Harivamsha Purana
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अध्याय 110 / 318

Parva 2, Adhyāya 55

127 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ127 श्लोक

अध्याय 110

श्लोक 1

गरुडस्य श्रीकृष्णस्य निवासयोग्यां भूमिं द्रष्टुं गमनम्, मथुरायां राजेन्द्रस्य श्रीकृष्णस्य स्वागतम्, श्रीकृष्णेन राज्ञः उग्रसेनस्य एवं मथुरावासिनां सत्कारं एवं गरुडस्य प्रत्यागत्य कुशस्थलीविषये कथनं विदर्भनगराद् याते शक्रतुल्यपराक्रमे ।किमर्थं गरुडो नीतः किं च कर्म चकार सः

garuḍasya śrīkṛṣṇasya nivāsayogyāṃ bhūmiṃ draṣṭuṃ gamanam, mathurāyāṃ rājendrasya śrīkṛṣṇasya svāgatam, śrīkṛṣṇena rājñaḥ ugrasenasya evaṃ mathurāvāsināṃ satkāraṃ evaṃ garuḍasya pratyāgatya kuśasthalīviṣaye kathanaṃ vidarbhanagarād yāte śakratulyaparākrame | kimarthaṃ garuḍo nītaḥ kiṃ ca karma cakāra saḥ

हिन्दी अर्थ

नमो 5ध्याय: माााण नाना, मधुरामें राजेद्ध श्रीकृष्णका स्वागत, श्रीकृष्णद्वारा गरुड़का लौटकर कुशस्थलीके विषयमें बताना जनमेजयने पूछा—इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भगवान्‌ _ श्रीकृष्ण जब विदर्भ नगरसे मथुराको गये, उस समय अपने साथ गरुड़कों क्यों ले गये और गरुड़ने वहाँ जाकर कौन-सा कार्य सम्पन्न किया 2

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श्लोक 2

न चारुरोह भगवान् वैनतेयं महाबलम् ।एतन्मे संशयं ब्रह्मन् ब्रूहि तत्त्वं महामुने

na cāruroha bhagavān vainateyaṃ mahābalam | etanme saṃśayaṃ brahman brūhi tattvaṃ mahāmune

हिन्दी अर्थ

महामुने ! ब्रह्मन्‌ ! भगवान्‌ श्रीकृष्ण महाबली गरुड़ृपर आरूढ़ क्यों नहीं हुए? यह मेरा संशय है। आप इसका ठीक-ठीक समाधान करें

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श्लोक 3

शृणु राजन् सुपर्णेन कृतं कर्मातिमानुषम् ।विदर्भनगरीं गत्वा वैनतेयो महाद्युतिः

śṛṇu rājan suparṇena kṛtaṃ karmātimānuṣam | vidarbhanagarīṃ gatvā vainateyo mahādyutiḥ

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌। महातेजस्वी विनतानन्दन गरुड़ने विदर्भनगरमें जाकर ऐसा कार्य किया था, जो मानवीय शक्तिसे परेकी वस्तु है

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श्लोक 4

असम्प्राप्ते च नगरीं मथुरां मधुसूदने ।मनसा चिन्तयामास वैनतेयो महाद्युतिः

asamprāpte ca nagarīṃ mathurāṃ madhusūdane | manasā cintayāmāsa vainateyo mahādyutiḥ

श्लोक 4–6 का हिन्दी अर्थ

प्रभो! मधुसूदन श्रीकृष्ण विदर्भनगरसे चलकर अभी मार्गमें ही थे, मथुरापुरी नहीं पहुँचे थे । तभी महातेजस्वी गरुड़ने मन- ही-मन विचार किया कि देवाधिदेव श्रीहरिने सब राजाओंके सामने जो कहा था कि ' मैं भोजराज उग्रसेनके द्वारा पालित रमणीय नगरी मथुराको जाऊँगा' उनके उस कथनके अन्तमें * चलूँगा' यह कहकर मैंने भी चलना स्वीकार कर लिया था। यही सोचते हुए गरुड़को एक कार्य सूझ गया और उन तेजस्वी पक्षिराजने दोनों हाथ जोड़ भगवान्‌को प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ इ-

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श्लोक 5

यदुक्तं देवदेवेन नृपाणामग्रतः प्रभो ।यास्यामि मथुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम्

yaduktaṃ devadevena nṛpāṇāmagrataḥ prabho | yāsyāmi mathurāṃ ramyāṃ bhojarājena pālitām

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 6

इति तद्वचनस्यान्ते गमिष्येति विचिन्तयन् ।कृताञ्जलिपुटः श्रीमान् प्रणिपत्याब्रवीदिदम्

iti tadvacanasyānte gamiṣyeti vicintayan | kṛtāñjalipuṭaḥ śrīmān praṇipatyābravīdidam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 7

देव यास्यामि नगरीं रैवतस्य कुशस्थलीम् ।रैवतं च गिरिं रम्यं नन्दनप्रतिमं वनम्

deva yāsyāmi nagarīṃ raivatasya kuśasthalīm | raivataṃ ca giriṃ ramyaṃ nandanapratimaṃ vanam

हिन्दी अर्थ

गरुड़ बोले—देव! मैं राजा रैवतकी कुशस्थली नगरीको जाऊँगा। वहाँ रमणीय रैवत गिरि है, जहाँ नन्दनके समान मनोहर वन है

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श्लोक 8

रुक्मिणोद्वासितां रम्यां शैलोदधितटाश्रयाम् ।वृक्षगुल्मलताकीर्णां पुष्परेणुविभूषिताम्

rukmiṇodvāsitāṃ ramyāṃ śailodadhitaṭāśrayām | vṛkṣagulmalatākīrṇāṃ puṣpareṇuvibhūṣitām

हिन्दी अर्थ

रुक्मीने पर्वत और समुद्रतटका आश्रय लेकर बसी हुई उस रमणीय नगरीको उजाड़ दिया है। वहाँ हरे-भरे वृक्ष, गुल्म और लताएँ फैली हुई हैं। फूलोंके पराग उसकी शोभा बढ़ाते हैं

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श्लोक 9

गजेन्द्रभुजगाकीर्णामृक्षवानरसेविताम् ।वराहमानुषाक्रान्तां मृगयूथैरनेकशः

gajendrabhujagākīrṇāmṛkṣavānarasevitām | varāhamānuṣākrāntāṃ mṛgayūthairanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ हाथी और सर्प भरे हुए हैं। रीछ तथा वानर उसका सेवन करते हैं। वाराह, भैंसे तथा मृ्ोंके अनेकानेक झुंड वहाँ वास करते हैं

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श्लोक 10

तां समन्तात् समालोक्य वासार्थं ते क्षमां क्षमा ।यदि स्याद् भवतो रम्या प्रशस्ता नगरीति च

tāṃ samantāt samālokya vāsārthaṃ te kṣamāṃ kṣamā | yadi syād bhavato ramyā praśastā nagarīti ca

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

मो डध्याय: + ३९ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन करके देवेश्वर जनार्दनको प्रणाम करनेके अनन्तर बलवान्‌ पक्षिराज गरुड़ पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये

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श्लोक 11

कण्टकोद्धरणं कृत्वा आगमिष्ये तवान्तिकम् ।एवं विज्ञाप्य देवेशं प्रणिपत्य जनार्दनम्

kaṇṭakoddharaṇaṃ kṛtvā āgamiṣye tavāntikam | evaṃ vijñāpya deveśaṃ praṇipatya janārdanam

अर्थ श्लोक 10 के साथ

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श्लोक 12

जगाम पतगेन्द्रोऽपि पश्चिमाभिमुखो बली ।कृष्णोऽपि यदुभिः सार्द्धं विवेश मथुरां पुरीम्

jagāma patagendro'pi paścimābhimukho balī | kṛṣṇo'pi yadubhiḥ sārddhaṃ viveśa mathurāṃ purīm

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

इधर श्रीकृष्ण भी यदुवंशियोंके साथ मधथुरापुरीमें जा पहुँचे। उस समय राजा उग्रसेन, नर्तकियाँ तथा मथुराके नागरिक सबने आगे बढ़कर हष्ट-पुष्ठ मनुष्योंके साथ आये हुए श्रीकृष्णका स्वागत- सत्कार किया

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श्लोक 13

स्वैरिण्य उग्रसेनश्च नागराश्चैव सर्वशः ।प्रत्युद्गम्यार्चयन् कृष्णं प्रहृष्टजनसङ्कुलम्

svairiṇya ugrasenaśca nāgarāścaiva sarvaśaḥ | pratyudgamyārcayan kṛṣṇaṃ prahṛṣṭajanasaṅkulam

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 14

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिर्वसुधाधिपैः ।किं चकार महाबाहुरुग्रसेनो महीपतिः

śrutvābhiṣiktaṃ rājendraṃ bahubhirvasudhādhipaiḥ | kiṃ cakāra mahābāhurugraseno mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा—बहुत-से राजाओंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रपदपर अभिषेक किया है—यह समाचार सुनकर महाबाहु राजा उग्रसेनने क्या किया ?

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श्लोक 15

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिः पार्थिवोत्तमैः ।इन्द्रेण कृतसन्धानं दूतं चित्राङ्गदं कृतम्

śrutvābhiṣiktaṃ rājendraṃ bahubhiḥ pārthivottamaiḥ | indreṇa kṛtasandhānaṃ dūtaṃ citrāṅgadaṃ kṛtam

श्लोक 15–22 का हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजीने कहा—बहुत-से श्रेष्ठ नरेशने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रके पदपर अभिषेक किया है। इन्द्रका अभिप्राय निवेदन करनेके लिये चित्राजूद दूत बनकर आये थे । एक-एक राजाको एक-एक लाख मुद्राएँ पुरस्कारमें दी गयीं। जो राजेन्द्र था, उसे एक अर्बुद (दस करोड़) दिया गया तथा साधारण मनुष्योंको भी दस-दस हजार रुपये दिये गये। जो वहाँ पहुँच गये थे, वे खाली हाथ घर नहीं लौटे । श्रीमान्‌ निधिपति शड्ड ही यादवरूपसे उपस्थित हो भगवान्‌ श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार धन देता था और सम्पूर्ण देवता इसका अनुमोदन करते थे॥ १५—१७ डर ॥ यह समाचार आत्मीय जनोंसे सुनकर तथा लोकवृत्तान्तकी जानकारी करानेवाले गुप्तचरके मुखसे जानकर उग्रसेनने देवमन्दिरोंमें विशेष रूपसे पूजाकी व्यवस्था करायी । वसुदेवके भवनके दोनों बगलमें तोरण लगे और सब ओर नटोंके नाच-गान होने और बाजे बजने लगे। राजा उग्रसेनने कसराजकी सभाको विचित्र वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा ध्वजा- परताका एवं मालाओंसे अलंकृत कराया। भोजराजने सब ओर भाँति-भाँतिकी पताकाएँ लगवार्यी और प्रत्येक फाटक एवं गोपुरको चूनेसे लिपवाया । इस प्रकार राजेन्द्र उग्रसेनने जेन्द्र श्रीकृष्णके लिये सिंहासन और भवन तैयार कररवाया

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श्लोक 16

एकैकं नृपतेर्भागं शतसाहस्रसम्मितम् ।राजेन्द्रे त्वर्बुदं दत्तं मानवेषु च वै दश

ekaikaṃ nṛpaterbhāgaṃ śatasāhasrasammitam | rājendre tvarbudaṃ dattaṃ mānaveṣu ca vai daśa

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 17

ये तत्र समनुप्राप्ता न रिक्तास्ते गृहं गताः ।शङ्खो यादवरूपेण प्रददौ हरिचिन्तितम्

ye tatra samanuprāptā na riktāste gṛhaṃ gatāḥ | śaṅkho yādavarūpeṇa pradadau haricintitam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 18

एवं निधिपतिः श्रीमान् दैवतैरनुमोदितः ।इति श्रुत्वात्मिकजनाल्लोकप्रवृत्तिकान्नरात्

evaṃ nidhipatiḥ śrīmān daivatairanumoditaḥ | iti śrutvātmikajanāllokapravṛttikānnarāt

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 19

चकार महतीं पूजां देवतायतनेष्वपि ।वसुदेवस्य भवने तोरणोभयपार्श्वतः

cakāra mahatīṃ pūjāṃ devatāyataneṣvapi | vasudevasya bhavane toraṇobhayapārśvataḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 20

नटानां नृत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः ।पताकाध्वजमालाढ्यां कारयामास वै नृपः

naṭānāṃ nṛtyageyāni vādyāni ca samantataḥ | patākādhvajamālāḍhyāṃ kārayāmāsa vai nṛpaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 21

कंसराजस्य च सभां विचित्राम्बरसुप्रभाम् ।पताका विविधाकारा दापयामास भोजराट्

kaṃsarājasya ca sabhāṃ vicitrāmbarasuprabhām | patākā vividhākārā dāpayāmāsa bhojarāṭ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 22

तोरणं गोपुरं चैव सुधापङ्कानुलेपनम् ।कारयामास राजेन्द्रो राजेन्द्रस्यासनालयम्

toraṇaṃ gopuraṃ caiva sudhāpaṅkānulepanam | kārayāmāsa rājendro rājendrasyāsanālayam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 23

नटानां नृत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः ।पताका वनमालाढ्याः पूर्णकुम्भाः समन्ततः

naṭānāṃ nṛtyageyāni vādyāni ca samantataḥ | patākā vanamālāḍhyāḥ pūrṇakumbhāḥ samantataḥ

श्लोक 23–25 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! नगरमें चारों ओर नाच- न होने और बाजे बजने लगे। राजमार्गॉपर चन्दनयुक्त जलका छिड़काव किया गया था और वहाँ चारों ओर जलसे भरे हुए कलश रखे गये थे। उन कलशोंको पताका और वनमालाओंसे अलंकृत किया गया था। राजा ग्रसेनने भूतलपर पाँवड़ेके रूपमें वस्त्र बिछवा दिये और वहाँ फूलोंकी मालाएँ रखवा दी थीं तथा सड़कोंके दोनों बगल चन्दन, अगुरु और गुग्गुलकी धूप जलवायी । जहाँ-तहाँ राल और गुड़ जलाये जा रहे थे

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श्लोक 24

राजमार्गेषु राजेन्द्र चन्दनोदकसेचितम् ।वस्त्राभरणकं राजा दापयामास भूतले

rājamārgeṣu rājendra candanodakasecitam | vastrābharaṇakaṃ rājā dāpayāmāsa bhūtale

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 25

धूपं पार्श्वोभये चैव चन्दनागुरुगुग्गुलैः ।गुडं सर्जरसं चैव दह्यमानं ततस्ततः

dhūpaṃ pārśvobhaye caiva candanāguruguggulaiḥ | guḍaṃ sarjarasaṃ caiva dahyamānaṃ tatastataḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 26

वृद्धस्त्रीजनसङ्घैश्च गायद्भिः स्तुतिमङ्गलम् ।अर्घं कृत्वा प्रतीक्षन्ते स्वेषु स्थानेषु योषितः

vṛddhastrījanasaṅghaiśca gāyadbhiḥ stutimaṅgalam | arghaṃ kṛtvā pratīkṣante sveṣu sthāneṣu yoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

बूढ़ी स्त्रियोंके समुदाय स्थान-स्थानपर स्तुति और मज्ञल गाते थे। उनके साथ ही युवतियाँ अपने-अपने घरोंपर _ अर्ध्य सजाकर श्रीकृष्णके शुभागमनकी बाट जोह रही थीं

अध्याय 110

श्लोक 27

एवं कृत्वा पुरानन्दमुग्रसेनो नराधिपः ।वसुदेवगृहं गत्वा प्रियाख्यानं निवेद्य च

evaṃ kṛtvā purānandamugraseno narādhipaḥ | vasudevagṛhaṃ gatvā priyākhyānaṃ nivedya ca

श्लोक 27–30 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार राजा उग्रसेन नगरमें आनन्दोत्सवकी व्यवस्था करके वसुदेवके घरपर गये और श्रीकृष्णके अभिषेक तथा आगमनका प्रिय समाचार निवेदन करके बलरामके साथ सलाहकर श्रीकृष्णके रथके निकट चले। राजन्‌ ! नरेश्वर! इसी बीचमें बड़े जोरसे श्ज-ध्वनि सुनायी दी । पाज्ञजन्यका गम्भीर नाद सुनकर मधुपुरवासी स्त्री, बालक, वृद्ध, सूत, मागध और वन्दी बलरामजीको आगे करके विशाल सेनाके साथ अर्ध्य-पाद्य आदि लिये नगरसे बाहर निकले। इन सबके साथ बुद्धिमान्‌ राजा उग्रसेन भी थे

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श्लोक 28

रामेण सह सम्मन्त्र्य निर्गतो रथमन्तिकम् ।तस्मिन्नेवान्तरे राजञ्शङ्खध्वनिरभून्महान्

rāmeṇa saha sammantrya nirgato rathamantikam | tasminnevāntare rājañśaṅkhadhvanirabhūnmahān

अर्थ श्लोक 27 के साथ

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श्लोक 29

पाञ्चजन्यस्य निनदं श्रुत्वा मधुरवासिनः ।स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च सूता मागधबन्दिनः

pāñcajanyasya ninadaṃ śrutvā madhuravāsinaḥ | striyo vṛddhāśca bālāśca sūtā māgadhabandinaḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 30

विनिर्ययुर्महासेना रामं कृत्वाग्रतो नृप ।अर्घ्य पाद्यं पुरस्कृत्य उग्रसेनेन धीमता

viniryayurmahāsenā rāmaṃ kṛtvāgrato nṛpa | arghya pādyaṃ puraskṛtya ugrasenena dhīmatā

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 31

दृष्टिपन्थानमासाद्य उग्रसेनो महीपतिः ।अवतीर्य रथाच्छुभ्रात् पादमार्गेण चाग्रतः

dṛṣṭipanthānamāsādya ugraseno mahīpatiḥ | avatīrya rathācchubhrāt pādamārgeṇa cāgrataḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णके दृष्टिपथमें आकर राजा उग्रसेन अपने उज्वल रथसे उतर पड़े और पैदल ही आगे बढ़े

अध्याय 110

श्लोक 32

दृष्ट्वाऽऽसीनं रथे रम्ये दिव्यरत्नविभूषितम् ।अङ्गेष्वाभरणं चैव दिव्यरत्नप्रभायुतम्

dṛṣṭvā''sīnaṃ rathe ramye divyaratnavibhūṣitam | aṅgeṣvābharaṇaṃ caiva divyaratnaprabhāyutam

श्लोक 32–34 का हिन्दी अर्थ

उन्होंने देखा, भगवान्‌ श्रीकृष्ण एक रमणीय रथपर विराजमान हैं । दिव्य रत्मय आभूषणोंसे विभूषित हैं । उनके अड्डोंके आभूषण दिव्य रत्लोंकी प्रभासे प्रकाशित हो रहे हैं । उनके वक्ष:स्थलपर वनमाला विराज रही है। वे दिव्य रूपधारी श्रीहरि तपते हुए सूर्यके समान जान पढ़ते हैं। उनके दोनों पार्श्वमें चैँवर और व्यजन डुलाये जाते हैं । सिरपर छत्र तना हुआ है। रथपर ऊँचा गरुड्ध्वज फहरा रहा है। वे समस्त राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं और निकट आये हुए सूर्यके समान दिव्य ज्योतिसे जाज्वल्यमान हो रहे हैं। अद्भुत शोभासे व्याप्त दिखायी देते हैं। उन देवेश्वर श्रीहरिकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो रहा है

अध्याय 110

श्लोक 33

वनमालोरसं दिव्यं तपन्तमिव भास्करम् ।चामरं व्यजनं छत्रं खगेन्द्रध्वजमुच्छ्रितम्

vanamālorasaṃ divyaṃ tapantamiva bhāskaram | cāmaraṃ vyajanaṃ chatraṃ khagendradhvajamucchritam

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 34

राजलक्षणसम्पूर्णमासन्नार्कमिवोज्ज्वलम् ।श्रियाभिभूतं देवेशं दुर्निरीक्ष्यतरं हरिम्

rājalakṣaṇasampūrṇamāsannārkamivojjvalam | śriyābhibhūtaṃ deveśaṃ durnirīkṣyataraṃ harim

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 35

दृष्ट्वा स राजा राजेन्द्र हर्षगद्गदया गिरा ।बभाषे पुण्डरीकाक्षं रामं बलनिषूदनम्

dṛṣṭvā sa rājā rājendra harṣagadgadayā girā | babhāṣe puṇḍarīkākṣaṃ rāmaṃ balaniṣūdanam

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! भगवान्‌ श्रीकृष्णको इस रूपमें देखकर राजा उग्रसेन शत्रुसैन्यहन्ता कमलनयन बलरामजीसे हर्षगदूगद वाणीमें बोले—

अध्याय 110

श्लोक 36

रथेन न मया गन्तुं युक्तपूर्वेति चिन्त्य वै ।अवतीर्णो महाभाग गच्छ त्वं स्यन्दनेन च

rathena na mayā gantuṃ yuktapūrveti cintya vai | avatīrṇo mahābhāga gaccha tvaṃ syandanena ca

हिन्दी अर्थ

महाभाग! मैंने पहलेसे ही यह सोच लिया है कि मुझे रथपर बैठकर भगवान्‌के सामने नहीं जाना चाहिये। अतः तुम्हीं रथसे यात्रा करो।' ऐसा कहकर वे रथसे उतर गये

अध्याय 110

श्लोक 37

विष्णुना छद्मरूपेण गत्वेमां मथुरां पुरीम् ।अनुप्रकाशितात्मानं देवेन्द्रत्वं नृपार्णवे

viṣṇunā chadmarūpeṇa gatvemāṃ mathurāṃ purīm | anuprakāśitātmānaṃ devendratvaṃ nṛpārṇave

श्लोक 37–42 का हिन्दी अर्थ

उतरकर वे फिर बोले—भगवान्‌ विष्णु छद्दरूप धारण करके इस मथुरापुरीमें आये थे। इन्होंने राजाओंके समुद्रमें जाकर अपने देवेन्द्र-रूपको प्रकाशित किया है; तमो5ध्याय: + १ अत; मैं केशवकी सर्वतोभावसे स्तुति करना चाहता हूँ । तब श्रीकृष्णके बड़े भाई महातेजस्वी बलरामने राजा उग्रसेनको इस प्रकार उत्तर दिया-'नरेश्वर! यहाँ आते हुए देवप्रवर श्रीकृष्णकी स्तुति करना आपके लिये उचित नहीं है। राजन्‌! आपपर तो श्रीकृष्ण बिना स्तुतिके ही संतुष्ट हैं। जब वे संतुष्ट ही हैं तो उनकी स्तुतिसे आपको क्या लेना है। आपके दर्शनमात्रसे ही उनकी स्तुति हो गयी। राजन्‌ ! श्रीकृष्ण राजेन्द्रका पद पाकर आपके घर आ रहे हैं; इसलिये आप अमानुषिक दिव्य स्तुतियोंद्वारा उनकी स्तुति करें—यह आपके लिये उचित नहीं है। इस तरह बातचीत करते हुए वे दोनों श्रीकृष्णके निकट जा पहुँचे । राजा उग्रसेनको हाथमें अर्घ्य लिये खड़ा देख वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपने उत्तम रथको ठहराकर उनसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 110

श्लोक 38

तमहं स्तोतुमिच्छामि सर्वभावेन केशवम् ।प्रत्युवाच महातेजा राजानं कृष्णपूर्वजः

tamahaṃ stotumicchāmi sarvabhāvena keśavam | pratyuvāca mahātejā rājānaṃ kṛṣṇapūrvajaḥ

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 39

न युक्तं नृपते स्तोतुं व्रजन्तं देवसत्तमम् ।विना स्तोत्रेण सन्तुष्टस्तव राजञ्जनार्दनः

na yuktaṃ nṛpate stotuṃ vrajantaṃ devasattamam | vinā stotreṇa santuṣṭastava rājañjanārdanaḥ

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 40

तुष्टस्य स्तुतिना किं ते दर्शनेन तव स्तुतिः ।राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य आगतस्तव वेश्मनि

tuṣṭasya stutinā kiṃ te darśanena tava stutiḥ | rājendratvamanuprāpya āgatastava veśmani

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 41

न त्वया स्तुतवान्राजन्दिव्यैः स्तोत्रैरमानुषैः ।एवमाब्रुवमाणौ तौ सम्प्राप्तौ केशवान्तिकम्

na tvayā stutavānrājandivyaiḥ stotrairamānuṣaiḥ | evamābruvamāṇau tau samprāptau keśavāntikam

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 42

अर्घोद्यतभुजं दृष्ट्वा स्थापयित्वा रथोत्तमम् ।उवाच वदतां श्रेष्ठ उग्रसेनं नराधिपम्

arghodyatabhujaṃ dṛṣṭvā sthāpayitvā rathottamam | uvāca vadatāṃ śreṣṭha ugrasenaṃ narādhipam

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 43

यन्मया चाभिषिक्तस्त्वं मथुरेशो भवत्विति ।न युक्तमन्यथा कर्तुं मथुराधिपते स्वयम्

yanmayā cābhiṣiktastvaṃ mathureśo bhavatviti | na yuktamanyathā kartuṃ mathurādhipate svayam

हिन्दी अर्थ

मथुरापते ! मैंने जो आपका इसलिये अभिषेक किया था कि आप मथुराराज्यके स्वामी हों, उसे आप स्वयं ही मटियामेट कर दें—यह आपके लिये उचित नहीं है

अध्याय 110

श्लोक 44

अर्घ्यमाचमनीयं च पाद्यं चास्मै निवेदितम् ।न दातुमर्हसे राजन्नेष मे मनसः प्रियः

arghyamācamanīyaṃ ca pādyaṃ cāsmai niveditam | na dātumarhase rājanneṣa me manasaḥ priyaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! मैंने आपको अर्घ्य, पाद्य और आचमनीय निवेदन किया है। अत: आप मुझे ये सब वस्तुएँ न दें-यही मेरे मनको प्रिय है

अध्याय 110

श्लोक 45

तवाभिप्रायं विज्ञाय ब्रवीमि नृपते वचः ।त्वमेव माथुरो राजा नान्यथा कर्तुमर्हसि

tavābhiprāyaṃ vijñāya bravīmi nṛpate vacaḥ | tvameva māthuro rājā nānyathā kartumarhasi

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! मैं आपके मनोभावको जानकर कहता हूँ। आप ही मथुराके राजा हैं और रहेंगे । इसे अन्यथा करना आपके लिये उचित नहीं है

अध्याय 110

श्लोक 46

स्थानभागं च नृपते दास्यामि तव दक्षिणम् ।यथा नृपाणां सर्वेषां तथा ते स्थापितोऽग्रतः

sthānabhāgaṃ ca nṛpate dāsyāmi tava dakṣiṇam | yathā nṛpāṇāṃ sarveṣāṃ tathā te sthāpito'grataḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज ! मैं आपको पुरस्कारके रूपमें नियत धनका भाग अर्पित करूँगा। जैसे अन्य सब राजाओंको दिया गया है, वैसे आपके लिये भी सामने रखा हुआ है

अध्याय 110

श्लोक 47

शतसाहस्रिको भागो वस्त्राभरणवर्जितः ।आरुहस्व रथं शुभ्रं चामीकरविभूषितम्

śatasāhasriko bhāgo vastrābharaṇavarjitaḥ | āruhasva rathaṃ śubhraṃ cāmīkaravibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

वस्त्र और आभूषण छोड़कर केवल एक लाख स्वर्ण (दीनार) आपके हिस्सेमें अर्पित हैं। अब आप इस स्वर्णभूषित शुभ्र रथपर आरूढ़ होइये

अध्याय 110

श्लोक 48

चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं च मनुजेश्वर ।दिव्याभरणसंयुक्तं मुकुटं भास्करप्रभम्

cāmaraṃ vyajanaṃ chatraṃ dhvajaṃ ca manujeśvara | divyābharaṇasaṃyuktaṃ mukuṭaṃ bhāskaraprabham

श्लोक 48–53 का हिन्दी अर्थ

महाभाग! मनुजेश्वर! चँवर, व्यजन, छत्र, ध्वज और दिव्य आभूषणोंसहित सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुट धारण कीजिये। साथ ही इस पुरीका पालन करते रहिये। आप पुत्रों और पौत्रोंके साथ आनन्दित रहकर मथुरापुरीका पालन कीजिये । शत्रुगणोंको पराजित करके भोजवंशको बढ़ाइये। 'ब्रजधारी इन्द्रने शूरसेनके कुलमें उत्पन्न हुए देवताओंके भी देवता, सबके आदि कारण शेष-स्वरूप बलरामजीके लिये दिव्य वस्त्र और आभूषण भेजा है। *मथुराके सभी नागरिकोंके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ दस-दस दीनार* सुवर्णके भाग नियत किये गये हैं। अनुसार मथुराके प्रत्येक नागरिकको दस-दस हजार स्वर्णमुद्राएँ सूत, मागध और बन्दीजनों मेंसे एक-एकको एक-एक हजार दीनार प्राप्त होंगे। मज़ल गानेवाली बूढ़ी स्त्रियों तथा नर्तकियोंको सौ-सौ दीनार दिये जायूँगे। विकट्ठु आदि जो प्रमुख यादव राजा उग्रसेनके साथ रहते हैं, उनमेंसे प्रत्येकका भाग इन्द्रने दस-दस हजार दीनार नियत किया है'

अध्याय 110

श्लोक 49

धारयस्व महाभाग पालयस्व पुरीमिमाम् ।पुत्रपौत्रैः प्रमुदितो मथुरां परिपालय

dhārayasva mahābhāga pālayasva purīmimām | putrapautraiḥ pramudito mathurāṃ paripālaya

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 50

जित्वारिगणसङ्घांश्च भोजवंशं विवर्द्धय ।देवदेवाद्यनन्ताय शौरिणे वज्रपाणिना

jitvārigaṇasaṅghāṃśca bhojavaṃśaṃ vivarddhaya | devadevādyanantāya śauriṇe vajrapāṇinā

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 51

प्रेषितं देवराजेन दिव्याभरणमम्बरम् ।माथुराणां च सर्वेषां भागा दीनारका दश

preṣitaṃ devarājena divyābharaṇamambaram | māthurāṇāṃ ca sarveṣāṃ bhāgā dīnārakā daśa

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 52

सूतमागधबन्दीनामेकैकस्य सहस्रकम् ।वृद्धस्त्रीजनसङ्घानां गणिकानां शतं शतम्

sūtamāgadhabandīnāmekaikasya sahasrakam | vṛddhastrījanasaṅghānāṃ gaṇikānāṃ śataṃ śatam

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 53

नृपेण सह तिष्ठन्ति विकद्रुप्रमुखाश्च ये ।दशसाहस्रिको भागस्तेषां धात्रा प्रकल्पितः

nṛpeṇa saha tiṣṭhanti vikadrupramukhāśca ye | daśasāhasriko bhāgasteṣāṃ dhātrā prakalpitaḥ

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 54

एवं सम्पूज्य राजानं माथुराणां चमूमुखे ।कृत्वा सुमहदानन्दां मथुरां मधुसूदनः

evaṃ sampūjya rājānaṃ māthurāṇāṃ camūmukhe | kṛtvā sumahadānandāṃ mathurāṃ madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार मथुरावासियोंकी सेनाके मुहानेपर राजा उग्रसेनका सम्मान करके भगवान्‌ मधुसूदनने सारी मथुराको महान्‌ आनन्दसे परिपूर्ण करते हुए उसमें प्रवेश किया

अध्याय 110

श्लोक 55

दिव्याभरणमाल्यैश्च दिव्याम्बरविलेपनैः ।दीप्यमानाः समन्ताच्च देवा इव त्रिविष्टपे

divyābharaṇamālyaiśca divyāmbaravilepanaiḥ | dīpyamānāḥ samantācca devā iva triviṣṭape

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वर्गमें देवता शोभा पाते हैं, उसी प्रकार मधुरामें भगवान्‌ श्रीकृष्ण और वहाँके नागरिक दिव्य आभूषणों, दिव्य पुष्पोंकी मालाओं तथा दिव्य वस्त्र और चन्दनोंसे अलंकृत हो सब ओर प्रकाशित हो रहे थे

अध्याय 110

श्लोक 56

भेरीपटहनादेन शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।बृंहितेन च नागानां हयानां हेषितेन च

bherīpaṭahanādena śaṅkhadundubhiniḥsvanaiḥ | bṛṃhitena ca nāgānāṃ hayānāṃ heṣitena ca

श्लोक 56–57 का हिन्दी अर्थ

भेरी, पटह, शड् और दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हींसने, शूरवीरोंके सिंहनाद करने तथा रथके पहियोंकी घरघराहट होनेसे जो सम्मिलित महान्‌ शब्द होता था, वह आकाशभमें मेघोंकी गर्जनाके समान प्रतीत होता था

अध्याय 110

श्लोक 57

सिंहनादेन शूराणां रथनेमिस्वनेन च ।तुमुलः सुमहानासीन्मेघनाद इवाम्बरे

siṃhanādena śūrāṇāṃ rathanemisvanena ca | tumulaḥ sumahānāsīnmeghanāda ivāmbare

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 58

बन्दिभिः स्तूयमानं च नमश्चक्रुरपि प्रजाः ।दत्त्वा दानमनन्तं च न ययौ विस्मयं हरिः

bandibhiḥ stūyamānaṃ ca namaścakrurapi prajāḥ | dattvā dānamanantaṃ ca na yayau vismayaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

बन्दीजन भगवान्‌की स्तुति करते थे और प्रजावर्गके लोग उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उस समय धनका अनन्त दान करके भी श्रीहरिको कोई विस्मय या गर्व नहीं हुआ

अध्याय 110

श्लोक 59

स्वभावोन्नतभावत्वाद् दृष्टपूर्वात्ततोऽधिकम् ।अनहङ्कारभावाच्च विस्मयं न जगाम ह

svabhāvonnatabhāvatvād dṛṣṭapūrvāttato'dhikam | anahaṅkārabhāvācca vismayaṃ na jagāma ha

हिन्दी अर्थ

एक तो स्वभावसे ही उनका ऊँचा भाव था। वे उससे पहले उसकी अपेक्षा भी अधिक धनका दान देख चुके थे और स्वाभाविक ही उन्हें अहंकार छू नहीं गया था; इसलिये उनको विस्मय या गर्व नहीं हुआ

अध्याय 110

श्लोक 60

दीप्यमानं स्ववपुषा आयान्तं भास्करप्रभम् ।दृष्ट्वा मथुरवासिन्यो नमश्चक्रुः पदे पदे

dīpyamānaṃ svavapuṣā āyāntaṃ bhāskaraprabham | dṛṣṭvā mathuravāsinyo namaścakruḥ pade pade

हिन्दी अर्थ

अपने इस शरीरसे प्रकाशित होते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्णको आते देख मधुरावासी स्त्रियाँ पग-पगपर उन्हें नमस्कार करती थीं

अध्याय 110

श्लोक 61

एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः ।नागपर्यङ्कमुत्सृज्य प्राप्तोऽयं मथुरां पुरीम्

eṣa nārāyaṇaḥ śrīmān kṣīrārṇavaniketanaḥ | nāgaparyaṅkamutsṛjya prāpto'yaṃ mathurāṃ purīm

हिन्दी अर्थ

(उस समय मथुरावासी आपसभमें इस प्रकार कहते थे) “ये ही क्षीरसमुद्रमें निवास करनेवाले श्रीमान्‌ भगवान्‌ नारायण हैं, जो इस समय शेषशय्याका परित्याग करके मथुरापुरीमें आ गये हैं

अध्याय 110

श्लोक 62

बद्ध्वा बलिं महावीर्यं दुर्जयं त्रिदशैरपि ।शक्राय प्रददौ राज्यं त्रैलोक्यं वज्रपाणये

baddhvā baliṃ mahāvīryaṃ durjayaṃ tridaśairapi | śakrāya pradadau rājyaṃ trailokyaṃ vajrapāṇaye

हिन्दी अर्थ

इन्होंने देवताओंके लिये भी दुर्जय महापराक्रमी राजा बलिको बाँधकर वज़धारी इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य दे दिया था'

अध्याय 110

श्लोक 63

हत्वा दैत्यगणान् सर्वान् कंसं च बलिनां वरम् ।भोजराजाय मथुरां दत्त्वा केशिनिषूदनः

hatvā daityagaṇān sarvān kaṃsaṃ ca balināṃ varam | bhojarājāya mathurāṃ dattvā keśiniṣūdanaḥ

श्लोक 63–64 का हिन्दी अर्थ

मो कि “इन केशिनिषूदन केशवने समस्त दैत्यसमूहोंका वध करके बलवानोंमें श्रेष्ठ कंसको मारकर मथुराका ज्य भोजराज उग्रसेनको दे दिया; किंतु न तो स्वयं ये ाज्यपर अभिषिक्त हुए और न राजाके सिंहासनपर ही बैठे । इस समय राजेन्द्रपद प्राप्त करके ये मथुरामें प्रविष्ठ हुए हैं'

अध्याय 110

श्लोक 64

नाभिषिक्तः स्वयं राज्ये न चासीनो नृपासने ।राजेन्द्रत्वं च सम्प्राप्य मथुरामाविशत्ततः

nābhiṣiktaḥ svayaṃ rājye na cāsīno nṛpāsane | rājendratvaṃ ca samprāpya mathurāmāviśattataḥ

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 65

एवमन्योन्यसञ्जल्पं श्रुत्वा पुरनिवासिनाम् ।बन्दिमागधसूतानामिदमूचुर्गणाधिपाः

evamanyonyasañjalpaṃ śrutvā puranivāsinām | bandimāgadhasūtānāmidamūcurgaṇādhipāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आपसमें कही गयी पुरवासियोंकी बातें सुनकर सूत, मागध और बन्दी- जनोंके प्रधान लोग इस प्रकार कहने लगे—

अध्याय 110

श्लोक 66

किं वा शक्यामहे वक्तुं गुणानां ते गुणोदधे ।मानुषेणैकजिह्वेन प्रभावोत्साहसम्भवान्

kiṃ vā śakyāmahe vaktuṃ guṇānāṃ te guṇodadhe | mānuṣeṇaikajihvena prabhāvotsāhasambhavān

हिन्दी अर्थ

गुणसागर! हम मनुष्यको मिली हुई एक जिदह्नाके द्वारा भापके गुणोंका प्रभाव, उत्साह और प्राकट्य कैसे बता पकते हैं ?

अध्याय 110

श्लोक 67

स तत्र भोगी नागेन्द्रः कदाचिद्देव बुद्धिमान् ।द्विसाहस्रेण जिह्वेन वासुकिः कथयिष्यति

sa tatra bhogī nāgendraḥ kadāciddeva buddhimān | dvisāhasreṇa jihvena vāsukiḥ kathayiṣyati

हिन्दी अर्थ

देव ! कदाचित्‌ पाताललोकमें रहनेवाले सर्पशरीरधारी नागराज बुद्धिमानू वासुकि (शेष) अपनी रो हजार जिह्लाओंद्वारा आपके गुण-प्रभावका वर्णन कर सकेंगे

अध्याय 110

श्लोक 68

किं त्वद्भुतमिदं लोके मानवेन्द्रेषु भूतले ।न भूतं न भविष्यं च शक्रादासनमागतम्

kiṃ tvadbhutamidaṃ loke mānavendreṣu bhūtale | na bhūtaṃ na bhaviṣyaṃ ca śakrādāsanamāgatam

हिन्दी अर्थ

इस भूतलपर या जगतमें नरेशोंके लिये कभी इन्द्रलोकसे सिंहासन आया हो, यह अद्धुत बात न कभी हुई थी और न भविष्यमें कभी होनेवाली हे (किंतु आपने इस असम्भवको भी सम्भव कर देखाया)

अध्याय 110

श्लोक 69

सभावतरणं चैव कलशैरागतं स्वयम् ।न श्रुतं न च दृष्टं वा तेन मन्यामहेऽद्भुतम्

sabhāvataraṇaṃ caiva kalaśairāgataṃ svayam | na śrutaṃ na ca dṛṣṭaṃ vā tena manyāmahe'dbhutam

हिन्दी अर्थ

स्वर्गसे सभाभवनका उतरना और आकाशमें देव्य कलशोंका प्रकट होकर स्वयं ही अभिषेक करना | तो किसीने देखा था और न कभी सुननेमें ही आया था। इसलिये हम इस घटनाको अद्भुत मानते हैं

अध्याय 110

श्लोक 70

धन्या देवी महाभागा देवकी योषितां वरा ।भवन्तं त्रिदशश्रेष्ठं धृत्वा गर्भेण केशवम्

dhanyā devī mahābhāgā devakī yoṣitāṃ varā | bhavantaṃ tridaśaśreṣṭhaṃ dhṛtvā garbheṇa keśavam

श्लोक 70–71 का हिन्दी अर्थ

ुवतियोंमें श्रेष्ठ महाभागा देवकीदेवी धन्य हैं, जिन्होंने भाप देवप्रवर केशवको गर्भमें धारण करनेका महान्‌ मौभाग्य प्राप्त किया और अब वे अपने ख्रेहपूर्ण नेत्रोंसे मापके श्यामसुन्दर कमल-नयन शोभाधाम देवपूजित [खारविन्दको निहारा करती हैं '

अध्याय 110

श्लोक 71

कृष्णं पद्मपलाशाक्षं श्रीपुञ्जममरार्चितम् ।नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम्

kṛṣṇaṃ padmapalāśākṣaṃ śrīpuñjamamarārcitam | netrābhyāṃ snehapūrṇābhyāṃ vīkṣate mukhapaṅkajam

अर्थ श्लोक 70 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 72

इति सञ्जल्पमानानां शृण्वन्तौ पृथगीरितम् ।उग्रसेनं पुरस्कृत्य भ्रातरौ रामकेशवौ

iti sañjalpamānānāṃ śṛṇvantau pṛthagīritam | ugrasenaṃ puraskṛtya bhrātarau rāmakeśavau

श्लोक 72–75 का हिन्दी अर्थ

ऐसी बातें हहनेवाले सूत, मागध और बन्दियोंके पृथक्‌-पृथक्‌ चनोंको सुनते हुए दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण ग्रसेनको आगे करके नगरकी चहारदिवारीके दरवाजेपर मा पहुँचे । उस समय बुद्धिमान्‌ राजा उग्रसेनने भगवान्‌ गीकृष्णके रथके आगे खड़ा होकर कहा—' पाद्य लाओ, द्य लाओ।' फिर स्वयं ही पाद्य, अर्ध्य और आचमन कर उनका पूजन किया। तत्पश्चात्‌ श्रीकृष्णको सिरसे णाम करके वे पराक्रमी राजा उग्रसेन हाथीपर चढ़ ये और जैसे मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार | सुवर्णमय जलकी वर्षा करने लगे। उस वर्षाके साथ श्रीकृष्ण अपने पिताके घर जा पहुँचे

अध्याय 110

श्लोक 73

प्राकारद्वारि सम्प्राप्तावर्चयामास वै तदा ।अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा पाद्यं पाद्येति चाब्रवीत्

prākāradvāri samprāptāvarcayāmāsa vai tadā | arghyamācamanaṃ dattvā pādyaṃ pādyeti cābravīt

अर्थ श्लोक 72 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 74

उग्रसेनस्ततो धीमान् केशवस्य रथाग्रतः ।प्रणम्य शिरसा कृष्णं गजमारुह्य वीर्यवान्

ugrasenastato dhīmān keśavasya rathāgrataḥ | praṇamya śirasā kṛṣṇaṃ gajamāruhya vīryavān

अर्थ श्लोक 72 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 75

घनवत् तोयधारेण ववर्ष कनकाम्बुभिः ।घनौघैर्वर्षमाणस्तु सम्प्राप्तः पितृवेश्मनि

ghanavat toyadhāreṇa vavarṣa kanakāmbubhiḥ | ghanaughairvarṣamāṇastu samprāptaḥ pitṛveśmani

अर्थ श्लोक 72 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 76

मथुराधिपतिः श्रीमानुवाच मधुसूदनम् ।राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य युक्तं मे नृपवेश्मनि

mathurādhipatiḥ śrīmānuvāca madhusūdanam | rājendratvamanuprāpya yuktaṃ me nṛpaveśmani

श्लोक 76–89 का हिन्दी अर्थ

वहाँ श्रीमान्‌ मथुरानरेश उग्रसेनने मधुसूदन श्रीकृष्णसे कहा—प्रभो! आपने राजेन्द्रका पद प्राप्त किया है; अतः आपके लिये यही उचित है कि आप देवराज इन्द्रके दिये हुए सिंहासनको इस राजमहलमें स्थापित करें। ' भगवन्‌! आप ही मथुराके स्वामी हैं। आपने यहाँकी राजसभाको अपनी भुजाओंके बलसे प्राप्त किया है। मैं आपको उस सभामें ले चलूँगा। एवं अपने व्यवहारोंसे आपको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करूँगा। आप मुझपर क्रोध न करें। प्रजानाथ! देवकी, वसुदेव और रोहिणी—ये हर्षके उद्रेकसे मोहित हो गये थे; अत: उस समय कुछ भी न कर सके। राजन्‌ ! तब कंसकी माता पद्मावतीने भगवान्‌ केशवका पूजन किया और कंस अनेक देशोंसे जिस धनको जीतकर लाया था, उसे देशकालका विचार करके श्रीकृष्णके युगल चरणोंमें निछावर कर दिया। इस समय श्रीकृष्णने राजा उग्रसेनको बुलाकर मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ॥ ७६-८० डर ॥ श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं मथुराका राज्य नहीं चाहता। मैंने धनकी अभिलाषासे आपके पुत्रका वध नहीं किया है। यह कालसे ही मृत्युको प्राप्त हुआ है। राजन्‌! आप नाना प्रकारके यज्ञ कीजिये, प्रचुर धनका दान दीजिये और मेरे बाहुबलका आश्रय लेकर शत्रुओंकी सेनाओंपर विजय पाइये। आप मानसिक संतापको त्याग दीजिये। कंस-वधजनित भयको मनसे निकाल दीजिये तथा मेरी दी हुई इस धनराशिको पुन: अपने ही भवनमें ले जाइये । इस तरह राजा उम्रसेनको आश्वासन दे श्रीमान्‌ श्रीकृष्ण हलधरके साथ माता-पिताके पास गये। वहाँ उन दोनों महाबली वीरोंने आनन्दपूर्ण हृदयसे विनीत होकर माता-पिताके चरणोंमें नमस्कार किया। उस मुहूर्तमें मथुरा नगरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो अमरावतीपुरी स्वर्गलोकका परित्याग करके भूतलपर उतर आयी हो। वसुदेवके घरकी ओर देखकर पुरवासी अपने मनमें सोचने लगे कि यह भूलोक नहीं देवलोक है। उस समय रानीसहित मथुरानरेशको विदा करके दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण वसुदेवके घरमें प्रविष्ठ हुए और अस्त्र-शस्त्र रखकर अपने घरमें इच्छानुसार बिचरने लगे

अध्याय 110

श्लोक 77

स्थापितुं देवराजेन दत्तं सिंहासनं प्रभो ।नेष्यामि मथुरेशस्य सभां भुजबलार्जिताम्

sthāpituṃ devarājena dattaṃ siṃhāsanaṃ prabho | neṣyāmi mathureśasya sabhāṃ bhujabalārjitām

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 78

प्रसादयिष्ये भगवन् न कोपं कर्तुमर्हसि ।देवकी वसुदेवश्च रोहिणी च विशाम्पते

prasādayiṣye bhagavan na kopaṃ kartumarhasi | devakī vasudevaśca rohiṇī ca viśāmpate

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 79

न किञ्चित्करणे शक्ता हर्षक्लमविमोहिता ।कंसमाता ततो राजन्नर्चयामास केशवम्

na kiñcitkaraṇe śaktā harṣaklamavimohitā | kaṃsamātā tato rājannarcayāmāsa keśavam

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 80

नानादिग्देशजानीतं कंसेनोपार्जितं धनम् ।देशकालं समालोक्य पादयुग्मे न्यवेदयत्

nānādigdeśajānītaṃ kaṃsenopārjitaṃ dhanam | deśakālaṃ samālokya pādayugme nyavedayat

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 81

उग्रसेनं समाहूय उवाच श्लक्ष्णया गिरा ।न चाहं मथुराकाङ्क्षी न मया वित्तकाङ्क्षया

ugrasenaṃ samāhūya uvāca ślakṣṇayā girā | na cāhaṃ mathurākāṅkṣī na mayā vittakāṅkṣayā

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 82

घातितस्तव पुत्रोऽयं कालेन निधनं गतः ।यजस्व विविधान्यज्ञान् ददस्व विपुलं धनम्

ghātitastava putro'yaṃ kālena nidhanaṃ gataḥ | yajasva vividhānyajñān dadasva vipulaṃ dhanam

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 83

जयस्व रिपुसैन्यानि मम बाहुबलाश्रयात् ।त्यजस्व मनसस्तापं कंसनाशोद्भवं भयम्

jayasva ripusainyāni mama bāhubalāśrayāt | tyajasva manasastāpaṃ kaṃsanāśodbhavaṃ bhayam

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 84

नयस्व वित्तनिचयं मया दत्तं पुनस्तव ।इति प्राश्वास्य राजानं कृष्णस्तु हलिना सह

nayasva vittanicayaṃ mayā dattaṃ punastava | iti prāśvāsya rājānaṃ kṛṣṇastu halinā saha

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 85

प्रविवेश ततः श्रीमान् मातापित्रोरथान्तिकम् ।आनन्दपरिपूर्णाभ्यां हृदयाभ्यां महाबलौ

praviveśa tataḥ śrīmān mātāpitrorathāntikam | ānandaparipūrṇābhyāṃ hṛdayābhyāṃ mahābalau

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 86

पितृमात्रोस्तु पादान् वै नमश्चक्रतुरानतौ ।तस्मिन् मुहूर्ते नगरी मथुरा तु बभूव सा

pitṛmātrostu pādān vai namaścakraturānatau | tasmin muhūrte nagarī mathurā tu babhūva sā

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 87

स्वर्गलोकं परित्यज्यावतीर्णेवामरावती ।वसुदेवस्य भवनं समीक्ष्य पुरवासिनः

svargalokaṃ parityajyāvatīrṇevāmarāvatī | vasudevasya bhavanaṃ samīkṣya puravāsinaḥ

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 88

मनसा चिन्तयामासुर्देवलोकं न भूतलम् ।विसृज्य मथुरेशं तु महिषीसहितं तदा

manasā cintayāmāsurdevalokaṃ na bhūtalam | visṛjya mathureśaṃ tu mahiṣīsahitaṃ tadā

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 89

भवनं वसुदेवस्य प्रविश्य बलकेशवौ ।न्यस्तशस्त्रावुभौ वीरौ स्वगृहे स्वैरचारिणौ

bhavanaṃ vasudevasya praviśya balakeśavau | nyastaśastrāvubhau vīrau svagṛhe svairacāriṇau

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 90

ततः कृताह्निकौ भूत्वा सुखासीनौ कथान्तरे ।एतस्मिन्नेव काले तु महोत्पातो बभूव ह

tataḥ kṛtāhnikau bhūtvā sukhāsīnau kathāntare | etasminneva kāle tu mahotpāto babhūva ha

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर नित्य कर्म करके सुखपूर्वक बैठकर जब वे दोनों बातचीत करने लगे, इसी समय वहाँ महान्‌ उत्पात प्रकट हुआ

अध्याय 110

श्लोक 91

बभ्रमुश्च घनाकाशे चेलुश्च भुवि पर्वताः ।समुद्राः क्षुभिताः सर्वे विभ्रान्तो भोगिनां वरः

babhramuśca ghanākāśe celuśca bhuvi parvatāḥ | samudrāḥ kṣubhitāḥ sarve vibhrānto bhogināṃ varaḥ

श्लोक 91–108 का हिन्दी अर्थ

गरुड़ बोले—देव! आप देवताओंके भी देवता । आपको नमस्कार करके मैं आपके निकटसे पहीके रहनेयोग्य निवासभूमिका निरीक्षण करनेके नये कुशस्थलीकी ओर चला गया था। सुरश्रेष्ठ ! वहाँ [कर आकाशका आश्रय ले सब ओरसे निरीक्षण रके मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि वहाँ सभी शुभ क्षणोंसे सम्पन्न एवं सम्मानित पुरीका निर्माण हो सकता. - । कुशस्थलीके बहुत-से प्रदेश सागरके समीप होनेसे लप्राय हैं। वहाँकी भूमि पूर्व और उत्तरकी ओरसे छ ढालू और शीतल है। वह सब ओरसे समुद्रके चमें है, इस कारण वहाँ बसी हुई पुरीका भेदन ररना देवताओंके लिये भी असम्भव होगा। वहाँ जो री बनेगी, वह सब प्रकारके रत्लोंकी खान होगी। वहाँके क्ष सम्पूर्ण मनोवाज्छित कामनाओंको फलके रूपमें दान करनेवाले होंगे। सभी ऋतुओं में खिलनेवाले फूल स पुरीकी शोभा बढ़ायेंगे। वह सब ओरसे अत्यन्त नोहर होगी । वहाँ सभी आश्रमोंके लोग निवास करेंगे । ह पुरी समस्त कमनीय गुणोंसे अलंकृत होगी। असंख्य र-नारियोंसे भरी रहकर सदा ही आमोद-प्रमोदको ढ़ानेवाली होगी। वह नगरी परकोटों, खाइयों, गोपुरों गैर अट्टालिकाओंकी पड़क्तियोंसे सुशोभित होगी। सकी सड़कें और चौराहे अद्भुत शोभासे सम्पन्न ोंगे। उस पुरीके द्वार एवं फाटक बहुत बड़े-बड़े ोंगे। विचित्र-विचित्र यन्त्रों और अर्गलाओंसे वह पम्पन्न होगी। सोनेकी चहारदीवारी उसकी शोभा ढ़ायेगी

अध्याय 110

श्लोक 92

कम्पिता यादवाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि ।तौ तान्निपतितान्दृष्ट्वा रामकृष्णौ तु निश्चलौ

kampitā yādavāḥ sarve nyubjāśca patitā bhuvi | tau tānnipatitāndṛṣṭvā rāmakṛṣṇau tu niścalau

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 93

महता पक्षवातेन विज्ञातौ पतगोत्तमम् ।ददर्श समनुप्राप्तं दिव्यस्रगनुलेपनम्

mahatā pakṣavātena vijñātau patagottamam | dadarśa samanuprāptaṃ divyasraganulepanam

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 94

प्रणम्य शिरसा ताभ्यां सौम्यरूपी कृतासनः ।तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं सचिवं साम्परायिकम्

praṇamya śirasā tābhyāṃ saumyarūpī kṛtāsanaḥ | taṃ dṛṣṭvā samanuprāptaṃ sacivaṃ sāmparāyikam

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 95

धृतिमन्तं गरुत्मन्तमुवाच बलिसूदनः ।स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन

dhṛtimantaṃ garutmantamuvāca balisūdanaḥ | svāgataṃ khecaraśreṣṭha surasenārimardana

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 96

विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय ।तमुवाच ततः कृष्णः स्थितं देहमिवापरम्

vinatāhṛdayānanda svāgataṃ keśavapriya | tamuvāca tataḥ kṛṣṇaḥ sthitaṃ dehamivāparam

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 97

तुल्यसामर्थ्यया वाचा आसीनं विनतात्मजम् ।यास्यामः पतगश्रेष्ठ भोजस्यान्तःपुरं महत्

tulyasāmarthyayā vācā āsīnaṃ vinatātmajam | yāsyāmaḥ patagaśreṣṭha bhojasyāntaḥpuraṃ mahat

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 98

तत्र गत्वा सुखासीना मन्त्रयामो मनोगतम् ।प्रविष्टौ तौ महावीर्यौ बलदेवजनार्दनौ

tatra gatvā sukhāsīnā mantrayāmo manogatam | praviṣṭau tau mahāvīryau baladevajanārdanau

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 99

वैनतेयतृतीयौ च गुह्यं मन्त्रमथाब्रुवन् ।अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम्

vainateyatṛtīyau ca guhyaṃ mantramathābruvan | avadhyo'sau kṛto'smākaṃ sumahacca riporbalam

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 100

वृतः सैन्येन महता महद्भिश्च नराधिपैः ।बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि

vṛtaḥ sainyena mahatā mahadbhiśca narādhipaiḥ | bahulāni ca sainyāni hantuṃ varṣaśatairapi

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 101

न शक्ष्यामः क्षयं कर्तुं जरासन्धस्य वाहिनीम् ।अतोऽर्थं वैनतेय त्वां ब्रवीमि मथुरां पुरीम्

na śakṣyāmaḥ kṣayaṃ kartuṃ jarāsandhasya vāhinīm | ato'rthaṃ vainateya tvāṃ bravīmi mathurāṃ purīm

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 102

वसतोरावयोः श्रेयो न भवेदिति मे मतिः ।देवदेवं नमस्कृत्य गतोऽहं भवतोऽन्तिकात्

vasatorāvayoḥ śreyo na bhavediti me matiḥ | devadevaṃ namaskṛtya gato'haṃ bhavato'ntikāt

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 103

वासार्थमीक्षितुं भूमिं तव देव कुशस्थलीम् ।गत्वाहं खे समास्थाय समन्तादवलोक्य ताम्

vāsārthamīkṣituṃ bhūmiṃ tava deva kuśasthalīm | gatvāhaṃ khe samāsthāya samantādavalokya tām

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 104

दृष्ट्वाहं विबुधश्रेष्ठ पुरीं लक्षणपूजिताम् ।सागरानूपविपुलां प्रागुदक्प्लवशीतलाम्

dṛṣṭvāhaṃ vibudhaśreṣṭha purīṃ lakṣaṇapūjitām | sāgarānūpavipulāṃ prāgudakplavaśītalām

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 105

सर्वतोदधिमध्यस्थामभेद्यां त्रिदशैरपि ।सर्वरत्नाकरवतीं सर्वकामफलद्रुमाम्

sarvatodadhimadhyasthāmabhedyāṃ tridaśairapi | sarvaratnākaravatīṃ sarvakāmaphaladrumām

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 106

सर्वर्तुकुसुमाकीर्णां सर्वतः सुमनोहराम् ।सर्वाश्रमाधिवासां च सर्वकामगुणैर्युताम्

sarvartukusumākīrṇāṃ sarvataḥ sumanoharām | sarvāśramādhivāsāṃ ca sarvakāmaguṇairyutām

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 107

नरनारीसमाकीर्णां नित्यामोदविवर्द्धिनीम् ।प्राकारपरिखोपेतां गोपुराट्टालमालिनीम्

naranārīsamākīrṇāṃ nityāmodavivarddhinīm | prākāraparikhopetāṃ gopurāṭṭālamālinīm

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 108

विचित्रचत्वरपथां विपुलद्वारतोरणाम् ।यन्त्रार्गलविचित्राख्यां हेमप्राकारशोभिताम्

vicitracatvarapathāṃ vipuladvāratoraṇām | yantrārgalavicitrākhyāṃ hemaprākāraśobhitām

अर्थ श्लोक 91 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 109

नरनागाश्वकलिलां रथसैन्यसमाकुलाम् ।नानादिग्देशजाकीर्णां दिव्यपुष्पफलद्रुमाम्

naranāgāśvakalilāṃ rathasainyasamākulām | nānādigdeśajākīrṇāṃ divyapuṣpaphaladrumām

हिन्दी अर्थ

हाथी, घोड़े, मनुष्य और शोंकी सेनासे वह पुरी व्याप्त रहेगी। विभिन्न दिशाओं भौर देशोंके लोगों तथा वहाँ उत्पन्न हुए पदार्थोंसे वह परी होगी। दिव्य पुष्प और फल देनेवाले देववृक्ष इसकी शोभा बढ़ायेंगे

अध्याय 110

श्लोक 110

पताकाध्वजमालाढ्यां महाभवनशालिनीम् ।भीषणीं रिपुसङ्घानां मित्राणां हर्षवर्द्धनीम्

patākādhvajamālāḍhyāṃ mahābhavanaśālinīm | bhīṣaṇīṃ ripusaṅghānāṃ mitrāṇāṃ harṣavarddhanīm

हिन्दी अर्थ

वह नगरी ध्वजा- पताकाओंकी पड़क्तियोंसे अलंकृत तथा बड़े-बड़े भवनोंसे पुशोभित होगी। शत्रु-समूहोंका भय और मित्रोंका हर्ष बढ़ाती रहेगी

अध्याय 110

श्लोक 111

मनुजेन्द्राधिवासेभ्यो विशिष्टां नगरोत्तमाम् ।रैवतं च गिरिश्रेष्ठं कुरु देव सुरालयम्

manujendrādhivāsebhyo viśiṣṭāṃ nagarottamām | raivataṃ ca giriśreṣṭhaṃ kuru deva surālayam

श्लोक 111–112 का हिन्दी अर्थ

देव! अबतक नरेन्द्रके जितने भ्धिवास हैं, उन सबसे वह पुरी विशिष्ट होगी। देवताओंका निवासस्थान जो गिरिश्रेष्ठ रैवतक है, उसको और वहाँके नन्दनवन-सदूश दिव्य वनको अपने नगरद्वारका भूषण बनाइये। सुस्त्रेष्ठ वहीं चलकर आप निवास कीजिये

अध्याय 110

श्लोक 112

नन्दनप्रतिमं दिव्यं पुरद्वारस्य भूषणम् ।कारयस्वाधिवासं च तत्र गत्वा सुरोत्तम

nandanapratimaṃ divyaṃ puradvārasya bhūṣaṇam | kārayasvādhivāsaṃ ca tatra gatvā surottama

अर्थ श्लोक 111 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 113

कुमारीणां प्रचारश्च सुरमण्यो भविष्यति ।नाम्ना द्वारवती ज्ञेया त्रिषु लोकेषु विश्रुता

kumārīṇāṃ pracāraśca suramaṇyo bhaviṣyati | nāmnā dvāravatī jñeyā triṣu lokeṣu viśrutā

श्लोक 113–127 का हिन्दी अर्थ

पढ9 वहाँ कुमारियोंका अत्यन्त मनोहर ढंगसे घूमना- फरना हो सकेगा। उस पुरीका नाम होगा द्वारवती या रका, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगी । वह पुरी इन्द्रकी ममरावतीके समान परम रमणीय होगी। यदि महासागर ललसे ढकी हुई भूमि (-का कुछ भाग) दे देगा, तो हाँ उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न पुरीका निर्माण हो सकेगा। आक्षात्‌ विश्वकर्मा पधारकर वहाँ आपकी इच्छाके अनुसार ना प्रकारके शिल्प-कर्म करेंगे। प्रभो! आप मणि, ती, मुँगा, हीरा, वैदूर्य तथा दिव्य भावोंसे युक्त त्रिलोकीके नन्यान्य दिव्य रॉद्वारा ऐसे महल बनवाइये, जो स्वर्गलोककी व-सभाओंके समान शोभा पा रहे हों। उनमें सैकड़ों द्व्य खम्भे लगे हों। वे महल सोनेकी ईंटोंसे बने हों और उन्हें सब प्रकारके रत्रोंसे विभूषित किया गया हो। शुभ्र प्रासाद दिव्य ध्वजा और पताकाओंसे अलंकृत ं । चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते हों और देव- न्धर्व उनकी रक्षामें तत्पर रहें ॥ १४३—११७ नि ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार ीकृष्णके प्रति अपना मनोभाव प्रकट करके विनता- न्दन गरुड़ने सिर झुकाकर उन दोनों भाइयोंको णाम किया। फिर वे अपने आसनपर बैठ गये। राजन्‌! फर बलरामसहित श्रीकृष्णने भी गरुड़की कही हुई हितकर ततपर विचार करके उसे प्रकाशित करनेकी इच्छा की पौर बहुमूल्य सुन्दर आभूषणोंद्वारा विनतानन्दन गरुड़का त्रधिवत्‌ सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया। तत्पश्चात्‌ वलोकमें विहार करनेवाले दो अमरोंकी भाँति वे दोनों आई मथुरामें सुख और आनन्दके साथ रहने लगे। गरुड़का ह वचन सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन श्रीकृष्णसे मेह और विश्वासपूर्वक यह अमृतके समान मधुर वचन ले—' श्रीकृष्ण ! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु कृष्ण ! शत्रुसूदन ! आज मैं तुमसे जो बात कहता हूँ, से सुनो॥ ११८—१२२ टू॥ “जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं खसे नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार तुमसे बिछुड़कर म समस्त यादव इस नगर या राज्यमें सुखसे नहीं ह सकते हैं। दूसरोंको मान देनेवाले तात! हम तुमसे [नाथ होकर तुम्हारे बाहुबलका आश्रय ले नरेन्द्रोंकी तो तत ही क्या है, इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंसे भी नहीं ते हैं ॥१२३-१२४ ट ॥। यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर! तुम विजयके लिये जहाँ- जहाँ जाओ, वहाँ हम सबको साथ लिये चलो'। राजा उग्रसेनकी बात सुनकर देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण मुसकराकर बोले—राजन्‌ ! अब आपकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं है'

अध्याय 110

श्लोक 114

भविष्यति पुरी रम्या शक्रस्येवामरावती ।यदि स्यात् संवृतां भूमिं प्रदास्यति महोदधिः

bhaviṣyati purī ramyā śakrasyevāmarāvatī | yadi syāt saṃvṛtāṃ bhūmiṃ pradāsyati mahodadhiḥ

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 115

यथेष्टं विविधं कर्म विश्वकर्मा करिष्यति ।मणिमुक्ताप्रवालाभिर्वज्रवैदूर्यसप्रभैः

yatheṣṭaṃ vividhaṃ karma viśvakarmā kariṣyati | maṇimuktāpravālābhirvajravaidūryasaprabhaiḥ

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 116

दिव्यैरभिप्राययुतैर्दिव्यरत्नैस्त्रिलोकजैः ।दिव्यस्तम्भशताकीर्णान् स्वर्गे देवसभोपमान्

divyairabhiprāyayutairdivyaratnaistrilokajaiḥ | divyastambhaśatākīrṇān svarge devasabhopamān

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 117

जाम्बुनदमयाञ्छुभ्रान् सर्वरत्नविभूषितान् ।दिव्यध्वजपताकाढ्यान् देवगन्धर्वपालितान्

jāmbunadamayāñchubhrān sarvaratnavibhūṣitān | divyadhvajapatākāḍhyān devagandharvapālitān

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 118

चन्द्रसूर्यप्रतीकाशान् प्रासादान् कारय प्रभो ।एवं कृत्वा तु सङ्कल्पं वैनतेयोऽथ केशवम्

candrasūryapratīkāśān prāsādān kāraya prabho | evaṃ kṛtvā tu saṅkalpaṃ vainateyo'tha keśavam

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 119

प्रणम्य शिरसा ताभ्यां निषसाद कृतासनः ।कृष्णोऽपि रामसहितो विचिन्त्य हितमीरितम्

praṇamya śirasā tābhyāṃ niṣasāda kṛtāsanaḥ | kṛṣṇo'pi rāmasahito vicintya hitamīritam

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 120

प्रकाशकर्तुकामौ तौ विसृज्य विनतात्मजम् ।सत्कृत्य विधिवद् राजन् महार्हवरभूषणैः

prakāśakartukāmau tau visṛjya vinatātmajam | satkṛtya vidhivad rājan mahārhavarabhūṣaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 121

मोदेते सुखिनौ तत्र सुरलोके यथामरौ ।तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः

modete sukhinau tatra suraloke yathāmarau | tasya tad vacanaṃ śrutvā bhojarājo mahāyaśāḥ

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 122

कृष्णं स्नेहेन विस्रब्धं बभाषे वचनामृतम् ।कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन

kṛṣṇaṃ snehena visrabdhaṃ babhāṣe vacanāmṛtam | kṛṣṇa kṛṣṇa mahābāho yadūnāṃ nandivarddhana

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 123

श्रूयतां वचनं त्वाद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ।त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम्

śrūyatāṃ vacanaṃ tvādya vakṣyāmi ripusūdana | tvayā vihīnāḥ sarve sma na śaktāḥ sukhamāsitum

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 124

पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ।त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः

pure'smin viṣayānte vā patihīnā iva striyaḥ | tvatsanāthā vayaṃ tāta tvadbāhubalamāśritāḥ

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 125

बिभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ।विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि

bibhīmo na narendrāṇāṃ sendrāṇāmapi mānada | vijayāya yaduśreṣṭha yatra yatra gamiṣyasi

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 126

तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ।तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः

tatra tvaṃ sahito'smābhirgacchethā yādavarṣabha | tasya rājño vacaḥ śrutvā sasmitaṃ devakīsutaḥ

अर्थ श्लोक 113 के साथ

अध्याय 110

श्लोक 127

यथेष्टं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम्

yatheṣṭaṃ bhavatāmadya tathā kartāsmyasaṃśayam

अर्थ श्लोक 113 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.