Harivamsha Purana
126
अध्याय 126 / 318

Parva 2, Adhyāya 71

54 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ54 श्लोक

अध्याय 126

श्लोक 1

नारदात् श्रीकृष्णस्य महत्ताप्रतिपादनं श्रुत्वापि इन्द्रस्य तं पारिजातस्य दाने अनुद्यता महेन्द्रवचनं श्रुत्वा नारदो वदतां वरः ।विविक्ते देवराजानमिदं वचनमब्रवीत्

nāradāt śrīkṛṣṇasya mahattāpratipādanaṃ śrutvāpi indrasya taṃ pārijātasya dāne anudyatā mahendravacanaṃ śrutvā nārado vadatāṃ varaḥ | vivikte devarājānamidaṃ vacanamabravīt

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने एकान्तमें उनसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 126

श्लोक 2

कामं प्रियाणि राजानो वक्तव्या नात्र संशयः ।प्राप्तकालं तु वक्तव्यं हितमप्रियमप्युत

kāmaṃ priyāṇi rājāno vaktavyā nātra saṃśayaḥ | prāptakālaṃ tu vaktavyaṃ hitamapriyamapyuta

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर! अवश्य ही राजाओंसे वे ही बात कहनी चाहिये, जो उन्हें प्रिय लगें; इसमें संशय नहीं है तथापि जिसका अवसर प्राप्त हुआ हो, ऐसा हितकारक वचन तो अप्रिय होनेपर भी उनसे कह देना ही उचित है

अध्याय 126

श्लोक 3

अनियुक्तपुरोभागो न स्यादिति वदन्ति हि ।सुलोकगतितत्त्वज्ञो नयविज्ञानकोविदः

aniyuktapurobhāgo na syāditi vadanti hi | sulokagatitattvajño nayavijñānakovidaḥ

हिन्दी अर्थ

जो उत्तम लोकगतिके तत्त्वका ज्ञाता है और नीतिके विज्ञानमें भी कुशल है, ऐसा पुरुष बिना कहे-सुने कहीं अगुआ न बने, यह बुद्धिमानू पुरुषोंका कथन है

अध्याय 126

श्लोक 4

कार्याकार्ये समुत्पन्ने परिपृच्छति मां भवान् ।यतस्ततः प्रवक्ष्यामि गृह्यतां यदि रोचते

kāryākārye samutpanne paripṛcchati māṃ bhavān | yatastataḥ pravakṣyāmi gṛhyatāṃ yadi rocate

हिन्दी अर्थ

कर्तव्याकर्तव्यकी समस्या खड़ी होनेपर प्राय: तुम मुझसे पूछते और सलाह लेते हो, इसलिये इस समय भी मैं तुमसे कुछ कहूँगा। यदि अच्छा लगे तो इसे काममें लाना

अध्याय 126

श्लोक 5

अनुक्तेनापि सुहृदा वक्तव्यं जानता हितम् ।न्याय्यं च प्राप्तकालं च पराभवमनिच्छता

anuktenāpi suhṛdā vaktavyaṃ jānatā hitam | nyāyyaṃ ca prāptakālaṃ ca parābhavamanicchatā

हिन्दी अर्थ

जो राजाकी पराजय नहीं चाहता और किस बातमें उसका हित है, यह अच्छी तरह जानता है—ऐसे सुहदूको बिना कहे भी न्यायसंगत और समयोचित हितकर वचन अवश्य कहना चाहिये

अध्याय 126

श्लोक 6

वक्तव्यं सर्वथा सद्भिरप्रियं चापि यद्धितम् ।आनृण्यमेतत् स्नेहस्य सद्भिरेवादृतं पुरा

vaktavyaṃ sarvathā sadbhirapriyaṃ cāpi yaddhitam | ānṛṇyametat snehasya sadbhirevādṛtaṃ purā

हिन्दी अर्थ

सत्पुरुषोंको उचित है कि वे सर्वथा हितकी ही बात बतायें, भले ही वह सुननेमें अप्रिय हो। यही ख्रेहसे उऋण होनेका उपाय है, जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने ही प्राचीन कालसे आदर किया है

अध्याय 126

श्लोक 7

अनृते धर्मभग्ने च न शुश्रूषति चाप्रिये ।न प्रियं च हितं वाच्यं सद्भिरेवेति निन्दिताः

anṛte dharmabhagne ca na śuśrūṣati cāpriye | na priyaṃ ca hitaṃ vācyaṃ sadbhireveti ninditāḥ

हिन्दी अर्थ

जो असत्यवादी, धर्म-मर्यादाको भंग करनेवाले, किसीका उपदेश सुननेकी इच्छा न रखनेवाले और सबके अप्रिय (द्वेषपात्र) हैं, ऐसे लोगोंसे न तो प्रिय बात कहनी चाहिये और न हितकी ही । ऐसा कहकर सत्पुरुषोंने इन सबकी निन्‍्दा की है

अध्याय 126

श्लोक 8

सर्वथा देव वक्तव्यं श्रूयतां शृण्वतां वर ।श्रुत्वा च कुरु सर्वज्ञ मम श्रेयस्करं वचः

sarvathā deva vaktavyaṃ śrūyatāṃ śṛṇvatāṃ vara | śrutvā ca kuru sarvajña mama śreyaskaraṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रोताओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ देव! मुझे तुमको सर्वथा हितकी बात बतानी है, सुनो और सुनकर मेरे कल्याणकारी वचनका पालन करो

अध्याय 126

श्लोक 9

अन्योन्यभेदो भ्रातॄणां सुहृदां वा बलान्तक ।भवत्यानन्दकृद् देव द्विषतां नात्र संशयः

anyonyabhedo bhrātṝṇāṃ suhṛdāṃ vā balāntaka | bhavatyānandakṛd deva dviṣatāṃ nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

बलासुरका विनाश करनेवाले देव! भाइयों अथवा सुददोंमें यदि परस्पर भेद (वैरभाव) हो जाय तो वह शत्रुओंको आनन्द देनेंबाला होता है, इसमें संशय नहीं है'

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श्लोक 10

हितानुबन्धसहितं कार्यं ज्ञेयं सुरेश्वर ।विपरीतं च तद्बुद्ध्या नित्यं बुद्धिमतां वर

hitānubandhasahitaṃ kāryaṃ jñeyaṃ sureśvara | viparītaṃ ca tadbuddhyā nityaṃ buddhimatāṃ vara

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सुरधर ! अपने कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्यको जानना चाहिये तथा जो इसके विपरीत हो, उसको भी सदा समझ लेना चाहिये। समझ लेनेके बाद जो कार्य आरम्भ करनेपर पीछे संताप देनेवाला हो, ऐसे कार्यको विद्वान्‌ पुरुष कदापि आरम्भ न करे-यही बुद्धिमानोंकी नीति है

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श्लोक 11

यत्स्यात्तापकरं पश्चादारब्धं कार्यमीदृशम् ।आरभेन्नैव तद् विद्वानेष बुद्धिमतां नयः

yatsyāttāpakaraṃ paścādārabdhaṃ kāryamīdṛśam | ārabhennaiva tad vidvāneṣa buddhimatāṃ nayaḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

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श्लोक 12

विपाकमस्य कार्यस्य नानुपश्यामि शोभनम् ।यदत्र कारणं देव निबोध विबुधाधिप

vipākamasya kāryasya nānupaśyāmi śobhanam | yadatra kāraṇaṃ deva nibodha vibudhādhipa

हिन्दी अर्थ

देव! विबुधेश्वर! मैं इस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं देखता हूँ। इसमें जो कारण है, उसे ध्यान देकर सुनो

अध्याय 126

श्लोक 13

य एको विश्वमध्यास्ते प्रधानं जगतो हरिः ।प्रकृत्या यं परं सर्वे क्षेत्रज्ञं वै विदुर्बुधाः

ya eko viśvamadhyāste pradhānaṃ jagato hariḥ | prakṛtyā yaṃ paraṃ sarve kṣetrajñaṃ vai vidurbudhāḥ

हिन्दी अर्थ

जो अकेले ही कार्यभूत जगत्‌ और उसके कारणभूत प्रधानके भी अधिष्ठाता (संचालक) हैं, वे श्रीहरि ही श्रीकृष्ण हैं । जिन्हें समस्त विद्वान्‌ प्रकृतिसे परे विराजमान क्षेत्रज्ञके रूपमें जानते हैं

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श्लोक 14

तस्याव्यक्तस्य यो व्यक्तो भागः सर्वभवोद्भवः ।तस्यात्मा परमो देवो विष्णुः सर्वस्य धीमतः

tasyāvyaktasya yo vyakto bhāgaḥ sarvabhavodbhavaḥ | tasyātmā paramo devo viṣṇuḥ sarvasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

उस अव्यक्त प्रकृतिके जो व्यक्तभाग (महत्तत्त्व या समष्टिबुद्धिकि अभिमानी चेतन) ब्रह्मा हैं, वे ही समस्त संसारकी उत्पत्तिके कारण हैं। उनके तथा सम्पूर्ण चेतन जीवमात्रके आत्मा वे परमदेव श्रीविष्णु ही हैं

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श्लोक 15

प्रकृत्याः प्रथमो भाग उमा देवी यशस्विनी ।व्यक्तः सर्वमयो विश्वः स्त्रीसंज्ञो लोकभावनः

prakṛtyāḥ prathamo bhāga umā devī yaśasvinī | vyaktaḥ sarvamayo viśvaḥ strīsaṃjño lokabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

यशस्विनी उमादेवी प्रकृतिका मुख्य भाग (व्यक्त जगत्स्वरूप) हैं। अत: सर्वमय व्यक्त विश्व स्त्रीसंज्ञक (सम्पूर्ण भोग्य वस्तुरूप) है, जो चेतनमात्रको तृप्त करनेवाला है

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श्लोक 16

रुक्मिण्याद्याः स्त्रियस्तस्या व्यक्तत्वं प्रथमो गुणः ।अव्यया प्रकृतिर्देवी गुणी देवो महेश्वरः

rukmiṇyādyāḥ striyastasyā vyaktatvaṃ prathamo guṇaḥ | avyayā prakṛtirdevī guṇī devo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ भी प्रकृतिका मुख्य गुण ( भाग) अर्थात्‌ व्यक्तरूप हैं । अविनाशिनी प्रकृति उमादेवी हैं, जो गुणरूपा हैं और उनसे युक्त गुणी पुरुष भगवान्‌ महेश्वर हैं

अध्याय 126

श्लोक 17

न विशेषोऽस्य रुद्रस्य विष्णोश्चामरसत्तम ।गुणिनश्चाव्ययः शास्ता सदा च प्रथमोऽगुणः

na viśeṣo'sya rudrasya viṣṇoścāmarasattama | guṇinaścāvyayaḥ śāstā sadā ca prathamo'guṇaḥ

श्लोक 17–19 का हिन्दी अर्थ

देवश्रेष्ठ ! ( इसी प्रकार लक्ष्मी या रुक्मिणी गुणमयी अविनाशिनी प्रकृति हैं और विष्णु या श्रीकृष्ण गुणी पुरुष हैं) इन गुणवान्‌ मायावी रुद्र और विष्णुमें कोई अन्तर नहीं है। त्रिगुणात्मक जगत्‌के जो प्रथम अविनाशी शासक निर्गुण परमात्मा हैं, वे ही महातेजस्वी नारायण हैं। वे सबके स्ष्टा और समस्त जगत्‌के उत्पादक हैं। देवेधर! इन परमात्मा परमदेव नारायणके द्वारा ही भोक्ता महेश्वरदेव, कर्ता अधोक्षज विष्णु, ब्रह्मा, अन्य देवसमुदाय तथा प्रजापतिगण—इन सबकी पीछे सृष्टि हुई है

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श्लोक 18

नारायणो महातेजाः सर्वकृत्ययेकभावनः ।भोक्ता महेश्वरो देवः कर्ता विष्णुरधोक्षजः

nārāyaṇo mahātejāḥ sarvakṛtyayekabhāvanaḥ | bhoktā maheśvaro devaḥ kartā viṣṇuradhokṣajaḥ

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 126

श्लोक 19

ब्रह्मा देवगणाश्चान्ये पश्चात्सृष्टा महात्मना ।महादेवेन देवेश प्रजापतिगणास्तथा

brahmā devagaṇāścānye paścātsṛṣṭā mahātmanā | mahādevena deveśa prajāpatigaṇāstathā

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 126

श्लोक 20

एवं पुराणपुरुषो विष्णुर्देवेषु पठ्यते ।अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च गुणेभ्यश्च परस्तथा

evaṃ purāṇapuruṣo viṣṇurdeveṣu paṭhyate | acintyaścāprameyaśca guṇebhyaśca parastathā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार पुराणपुरुष भगवान्‌ विष्णु देवताओंमें अचिन्त्य, अप्रमेय और गुणातीत कहे जाते हैं

अध्याय 126

श्लोक 21

अदित्या तपसा विष्णुर्महात्माऽऽराधितः पुरा ।वरेण च्छन्दिता तेन परितुष्टेन चादितिः

adityā tapasā viṣṇurmahātmā''rādhitaḥ purā | vareṇa cchanditā tena parituṣṭena cāditiḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें देवमाता अदितिने तपस्याद्वारा परमात्मा विष्णुकी आराधना की। उससे संतुष्ट हो भगवान्‌ विष्णुने भी अदितिको इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी

अध्याय 126

श्लोक 22

तयोक्तस्त्वत्समं पुत्रमिच्छामीति सुरोत्तम ।प्रणिपत्य च विज्ञाय नारायणमधोक्षजम्

tayoktastvatsamaṃ putramicchāmīti surottama | praṇipatya ca vijñāya nārāyaṇamadhokṣajam

हिन्दी अर्थ

सुस्श्रेष्ठ! उस समय अदितिने अधोक्षज(इन्द्रियातीत ) भगवान्‌ नारायणको पहचानकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—' प्रभो ! मैं आपके समान पुत्र चाहती हूँ

अध्याय 126

श्लोक 23

तेनोक्तं भुवने नास्ति मत्समः पुरुषोऽपरः ।अंशेन तु भविष्यामि पुत्रः खल्वहमेव ते

tenoktaṃ bhuvane nāsti matsamaḥ puruṣo'paraḥ | aṃśena tu bhaviṣyāmi putraḥ khalvahameva te

हिन्दी अर्थ

तब उन्होंने कहा-'देवि! समस्त भुवनोंमें मेरे समान दूसरा कोई पुरुष नहीं है। अत: मैं ही अपने अंशसे तुम्हारा पुत्र होऊँगा'

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श्लोक 24

स जातः सर्वकृद् देवो भ्राता तव सुरेश्वर ।नारायणो महातेजा यमुपेन्द्रं प्रचक्षते

sa jātaḥ sarvakṛd devo bhrātā tava sureśvara | nārāyaṇo mahātejā yamupendraṃ pracakṣate

हिन्दी अर्थ

ध२७ करनेवाले महातेजस्वी भगवान्‌ नारायण तुम्हारे भाईके रूपमें अवतीर्ण हुए, जिन्हें उपेन्द्र कहते हैं

अध्याय 126

श्लोक 25

इच्छन्नेव हरिर्देव काश्यपत्वमुपागतः ।तैस्तैर्भावैर्विकुरुते भूतभव्यभवाप्ययः

icchanneva harirdeva kāśyapatvamupāgataḥ | taistairbhāvairvikurute bhūtabhavyabhavāpyayaḥ

हिन्दी अर्थ

देव ! भूत और भविष्यकी उत्पत्ति एवं संहारके अधिष्ठानभूत श्रीहरि स्वेच्छासे ही कश्यपजीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे तथा अपनी इच्छाके अनुसार ही वे विभिन्‍न रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं

अध्याय 126

श्लोक 26

प्रादुर्भावं गतो देवो जगतो हितकाम्यया ।माथुरं जगतो नाथः कर्ता हर्ता च केशवः

prādurbhāvaṃ gato devo jagato hitakāmyayā | māthuraṃ jagato nāthaḥ kartā hartā ca keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

जगत्‌के संरक्षक, ख्रष्ट और संहारक भगवान्‌ केशव जगत्‌के हितकी कामनासे ही मधथुरामें अवतीर्ण हुए हैं

अध्याय 126

श्लोक 27

यथा पललपिण्डः स्याद् व्याप्तः स्नेहेन मानद ।तथा जगदिदं व्याप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना

yathā palalapiṇḍaḥ syād vyāptaḥ snehena mānada | tathā jagadidaṃ vyāptaṃ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

हिन्दी अर्थ

दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र! जैसे मांसपिण्ड ख्रेह (चर्बी या चिकनाई)-से व्याप्त होता है, उसी प्रकार यह सारा जगत्‌ प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णुसे व्याप्त है

अध्याय 126

श्लोक 28

ब्रह्मण्यदेवः सर्वात्मा तैस्तैर्भावैर्विकुर्वति ।जगत्यतिगुणो देवो वैकुण्ठः सर्वभावनः

brahmaṇyadevaḥ sarvātmā taistairbhāvairvikurvati | jagatyatiguṇo devo vaikuṇṭhaḥ sarvabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

वे भगवान्‌ ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, सबके आत्मा हैं और जगतमें जैसा शरीर धारण करते हैं, उसके अनुसार ही विभिन्‍न भावों (सुख-दुः:खादि धर्मों ) द्वारा विकारको प्राप्त होते-से प्रतीत होते हैं । वास्तवमें तो सबकी उत्पत्ति करनेवाले वे भगवान्‌ वैकुण्ठ गुणातीत हैं

अध्याय 126

श्लोक 29

अतः समस्तदेवानां पूज्य एव च केशवः ।पद्मनाभश्च भगवान् प्रजासर्गकरो विभुः

ataḥ samastadevānāṃ pūjya eva ca keśavaḥ | padmanābhaśca bhagavān prajāsargakaro vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

अत; प्रजाकी सृष्टि करनेवाले सर्वव्यापी भगवान्‌ पद्यनाभस्वरूप श्रीकृष्ण समस्त देवताओंके लिये भी पूज्य ही हैं

अध्याय 126

श्लोक 30

अनन्तो धारणार्थं च बिभर्ति च महद्यशः ।यज्ञ इत्यपि सद्भिश्च कथ्यते वेदवादिभिः

ananto dhāraṇārthaṃ ca bibharti ca mahadyaśaḥ | yajña ityapi sadbhiśca kathyate vedavādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करनेके लिये अनन्त (शेषनाग)-के रूपमें प्रकट हुए हैं। वे महान्‌ यश धारण करते हैं। वेदवादी साधु पुरुष उन्हींका 'यज्ञ' नामसे भी प्रतिपादन करते हैं

अध्याय 126

श्लोक 31

श्वेतः कृतयुगे देवो रक्तस्त्रेतायुगे तथा ।द्वापरे च तथा पीतः कृष्णः कलियुगे विभुः

śvetaḥ kṛtayuge devo raktastretāyuge tathā | dvāpare ca tathā pītaḥ kṛṣṇaḥ kaliyuge vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

वे सर्वव्यापी भगवान्‌ सत्ययुगमें श्वेत, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें पीत तथा कलियुगमें कृष्णवर्णका स्वरूप धारण करते हैं*

अध्याय 126

श्लोक 32

अवधीत्स हिरण्याक्षं दिव्यरूपधरो हरिः ।दधाराप्सु निमज्जन्तीमेष देवो वसुन्धराम्

avadhītsa hiraṇyākṣaṃ divyarūpadharo hariḥ | dadhārāpsu nimajjantīmeṣa devo vasundharām

श्लोक 32–34 का हिन्दी अर्थ

उन श्रीहरिने दिव्यरूप धारण करके हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध किया था। उन्होंने जगत्‌के हितकी कामनासे वाराहरूप धारण करके जलमें डूबती हुई पृथ्वीका उद्धार एवं जलके ऊपर इसका संस्थापन किया था। उन्हीं श्रीहरिने नरसिंह रूप धारण करके ति कृतं सम्पद्यते चरन्‌ ॥ य॑ नीलकण्ठ कहते हैं कि जो अविद्यारूपी निद्रामें सो रहा है अर्थात्‌ लिये इस जगतमें भगवान्‌ श्रीहरि कृष्ण होते हैं ( अर्थात्‌ श्रीकृष्णका ब्रता और समझता है, जो उस अज्ञान-निद्रासे आधा जग गया है, अर्थात्‌ सुवर्णके समान मनोहर कान्ति धारण करते हैं । वह मनुष्य ता है । जो कल्याणकी प्राप्तिकि लिये सदा सजग रहकर प्रयत्न करता गगवान्‌ माताकी भाँति अनुरक्त (वात्सल्यभावसे युक्त) होते हैं। जो पथपर ही चलता है, वह कृतकृत्य होनेके कारण कृतयुग अथवा वा उसके समक्ष वे सदा अपने शुद्ध रूपको ही प्रकाशित करते हैं । हिरण्यकशिपुका संहार किया था और उन्हीं वामनरूपधारी श्रीमान्‌ भगवान्‌ विष्णुने इस पृथ्वीको जीता और बलिको नागपाशमें बाँध लिया

अध्याय 126

श्लोक 33

वाराहं वपुराश्रित्य जगतो हितकाम्यया ।जघ्ने हिरण्यकशिपुं नारसिंहवपुर्हरिः

vārāhaṃ vapurāśritya jagato hitakāmyayā | jaghne hiraṇyakaśipuṃ nārasiṃhavapurhariḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 126

श्लोक 34

जिगाय जगतीं चैव विष्णुर्वामनरूपधृक् ।बबन्ध च बलिं देवः श्रीमान् पन्नगबन्धनैः

jigāya jagatīṃ caiva viṣṇurvāmanarūpadhṛk | babandha ca baliṃ devaḥ śrīmān pannagabandhanaiḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 126

श्लोक 35

देवदानवसम्भूतानाक्रामयदपि श्रियम् ।त्वय्यनन्तः पुरा विष्णुरुदारोऽमितविक्रमः

devadānavasambhūtānākrāmayadapi śriyam | tvayyanantaḥ purā viṣṇurudāro'mitavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

यद्यपि देवताओं और दानवोंके सम्मिलित प्रयत्नसे प्रकट हुई राजलक्ष्मी दोनोंके लिये साधारण थी तो भी पूर्वकालमें अमितपराक्रमी, उदारहदय, अनन्तस्वरूप भगवान्‌ विष्णुने तुम्हारे लिये उसपर आक्रमण किया अर्थात्‌ विराट्‌-रूपसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके त्रिलोकलक्ष्मी तुम्हें समर्पित कर दी

अध्याय 126

श्लोक 36

सावशेषं तपो यस्य तन्निहन्ति जनार्दनः ।अलीकेष्वपि वर्तन्तं व्रतमेतन्महात्मनः

sāvaśeṣaṃ tapo yasya tannihanti janārdanaḥ | alīkeṣvapi vartantaṃ vratametanmahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

जिसकी तपस्या शेष है, वह भी यदि अलीक—मायामय अर्थात्‌ छल-कपट एवं अन्यायपूर्ण बर्ताव करता है तो भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसे मार डालते हैं; क्योंकि दुराचारियोंका यह विनाश इन महात्मा श्रीकृष्णका ब्रत है

अध्याय 126

श्लोक 37

जघ्ने च दानवान् मुख्यान् देवानां ये च शत्रवः ।तव प्रियार्थं गोविन्दो धर्मनित्यः सतां गतिः

jaghne ca dānavān mukhyān devānāṃ ye ca śatravaḥ | tava priyārthaṃ govindo dharmanityaḥ satāṃ gatiḥ

हिन्दी अर्थ

सदा धर्मकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले सत्पुरुषोंके आश्रयभूत भगवान्‌ गोविन्दने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मुख्य- मुख्य दानवोंका तथा जो लोग देवताओंके शत्रु हुए हैं, उनका भी वध कर डाला है

अध्याय 126

श्लोक 38

रामत्वमपि चावाप्य जघ्ने रावणमात्मवान् ।भूत्वा कामगुणांश्चैव जघान द्विरदं हरिः

rāmatvamapi cāvāpya jaghne rāvaṇamātmavān | bhūtvā kāmaguṇāṃścaiva jaghāna dviradaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

इन मनस्वी प्रभुने ही श्रीरामचन्द्रका रूप धारण करके रावणको मारा था तथा दूसरे-दूसरे अवतार धारण करके इन श्रीहरिने इच्छानुसार शौर्य आदि गुणोंसे युक्त असुरोंका उसी तरह संहार कर डाला था, जैसे सिंह हाथीको नष्ट कर देता है

अध्याय 126

श्लोक 39

हिताय जगतोऽद्यापि लोके वसति मानुषे ।उपेन्द्रो जगतां नाथः सर्वभूतोत्तमोत्तमः

hitāya jagato'dyāpi loke vasati mānuṣe | upendro jagatāṃ nāthaḥ sarvabhūtottamottamaḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त भूतोंमें जो उत्तम हैं, उनसे भी उत्तम वे जगदीश्वर उपेन्द्र इस समय भी जगत्‌के हितके लिये मनुष्यके रूपमें निवास करते हैं

अध्याय 126

श्लोक 40

जटी कृष्णाजिनी दण्डी दृष्टपूर्वो मया हरिः ।दैतेयेषु चरन् देवस्तृणेष्वग्निरिवोद्धतः

jaṭī kṛṣṇājinī daṇḍī dṛṣṭapūrvo mayā hariḥ | daiteyeṣu caran devastṛṇeṣvagnirivoddhataḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे तिनकोंमें प्रज्जलित हुई अग्नि फैल रही हो, उसी प्रकार मैंने पूर्वकालमें दैत्यसमूहोंके बीच श्रीहरिको जटा, काला मृगचर्म एवं पलाशदण्ड धारण किये वामन ब्रह्मचारीके रूपमें विचरते देखा है

अध्याय 126

श्लोक 41

अद्राक्षमपि गोविन्दं दानवैकार्णवं जगत् ।कुर्वाणं दानवैर्हीनं जगतो हितकाम्यया

adrākṣamapi govindaṃ dānavaikārṇavaṃ jagat | kurvāṇaṃ dānavairhīnaṃ jagato hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

जब सारा संसार दानवरूपी एकार्णव्में मग्न था, उस समय भी जगत्‌के हितकी कामनासे इस विश्वको दानवहीन करते हुए श्रीगोविन्दका मैंने दर्शन किया है

अध्याय 126

श्लोक 42

अवश्यं पारिजातं ते नयिष्यति जनार्दनः ।द्वारकाममरश्रेष्ठ नानृतं च ब्रवीम्यहम्

avaśyaṃ pārijātaṃ te nayiṣyati janārdanaḥ | dvārakāmamaraśreṣṭha nānṛtaṃ ca bravīmyaham

हिन्दी अर्थ

अमरश्रेष्ठ! मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, जनार्दन श्रीकृष्ण तुम्हारे इस पारिजातको अवश्य द्वारकापुरीमें ले जायँगे

अध्याय 126

श्लोक 43

भ्रातृस्नेहाभिभूतस्त्वं न कृष्णे प्रहरिष्यसि ।नापि कृष्णस्त्वयि ज्येष्ठे प्रहरिष्यति वासव

bhrātṛsnehābhibhūtastvaṃ na kṛṣṇe prahariṣyasi | nāpi kṛṣṇastvayi jyeṣṭhe prahariṣyati vāsava

हिन्दी अर्थ

वासव! तुम भ्रातृ-स्रेहसे अभिभूत होकर श्रीकृष्णपर प्रहार नहीं करोगे और श्रीकृष्ण भी तुमपर बड़े भाईके नाते प्रहार नहीं करेंगे

अध्याय 126

श्लोक 44

नैव चेच्छ्रोष्यति प्रोक्तं मया देव कथञ्चन ।पृच्छ त्वं नयधर्मज्ञान् ये हितास्तव मन्त्रिणः

naiva cecchroṣyati proktaṃ mayā deva kathañcana | pṛccha tvaṃ nayadharmajñān ye hitāstava mantriṇaḥ

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

नमो द्र्९ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नारदजीके ऐसा कहनेपर देवेश्वर इन्द्रने उन जगदूगुरु मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया—

अध्याय 126

श्लोक 45

नारदेनैवमुक्तस्तु महेन्द्रो जनमेजय ।इदमुत्तरमीशोऽथ प्रत्युवाच जगद्गुरुम्

nāradenaivamuktastu mahendro janamejaya | idamuttaramīśo'tha pratyuvāca jagadgurum

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 126

श्लोक 46

एवंविधप्रभावं त्वं कृष्णं वदसि यद् द्विज ।एवमेतत् सुबहुशः श्रुतं खलु मया मुने

evaṃvidhaprabhāvaṃ tvaṃ kṛṣṇaṃ vadasi yad dvija | evametat subahuśaḥ śrutaṃ khalu mayā mune

हिन्दी अर्थ

ब्रहमनू! आप श्रीकृष्णको जो ऐसे प्रभावशाली बता रहे हैं, वह ठीक है। मुने! उनके ऐसे प्रभावकी चर्चा मैंने बहुत बार सुनी है

अध्याय 126

श्लोक 47

यतश्चैवंविधः कृष्णस्ततोऽहं तस्य वै तरुम् ।न प्रदास्यामि दातव्यं सतां धर्ममनुस्मरन्

yataścaivaṃvidhaḥ kṛṣṇastato'haṃ tasya vai tarum | na pradāsyāmi dātavyaṃ satāṃ dharmamanusmaran

हिन्दी अर्थ

जब श्रीकृष्ण ऐसे महान्‌ हैं, तब मैं सत्पुरुषोंके धर्मका स्मरण करते हुए निश्चय ही उन्हें देनेयोग्य होनेपर भी पारिजात-वृक्ष नहीं दूँगा

अध्याय 126

श्लोक 48

महाप्रभावो नाल्पार्थे रुष्येदिति विचिन्तयन् ।व्यवस्थितोऽहं भद्रं ते मुने सर्वगुणादिति

mahāprabhāvo nālpārthe ruṣyediti vicintayan | vyavasthito'haṃ bhadraṃ te mune sarvaguṇāditi

हिन्दी अर्थ

मुने ! आपका कल्याण हो। जो महान्‌ प्रभावशाली पुरुष हैं, वे इस छोटी-सी वस्तुके लिये मुझपर रुष्ट नहीं होंगे, ऐसा सोचकर उन सर्वगुणसम्पन्‍न श्रीकृष्णसे निर्भय होकर स्थित हूँ

अध्याय 126

श्लोक 49

महाप्रभावाः सततं भवन्ति हि सहिष्णवः ।श्रोतारश्चैव सततं वृद्धानां ज्ञानचक्षुषाम्

mahāprabhāvāḥ satataṃ bhavanti hi sahiṣṇavaḥ | śrotāraścaiva satataṃ vṛddhānāṃ jñānacakṣuṣām

हिन्दी अर्थ

महान्‌ प्रभावशाली महापुरुष सदा सहिष्णु होते हैं और ज्ञानदृष्टि रखनेवाले बड़े-बूढ़ोंकी बातें सुनते हैं

अध्याय 126

श्लोक 50

महात्मा कारणे नाल्पे कृष्णो धर्मभृतां वरः ।भ्रात्रा ज्येष्ठेन सर्वज्ञो विरोधं गन्तुमर्हति

mahātmā kāraṇe nālpe kṛṣṇo dharmabhṛtāṃ varaḥ | bhrātrā jyeṣṭhena sarvajño virodhaṃ gantumarhati

हिन्दी अर्थ

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ महात्मा श्रीकृष्ण इस छोटे-से कारणपर अपने बड़े भाईके साथ विरोध नहीं करेंगे

अध्याय 126

श्लोक 51

यथैवं मम मातुः स वरं प्रादादधोक्षजः ।तथैव तस्याः पुत्राणां ज्येष्ठानां सोढुमर्हति

yathaivaṃ mama mātuḥ sa varaṃ prādādadhokṣajaḥ | tathaiva tasyāḥ putrāṇāṃ jyeṣṭhānāṃ soḍhumarhati

हिन्दी अर्थ

जैसे अधोक्षज भगवान्‌ विष्णुने मेरी माताको इस प्रकार वरदान दिया है, वैसे ही उन्हें उसके ज्येष्ठ पुत्रॉंकें अपराधको भी सहन करना चाहिये

अध्याय 126

श्लोक 52

यथैवोपेन्द्रतां यातः स्वयमिच्छञ्जनार्दनः ।तथैव भ्रातुरिन्द्रस्य सम्मानं कर्तुमर्हति

yathaivopendratāṃ yātaḥ svayamicchañjanārdanaḥ | tathaiva bhrāturindrasya sammānaṃ kartumarhati

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वयं अपनी ही इच्छासे भगवान्‌ विष्णु उपेन्द्र-भावको प्राप्त हुए (मेरे छोटे भाईके रूपमें अवतीर्ण हुए), उसी प्रकार उन्हें अपने बड़े भाई मुझ इन्द्रका सम्मान भी करना चाहिये

अध्याय 126

श्लोक 53

ज्यैष्ठ्यमेतेन देवेन नारब्धं किं पुरातने ।अथेदानीमपीच्छेत् स ज्येष्ठोऽस्तु मधुसूदनः

jyaiṣṭhyametena devena nārabdhaṃ kiṃ purātane | athedānīmapīcchet sa jyeṣṭho'stu madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

क्या पूर्वकालमें (वामन-अवतारके समय) इन विष्णु- देवने मेरी ज्येष्ठता नहीं स्वीकार की थी, उसी तरह इस समय भी यदि मधुसूदन चाहें तो स्वयं ही ज्येष्ठ हो जायँ'

अध्याय 126

श्लोक 54

सुनिश्चितं बलरिपुमीक्ष्य नारदो विसर्जितस्त्रिदशवरेण धर्मभृत् ।ययौ पुरीं यदुवृषभाभिरक्षितां कुशस्थलीं धृतिमतिमांस्तपोधनः

suniścitaṃ balaripumīkṣya nārado visarjitastridaśavareṇa dharmabhṛt | yayau purīṃ yaduvṛṣabhābhirakṣitāṃ kuśasthalīṃ dhṛtimatimāṃstapodhanaḥ

हिन्दी अर्थ

धृति और बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा तपोधन नारद बल-विनाशन इन्द्रको अपने निश्चयपर अटल देख उन देवेश्वरसे विदा ले यदुपति श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुशस्थली (द्वारका)-पुरीको चले गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.