Harivamsha Purana
125
अध्याय 125 / 318

Parva 2, Adhyāya 70

50 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ50 श्लोक

अध्याय 125

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य गदाप्रहारस्य वार्त्तां श्रुत्वा कुपितस्य इन्द्रेण तस्य व्यवहारस्य कटुआलोचनं एवं युद्धं विना पारिजातस्य अदानस्येव निश्चयं देवराजवचः श्रुत्वा नारदः कुरुनन्दन ।प्रोवाच वाक्यं वाक्यज्ञो धर्मात्मा धर्मवित्तमः

śrīkṛṣṇasya gadāprahārasya vārttāṃ śrutvā kupitasya indreṇa tasya vyavahārasya kaṭuālocanaṃ evaṃ yuddhaṃ vinā pārijātasya adānasyeva niścayaṃ devarājavacaḥ śrutvā nāradaḥ kurunandana | provāca vākyaṃ vākyajño dharmātmā dharmavittamaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन! देवराज इन्द्रकी बात सुनकर धर्मश्ञोंमें श्रेष्ठ तथा बातचीत करनेकी कला जाननेवाले धर्मात्मा नारदजीने यह बात कही—

अध्याय 125

श्लोक 2

अवश्यमेव वक्तव्यं हितं बलनिषूदन ।मया तव महाबाहो बहुमानोऽस्ति मे त्वयि

avaśyameva vaktavyaṃ hitaṃ balaniṣūdana | mayā tava mahābāho bahumāno'sti me tvayi

हिन्दी अर्थ

महाबाहु बलसूदन! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति बहुत आदर है, इसलिये मुझे तुम्हारे हितकी बात अवश्य बतानी चाहिये

अध्याय 125

श्लोक 3

उक्तो मया वासुदेवो जानता भवतो मतम् ।न दत्तः पारिजातोऽयं हरस्यापि त्वया पुरा

ukto mayā vāsudevo jānatā bhavato matam | na dattaḥ pārijāto'yaṃ harasyāpi tvayā purā

हिन्दी अर्थ

मैं तुम्हारे इस विचारको जानता था; क्योंकि तुमने पहले महादेवजीके माँगनेपर भी यह परिजात-वृक्ष उन्हें नहीं दिया था; इसलिये मैंने तुम्हारी ओरसे श्रीकृष्णको सब कुछ बताया था

अध्याय 125

श्लोक 4

हेतवश्च मया तस्य दर्शितास्ते समासतः ।न चावगतवान् देवः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते

hetavaśca mayā tasya darśitāste samāsataḥ | na cāvagatavān devaḥ satyametad bravīmi te

हिन्दी अर्थ

तुमने पारिजात न देनेके विषयमें जो कारण बताये हैं, उन्हें भी मैंने संक्षेपसे उनको दर्शाया था; परंतु भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन्हें स्वीकार नहीं किया, यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ

अध्याय 125

श्लोक 5

उपेन्द्रोऽहं महेन्द्रेण लालनीयः सदेति माम् ।उवाच पुण्डरीकाक्षो दत्तमुत्तरमेव च

upendro'haṃ mahendreṇa lālanīyaḥ sadeti mām | uvāca puṇḍarīkākṣo dattamuttarameva ca

हिन्दी अर्थ

मेरी बातका उत्तर देते हुए कमलनयन श्रीकृष्ण कहने लगे, मैं उपेन्द्र (इन्द्रका छोटा भाई) हूँ; अत: महेन्द्रको सदा ही मेरा लाड़-प्यार करना चाहिये '

अध्याय 125

श्लोक 6

पुनः पुनर्मया वास्य हेतवो देव दर्शिताः ।ततो न बुद्धिर्व्यावृत्ता वृत्रनाशन तस्य वै

punaḥ punarmayā vāsya hetavo deva darśitāḥ | tato na buddhirvyāvṛttā vṛtranāśana tasya vai

हिन्दी अर्थ

वृत्रासुरविनाशन देव! मैंने बारम्बार उन्हें कारण दिखाये; परंतु उनका विचार नहीं बदला

अध्याय 125

श्लोक 7

अपि चाप्युक्तवान् देवो वाक्यान्ते मधुसूदनः ।प्रत्याह पुरुषश्रेष्ठः सरोषमिव वासव

api cāpyuktavān devo vākyānte madhusūdanaḥ | pratyāha puruṣaśreṣṭhaḥ saroṣamiva vāsava

हिन्दी अर्थ

इन्द्र! मेरी बातके अन्तमें पुरुषश्रेष्ठ भगवान्‌ मधुसूदनने कुछ रुष्ट-से होकर उत्तर देते हुए कहा—

अध्याय 125

श्लोक 8

न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः ।मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते

na devagandharvagaṇā na rākṣasā na cāsurā naiva ca yakṣapannagāḥ | mama pratijñāmapahantumudyatā mune samarthāḥ khalu bhadramastu te

हिन्दी अर्थ

मुने! आपका कल्याण हो। यदि समस्त देवता, गन्धर्व, राक्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ जायेँ तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सकते, नहीं हो सकते

अध्याय 125

श्लोक 9

स पारिजातं यदि न प्रदास्यति प्रयाच्यमानो भवतामरेश्वरः ।ततः शचीव्यामृदितानुलेपने गदां विमोक्ष्यामि पुरन्दरोरसि

sa pārijātaṃ yadi na pradāsyati prayācyamāno bhavatāmareśvaraḥ | tataḥ śacīvyāmṛditānulepane gadāṃ vimokṣyāmi purandarorasi

हिन्दी अर्थ

यदि आपके याचना करनेपर अमेस्थर इन्ध पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके उस वक्ष:स्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिज्जनसे मिट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा!

अध्याय 125

श्लोक 10

उपेन्द्रस्य महेन्द्रायं भ्रातुस्ते निश्चयः परः ।यदत्र मन्यसे न्याय्यं सम्प्रधार्य कुरुष्व तत्

upendrasya mahendrāyaṃ bhrātuste niścayaḥ paraḥ | yadatra manyase nyāyyaṃ sampradhārya kuruṣva tat

हिन्दी अर्थ

महेन्द्र! तुम्हारे भाई उपेन्द्रका यही अन्तिम निश्चय है। अब यहाँ तुम जो न्यायोचित कार्य समझो, उसका विचार करके वही करो

अध्याय 125

श्लोक 11

तत्त्वं हितं च देवेश श्रूयतां वदतो मम ।नयनं पारिजातस्य द्वारकां मम रोचते

tattvaṃ hitaṃ ca deveśa śrūyatāṃ vadato mama | nayanaṃ pārijātasya dvārakāṃ mama rocate

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर! मैं तुम्हें तत्व और हितकी बात बताता हूँ, सुनो; मुझे पारिजातका द्वारकामें ले जाया जाना ही ठीक जँचता है'

अध्याय 125

श्लोक 12

नारदेनैवमुक्तस्तु सुव्यक्तं बलदेहभित् ।रोषाविष्टः सहस्राक्षोऽब्रवीदेतन्तराधिप

nāradenaivamuktastu suvyaktaṃ baladehabhit | roṣāviṣṭaḥ sahasrākṣo'bravīdetantarādhipa

हिन्दी अर्थ

द्२१ नरेश! जब नारदजीने इस प्रकार सुस्पष्ट बात कह दी, तब बलासुरका विनाश करनेवाले सहख्र नेत्रधारी इन्द्र रोषके आवेशमें आकर बोले-

अध्याय 125

श्लोक 13

अनागसि मयि ज्येष्ठे सोदरे यदि केशवः ।एवं प्रवृत्तः किं शक्यं कर्तुमद्य तपोधन

anāgasi mayi jyeṣṭhe sodare yadi keśavaḥ | evaṃ pravṛttaḥ kiṃ śakyaṃ kartumadya tapodhana

हिन्दी अर्थ

तपोधन! यदि श्रीकृष्ण अपने निरपराध एवं ज्येष्ठ पहोदर भाईके प्रति ऐसा अनुचित बर्ताव करनेके लिये उद्चत हैं तो अब क्या किया जा सकता है?

अध्याय 125

श्लोक 14

बहूनि प्रतिलोमानि पुरा स कृतवान् मयि ।कृष्णो नारद सोढानि भ्रातेति स्म मया सदा

bahūni pratilomāni purā sa kṛtavān mayi | kṛṣṇo nārada soḍhāni bhrāteti sma mayā sadā

हिन्दी अर्थ

नारद! श्रीकृष्णने पहले भी मेरे प्रतिकूल बहुत-से कार्य किये हैं; परंतु यह मेरा छोटा भाई है, ऐसा समझकर मैंने सदा उन बातोंको सहन किया है

अध्याय 125

श्लोक 15

खाण्डवे चार्जुनरथं पुरा वाहयता सता ।मदीया वारिता मेघाः शमयन्तोऽग्निमुद्धतम्

khāṇḍave cārjunarathaṃ purā vāhayatā satā | madīyā vāritā meghāḥ śamayanto'gnimuddhatam

हिन्दी अर्थ

पहलेकी बात है, ये खाण्डव वनमें अर्जुनका रथ हाँक रहे थे, उस समय उस वनमें लगी हुई प्रचण्ड आगको बुझानेके लिये मैंने जो मेघ नियुक्त किये थे, मेरे उन सभी मेघोंका इन्होंने निवारण कर दिया था

अध्याय 125

श्लोक 16

गोवर्धनं धारयता विप्रियं च कृतं मम ।तथा वृत्रवधे प्राप्ते साहाय्यार्थं वृतो मया

govardhanaṃ dhārayatā vipriyaṃ ca kṛtaṃ mama | tathā vṛtravadhe prāpte sāhāyyārthaṃ vṛto mayā

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

इसी तरह गोवर्धन पर्वतको धारण करके इन्होंने मेरा अप्रिय किया था। जब वृत्रासुरके वधका अवसर प्राप्त हुआ, उस समय मैंने इनसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी; परंतु इन्होंने यह कहकर मुझे कोरा जवाब दे दिया कि मैं तो समस्त प्राणियोंके लिये सम हूँ (मेरा किसीसे राग या द्वेष नहीं है) । तब मैंने अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर वृत्रासुरका वध किया था

अध्याय 125

श्लोक 17

समोऽहमिति सर्वेषां भूतानामिति चोक्तवान् ।स्वबाहुबलमाश्रित्य वृत्रश्च निहतो मया

samo'hamiti sarveṣāṃ bhūtānāmiti coktavān | svabāhubalamāśritya vṛtraśca nihato mayā

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 125

श्लोक 18

देवासुरेषु प्राप्तेषु सङ्ग्रामेषु च नारद ।युध्यत्यात्मेच्छया कृष्णो मुने सुविदितं तव

devāsureṣu prāpteṣu saṅgrāmeṣu ca nārada | yudhyatyātmecchayā kṛṣṇo mune suviditaṃ tava

हिन्दी अर्थ

मुने! नारद! जब-जब देवासुर-संग्रामके अवसर आते हैं, तब-तब विष्णु अपनी इच्छासे ही युद्ध करते हैं (जीमें आया तो करते हैं और नहीं तो चल देते हैं) । यह बात आपको अच्छी तरह ज्ञात है

अध्याय 125

श्लोक 19

बहुनात्र किमुक्तेन तस्माद् दिष्ट्या प्रवर्तताम् ।ज्ञातिभेदो न नः कार्यः साक्षी त्वं मम नारद

bahunātra kimuktena tasmād diṣṭyā pravartatām | jñātibhedo na naḥ kāryaḥ sākṣī tvaṃ mama nārada

हिन्दी अर्थ

इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ (बात बढ़ानेसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है); अत: यदि प्रारब्धवश युद्ध ही होना है तो हो; परंतु नारदजी! आप मेरी ओरसे इस बातके साक्षी हैं कि हमलोगोंको अपने भाईसे कलह करना अभीष्ट नहीं है

अध्याय 125

श्लोक 20

ममोरसि गदां मोक्तुमुद्यतो यदि केशवः ।अनुशब्द्याथ पौलोमीं गुणः क इह दृश्यते

mamorasi gadāṃ moktumudyato yadi keśavaḥ | anuśabdyātha paulomīṃ guṇaḥ ka iha dṛśyate

हिन्दी अर्थ

यदि केशव मेरी छातीमें गदा मारनेको ही उद्यत हैं तो पुलोमकुमारी शचीका नामोल्लेख करके ऐसी बात कहनेमें यहाँ कौन-सा लाभ दिखायी देता है?

अध्याय 125

श्लोक 21

उदवासगतो धीमान् पिता नः कश्यपः प्रभुः ।अदित्या सह मे मात्रा तयोर्वाक्यमिदं भवेत्

udavāsagato dhīmān pitā naḥ kaśyapaḥ prabhuḥ | adityā saha me mātrā tayorvākyamidaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

मेरे बुद्धिमान्‌ पिता भगवान्‌ कश्यप मेरी माता अदितिके साथ क्षीरसागरमें जलवास करनेके लिये गये हैं। वे दोनों मेरे प्रति ऐसी बात कह सकते थे (क्योंकि माता-पिताको यह अधिकार है कि वे पुत्रको राहपर लानेके लिये उसे ताड़ना दे) '

अध्याय 125

श्लोक 22

अजितात्मा मम भ्राता रजसा तमसा वृतः ।कामेन च स्त्रियो बाक्यादेवं मामुक्तवान्गुरुम्

ajitātmā mama bhrātā rajasā tamasā vṛtaḥ | kāmena ca striyo bākyādevaṃ māmuktavāngurum

हिन्दी अर्थ

परंतु मेरे भाई श्रीकृष्ण अजितात्मा हैं, अपने मनपर काबू नहीं पा सके हैं; साथ ही रजोगुण और तमोगुणसे घिरे हुए हैं; अत: कामवश एक स्त्रीके कहनेमात्रसे मुझ अपने गुरुजनके प्रति उन्होंने ऐसी बात कह डाली है

अध्याय 125

श्लोक 23

धिक्स्त्रियः सर्वथा विप्र धिग् राजसमितिं तथा ।यत्राधिक्षिप्तवान् विष्णुरेवं मां स्त्रीजितो द्विज

dhikstriyaḥ sarvathā vipra dhig rājasamitiṃ tathā | yatrādhikṣiptavān viṣṇurevaṃ māṃ strījito dvija

हिन्दी अर्थ

विप्रवर ! स्त्रियोंको सर्वथा धिक्कार है तथा उस राजसभाको भी धिक्कार है, जहाँ स्त्रीके वशीभूत हुए श्रीकृष्णने मुझपर इस प्रकार आक्षेप किया है

अध्याय 125

श्लोक 24

न दृष्टं कश्यपकुले व्यपदेश्यं महामुने ।नैव दक्षकुले दृष्टं मातुर्मे यत्र सम्भवः

na dṛṣṭaṃ kaśyapakule vyapadeśyaṃ mahāmune | naiva dakṣakule dṛṣṭaṃ māturme yatra sambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

महामुने! महर्षि कश्यपके कुलमें अबतक कोई निन्दनीय बात नहीं देखी गयी है तथा जहाँ मेरी माताका जन्म हुआ है, उस दक्षकुलमें भी ऐसी कोई बात देखनेमें नहीं आयी है

अध्याय 125

श्लोक 25

न ज्येष्ठता न राजत्वं देवानां प्रतिमानितम् ।कामरागाभिभूतेन कृष्णेन खलु नारद

na jyeṣṭhatā na rājatvaṃ devānāṃ pratimānitam | kāmarāgābhibhūtena kṛṣṇena khalu nārada

हिन्दी अर्थ

नारद! काम और रागसे आक्रान्त हुए श्रीकृष्णने न तो मेरे बड़प्पनका आदर किया है और न मेरे देवराज पदका ही सम्मान किया है

अध्याय 125

श्लोक 26

पुत्रदारसहस्रैर्हि भ्रातानघ विशिष्यते ।सद्वृत्तो ज्ञानसम्पन्न इति ब्रह्मा पुराब्रवीत्

putradārasahasrairhi bhrātānagha viśiṣyate | sadvṛtto jñānasampanna iti brahmā purābravīt

हिन्दी अर्थ

निष्पाप देवर्षे ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने ऐसा कहा था कि सदाचारी और ज्ञानसम्पन्न भाई हजारों स्त्रियों और पुत्रोंसे बढ़कर है

अध्याय 125

श्लोक 27

नास्ति भ्रातृसमो वन्धुराहार्य इतरो जनः ।इति मामव्रवीन्माता पिता चैव प्रजापतिः

nāsti bhrātṛsamo vandhurāhārya itaro janaḥ | iti māmavravīnmātā pitā caiva prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

मेरी माता तथा मेरे पिता प्रजापति कश्यपजीने मुझसे कहा था कि भाईके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है; क्योंकि वह स्वाभाविक बन्धु है और दूसरे लोग भोजन आदि देकर बनाये हुए हैं

अध्याय 125

श्लोक 28

सोदरे तु विशेषं तु पिता मे कश्यपोऽब्रवीत् ।दृप्ता मया विरुद्धयन्ते दानवाः पापनिश्चयाः

sodare tu viśeṣaṃ tu pitā me kaśyapo'bravīt | dṛptā mayā viruddhayante dānavāḥ pāpaniścayāḥ

हिन्दी अर्थ

मेरे पिता कश्यपने सहोदर भाईमें विशेष बन्धुत्व बताया है। यद्यपि दानव भी हमारे भाई ही हैं; तथापि वे घमंडी और पापपूर्ण . विचार रखनेवाले हो गये हैं; इसलिये मैं उनका विरोध करता हूँ

अध्याय 125

श्लोक 29

काममेतन्न वक्तव्यं स्वयमात्मस्तवान्वितम् ।प्राप्तस्त्ववसरो विप्र यदिहाद्योच्यते मया

kāmametanna vaktavyaṃ svayamātmastavānvitam | prāptastvavasaro vipra yadihādyocyate mayā

हिन्दी अर्थ

विप्रवर! जो बात अपनी प्रशंसासे युक्त हो, उसे स्वयं ही नहीं कहना चाहिये, इसमें संशय नहीं है तथापि इस समय यहाँ मेरे द्वारा जो बात कही जाती है, उसके कहनेका अवसर आ गया है

अध्याय 125

श्लोक 30

धनुर्ज्यायां मुनिश्रेष्ठ छिन्नायां हि पुरानघ ।धन्वीभिरमराणां च वरदानान्महामते

dhanurjyāyāṃ muniśreṣṭha chinnāyāṃ hi purānagha | dhanvībhiramarāṇāṃ ca varadānānmahāmate

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

मुनिश्रेष्ठ! महामते! पूर्वकालमें (दक्षयज्ञ- विध्वंसके समय) जब भगवान्‌ शड्रके धनुर्धर पार्षदोंने वरदानके प्रभावसे देवताओंकी धनुषोंकी प्रत्यज्ञा काट डाली और यज्ञरूपी विष्णुका सिर काट लिया गया था, उस समय मैंने ही उनके धड़को धारण किया था तथा रुद्रके तेजसे कटे हुए उनके सिरको यत्रपूर्वक धड़से जोड़ा था

अध्याय 125

श्लोक 31

उत्कृत्तशिरसो विष्णोः पुरा देहो धृतो मया ।सन्धितं च शिरो यत्नाच्छिन्नं रौद्रेण तेजसा

utkṛttaśiraso viṣṇoḥ purā deho dhṛto mayā | sandhitaṃ ca śiro yatnācchinnaṃ raudreṇa tejasā

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 125

श्लोक 32

अहं विशिष्टो देवानामित्युक्त्या पुनरच्युतः ।धनुरारोप्य दर्पेण स्थितो नारद केशवः

ahaṃ viśiṣṭo devānāmityuktyā punaracyutaḥ | dhanurāropya darpeṇa sthito nārada keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

नारदजी! जब उनका मस्तक जुड़ गया, तब वे अच्युतस्वरूप केशव पुनः धनुष चढ़ाकर बड़े घमंडके साथ यह कहते हुए खड़े हो गये कि मैं इन देवताओंमें सबसे बढ़कर हूँ'

अध्याय 125

श्लोक 33

किं मां पिता वा माता वा वक्ष्यतीति मया मुने ।स्नेहेन च स्थितं विष्णोः शरीरं मुनिसत्तम

kiṃ māṃ pitā vā mātā vā vakṣyatīti mayā mune | snehena ca sthitaṃ viṣṇoḥ śarīraṃ munisattama

हिन्दी अर्थ

घ्श्दे "मुने! ऋषिश्रेष्ठ ! मैंने उस समय यह सोचकर कि यदि मैं नहीं बचाता हूँ तो मेरे पिता-माता मुझे क्या कहेंगे, बड़े ख्रेहके साथ विष्णुके शरीरको थाम लिया था

अध्याय 125

श्लोक 34

ऐन्द्रं वैष्णवमस्यैव मुने भागमहं ददौ ।यवीयांसमहं प्रेम्णा कृष्णं पश्यामि नारद

aindraṃ vaiṣṇavamasyaiva mune bhāgamahaṃ dadau | yavīyāṃsamahaṃ premṇā kṛṣṇaṃ paśyāmi nārada

हिन्दी अर्थ

नारद मुने ! (वर्षा-ऋतुमें जो सत्कर्म या पूजन किया जाता है, उसपर (मुझ) इन्द्रका ही आधिपत्य है; क्योंकि उस समय श्रीविष्णु शयन करते हैं) उस ऐन्द्र भागको ही वैष्णव भाग बनाकर मैंने इन्हें अर्पित किया है*। इस प्रकार मैं अपने छोटे भाई कृष्णको सदा प्रेमपूर्ण दृष्टिसे ही देखता हूँ

अध्याय 125

श्लोक 35

सङ्ग्रामेषु प्रहर्तव्यं तेन पूर्वं तपोधन ।राजा किलाहं समरे प्रहराम्यग्रतो धुवम्

saṅgrāmeṣu prahartavyaṃ tena pūrvaṃ tapodhana | rājā kilāhaṃ samare praharāmyagrato dhuvam

हिन्दी अर्थ

तपोधन ! संग्रामके अवसरोंपर (यदि कृष्ण मेरे विरोधमें खड़े हों तो) पहले उन्हींको मुझपर प्रहार करना चाहिये। अन्यत्र युद्धमें मैं अवश्य ही पहले प्रहार करता हूँ; क्योंकि मैं राजा हूँ

अध्याय 125

श्लोक 36

प्रादुर्भावेषु सर्वेषु स्वशरीरमिवानघ ।यत्नाद् रक्षामि धर्मज्ञ केशवं भक्तिमाश्रितम्

prādurbhāveṣu sarveṣu svaśarīramivānagha | yatnād rakṣāmi dharmajña keśavaṃ bhaktimāśritam

हिन्दी अर्थ

पापरहित धर्मज्ञ नारदजी! सभी अवतारोंके समय मुझमें भक्ति रखनेवाले केशवकी मैं अपने शरीरके समान यत्रपूर्वक रक्षा करता आया हूँ

अध्याय 125

श्लोक 37

इदं भङ्क्त्वा मदीयं च भुवनं विष्णुना कृतम् ।उपर्युपरि लोकानामधिकं भुवनं मुने

idaṃ bhaṅktvā madīyaṃ ca bhuvanaṃ viṣṇunā kṛtam | uparyupari lokānāmadhikaṃ bhuvanaṃ mune

हिन्दी अर्थ

मुने ! विष्णुने मेरे इस भुवन (स्वर्गलोक)- की मर्यादा भंग करके सब लोकोंसे ऊपर-ऊपर अपने भुवन (वैकुण्ठधाम)-को प्रतिष्ठित किया और उसे अन्य लोकोंसे बढ़कर महत्त्व दिया

अध्याय 125

श्लोक 38

अवमानः स च मया पृष्ठतः क्रियते मुने ।लालनीयो मया बाल इत्येवं भ्रातृगौरवात्

avamānaḥ sa ca mayā pṛṣṭhataḥ kriyate mune | lālanīyo mayā bāla ityevaṃ bhrātṛgauravāt

हिन्दी अर्थ

मुने ! वह अपमान मैंने पीछे कर दिया ( भुला दिया) । बड़े भाईका जो गौरव है, उसपर ध्यान देकर मैंने सदा यही सोचा है कि यह बालक है। अतः मेरे द्वारा लाड़-प्यार पानेके योग्य है

अध्याय 125

श्लोक 39

बालोऽयं मम पुत्रेति यवीयानिति नारद ।पित्रा मात्रा च गोविन्दो मानी च परिभाषितः

bālo'yaṃ mama putreti yavīyāniti nārada | pitrā mātrā ca govindo mānī ca paribhāṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

नारद ! श्रीकृष्णके विषयमें मेरा सदा यही भाव रहा है कि यह बालक है, मेरा छोटा भाई है; अतः मेरे द्वारा पुत्रके समान लाड़ लड़ानेके योग्य है, किंतु उनके विषयमें मेरे माता-पिताने भी अपना यही विचार व्यक्त किया है कि गोविन्द मानी है

अध्याय 125

श्लोक 40

इष्टस्तत्र जनानां च केशवः सुविशेषतः ।वयं द्वेष्या न सन्देहस्तत्र स्नेहोऽतिरिच्यते

iṣṭastatra janānāṃ ca keśavaḥ suviśeṣataḥ | vayaṃ dveṣyā na sandehastatra sneho'tiricyate

हिन्दी अर्थ

वहाँ (मनुष्यलोक)-के लोगोंको श्रीकृष्ण विशेष प्रिय हैं और हमलोग उनके द्वेषके पात्र हो गये हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसका कारण यही है कि श्रीकृष्णका उन मनुष्योंके प्रति स्नेह बढ़ता जा रहा है

अध्याय 125

श्लोक 41

सर्वज्ञो बलवाञ्छ्ररः पात्रं मानयिता तथा ।केशवेत्येव च ध्यानं यत्तद्वितथतां गतम्

sarvajño balavāñchraraḥ pātraṃ mānayitā tathā | keśavetyeva ca dhyānaṃ yattadvitathatāṃ gatam

हिन्दी अर्थ

अबतक जो मेरा यह खयाल था कि केशव सर्वज्ञ, बलवान, शूरवीर, सुपात्र और दूसरोंको मान देनेवाले हैं, वह सब निष्फल हो गया

अध्याय 125

श्लोक 42

गच्छ नारद वक्तव्यः केशवो वचनान्मम ।आहूतो न निवर्तेयं समरं प्रति शत्रुभिः

gaccha nārada vaktavyaḥ keśavo vacanānmama | āhūto na nivarteyaṃ samaraṃ prati śatrubhiḥ

हिन्दी अर्थ

नारदजी ! जाइये और मेरे शब्दों में श्रीकृष्णसे कह दीजिये कि 'मैं शत्रुओंके आह्वान करने या ललकारनेपर युद्धसे पीछे नहीं हट सकता

अध्याय 125

श्लोक 43

यदीच्छसि तदागच्छ सह्यं ते यत्त्वमिच्छसि ।प्रहरस्व च पूर्वं त्वं भार्याजित यथेच्छसि

yadīcchasi tadāgaccha sahyaṃ te yattvamicchasi | praharasva ca pūrvaṃ tvaṃ bhāryājita yathecchasi

श्लोक 43–45 का हिन्दी अर्थ

बातका समर्थन होता है। पत्नीके वशमें रहनेवाले श्रीकृष्ण ! यदि तुम मुझपर गदाका प्रहार करना चाहते हो तो आ जाओ। तुम जो चाहते हो, तुम्हारे उस प्रहारको सहन किया जायगा। जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार पहले तुर्म्हीं प्रहार करो ॥ डे ॥ 'जनार्दन! तुम गरुड़पर चढ़कर सुदूढ़ होकर मेरे ऊपर सुदर्शन चक्र, शा धनुष, कौमोदकी गदा और नन्दकनामक खड्गके द्वारा प्रहार करो। केशव! यदि भ्रातृस्नेह मुझे व्याकुल नहीं कर देगा तो तुम्हारे प्रहार करनेपर मैं भी यथाशक्ति तुमपर प्रहार करूँगा। अहो, ऐसी परिस्थितिको धिक्कार है!

अध्याय 125

श्लोक 44

रथाङ्गेनाथ शार्ङ्गेण गदया नन्दकेन च ।प्रहरारुह्य गरुडं दृढो भूत्वा जनार्दन

rathāṅgenātha śārṅgeṇa gadayā nandakena ca | praharāruhya garuḍaṃ dṛḍho bhūtvā janārdana

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 125

श्लोक 45

प्रहृते प्रहरिष्यामि यथाशक्त्या च केशव ।अहो धिग् यदि मां स्नेहो विक्लवं न करिष्यति

prahṛte prahariṣyāmi yathāśaktyā ca keśava | aho dhig yadi māṃ sneho viklavaṃ na kariṣyati

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 125

श्लोक 46

यावन्न सङ्ग्रामगतो जितोऽहं चक्रपाणिना ।पारिजातं न दास्यामि तावद् भो मुनिसत्तम

yāvanna saṅgrāmagato jito'haṃ cakrapāṇinā | pārijātaṃ na dāsyāmi tāvad bho munisattama

हिन्दी अर्थ

मुनिश्रेष्ठ ! जबतक मैं संग्रामभूमिमें उपस्थित होकर चक्रपाणि श्रीकृष्णके द्वारा पराजित नहीं हो जाऊँगा, तबतक उन्हें पारिजात नहीं दूँगा

अध्याय 125

श्लोक 47

मां समाह्वयते ज्येष्ठं यवीयान् स तपोधन ।अहो तं मर्षयिष्यामि किमर्थं स्त्रीजितं हरिम्

māṃ samāhvayate jyeṣṭhaṃ yavīyān sa tapodhana | aho taṃ marṣayiṣyāmi kimarthaṃ strījitaṃ harim

हिन्दी अर्थ

अहो तपोधन! जब श्रीकृष्ण छोटे होकर मुझ बड़े भाईको युद्धके लिये ललकार रहे हैं, तब पत्नीके गुलाम बने हुए उन केशवके इस बर्तावको मैं किस लिये सहन करूँ

अध्याय 125

श्लोक 48

अद्यैव गच्छ भगवन् द्वारकां कृष्णपालिताम् ।विवादे संस्थितः सोऽज्ञ इति वाच्यस्त्वयाच्युतः

adyaiva gaccha bhagavan dvārakāṃ kṛṣṇapālitām | vivāde saṃsthitaḥ so'jña iti vācyastvayācyutaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! आप आज ही श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीको चले जाइये और विवादके लिये तैयार खड़े हुए उस अज्ञानी अच्युतसे इस प्रकार मेरा उत्तर सुना दीजिये

अध्याय 125

श्लोक 49

पलाशपत्रार्द्धमपि त्वयाजितो न पारिजातस्य तव प्रदास्यति ।इति प्रवाच्यो मधुसूदनस्त्वया वचो मदीयं स्मरता तपोधन

palāśapatrārddhamapi tvayājito na pārijātasya tava pradāsyati | iti pravācyo madhusūdanastvayā vaco madīyaṃ smaratā tapodhana

हिन्दी अर्थ

जबतक तुम पराजित नहीं कर दोगे, तबतक पारिजात वृक्षकी तो बात ही क्या है, उसकी आधी पत्ती भी इन्द्र तुम्हें नहीं देगा। तपोधन! मेरी इस बातको याद रखते हुए आपको मधुसूदन श्रीकृष्णसे इन्हीं शब्दोंमें यह बात कहनी चाहिये

अध्याय 125

श्लोक 50

पुनः प्रवाच्यो भगवंस्त्वयाच्युतो मम प्रियार्थं खलु निर्विशङ्कितम् ।न मायया हर्तुमिहार्हसि द्रुमं सुयुद्धमेवास्तु धिगस्तु जिह्मताम्

punaḥ pravācyo bhagavaṃstvayācyuto mama priyārthaṃ khalu nirviśaṅkitam | na māyayā hartumihārhasi drumaṃ suyuddhamevāstu dhigastu jihmatām

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ ! आपको मेरा प्रिय करनेके लिये अच्युतसे पुन: निःशड्ड होकर यह बात कह देनी चाहिये कि माया (छल-कपट)-के द्वारा पारिजात वृक्षका अपहरण करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। विशुद्ध युद्ध ही होना चाहिये । कुटिलतापूर्वक बर्तावको धिक्कार है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.