Harivamsha Purana
106
अध्याय 106 / 318

Parva 2, Adhyāya 51

72 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ72 श्लोक

अध्याय 106

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य भीष्मकेण सह संवादः, भीष्मकेण कृष्णस्य स्तुतिः, कृष्णस्य मथुरागमनं पुत्रो मे बाल भावेन भगिनीं दातुमिच्छति ।स्वयंवरे नरेन्द्राणां न चाहं दातुमुत्सहे

śrīkṛṣṇasya bhīṣmakeṇa saha saṃvādaḥ, bhīṣmakeṇa kṛṣṇasya stutiḥ, kṛṣṇasya mathurāgamanaṃ putro me bāla bhāvena bhaginīṃ dātumicchati | svayaṃvare narendrāṇāṃ na cāhaṃ dātumutsahe

हिन्दी अर्थ

पमो$ध्याय: स्सस्स्‍्स्‍स्‍सससााा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका मथुरागमन भीष्मकने कहा—भगवन्‌ ! मेरा पुत्र रुकमी अपने बालचापल्य या अविवेकके कारण अपनी बहिनको नरेन्द्रोंकें समक्ष स्वयंवरमें देना चाहता है; परंतु मेरी इच्छा उसे स्वयंवरमें देनेकी नहीं है

अध्याय 106

श्लोक 2

अतीव बालभावत्वाद् दातुमिच्छेन्मतिर्मम ।एका ह्येकं समालोक्य वरयिष्यति मे मतिः

atīva bālabhāvatvād dātumicchenmatirmama | ekā hyekaṃ samālokya varayiṣyati me matiḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त बचपन या मूर्खताके कारण ही वह अपनी बहिनको स्वयंवरमें देना चाहता है, ऐसा मेरा विश्वास है। मेरी राय तो यही है कि वह अकेली एकमात्र मनोनीत पतिका वरण करे

अध्याय 106

श्लोक 3

अतः प्रसादयिष्ये त्वां पुत्रदुर्नयहेतुना ।प्रसादं कुरु देवेश क्षन्तुमर्हसि मे प्रभो

ataḥ prasādayiṣye tvāṃ putradurnayahetunā | prasādaṃ kuru deveśa kṣantumarhasi me prabho

हिन्दी अर्थ

अतः प्रभो! मैं अपने पुत्रकी दुर्नीतिके कारण (अपनेको अपराधी मानकर) आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। देवेश्वर ! आप मुझपर कृपा बनाये रखें और मेरे अपराधको क्षमा कर दें

अध्याय 106

श्लोक 4

बालभावेन पुत्रेण चालितं नृपमण्डलम् ।यदा भवति वै प्रौढः कीदृशोऽविनयो भवेत्

bālabhāvena putreṇa cālitaṃ nṛpamaṇḍalam | yadā bhavati vai prauḍhaḥ kīdṛśo'vinayo bhavet

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले—राजन्‌! आपके पुत्रने बाल्यावस्थामें ही समस्त नरेश-मण्डलमें हलचल मचा दी है; फिर जब वह प्रौढ़ होगा, तब न जाने उसकी उद्दण्डता कैसी हो जायगी ?

अध्याय 106

श्लोक 5

सूर्येन्दुसदृशाँल्लोकांस्तपसोपार्जितश्रियः ।लोकेऽस्मिन् नरदेवानां महाकुलसमुद्भवान्

sūryendusadṛśā~llokāṃstapasopārjitaśriyaḥ | loke'smin naradevānāṃ mahākulasamudbhavān

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

जो एक राजाके सामने भी मोहवश झूठ बोलता है, वह राजाओंको मिलनेवाले सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा तपस्यासे श्रीसम्पन्न हुए लोकोंको, जो उसे महान्‌ कुलमें उत्पन्न होनेके कारण सुगमतापूर्वक किये गये बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा प्राप्त हुए हैं, यम-यातनाकी आगसे दग्ध कर देता है और उन लोकोंमेंसे ही एक जो यह लोक है, इसमें भी वह रह नहीं पाता है

अध्याय 106

श्लोक 6

एकस्यापि नृपस्याग्रे मोहाद् यो वितथं वदेत् ।न स तिष्ठति लोकेऽस्मिन्निर्दहेद्दण्डवह्निना

ekasyāpi nṛpasyāgre mohād yo vitathaṃ vadet | na sa tiṣṭhati loke'sminnirdaheddaṇḍavahninā

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 7

एष धर्मो नरेन्द्राणामिति ते विदितं प्रभो ।लोकधर्मं पुरस्कृत्य पुरा गीतं स्वयम्भुवा

eṣa dharmo narendrāṇāmiti te viditaṃ prabho | lokadharmaṃ puraskṛtya purā gītaṃ svayambhuvā

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! यह (सत्यभाषण) नरेशोंका धर्म है। इस बातको आप भी जानते ही होंगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीने पूर्वकालमें लोकधर्मको सामने रखते हुए सत्यके ही महत्त्वका मान किया है

अध्याय 106

श्लोक 8

कथं तव सुतस्तेषामग्रतो मनुजेश्वर ।वक्तुमर्हति राजेन्द्र वितथं राजसंसदि

kathaṃ tava sutasteṣāmagrato manujeśvara | vaktumarhati rājendra vitathaṃ rājasaṃsadi

हिन्दी अर्थ

मनुजेश्वर! राजेन्द्र ! ऐसी दशामें आपका पुत्र राजसभामें उन राजाओंके आगे झूठ कैसे बोल सकता है? (जिसमें आपकी सम्मति नहीं होगी, उसकी घोषणा वह कैसे कर सकता है)

अध्याय 106

श्लोक 9

तादृशं रङ्गमतुलं कारयंस्तनयस्तव ।कथं त्वया ह्यविज्ञात इति मे संशयो महान्

tādṛśaṃ raṅgamatulaṃ kārayaṃstanayastava | kathaṃ tvayā hyavijñāta iti me saṃśayo mahān

हिन्दी अर्थ

आपका पुत्र जब वैसा अनुपम रंगस्थल बनवा रहा था, तब आप उसकी उस चेष्टासे किस तरह अनजान रह गये? यह मेरे मनमें महान्‌ संशय है

अध्याय 106

श्लोक 10

आगतानां नरेन्द्राणामनलार्केन्दुवर्चसाम् ।यथार्हेण तु सम्पूज्य आतिथ्यं कृतवानसि

āgatānāṃ narendrāṇāmanalārkenduvarcasām | yathārheṇa tu sampūjya ātithyaṃ kṛtavānasi

हिन्दी अर्थ

अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ नरेश यहाँ पधारे हैं और आपने उन सबका यथायोग्य पूजन करके आतिथ्य- सत्कार किया है। (फिर आप इन बातोंसे अपनेको अपरिचित कैसे बता रहे हैं)

अध्याय 106

श्लोक 11

रथाश्वनरनागानां विमर्दमतुलं तथा ।कथं न ज्ञातवान् राजंस्तव पुत्रस्य चेष्टितम्

rathāśvanaranāgānāṃ vimardamatulaṃ tathā | kathaṃ na jñātavān rājaṃstava putrasya ceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकोंसे भरी ुई चतुरज्ञिंणी सेनाका जो अनुपम संहार हुआ है, वह पब आपके पुत्रकी कुचेष्टाका ही फल है, इस बातकी नानकारी आपको कैसे नहीं हुई ?

अध्याय 106

श्लोक 12

विषादो न भवेदत्र चतुरङ्गबलागमे ।कथं न ज्ञायते राजन्निति मे बुद्धिसंशयः

viṣādo na bhavedatra caturaṅgabalāgame | kathaṃ na jñāyate rājanniti me buddhisaṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! जब हाँ चतुरज्ञिंणी सेनाका जमाव होगा, तब क्या कोई बरेदजनक घटना नहीं घटित होगी—यह बात आपकी ममझमें कैसे नहीं आ रही है। यह मेरी बुद्धिमें संशय त्पनन हो गया है

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श्लोक 13

ममागमनमेवेह प्रायेण न हितं तव ।अतो न कृतमातिथ्यमपात्राय नरेश्वर

mamāgamanameveha prāyeṇa na hitaṃ tava | ato na kṛtamātithyamapātrāya nareśvara

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! मेरा यहाँ आगमन ही ाय: आपके लिये हितकर नहीं है—ऐसा समझकर ही मापने मुझ अपात्रका आतिथ्य-सत्कार नहीं किया

अध्याय 106

श्लोक 14

पात्रेभ्यो दीयतां कन्या मामपास्य नरेश्वर ।ममागमनदोषेण कथं कन्यां न दास्यसे

pātrebhyo dīyatāṃ kanyā māmapāsya nareśvara | mamāgamanadoṣeṇa kathaṃ kanyāṃ na dāsyase

हिन्दी अर्थ

जजन्‌ ! मुझे छोड़कर आप इन सुपात्र राजाओंको अपनी नया दीजिये। मेरे आ जानेके दोषसे आप अपनी नन्याका दान कैसे नहीं करेंगे

अध्याय 106

श्लोक 15

कन्याविघ्नं च कुर्वाणो नरके परिपच्यते ।इति धर्मविदैर्गीतं मन्वादिभिर्नरोत्तमैः

kanyāvighnaṃ ca kurvāṇo narake paripacyate | iti dharmavidairgītaṃ manvādibhirnarottamaiḥ

हिन्दी अर्थ

कन्याके विवाहमें तघ्न डालनेवाला मनुष्य नरककी आगमें पकाया जाता -ऐसा मनु आदि धर्मज्ञ नरेशोंने कहा है

अध्याय 106

श्लोक 16

अतोऽर्थं न प्रविष्टोऽहं रङ्गमध्ये विशाम्पते ।विदित्वा न कृतातिथ्यं नरदेव तवालयम्

ato'rthaṃ na praviṣṭo'haṃ raṅgamadhye viśāmpate | viditvā na kṛtātithyaṃ naradeva tavālayam

हिन्दी अर्थ

जानाथ! इसलिये मैं रज़भूमिमें नहीं आया हूँ, नरदेव ! झे पहले ही ज्ञात हो गया था कि आपका घर आतिथ्य- न है

अध्याय 106

श्लोक 17

ह्रियाभिभूतो राजेन्द्र पार्थिवोऽहं नराधिप ।विदर्भनगरे राजन् बलविश्रामहेतुना

hriyābhibhūto rājendra pārthivo'haṃ narādhipa | vidarbhanagare rājan balaviśrāmahetunā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! नरेश्वर! मैंने विदर्भ नगरमें तरश्रामके लिये जो अपनी सेनाको ठहरा दिया—इसके गरण राजेन्द्रोंका राजा होकर भी मैं लज्जासे गड़ गया (क्योंकि यदि मैंने यहाँ विश्राम न किया होता तो मुझे पपके द्वारा सत्कृत न होनेका अपमान नहीं सहना ड़ता)

अध्याय 106

श्लोक 18

आवाभ्यां कृतमातिथ्यं कैशिकस्तु प्रियातिथिः ।उषितौ च यथा स्वर्गे पुरा गरुडकेशवौ

āvābhyāṃ kṛtamātithyaṃ kaiśikastu priyātithiḥ | uṣitau ca yathā svarge purā garuḍakeśavau

हिन्दी अर्थ

इतनेपर भी मैंने और गरुड़ने पूरा-पूरा ततिथ्य-सत्कार प्राप्त किया है; क्योंकि राजा कैशिकको तिथि प्रिय है। हम दोनों यहाँ उसी तरह सुखसे रहे , जैसे पहले वैकुण्ठधाममें रहा करते थे

अध्याय 106

श्लोक 19

एवमेव ब्रुवाणं तु कृष्णं वाग्वज्रचोदितम् ।श्लक्ष्णवाचाम्बुनाऽऽसिच्य शमितोऽग्निरिव ज्वलन्

evameva bruvāṇaṃ tu kṛṣṇaṃ vāgvajracoditam | ślakṣṇavācāmbunā''sicya śamito'gniriva jvalan

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसी ही तें कहकर जिन्होंने वाग्वज़रका प्रहार किया था, उन्हीं गवान्‌ श्रीकृष्णको, जो अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे , राजा भीष्मकने अपनी मधुर वाणीरूप जलसे सींचकर न्त किया

अध्याय 106

श्लोक 20

प्रसीद देवलोकेश पाहि मां लोकशासन ।अज्ञानतमसाविष्टं ज्ञानचक्षुःप्रदो भव

prasīda devalokeśa pāhi māṃ lokaśāsana | ajñānatamasāviṣṭaṃ jñānacakṣuḥprado bhava

हिन्दी अर्थ

भीष्मक बोले—देवलोकेश्वर! आप मुझपर प्न्न हों, लोकशासक परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। अज्ञानरूपी अन्धकारसे घिरा हुआ हूँ, आप मुझे नरूपी नेत्र प्रदान करें

अध्याय 106

श्लोक 21

मानुष्ये मांसचक्षुष्ट्वादसम्यग्विदिता वयम् ।न प्रसिद्ध्यन्ति कर्माणि क्रियतामविचारणात्

mānuṣye māṃsacakṣuṣṭvādasamyagviditā vayam | na prasiddhyanti karmāṇi kriyatāmavicāraṇāt

हिन्दी अर्थ

मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर सपिण्डपर ही दृष्टि रखनेके कारण अथवा केवल भूलदर्शी होनेके कारण हम सम्यग्‌ ज्ञानसे वज्चित हैं हमारी बुद्धि उलटी हो गयी है) । अत: अविचारपूर्वक म॑ करनेके कारण हमारे कार्य सिद्ध नहीं हो पाते

अध्याय 106

श्लोक 22

भवन्तं शरणं प्राप्य देवानामपि दैवतम् ।सम्यग् भवतु मे दृष्टिः सम्पश्यन्तु च मे क्रियाः

bhavantaṃ śaraṇaṃ prāpya devānāmapi daivatam | samyag bhavatu me dṛṣṭiḥ sampaśyantu ca me kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

पर्दे आप देवताओंके भी देवता हैं। आपकी शरणमें आकर मेरी दृष्टि उत्तम हो जाय और मेरे सारे कर्म ठीक ढंगसे सम्पन्न हों

अध्याय 106

श्लोक 23

अनिष्पन्नामपि क्रियां नयोपेतां विचक्षणाः ।फलदां हि प्रकुर्वन्ति महासेनापतिर्यथा

aniṣpannāmapi kriyāṃ nayopetāṃ vicakṣaṇāḥ | phaladāṃ hi prakurvanti mahāsenāpatiryathā

हिन्दी अर्थ

जैसे प्रधान सेनापति अयोग्य सेनाका भी नीतिपूर्वक सश्लालनकर उसे सफल बना देता है, उसी तरह विद्वान्‌ पुरुष असम्पन्‍न कर्मको भी यदि वह न्याययुक्त है तो फलदायक बना देते हैं

अध्याय 106

श्लोक 24

भवन्तं शरणं प्राप्य नाति बाधति मे भयम् ।यन्मया चिन्तितं कार्य तद् भवाञ्छ्रोतुमर्हति

bhavantaṃ śaraṇaṃ prāpya nāti bādhati me bhayam | yanmayā cintitaṃ kārya tad bhavāñchrotumarhati

हिन्दी अर्थ

आपकी शरणमें आ जानेके कारण अब मुझे किसी प्रकारका भय नहीं सता रहा है। मैंने जो कार्य सोचा है, उसे आप सुननेकी कृपा करें

अध्याय 106

श्लोक 25

न दातुमिच्छे कन्यां वै पार्थिवेभ्यः स्वयंवरे ।प्रसादं कुरु देवेश न कोपं कर्तुमर्हसि

na dātumicche kanyāṃ vai pārthivebhyaḥ svayaṃvare | prasādaṃ kuru deveśa na kopaṃ kartumarhasi

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर ! मैं स्वयंवरमें आये हुए राजाओंको अपनी कन्या नहीं देना चाहता। आप मुझपर कृपा करें, क्रोध न करें

अध्याय 106

श्लोक 26

वचनेन किमुक्तेन त्वया राजन् महामते ।स्वकन्यां दास्यसे नेति कोऽत्र नेता तवानघ

vacanena kimuktena tvayā rājan mahāmate | svakanyāṃ dāsyase neti ko'tra netā tavānagha

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले—महामते नरेश्र! आप केवल बातें बनाते हैं। इससे कया होगा? अनघ! आप अपनी कन्या किसीको देंगे या नहीं—इस विषयमें आपको रोकनेवाला कौन है?

अध्याय 106

श्लोक 27

मा देहीति न चाख्येयं ददस्वेति न मे वचः ।रुक्मिण्या दिव्यमूर्तित्वं सम्बन्धे कारणं मम

mā dehīti na cākhyeyaṃ dadasveti na me vacaḥ | rukmiṇyā divyamūrtitvaṃ sambandhe kāraṇaṃ mama

हिन्दी अर्थ

आप दूसरेको कन्या न दीजिये, मुझे ही दीजिये' यह दोनों प्रकारकी बातें मुझे नहीं कहनी चाहिये। रुक्मिणी दिव्यरूपधारिणी देवी है, उसकी यह दिव्यता ही उसके साथ मेरे भावी सम्बन्धमें कारण है

अध्याय 106

श्लोक 28

मेरुकूटे पुरा देवैः कृतमंशावतारणम् ।तदा निसृष्टा श्रीः पूर्वं गच्छ त्वं पतिना सह

merukūṭe purā devaiḥ kṛtamaṃśāvatāraṇam | tadā nisṛṣṭā śrīḥ pūrvaṃ gaccha tvaṃ patinā saha

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें मेरुपर्वतके शिखरपर एकत्र हुए देवताओंने अपने-अपने अंशको भूतलपर उतारा था। उस समय ब्रह्माजीने लक्ष्मीसे कहा- 'देवि! तुम भी अपने पतिके साथ जाओ और मनुष्यलोकमें कुण्डिनपुरके भीतर राजा भीष्मककी रानीके गर्भसे जन्म लो। विपुलश्रोणि! इन्द्रपर कृपा करके तुम्हें ऐसा करना चाहिये

अध्याय 106

श्लोक 29

मानुष्ये कुण्डिनगरे भीष्मकस्याङ्गनोदरे ।जायस्व विपुलश्रोणि प्रत्यवेक्ष्य च वासवम्

mānuṣye kuṇḍinagare bhīṣmakasyāṅganodare | jāyasva vipulaśroṇi pratyavekṣya ca vāsavam

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 30

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि राजन्नकृतकं वचः ।श्रुत्वा स्वयं विनिश्चित्य यद्युक्तं तत्करिष्यति

tenāhaṃ vaḥ pravakṣyāmi rājannakṛtakaṃ vacaḥ | śrutvā svayaṃ viniścitya yadyuktaṃ tatkariṣyati

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! इसीलिये मैं आपसे स्वाभाविक बात कह रहा हूँ, इसमें कहीं कृत्रिमता या बनावट नहीं है। इस बातकों सुनकर आपकी कन्या रुक्मिणी स्वयं ही अपने कर्तव्यका निश्चय करके जो उचित समझेगी, वह करेगी; क्योंकि वह साधारण स्त्री नहीं है, यह साक्षात्‌ लक्ष्मी है और किसी कारणवश ब्रह्माजीके कहनेसे यहाँ प्रकट हुई है

अध्याय 106

श्लोक 31

रुक्मिणी नाम ते कन्या न सा प्राकृतमानुषी ।श्रीरेषा ब्रह्मवाक्येन जाता केनापि हेतुना

rukmiṇī nāma te kanyā na sā prākṛtamānuṣī | śrīreṣā brahmavākyena jātā kenāpi hetunā

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 32

न च सा मनुजेन्द्राणां स्वयंवरविधिक्षमा ।एका त्वेकाय दातव्या इति धर्मो व्यवस्थितः

na ca sā manujendrāṇāṃ svayaṃvaravidhikṣamā | ekā tvekāya dātavyā iti dharmo vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

वह नरेन्द्रोंकें सामने स्वयंवरविधिका पालन करनेयोग्य नहीं है। एक कन्याको एक ही वरके हाथमें देना चाहिये-यही सिद्धान्तभूत सुस्थिर धर्म है

अध्याय 106

श्लोक 33

न च तां शक्यसे राजँल्लक्ष्मीं दातुं स्वयंवरे ।सदृशं वरमालोक्य दातुमर्हसि धर्मतः

na ca tāṃ śakyase rāja~llakṣmīṃ dātuṃ svayaṃvare | sadṛśaṃ varamālokya dātumarhasi dharmataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! आप उस लक्ष्मीको स्वयंवरमें नहीं दे सकते। किसी योग्य वरको देखकर धर्मपूर्वक उसके हाथमें उसका दान कर देना ही आपके लिये उचित है

अध्याय 106

श्लोक 34

अतोऽर्थं वैनतेयोऽयं विघ्नकारणहेतुना ।आगतः कुण्डिनगरे देवराजेन चोदितः

ato'rthaṃ vainateyo'yaṃ vighnakāraṇahetunā | āgataḥ kuṇḍinagare devarājena coditaḥ

हिन्दी अर्थ

इसीलिये देवराज इन्द्रसे प्रेरित होकर यह विनतानन्दन रुड़ इस स्वयंवरमें विघ्न डालने-हेतु कुण्डिनपुरमें पधारे

अध्याय 106

श्लोक 35

अहं चैवागतो राज्ञां द्रष्टुकामो महोत्सवम् ।तां च कन्यां वरारोहां पद्मेन रहितां श्रियम्

ahaṃ caivāgato rājñāṃ draṣṭukāmo mahotsavam | tāṃ ca kanyāṃ varārohāṃ padmena rahitāṃ śriyam

हिन्दी अर्थ

मैं राजाओंके इस महान्‌ उत्सबको तथा बिना मलकी लक्ष्मीरूपा इस परम सुन्दरी राजकन्याको खनेकी इच्छासे यहाँ आया था

अध्याय 106

श्लोक 36

क्षन्तव्यमिति यत् प्रोक्तं त्वया राजन् ममाग्रतः ।युक्तिपूर्वमहं मन्ये कलुषाय न पार्थिव

kṣantavyamiti yat proktaṃ tvayā rājan mamāgrataḥ | yuktipūrvamahaṃ manye kaluṣāya na pārthiva

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! पृथ्वीनाथ ! मापने जो मेरे सामने यह बात कही कि मेरा अपराध पमा करना चाहिये,सो ठीक है। मैं इसे युक्तिसंगत गनता हूँ। इसमें दुर्भावका कोई कारण नहीं है

अध्याय 106

श्लोक 37

पूर्वमेव मयाऽऽख्यातं येनास्मि विषये तव ।आगतः सौम्यरूपेण तेनैव क्षान्तवान् विभो

pūrvameva mayā''khyātaṃ yenāsmi viṣaye tava | āgataḥ saumyarūpeṇa tenaiva kṣāntavān vibho

हिन्दी अर्थ

त्रभो! इस विषयमें तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि पापके राज्यमें सौम्यरूपसे आया हूँ (विरोधीरूपसे नहीं) । सीसे आपको समझ लेना चाहिये कि मैंने क्षमा कर है

अध्याय 106

श्लोक 38

क्षान्तेषु गुणबाहुल्यं दोषापहरणं क्षमा ।कथमस्मद्विधे राजन् कलुषो वसते हृदि

kṣānteṣu guṇabāhulyaṃ doṣāpaharaṇaṃ kṣamā | kathamasmadvidhe rājan kaluṣo vasate hṛdi

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! क्षमाशील पुरुषोंमें बहुत-से गुण कट होते हैं । क्षमा सब दोषोंको हर लेनेवाली है। मुझ- से पुरुषके हृदयमें दुर्भाव कैसे रह सकता है

अध्याय 106

श्लोक 39

कुलजे सत्त्वसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि ।भवादृशे कथं राजन् कलुषो भुवि वर्तते

kulaje sattvasampanne dharmajñe satyavādini | bhavādṛśe kathaṃ rājan kaluṣo bhuvi vartate

हिन्दी अर्थ

रेश्वर ! आप भी कुलीन, सत्त्वगुण-सम्पन्न, धर्मज्ञ और त्यवादी हैं । इस भूतलपर आप-जैसे पुरुषके हृदयमें लुषभाव कैसे टिक सकता है

अध्याय 106

श्लोक 40

क्षान्तोऽयमिति मन्तव्यं मम सेनासहागतम् ।न चाहं सेनया सार्द्धं यास्यामि रिपुवाहिनीम्

kṣānto'yamiti mantavyaṃ mama senāsahāgatam | na cāhaṃ senayā sārddhaṃ yāsyāmi ripuvāhinīm

हिन्दी अर्थ

मैं सेनाके ाथ यहाँ आया हूँ, इसलिये आपको यहीं मानना चाहिये के ये क्षमाशील हैं; क्योंकि मैं शत्रुओंकी सेनामें अपनी ना साथ लेकर नहीं जाता हूँ

अध्याय 106

श्लोक 41

अक्षान्तश्चारिसेनायां यास्यामि द्विजवाहने ।स्थितः सोमार्कसङ्काशान्यायुधानि करैर्वहन्

akṣāntaścārisenāyāṃ yāsyāmi dvijavāhane | sthitaḥ somārkasaṅkāśānyāyudhāni karairvahan

हिन्दी अर्थ

जब मैं असहिष्णु कर शत्रु-सेनापर आक्रमण करता हूँ, तब गरुड़पर ठता हूँ और अपने हाथोंमें चन्द्रमा तथा सूर्यके समान [मकीले अस्त्र-शस्त्र धारण करता हूँ

अध्याय 106

श्लोक 42

मान्योऽस्माकं त्वया राजन् वयसा च पिता समः ।पालयस्व पुरीं सम्यक्क्षत्रेषु पितृवद् वस

mānyo'smākaṃ tvayā rājan vayasā ca pitā samaḥ | pālayasva purīṃ samyakkṣatreṣu pitṛvad vasa

हिन्दी अर्थ

राजन! रे लिये पिता सबसे अधिक आदरणीय हैं, जो अवस्थामें पापके ही तुल्य हैं (अत: आप मेंरे लिये पिताके तुल्य ) । आप अपनी पुरीका भलीभाँति पालन कीजिये और त्रियोंमें पिताके समान आदरणीय बनकर रहिये

अध्याय 106

श्लोक 43

कलुषो नाम राजेन्द्र वसेत् कापुरुषेषु वै ।शूरेषु शुद्धभावेषु कलुषो वसते कथम्

kaluṣo nāma rājendra vaset kāpuruṣeṣu vai | śūreṣu śuddhabhāveṣu kaluṣo vasate katham

हिन्दी अर्थ

जेन्द्र! दुर्भाव तो कायरोंमें रहा करता है, विशुद्ध ाववाले शूरवीरोंमें कलुषित भाव कैसे रह सकता

अध्याय 106

श्लोक 44

जानीध्वमेषा मे वृत्तिः पुत्रेषु पितृवद् वयम् ।इमावपि च राजानौ विदर्भनगराधिपौ

jānīdhvameṣā me vṛttiḥ putreṣu pitṛvad vayam | imāvapi ca rājānau vidarbhanagarādhipau

हिन्दी अर्थ

मेरी यह वृत्ति सर्वथा कलुषभावसे रहित है, स बातको आपलोग अच्छी तरह जान लें। हम पुत्रोंपर पताके तुल्य ही स्नेह रखते हैं। ये दोनों विदर्भनगरके घिपति राजा क्रथ और कैशिक भी ऐसे ही स्वभावके

अध्याय 106

श्लोक 45

आतिथ्यकरणेऽस्माकं स्वराज्यं ददतावुभौ ।तेन दानफलेनास्य दशपूर्वा दिवं गताः

ātithyakaraṇe'smākaṃ svarājyaṃ dadatāvubhau | tena dānaphalenāsya daśapūrvā divaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

इन दोनोंने हमलोगोंका आतिथ्य-सत्कार करते मय मुझे अपना सारा राज्य ही समर्पित कर दिया। उस नके फलसे इनके दस पीढ़ी पहलेके पूर्वज स्वर्गलोकमें ले गये

अध्याय 106

श्लोक 46

भविष्याश्चैव राजानः पुत्रपौत्रा दशावराः ।तेऽपि तत्रैव यास्यन्ति देवलोकं नराधिपाः

bhaviṣyāścaiva rājānaḥ putrapautrā daśāvarāḥ | te'pi tatraiva yāsyanti devalokaṃ narādhipāḥ

हिन्दी अर्थ

भविष्यमें भी दस पीढ़ीतक जो पुत्र- त्र आदि राजा होंगे, वे सभी नरेश उक्त दानके फलसे सी देवलोकमें जायूँगे

अध्याय 106

श्लोक 47

अनयोः सुचिरं कालं भुक्त्वा राज्यमकण्टकम् ।यदाभिलाषो मोक्षस्य यास्येते निर्वृतिं सुखम्

anayoḥ suciraṃ kālaṃ bhuktvā rājyamakaṇṭakam | yadābhilāṣo mokṣasya yāsyete nirvṛtiṃ sukham

हिन्दी अर्थ

परप इन दोनोंको चिरकालतक अकण्टक राज्य भोग लेनेके पश्चात्‌ जब मोक्षकी अभिलाषा होगी, तब ये सुखस्वरूप परमानन्द पदको प्राप्त कर लेंगे

अध्याय 106

श्लोक 48

नरेन्द्राश्च महाभागा येऽभिषेचितुमागताः ।कालेन तेऽपि यास्यन्ति देवलोकं त्रिविष्टपम्

narendrāśca mahābhāgā ye'bhiṣecitumāgatāḥ | kālena te'pi yāsyanti devalokaṃ triviṣṭapam

हिन्दी अर्थ

जो महाभाग नरेश मेरा अभिषेक करनेके लिये आये थे, वे भी समयानुसार देवताओंके निवासभूत स्वर्गलोकमें चले जायेँगे

अध्याय 106

श्लोक 49

स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि वैनतेयसहायवान् ।नगरीं मथुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम्

svasti vo'stu gamiṣyāmi vainateyasahāyavān | nagarīṃ mathurāṃ ramyāṃ bhojarājena pālitām

हिन्दी अर्थ

आपलोगोंका कल्याण हो, अब मैं गरुड़के साथ भोजराज उम्रसेनद्वारा पालित रमणीय मथुरापुरीको जाऊँगा

अध्याय 106

श्लोक 50

एवमुक्त्वा तु राजानं भीष्मकं यदुनन्दनः ।राज्ञश्चैवमुपामन्त्र्य वैदर्भाभ्यां विशेषतः

evamuktvā tu rājānaṃ bhīṣmakaṃ yadunandanaḥ | rājñaścaivamupāmantrya vaidarbhābhyāṃ viśeṣataḥ

श्लोक 50–58 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा भीष्मकसे ऐसा कहकर विशेषत: वहाँ बैठे हुए राजाओंसे विदा ले यदुकुलनन्दन देवेश्वर श्रीकृष्ण विदर्भराज क्रथ और कैशिकके साथ सभाभवनसे निकलकर रथके निकट गये। तदनन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्णको जाते देख राजर्षि भीष्मक बड़े प्रसन्न हुए और उन समस्त भूपालोंके मुखपर विषाद छा गया । जो सबके आदिकारण, स्वयम्भूरूप, देवताओं और असुरोंद्वारा वन्दित, सहस्त्रों चरणोंसे युक्त, सहसों नेत्रोंसे विभूषित, सहस्रों भुजाओंसे सुशोभित शरीरवाले, सहस्रों मस्तकोंसे सम्पन्न तथा सहस्रों मुकुटोंसे प्रकाशमान हैं, जो दिव्य माला तथा दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले, दिव्य गन्ध और दिव्य अनुलेपनसे अलंकृत हैं, जिनके श्रीअड्ों पर दिव्य आभूषण शोभा देते हैं, जो अनेक दिव्य आयुधोंसे सम्पन्न हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन अरुण कमलनयन राजेन्द्र श्रीकृष्णको देखकर राजा भीष्मक हाथ जोड़ उनके चरणोंमें गिर पड़े। इस प्रकार मन, वाणी और शरीरद्वारा प्रणाम करके उन्होंने उस समय उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ ५०-१५ डर ॥| भीष्मक बोले—देवदेव! आपको नमस्कार है। आप आदि और अन्तसे रहित हैं, आपको नमस्कार _ है। नारायण! आप सबके परम आश्रय हैं। आप सनातन आदिदेवको नमस्कार है। आप ही स्वयम्भू (ब्रह्मा), विश्वरूप, स्थाणु (महादेव अथवा स्थावर प्राणी ), वेधस्‌ (विधाता),पद्यनाभ, जटाधारी, दण्डधारी, पिज्लवर्ण, हंसकान्ति, हंसरूप तथा चक्रस्वरूप हैं । आपको नमस्कार है

अध्याय 106

श्लोक 51

सभान्निष्क्रम्य देवेशो जगाम रथमन्तिकम् ।ततः प्रहृष्टो राजर्षिर्भीष्मकः किल केशवम्

sabhānniṣkramya deveśo jagāma rathamantikam | tataḥ prahṛṣṭo rājarṣirbhīṣmakaḥ kila keśavam

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 52

ते सर्वे च महीपाला विषण्णवदनाभवन् ।आद्यं स्वायम्भुवं रूपं सुरासुरनमस्कृतम्

te sarve ca mahīpālā viṣaṇṇavadanābhavan | ādyaṃ svāyambhuvaṃ rūpaṃ surāsuranamaskṛtam

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 53

सहस्रपात्सहस्राक्षं सहस्रभुजविग्रहम् ।सहस्रशिरसं देवं सहस्रमुकुटोज्ज्वलम्

sahasrapātsahasrākṣaṃ sahasrabhujavigraham | sahasraśirasaṃ devaṃ sahasramukuṭojjvalam

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 54

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।दिव्याभरणसंयुक्तं दिव्यानेकोद्यतायुधम्

divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhānulepanam | divyābharaṇasaṃyuktaṃ divyānekodyatāyudham

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 55

कृष्णं रक्तारविन्दाक्षं चन्द्रसूर्याग्निलोचनम् ।दृष्ट्वा स राजा राजेन्द्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः

kṛṣṇaṃ raktāravindākṣaṃ candrasūryāgnilocanam | dṛṣṭvā sa rājā rājendraṃ praṇipatya kṛtāñjaliḥ

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 56

वाङ्मनःकायसंयुक्तं स्तोतुमारब्धवांस्तदा ।देवदेव नमस्तुभ्यमनादिनिधनाय वै

vāṅmanaḥkāyasaṃyuktaṃ stotumārabdhavāṃstadā | devadeva namastubhyamanādinidhanāya vai

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 57

शाश्वतायादिदेवाय नारायण परायण ।स्वयम्भुवे च विश्वाय स्थाणवे वेधसाय च

śāśvatāyādidevāya nārāyaṇa parāyaṇa | svayambhuve ca viśvāya sthāṇave vedhasāya ca

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 58

पद्मनाभाय जटिने दण्डिने पिङ्गलाय च ।हंसप्रभाय हंसाय चक्ररूपाय वै नमः

padmanābhāya jaṭine daṇḍine piṅgalāya ca | haṃsaprabhāya haṃsāya cakrarūpāya vai namaḥ

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 59

वैकुण्ठाय नमस्तस्मै अजाय परमात्मने ।सदसद्भावयुक्ताय पुराणपुरुषाय च

vaikuṇṭhāya namastasmai ajāya paramātmane | sadasadbhāvayuktāya purāṇapuruṣāya ca

हिन्दी अर्थ

आप वैकुण्ठधामके अधिपति, अजन्मा एवं परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। आप ही सद्धाव और असद्धावसे युक्त हैं, आप ही पुराणपुरुष हैं । आपको नमस्कार है

अध्याय 106

श्लोक 60

पुरुषोत्तमाय युक्ताय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते ।वरदो भव मे नित्यं त्वद्भक्ताय सुरोत्तम

puruṣottamāya yuktāya nirguṇāya namo'stu te | varado bhava me nityaṃ tvadbhaktāya surottama

हिन्दी अर्थ

आप योगयुक्त पुरुषोत्तम एवं निर्गुण परमात्मा हैं । मापको नमस्कार है । सुर्श्रेष्ठ ! मैं आपका भक्त हूँ। आप रे लिये सदा वरदायक हों। नाथ! आप ही सम्पूर्ण गोकोंके नाथ—संरक्षक हैं। आत्मज्ञानियोंके 'विष्णु' सर्वव्यापी परमात्मा) भी आप ही हैं

अध्याय 106

श्लोक 61

लोकनाथोऽसि नाथ त्वं विष्णुस्त्वं विदितात्मनाम् ।एवं स्तुत्वा महादेवं नृपाणामग्रतो नृपः

lokanātho'si nātha tvaṃ viṣṇustvaṃ viditātmanām | evaṃ stutvā mahādevaṃ nṛpāṇāmagrato nṛpaḥ

श्लोक 61–65 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा भीष्मकने मस्त नरेशोंके सामने बहुमूल्य मणियों तथा मुक्ताओंद्वारा ज़॒ और वैदूर्यमणिका भी उपहास करनेवाले महान्‌ वता श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति करके उन्हें सुवर्णकी शि भेंट की । फिर महाबली विनतानन्दन गरुड़को भी मस्कार किया॥ ६१-६२ हू ॥ भीष्पक बोले—जिनका वेग वायुके समान है, ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, दिव्यस्वरूप एवं शश्यपमुनिके पुत्र हैं, उन पक्षिराज गरुड़को नमस्कार , नमस्कार है॥ ६३ ई॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार क्षेपसे ही गरुड़की स्तुति करके उत्तम आभूषणोंद्वारा त्कार करनेके पश्चात्‌ राजाने कमललोचन श्रीकृष्णको दा किया। इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्रके प्रस्थान करनेपर हुत-से राजा उनके पीछे-पीछे गये

अध्याय 106

श्लोक 62

महार्हमणिमुक्ताभिर्वज्रवैदूर्यहासिनम् ।शातकुम्भस्य निचयं कृष्णाय प्रददौ नृपः

mahārhamaṇimuktābhirvajravaidūryahāsinam | śātakumbhasya nicayaṃ kṛṣṇāya pradadau nṛpaḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 63

पुनश्चक्रे नमस्कारं वैनतेये महाबले ।नमस्तस्मै खगेन्द्राय नमो मारुतरंहसे

punaścakre namaskāraṃ vainateye mahābale | namastasmai khagendrāya namo mārutaraṃhase

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 64

कामरूपाय दिव्याय काश्यपाय च वै नमः ।इति सङ्क्षेपतः स्तुत्वा सत्कृत्य वरभूषणैः

kāmarūpāya divyāya kāśyapāya ca vai namaḥ | iti saṅkṣepataḥ stutvā satkṛtya varabhūṣaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 65

ततो विसर्जयामास कृष्णं कमललोचनम् ।अनुजग्मुर्नृपाश्चैव प्रस्थितं वासवानुजम्

tato visarjayāmāsa kṛṣṇaṃ kamalalocanam | anujagmurnṛpāścaiva prasthitaṃ vāsavānujam

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 66

प्रतिगृह्य च सत्कारं नृपानामन्त्र्य वीर्यवान् ।जगाम मथुरां कृष्णो द्योतयानो दिशो दश

pratigṛhya ca satkāraṃ nṛpānāmantrya vīryavān | jagāma mathurāṃ kṛṣṇo dyotayāno diśo daśa

श्लोक 66–69 का हिन्दी अर्थ

पराक्रमी कृष्ण उन राजाओंका सत्कार ग्रहण करके उनसे दा ले दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए सौम्यरूपधारी क्षिप्रवर विनतानन्दन गरुड़को आगे करके मथुरापुरीको ये। वे अपनेको चारों ओरसे विशाल रथसमूहद्वारा रकर भेरी, पटह, शड्धू और दुन्दुभियोंकी ध्वनिके [थ प्रस्थित हुए । हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, रवीरोंके सिंहनाद करने तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे [लकर उन वाद्योंका ऐसा महान्‌ तुमुल नाद हुआ, महामेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान प्रतीत होता [

अध्याय 106

श्लोक 67

वैनतेयं पुरस्कृत्य सौम्यरूपं खगोत्तमम् ।महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः

vainateyaṃ puraskṛtya saumyarūpaṃ khagottamam | mahatā rathavṛndena parivārya samantataḥ

अर्थ श्लोक 66 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 68

भेरीपटहनादेन शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।बृंहितेन च नागानां हयानां हेषितेन च

bherīpaṭahanādena śaṅkhadundubhiniḥsvanaiḥ | bṛṃhitena ca nāgānāṃ hayānāṃ heṣitena ca

अर्थ श्लोक 66 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 69

सिंहनादेन शूराणां रथनेमिस्वनेन च ।तुमुलः सुमहानासीन्महामेघरवोपमः

siṃhanādena śūrāṇāṃ rathanemisvanena ca | tumulaḥ sumahānāsīnmahāmegharavopamaḥ

अर्थ श्लोक 66 के साथ

अध्याय 106

श्लोक 70

गते कृष्णे महावीर्ये आदाय वरमासनम् ।सभामादाय देवाश्च प्रययुस्त्रिदशालयम्

gate kṛṣṇe mahāvīrye ādāya varamāsanam | sabhāmādāya devāśca prayayustridaśālayam

हिन्दी अर्थ

महापराक्रमी श्रीकृष्णके चले जानेपर त्रतालोग उस श्रेष्ठ सिंहासन तथा सभाभवनको साथ स्वर्गलोकको चले गये

अध्याय 106

श्लोक 71

महता चतुरङ्गेण बलेन परिवारिताः ।क्रोशमात्रमुपव्रज्य अनुज्ञाते जनार्दने

mahatā caturaṅgeṇa balena parivāritāḥ | krośamātramupavrajya anujñāte janārdane

श्लोक 71–72 का हिन्दी अर्थ

विशाल चतुरड़िणी नासे घिरे हुए राजा लोग एक कोसतक पीछे-पीछे [कर भगवान्‌ जनार्दनकी आज्ञा मिलनेपर लौटे और ब-के-सब पुन: स्वयंवरमें चले गये

अध्याय 106

श्लोक 72

प्रययुस्ते नृपाः सर्वे पुनरेव स्वयंवरम्

prayayuste nṛpāḥ sarve punareva svayaṃvaram

अर्थ श्लोक 71 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.