Harivamsha Purana
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अध्याय 111 / 318

Parva 2, Adhyāya 56

35 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ35 श्लोक

अध्याय 111

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्याज्ञया यादवानां द्वारकापुरीं प्रस्थानं कस्यचित्त्वथ कालस्य सभ्यांस्तान् यदुसंसदि ।बभाषे पुण्डरीकाक्षो हेतुमद्वाक्यमुत्तमम्

śrīkṛṣṇasyājñayā yādavānāṃ dvārakāpurīṃ prasthānaṃ kasyacittvatha kālasya sabhyāṃstān yadusaṃsadi | babhāṣe puṇḍarīkākṣo hetumadvākyamuttamam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर किसी समय कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णने यादवोंकी सभामें बैठे हुए समस्त सभासदोंसे यह हेतुयुक्त उत्तम वचन कहा-

अध्याय 111

श्लोक 2

यादवानामियं भूमिर्मथुरा राष्ट्रमालिनी ।वयं चैवेह सम्भूता व्रजे च परिवर्द्धिताः

yādavānāmiyaṃ bhūmirmathurā rāṣṭramālinī | vayaṃ caiveha sambhūtā vraje ca parivarddhitāḥ

हिन्दी अर्थ

यह राष्ट्रकी मालासे अलंकृत (समूचे राष्ट्रको मालाकी भाँति धारण करनेवाली राजधानी ) मथुरापुरी यादवोंकी भूमि है। हम भी यहीं पैदा हुए हैं और इसीके ब्रजमें पलकर बड़े हुए हैं

अध्याय 111

श्लोक 3

तदिदानीं गतं दुःखं शत्रवश्च पराजिताः ।नृपेषु जनितं वैरं जरासन्धेन विग्रहः

tadidānīṃ gataṃ duḥkhaṃ śatravaśca parājitāḥ | nṛpeṣu janitaṃ vairaṃ jarāsandhena vigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

इस समय हमारा सारा दुःख दूर हो गया है। हमारे शत्रु भी हमसे हार मान चुके हैं। हमने राजाओंसे वैर मोल ले लिया और जरासंधसे लड़ाई छेड़ दी है

अध्याय 111

श्लोक 4

वाहनानि च नः सन्ति पादातं चाप्यनन्तकम् ।रत्नानि च विचित्राणि मित्राणि च बहूनि च

vāhanāni ca naḥ santi pādātaṃ cāpyanantakam | ratnāni ca vicitrāṇi mitrāṇi ca bahūni ca

हिन्दी अर्थ

हमारे पास पर्यास वाहन हैं। पैदलोंकी संख्या भी अनन्त है। हमारे खजानेमें विचित्र रत्र हैं तथा हमारे मित्रोंकी संख्या भी बहुत है

अध्याय 111

श्लोक 5

इयं च माथुरी भूमिरल्पा गम्या परस्य तु ।वृद्धिश्चैव परास्माकं बलतो मित्रतस्तथा

iyaṃ ca māthurī bhūmiralpā gamyā parasya tu | vṛddhiścaiva parāsmākaṃ balato mitratastathā

हिन्दी अर्थ

परंतु यह मथुराकी भूमि बहुत छोटी है और शत्रुका सुगमतापूर्वक इसमें प्रवेश हो जाता है। इधर हमारे सैनिकों और मित्रोंकी बहुत अधिक वृद्धि हुई है

अध्याय 111

श्लोक 6

कुमारकोट्यो याश्चेमाः पदातीनां गणाश्च ये ।एषामपीह वसतां सम्मर्दमुपलक्षये

kumārakoṭyo yāścemāḥ padātīnāṃ gaṇāśca ye | eṣāmapīha vasatāṃ sammardamupalakṣaye

हिन्दी अर्थ

हमारे पास जो ये एक करोड़ कुमार (अविवाहित) सैनिक हैं तथा ये जो पैदलोंके बहुत-से दल हैं, इनके भी यहीं रहनेसे यहाँ बड़ी भीड़-भाड़ दिखायी देती है

अध्याय 111

श्लोक 7

अत्र नो रोचते मह्यं निवासो यदुपुङ्गवाः ।पुरीं निवेशयिष्यामि मम तत्क्षन्तुमर्हथ

atra no rocate mahyaṃ nivāso yadupuṅgavāḥ | purīṃ niveśayiṣyāmi mama tatkṣantumarhatha

हिन्दी अर्थ

अत: यदुपुद्भवो! अब यहाँ निवास करना मुझे अच्छा नहीं लगता है; इसलिये मैं दूसरी पुरी बसाऊँगा। मेरी इस धृष्टताको आपलोग क्षमा करेंगे '

अध्याय 111

श्लोक 8

एतद् यदनुरूपं वो ममाभिप्रायजं वचः ।भवाय भवतां काले यदुक्तं यदुसंसदि

etad yadanurūpaṃ vo mamābhiprāyajaṃ vacaḥ | bhavāya bhavatāṃ kāle yaduktaṃ yadusaṃsadi

हिन्दी अर्थ

मोडध्याय: + पड इस यादवसभामें मेरे हार्दिक अभिप्रायके अनुसार जो बात कही गयी है, वह समयानुसार आपलोगोंके उद्धवके लिये ही है। यदि आपलोगोंको अनुकूल जँचती हो तो कहिये

अध्याय 111

श्लोक 9

तमूचुर्यादवाः सर्वे हृष्टेन मनसा तदा ।साध्यतां यदभिप्रेतं जनस्यास्य भवाय वै

tamūcuryādavāḥ sarve hṛṣṭena manasā tadā | sādhyatāṃ yadabhipretaṃ janasyāsya bhavāya vai

हिन्दी अर्थ

तब समस्त यादव प्रसन्न मनसे बोल उठे-“'प्रभो! इस यादव-समाजके उद्धवके लिये आपको जो अभीष्ट हो, वह कार्य कीजिये

अध्याय 111

श्लोक 10

ततः सम्मन्त्रयामासुर्वृष्णयो मन्त्रमुत्तमम् ।अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम्

tataḥ sammantrayāmāsurvṛṣṇayo mantramuttamam | avadhyo'sau kṛto'smākaṃ sumahacca riporbalam

हिन्दी अर्थ

तब समस्त वृष्णिवंशी मिलकर उत्तम मन्त्रणा करने लगे-'यह जरासंध (या कालयवन) हमलोगोंके लिये अवध्य कर दिया गया है। हमारे उस शत्रुका सैनिक बल बहुत बड़ा है

अध्याय 111

श्लोक 11

कृतः सैन्यक्षयश्चापि महानिह नराधिपैः ।बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ।न शक्ष्यामो ह्यतस्तेषामपयानेऽभवन्मतिः

kṛtaḥ sainyakṣayaścāpi mahāniha narādhipaiḥ | bahulāni ca sainyāni hantuṃ varṣaśatairapi | na śakṣyāmo hyatasteṣāmapayāne'bhavanmatiḥ

हिन्दी अर्थ

हमारे पक्षके नरेशोंने शत्रुकी उस सेनाका बड़ा भारी विनाश किया है तो भी उसके पास अभी बहुत-सी सेनाएँ हैं, जिन्हें हमलोग सौ वर्षोंमें भी नहीं मार सकते। अत: हमारा विचार उनसे हट जानेके लिये हो गया है'

अध्याय 111

श्लोक 12

तस्मिंश्चैवान्तरे राजा सकालयवनस्तदा ।सैन्येन तद्विधेनैव मथुरामभ्युपागमत्

tasmiṃścaivāntare rājā sakālayavanastadā | sainyena tadvidhenaiva mathurāmabhyupāgamat

हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें कालयवनसहित राजा जरासंध फिर वैसी ही सेना साथ लेकर मथुरापर चढ़ आया

अध्याय 111

श्लोक 13

ततो जरासन्धबलं दुर्निवार्यमभूत् तदा ।ते कालयवनं चैव श्रुत्वेदं प्रतिपेदिरे

tato jarāsandhabalaṃ durnivāryamabhūt tadā | te kālayavanaṃ caiva śrutvedaṃ pratipedire

हिन्दी अर्थ

उस समय मथुराके सैनिकोंके लिये जरासंधकी सेनाको ही रोकना अत्यन्त कठिन कार्य था। फिर जब यादवोंने कालयवनका भी आगमन सुना, तब तो उन्होंने मथुरासे हट जाना ही अपने लिये श्रेयस्कर समझा

अध्याय 111

श्लोक 14

केशवः पुनरेवाह यादवान् सत्यसङ्गरः ।अद्यैव दिवसः पुण्यो निर्यामः स्वबलानुगाः

keśavaḥ punarevāha yādavān satyasaṅgaraḥ | adyaiva divasaḥ puṇyo niryāmaḥ svabalānugāḥ

हिन्दी अर्थ

सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णने वहाँ यादवोंसे फिर कहा-' आज ही वह पुण्य दिवस है, जब कि अपनी सेनाके साथ हमें यहाँसे निकल चलना है'

अध्याय 111

श्लोक 15

ततो निश्चक्रमुः सर्वे यादवाः कृष्णशासनात् ।ओघा इव समुद्रस्य बलौघप्रतिनादिताः

tato niścakramuḥ sarve yādavāḥ kṛṣṇaśāsanāt | oghā iva samudrasya balaughapratināditāḥ

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर समस्त यादव श्रीकृष्णकी आज्ञासे उस पुरीको छोड़कर निकल गये। उस समय सैन्यसमूहोंके कोलाहलसे भरे हुए यादवोंके दल समुद्रके जलप्रवाहकी भाँति जान पढ़ते थे

अध्याय 111

श्लोक 16

सङ्गृह्य ते कलत्राणि वसुदेवपुरोगमाः ।सुसन्नद्धैर्गजैर्मत्तै रथैरश्वैश्च दंशितैः

saṅgṛhya te kalatrāṇi vasudevapurogamāḥ | susannaddhairgajairmattai rathairaśvaiśca daṃśitaiḥ

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

वसुदेव आदि सभी यादव अपनी स्त्रियोंको साथ ले कसे-कसाये मतवाले हाथियों, रथों और सुसच्जित अश्वोंके द्वारा मथुरा छोड़कर चल दिये। उन सबने डंके पीटकर स्वजनों तथा जाति-भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया था

अध्याय 111

श्लोक 17

आहत्य दुन्दुभीन् सर्वे स्वजनज्ञातिबान्धवाः ।निर्ययुर्यादवाः सर्वे मथुरामपहाय वै

āhatya dundubhīn sarve svajanajñātibāndhavāḥ | niryayuryādavāḥ sarve mathurāmapahāya vai

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 111

श्लोक 18

स्यन्दनैः काञ्चनापीडैर्मत्तैश्च वरवारणैः ।सूतैः प्लुतैश्च तुरगैः कशापार्ष्णिप्रणोदितैः

syandanaiḥ kāñcanāpīḍairmattaiśca varavāraṇaiḥ | sūtaiḥ plutaiśca turagaiḥ kaśāpārṣṇipraṇoditaiḥ

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ ! सुवर्णभूषित रथों, मतवाले गजराजों और सारथीकी आश्ञामात्रसे उछलकर चलनेवाले तथा हाथमें चाबुक लिये सवारोंद्वारा हाँके जानेवाले घोड़ोंसे अपनी-अपनी श्रेष्ठ सेनाओंकी शोभा बढ़ाते तथा उन्हें खींचकर अपने साथ लिये जाते हुए वृष्णिवंशी बड़े हर्षके साथ पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए

अध्याय 111

श्लोक 19

स्वानि स्वानि बलाग्राणि शोभयन्तः प्रकर्षिणः ।प्रत्यङ्मुखा ययुर्हृष्टा वृष्णयो भरतर्षभ

svāni svāni balāgrāṇi śobhayantaḥ prakarṣiṇaḥ | pratyaṅmukhā yayurhṛṣṭā vṛṣṇayo bharatarṣabha

अर्थ श्लोक 18 के साथ

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 20

ततो मुख्यतमाः सर्वे यादवा रणकोविदाः ।अनीकाग्राणि कर्षन्तो वासुदेवपुरोगमाः

tato mukhyatamāḥ sarve yādavā raṇakovidāḥ | anīkāgrāṇi karṣanto vāsudevapurogamāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर युद्धकुशल श्रीकृष्ण आदि सभी मुख्य-मुख्य यादव अपनी सेनाओंको साथ लेकर चले

अध्याय 111

श्लोक 21

ते स्म नानालताचित्रं नारिकेलवनायुतम् ।कीर्णं नागबलैः कान्तं केतकीखण्डमण्डितम्

te sma nānālatācitraṃ nārikelavanāyutam | kīrṇaṃ nāgabalaiḥ kāntaṃ ketakīkhaṇḍamaṇḍitam

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

वे यदुपुज्ब वीर सिंधुराजके जलप्राय देशमें जा ुँचे, जो नाना प्रकारकी लताओंसे विचित्र शोभा पा ] था। नारियलके बहुत-से वन वहाँ सुशोभित होते । नागकेसरोंके झुंड इधर-उधर सब ओर फैले थे, नसे वहाँकी कमनीयता और भी बढ़ गयी थी। वड़ोंकी झाड़ियोंसे वह प्रदेश अलंकृत हो रहा था। हीं-कहीं ताड़, पुन्नाग, वकुल और अंगूरके वन उस भागको और घना बना रहे थे

अध्याय 111

श्लोक 22

तालपुन्नागबकुलद्राक्षावनघनं क्वचित् ।अनूपं सिन्धुराजस्य प्रपेतुर्यदुपुङ्गवाः

tālapunnāgabakuladrākṣāvanaghanaṃ kvacit | anūpaṃ sindhurājasya prapeturyadupuṅgavāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 111

श्लोक 23

ते तत्र रमणीयेषु विषयेषु सुखप्रियाः ।मुमुदुर्यादवाः सर्वे देवाः स्वर्गगता इव

te tatra ramaṇīyeṣu viṣayeṣu sukhapriyāḥ | mumuduryādavāḥ sarve devāḥ svargagatā iva

हिन्दी अर्थ

जिन्हें सुख प्रिय है, वे सब यादव वहाँके रमणीय स्थानोंमें र्गमें रहनेवाले देवताओंके समान आनन्दका अनुभव रने लगे

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 24

पुरवास्तु विचिन्वन् स कृष्णस्तु परवीरहा ।ददर्श विपुलं देशं सागरेणोपशोभितम्

puravāstu vicinvan sa kṛṣṇastu paravīrahā | dadarśa vipulaṃ deśaṃ sāgareṇopaśobhitam

हिन्दी अर्थ

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने रके वास्तुस्थानकी खोज करते हुए समुद्रसे सुशोभित नेवाले एक विशाल प्रदेशको देखा

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 25

वाहनानां हितं चैव सिकताताम्रमृत्तिकम् ।पुरलक्षणसम्पन्नं कृतास्पदमिव श्रिया

vāhanānāṃ hitaṃ caiva sikatātāmramṛttikam | puralakṣaṇasampannaṃ kṛtāspadamiva śriyā

हिन्दी अर्थ

वह स्थान लूके साथ ही ताँबेके रड़्वाली मिट्टीसे सुशोभित था। हनोंके लिये हितकर तथा नगरोपयोगी शुभ लक्षणोंसे म्पन्‍्न था। वह ऐसा मनोहर प्रतीत होता था, मानो क्ष्मीने उसे अपना वासस्थान बना लिया हो

अध्याय 111

श्लोक 26

सागरानिलसंवीतं सागराम्बुनिषेवितम् ।विषयं सिन्धुराजस्य शोभितं पुरलक्षणैः

sāgarānilasaṃvītaṃ sāgarāmbuniṣevitam | viṣayaṃ sindhurājasya śobhitaṃ puralakṣaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

धुराजका वह प्रदेश समुद्रकी वायुसे विजित, सागरके लसे सेवित तथा नगरोपयोगी लक्षणोंसे सुशोभित [

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 27

तत्र रैवतको नाम पर्वतो नातिदूरतः ।मन्दरोदारशिखरः सर्वतोऽभिविराजते

tatra raivatako nāma parvato nātidūrataḥ | mandarodāraśikharaḥ sarvato'bhivirājate

हिन्दी अर्थ

वहाँ पास ही रैवतक नामसे प्रसिद्ध पर्वत था, [सके शिखर मन्दराचलके समान ऊँचे और रमणीय । वह पर्वत सब ओरसे बड़ी शोभा पा रहा था

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 28

तत्रैकलव्यसंवासो द्रोणेनाध्युषितश्चिरम् ।प्रभूतपुरुषोपेतः सर्वरत्नसमाकुलः

tatraikalavyasaṃvāso droṇenādhyuṣitaściram | prabhūtapuruṣopetaḥ sarvaratnasamākulaḥ

हिन्दी अर्थ

हाँ एकलव्य रहता था। आचार्य द्रोण भी वहाँ दीर्घकालतक वास कर चुके थे। बहुत-से मनुष्य वहाँ आते-जाते तथा वह पर्वत सब प्रकारके रत्ोंसे व्याप्त था

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 29

विहारभूमिस्तत्रैव तस्य राज्ञः सुनिर्मिता ।नाम्ना द्वारवती नाम स्वायताष्टापदोपमा

vihārabhūmistatraiva tasya rājñaḥ sunirmitā | nāmnā dvāravatī nāma svāyatāṣṭāpadopamā

हिन्दी अर्थ

सके पास ही उस राजा रेवतकी विहारभूमि थी, सका बड़े सुन्दर ढंगसे निर्माण किया गया था। उस मिका नाम था द्वारवती, जो विशाल होनेके साथ ही तरंज या चौसरकी बिछाँतके समान चौकोर थी

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 30

केशवेन मतिस्तत्र पुर्यर्थे विनिवेशिता ।निवेशं तत्र सैन्यानां रोचयन्ति स्म यादवाः

keśavena matistatra puryarthe viniveśitā | niveśaṃ tatra sainyānāṃ rocayanti sma yādavāḥ

हिन्दी अर्थ

गवान्‌ श्रीकृष्णने वहाँ नगर बसानेका विचार किया। दवोंको भी वहाँ सेनाका पड़ाव डालना जँच गया

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 31

ते रक्तसूर्यदिवसे तत्र यादवपुङ्गवाः ।सेनापालांश्च सञ्चक्रुः स्कन्धावारनिवेशनम्

te raktasūryadivase tatra yādavapuṅgavāḥ | senāpālāṃśca sañcakruḥ skandhāvāraniveśanam

हिन्दी अर्थ

ननमें जब कि सूर्यपर लाली छा रही थी, वहाँ श्रेष्ठ दवोंने सेनाके रक्षक नियुक्त किये और सैनिकोंके हरनेके लिये छावनियाँ तैयार करायीं

अध्याय 111

श्लोक 32

ध्रुवाय तत्र न्यवसत् केशवः सह यादवैः ।देशे पुरनिवेशाय स यदुप्रवरो विभुः

dhruvāya tatra nyavasat keśavaḥ saha yādavaiḥ | deśe puraniveśāya sa yadupravaro vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

यदुप्रवर गवान्‌ श्रीकृष्णने यादवोंके साथ उस प्रदेशमें एक स्थिर नगर बसानेके लिये निवास किया

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 33

तस्यास्तु विधिवन्नाम वास्तूनि च गदाग्रजः ।निर्ममे पुरुषश्रेष्ठो मनसा यादवोत्तमः

tasyāstu vidhivannāma vāstūni ca gadāgrajaḥ | nirmame puruṣaśreṣṭho manasā yādavottamaḥ

हिन्दी अर्थ

गदके डे भाई यादवश्रेष्ठ पुरुषोत्तमने मानसिक संकल्पके द्वारा स पुरीका नाम निश्चित किया और मनसे ही विधिपूर्वक समें गृहोंका विभाग किया

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 34

एवं द्वारवतीं चैव पुरीं प्राप्य सबान्धवाः ।सुखिनो न्यवसन् राजन् स्वर्गे देवगणा इव

evaṃ dvāravatīṃ caiva purīṃ prāpya sabāndhavāḥ | sukhino nyavasan rājan svarge devagaṇā iva

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! इस प्रकार बन्धु-बान्धवोंसहित यदुवंशी द्वारकापुरीमें पहुँचकर वहाँ उसी तरह सुखसे रहने लगे, जैसे देवता स्वर्गमें रहते हैं

English

Thereupon the Dānava went to his father Kashyapa and expressed his desire. Kashyapa said what the king of gods had communicated (18). "O son, go now to the city of Vajra and live there controlling yourself. After the termination of the Yajna I will do what is fair" (19). Thus addressed Vajranābha returned to his own city.

अध्याय 111

श्लोक 35

कृष्णोऽपि कालयवनं ज्ञात्वा केशिनिषूदनः ।जरासन्धभयाच्चैव पुरीं द्वारवतीं ययौ

kṛṣṇo'pi kālayavanaṃ jñātvā keśiniṣūdanaḥ | jarāsandhabhayāccaiva purīṃ dvāravatīṃ yayau

हिन्दी अर्थ

केशिहन्ता श्रीकृष्ण भी कालयवनका आना जानकर उसके और जरासंधके भयसे द्वारकापुरीको चले गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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