्षन्तं पाण्डुरं भोगिनां वरम्

vaiṣṇavaṃ hastasaṃśleṣaṃ manyamānamavāṅmukham | caraṇābhyāṃ prakarṣantaṃ pāṇḍuraṃ bhogināṃ varam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 34

हेमपत्रैरुपचितं धातुमन्तमिवाचलम् ।अमृतारम्भहर्तारं द्विजिह्वेन्द्रविनाशनम्

hemapatrairupacitaṃ dhātumantamivācalam | amṛtārambhahartāraṃ dvijihvendravināśanam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 35

त्रासनं दैत्यसङ्घानां वाहनं ध्वजलक्षणम् ।तं दृष्ट्वा स ध्वजं प्राप्तं सचिवं साम्परायिकम्

trāsanaṃ daityasaṅghānāṃ vāhanaṃ dhvajalakṣaṇam | taṃ dṛṣṭvā sa dhvajaṃ prāptaṃ sacivaṃ sāmparāyikam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 36

धृतिमन्तं गरुत्मन्तं जगाद मधुसूदनः ।दृष्ट्वा परमसंहृष्टः स्थितं देवमिवापरम् ।तुल्यसामर्थ्यया वाचा गरुत्मन्तमवस्थितम्

dhṛtimantaṃ garutmantaṃ jagāda madhusūdanaḥ | dṛṣṭvā paramasaṃhṛṣṭaḥ sthitaṃ devamivāparam | tulyasāmarthyayā vācā garutmantamavasthitam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 37

स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन ।विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय

svāgataṃ khecaraśreṣṭha surasenārimardana | vinatāhṛdayānanda svāgataṃ keśavapriya

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले—आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ गरुड़! तुम्हारा स्वागत है । देवसेनाके शत्रुओंका मर्दन करनेवाले क्रेशवप्रिय विनतानन्दन ! तुम्हारा स्वागत है

अध्याय 102

श्लोक 38

व्रज पत्ररथश्रेष्ठ कैशिकस्य निवेशनम् ।वयं तत्रैव गत्वाद्य प्रतीक्षाम स्वयंवरम्

vraja patrarathaśreṣṭha kaiśikasya niveśanam | vayaṃ tatraiva gatvādya pratīkṣāma svayaṃvaram

हिन्दी अर्थ

पंख ही जिनका रथ है, उन पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ गरुड़ ! तुम जा कैशिकके* भवनमें चलो । हम आज वहीं चलकर प्वयंवरकी प्रतीक्षा करें

अध्याय 102

श्लोक 39

राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम् ।द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र समेतानां महात्मनाम्

rājñāṃ tatra sametānāṃ hastyaśvarathagāminām | drakṣyāmaḥ śataśastatra sametānāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

वहाँ हाथी, घोड़े और ्थोंद्वारा यात्रा करनेवाले सैकड़ों महामनस्वी नरेश एकत्र हुए हैं, जिनका दर्शन प्राप्त होगा

अध्याय 102

श्लोक 40

एवमुक्त्वा महाबाहुर्वैनतेयं महाबलम् ।जगामाथ पुरीं कृष्णः कैशिकस्य महात्मनः

evamuktvā mahābāhurvainateyaṃ mahābalam | jagāmātha purīṃ kṛṣṇaḥ kaiśikasya mahātmanaḥ

श्लोक 40–42 का हिन्दी अर्थ

महाबली विनतानन्दन गरुड़से ऐसा कहकर महाबाहु श्रीमान्‌ कृष्ण गरुड़ तथा महारथी यादवोंके साथ महामना कैशिककी राजधानी कुण्डिनपुरमें गये। देवकीनन्दन श्रीकृष्णके विदर्भनगरमें पहुँच जानेपर उनके साथके सब तोग बड़े प्रसन्न हुए। सबके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे समस्त बलशाली तथा अस्त्र-शस्त्रधारी राजपूत वहाँ उहरनेकी तैयारी करने लगे

अध्याय 102

श्लोक 41

वैनतेयसखः श्रीमान् यादवैश्च महारथैः ।विदर्भनगरीं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने

vainateyasakhaḥ śrīmān yādavaiśca mahārathaiḥ | vidarbhanagarīṃ prāpte kṛṣṇe devakinandane

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 42

हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे निवासायोपचक्रमुः ।सर्वे शस्त्रायुधधरा राजानो बलशालिनः

hṛṣṭāḥ pramuditāḥ sarve nivāsāyopacakramuḥ | sarve śastrāyudhadharā rājāno balaśālinaḥ

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 43

एतस्मिन्नेव काले तु राजा नयविशारदः ।कैशिकस्तत उत्थाय प्रहृष्टेनान्तरात्मना

etasminneva kāle tu rājā nayaviśāradaḥ | kaiśikastata utthāya prahṛṣṭenāntarātmanā

श्लोक 43–44 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय ीतिविशारद राजा कैशिक प्रसन्नचित्तसे उठकर स्वयं डी श्रीकृष्णके पास गये और उन्हें अर्घ्य, आचमन भादि देकर विधिपूर्वक सत्कार करके अपने नगरमें ने आये

अध्याय 102

श्लोक 44

अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा स राजा कैशिकः स्वयम् ।सत्कृत्य विधिवत् कृष्णं स्वपुरं सम्प्रवेशयत्

arghyamācamanaṃ dattvā sa rājā kaiśikaḥ svayam | satkṛtya vidhivat kṛṣṇaṃ svapuraṃ sampraveśayat

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 102

श्लोक 45

पूर्वमेव तु कृष्णाय कारितं दिव्यमन्दिरम् ।विवेश सबलः श्रीमान् कैलासं शङ्करो यथा

pūrvameva tu kṛṣṇāya kāritaṃ divyamandiram | viveśa sabalaḥ śrīmān kailāsaṃ śaṅkaro yathā

हिन्दी अर्थ

उन्होंने श्रीकृष्णके लिये पहले री एक दिव्य भवनका निर्माण करा रखा था। जैसे गगवान्‌ शंकर कैलासधाममें जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमान्‌ रष्णने अपनी सेनाके साथ कैशिकके उस भवनमें वेश किया

अध्याय 102

श्लोक 46

खाद्यपानादिरत्नौघैरर्चितो वासवानुजः ।सुखेन उषितः कृष्णस्तस्य राज्ञो निवेशने ।पूजितौ बहुमानेन स्नेहपूर्णेन चेतसा

khādyapānādiratnaughairarcito vāsavānujaḥ | sukhena uṣitaḥ kṛṣṇastasya rājño niveśane | pūjitau bahumānena snehapūrṇena cetasā

हिन्दी अर्थ

इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण उस जमहलमें खान-पान आदिसे एवं रत्-राशियोंद्वारा भलीभाँति [जित हो सुखपूर्वक रहने लगे। राजा कैशिकने बड़े ही सम्मानके साथ स्नेहपूर्ण हदयसे उनका पूजन किया पा

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.