Harivamsha Purana
127
अध्याय 127 / 318

Parva 2, Adhyāya 72

65 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ65 श्लोक

अध्याय 127

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन नारदं अमरावत्योपरि आक्रमणस्य निश्चयं कथयित्वा इन्द्राय सन्देशप्रेषणम्, इन्द्रबृहस्पतयोः वार्तालापः, बृहस्पतिना कश्यपाय अस्य समाचारस्य कथनं एवं कश्यपेन युद्धस्य शान्तये भगवतः शङ्करस्य स्तुतिः अथेत्य द्वारकां रम्यां नारदो मुनिसत्तमः ।ददर्श पुरुषश्रेष्ठं नारायणमरिन्दमम्

śrīkṛṣṇena nāradaṃ amarāvatyopari ākramaṇasya niścayaṃ kathayitvā indrāya sandeśapreṣaṇam, indrabṛhaspatayoḥ vārtālāpaḥ, bṛhaspatinā kaśyapāya asya samācārasya kathanaṃ evaṃ kaśyapena yuddhasya śāntaye bhagavataḥ śaṅkarasya stutiḥ athetya dvārakāṃ ramyāṃ nārado munisattamaḥ | dadarśa puruṣaśreṣṭhaṃ nārāyaṇamarindamam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर रमणीय द्वारकापुरीमें जाकर मुनिवर नारदने शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषप्रवर नारायण ( भगवान्‌ श्रीकृष्ण )- का दर्शन किया

अध्याय 127

श्लोक 2

स्ववेश्मनि सुखासीनं सहितं सत्यभामया ।विराजमानं वपुषा सर्वतेजोऽतिगामिना

svaveśmani sukhāsīnaṃ sahitaṃ satyabhāmayā | virājamānaṃ vapuṣā sarvatejo'tigāminā

हिन्दी अर्थ

वे अपने भवनमें सत्यभामाके साथ सुखपूर्वक बैठे थे और सम्पूर्ण तेजोंका अतिक्रमण करनेवाले अपने दिव्य विग्रहसे विराजमान हो रहे थे

अध्याय 127

श्लोक 3

तमेवार्थं महात्मानं चिन्तयन्तं दृढव्रतम् ।केवलं योजयन्तं च वाक्यमात्रेण भाविनीम्

tamevārthaṃ mahātmānaṃ cintayantaṃ dṛḍhavratam | kevalaṃ yojayantaṃ ca vākyamātreṇa bhāvinīm

हिन्दी अर्थ

दृढ़तापूर्वक अपने ब्रतका पालन करनेवाले महात्मा श्रीकृष्ण उसी (पारिजात)-के विषयमें सोच रहे थे और भामिनी सत्यभामाको केवल वाणीमात्रसे सान्त्वना दे रहे थे

अध्याय 127

श्लोक 4

दृष्ट्वैव नारदं देवः प्रत्युत्थाय अधोक्षजः ।पूजयामास च तथा विधिदृष्टेन कर्मणा

dṛṣṭvaiva nāradaṃ devaḥ pratyutthāya adhokṣajaḥ | pūjayāmāsa ca tathā vidhidṛṣṭena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

नारदजीको देखते ही भगवान्‌ अधोक्षज उठकर खड़े हो गये तथा उन्होंने शास्त्रोक्त विधिसे उनका पूजन किया

अध्याय 127

श्लोक 5

सुखोपविष्टं विश्रान्तं प्रहस्य मधुसूदनः ।वृत्तान्तं परिपप्रच्छ पारिजाततरुं प्रति

sukhopaviṣṭaṃ viśrāntaṃ prahasya madhusūdanaḥ | vṛttāntaṃ paripapraccha pārijātataruṃ prati

हिन्दी अर्थ

जब वे सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये और विश्राम कर चुके, तब मधुसूदन श्रीकृष्णने हँसकर उनसे पारिजात-वृक्षके विषयमें समाचार पूछा

अध्याय 127

श्लोक 6

अथाचष्ट मुनिः सर्वं विस्तरेण तपोधनः ।इन्द्रानुजायेन्द्रवाक्यं निखिलं जनमेजय

athācaṣṭa muniḥ sarvaṃ vistareṇa tapodhanaḥ | indrānujāyendravākyaṃ nikhilaṃ janamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! तब तपोधन मुनि नारदजीने सारा समाचार विस्तारपूर्वक बतलाया और इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णके लिये इन्द्रकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं

अध्याय 127

श्लोक 7

श्रुत्वा कृष्णस्तु तत्सर्वं नारदं वाक्यमब्रवीत् ।अमरावतीं पुरीं यास्ये श्वोऽहं धर्मभृतां वर

śrutvā kṛṣṇastu tatsarvaṃ nāradaṃ vākyamabravīt | amarāvatīṃ purīṃ yāsye śvo'haṃ dharmabhṛtāṃ vara

हिन्दी अर्थ

वह सब सुनकर श्रीकृष्णने नारदजीसे कहा—' धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर ! मैं कल अमरावतीपुरीकी यात्रा करूँगा

अध्याय 127

श्लोक 8

इत्युक्त्वा नारदेनैव सहितः सागरं ययौ ।सन्दिदेश ततस्तत्र विविक्ते नारदं हरिः

ityuktvā nāradenaiva sahitaḥ sāgaraṃ yayau | sandideśa tatastatra vivikte nāradaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर श्रीहरि नारदजीके साथ ही समुद्र-तटपर गये और वहाँ एकान्तमें उन्होंने उन देवर्षिको यह संदेश दिया—

अध्याय 127

श्लोक 9

महेन्द्रभवनं गत्वा अद्य ब्रूहि तपोधन ।अभिवाद्य महात्मानं मद्वाक्यममरोत्तमम्

mahendrabhavanaṃ gatvā adya brūhi tapodhana | abhivādya mahātmānaṃ madvākyamamarottamam

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

तपोधन! आप आज ही इन्द्रभवनमें जाकर मेरी औओरसे अमरश्रेष्ठ महात्मा इन्द्रको प्रणाम करके उनसे मेरी यह बात बता दीजिये कि इन्द्र ! प्रभो ! आप युद्धमें मेरे सामने नहीं ठहर सकेंगे। आपको यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि मैं पारिजातको वहाँसे ले आनेका दृढ़ निश्चय कर चुका हूँ'

अध्याय 127

श्लोक 10

न युद्धे प्रमुखे शक्र स्थातुमर्हसि मे प्रभो ।पारिजातस्य नयने निश्चितं त्वमवेहि माम्

na yuddhe pramukhe śakra sthātumarhasi me prabho | pārijātasya nayane niścitaṃ tvamavehi mām

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 127

श्लोक 11

एवमुक्तस्तु कृष्णेन नारदस्त्रिदिवं गतः ।आचचक्षेऽथ कृष्णोक्तं देवेन्द्रस्यामितौजसः

evamuktastu kṛṣṇena nāradastridivaṃ gataḥ | ācacakṣe'tha kṛṣṇoktaṃ devendrasyāmitaujasaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर नारदजी स्वर्गलोकको चले गये । वहाँ उन्होंने अमिततेजस्वी देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णकी कही हुई सारी बात बता दी

अध्याय 127

श्लोक 12

ततो बृहस्पतेः शक्रः शशंस बलनाशनः ।श्रुत्वा बृहस्पतिर्देवमुवाच कुरुनन्दन

tato bṛhaspateḥ śakraḥ śaśaṃsa balanāśanaḥ | śrutvā bṛhaspatirdevamuvāca kurunandana

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! तब बलासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रने बृहस्पतिसे यह सब प्रसंग कह सुनाया। उसे सुनकर बृहस्पतिने देवेन्द्रसे कहा—

अध्याय 127

श्लोक 14

अहो धिग् ब्रह्मसदनं मयि याते शतक्रतो ।दुर्नीतमिदमारब्धमत्र भेदो हि दारुणः १३॥ अनाख्यात्वा कथं नाम भवता भुवनेश्वर ।ममैतत् कृत्यमारब्धं देव केनापि हेतुना

aho dhig brahmasadanaṃ mayi yāte śatakrato | durnītamidamārabdhamatra bhedo hi dāruṇaḥ 13|| anākhyātvā kathaṃ nāma bhavatā bhuvaneśvara | mamaitat kṛtyamārabdhaṃ deva kenāpi hetunā

हिन्दी अर्थ

भुवनेश्वर! देव! क्या कारण था कि तुमने मुझसे बताये बिना ही यह दुष्कृत्य आरम्भ कर दिया

अध्याय 127

श्लोक 15

अथवा भवितव्येन कर्मजेन प्रयुज्यते ।जगद् वृत्रघ्न न विधिः शक्यः समतिवर्तितुम्

athavā bhavitavyena karmajena prayujyate | jagad vṛtraghna na vidhiḥ śakyaḥ samativartitum

हिन्दी अर्थ

अथवा वृत्रासुर-विनाशन इन्द्र ! यह सम्पूर्ण जगत्‌ भावी कर्मफलसे प्रेरित होता रहता है। विधिके विधानका उल्लड्डन करना असम्भव है

अध्याय 127

श्लोक 16

सहसैव तु कार्याणामारम्भो न प्रशस्यते ।तदेतत्सहसाऽऽरब्धं कार्यं दास्यति लाघवम्

sahasaiva tu kāryāṇāmārambho na praśasyate | tadetatsahasā''rabdhaṃ kāryaṃ dāsyati lāghavam

हिन्दी अर्थ

सहसा किया हुआ कार्योंका आरम्भ अच्छा नहीं माना गया है। तुमने जो सहसा यह कार्य आरम्भ कर दिया है, यह अवश्य तुम्हें लघुता (पराजय) प्रदान करेगा

अध्याय 127

श्लोक 17

बृहस्पतिं महात्मानं महेन्द्रस्त्वब्रवीद् वचः ।एवं गतेऽद्य यत् कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति

bṛhaspatiṃ mahātmānaṃ mahendrastvabravīd vacaḥ | evaṃ gate'dya yat kāryaṃ tad bhavān vaktumarhati

हिन्दी अर्थ

तब महेन्द्रने महात्मा बृहस्पतिसे कहा—“गुरुदेव! ऐसी परिस्थितिमें आज जो मेरा कर्तव्य हो, उसे आप बतानेकी कृपा करें'

अध्याय 127

श्लोक 18

तमुवाचाथ धर्मात्मा गतानागततत्त्ववित् ।अधोमुखश्चिन्तयित्वा बृहस्पतिरुदारधीः

tamuvācātha dharmātmā gatānāgatatattvavit | adhomukhaścintayitvā bṛhaspatirudāradhīḥ

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर भूत और भविष्यके तत््वको जाननेवाले उदारबुद्धि धर्मात्मा बृहस्पतिने नीचे मुँह करके कुछ देरतक सोच-विचारकर उनसे कहा—

अध्याय 127

श्लोक 19

यतस्व सह पुत्रेण योधयस्व जनार्दनम् ।तथा शक्र करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति

yatasva saha putreṇa yodhayasva janārdanam | tathā śakra kariṣyāmi yathā nyāyyaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

देवेन्द्र! अब तुम अपने पुत्र जयन्तके साथ युद्धभूमिमें उपस्थित हो श्रीकृष्णके साथ युद्ध और उसमें विजय पानेका प्रयल्र करो। तबतक मैं ऐसा प्रयल करूँगा, जिससे न्यायसंगत परिणाम प्रकट होगा'

अध्याय 127

श्लोक 20

बृहस्पतिस्त्वेवमुक्त्वा क्षीरोदं सागरं गतः ।आचष्ट मुनये सर्वं कश्यपाय महात्मने

bṛhaspatistvevamuktvā kṣīrodaṃ sāgaraṃ gataḥ | ācaṣṭa munaye sarvaṃ kaśyapāya mahātmane

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर बृहस्पतिजी क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ उन्होंने महात्मा कश्यप मुनिसे सब बातें कह सुनायीं

अध्याय 127

श्लोक 21

तच्छ्रुत्वा कश्यपः क्रुद्धो बृहस्पतिमभाषत ।अवश्यं भाव्यमेतद् भोः सर्वथा नात्र संशयः

tacchrutvā kaśyapaḥ kruddho bṛhaspatimabhāṣata | avaśyaṃ bhāvyametad bhoḥ sarvathā nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

वह सुनकर कश्यपजीने कुपित हो बृहस्पतिजीसे कहा-' अजी, यह युद्ध अवश्य होगा। सर्वथा होकर रहेगा—इसमें संशय नहीं है

अध्याय 127

श्लोक 22

इच्छतः सदृशीं भार्यां महर्षेर्देवशर्मणः ।अपध्यानकृतो दोषः पतत्येष शतक्रतोः

icchataḥ sadṛśīṃ bhāryāṃ maharṣerdevaśarmaṇaḥ | apadhyānakṛto doṣaḥ patatyeṣa śatakratoḥ

हिन्दी अर्थ

महर्षि देवशर्माकी पत्नी रुचि सर्वथा उन्हींके समान शुद्ध आचार- विचारवाली थी; परंतु इन्द्रने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। इससे मुनिने इन्द्रका अनिष्ट-चिन्तन किया। वही यह दोष इस समय इन्द्रपर पड़ रहा है*

अध्याय 127

श्लोक 23

तस्य दोषस्य शान्त्यर्थमारब्धश्च मुने मया ।उदवासः स दोषश्च प्राप्त एव सुदारुणः

tasya doṣasya śāntyarthamārabdhaśca mune mayā | udavāsaḥ sa doṣaśca prāpta eva sudāruṇaḥ

हिन्दी अर्थ

मुने ! उस दोषकी शान्तिके लिये ही मैंने यह जलवासरूप तप आरम्भ किया था तथापि वह अत्यन्त दारुण दोष प्राप्त हो ही गया

अध्याय 127

श्लोक 24

तद् गमिष्यामि मध्येऽस्य सहादित्या तपोधन ।उभौ तौ वारयिष्यामि दैवं संवदते यदि

tad gamiṣyāmi madhye'sya sahādityā tapodhana | ubhau tau vārayiṣyāmi daivaṃ saṃvadate yadi

हिन्दी अर्थ

तपोधन! अत: अब मैं अदितिके साथ इस युद्धके अवसरपर मध्यस्थ होकर जाऊँगा और यदि दैव अनुकूल रहा तो दोनोंको युद्धसे रोकूँगा

अध्याय 127

श्लोक 25

बृहस्पतिस्तु धर्मात्मा मारीचमिदमब्रवीत् ।प्राप्तकालं त्वया तत्र भवितव्यं तपोधन

bṛhaspatistu dharmātmā mārīcamidamabravīt | prāptakālaṃ tvayā tatra bhavitavyaṃ tapodhana

हिन्दी अर्थ

तब धर्मात्मा बृहस्पतिने मरीचिनन्दन कश्यपसे इस प्रकार कहा—'तपोधन! अब युद्धका अवसर प्राप्त हो गया। अतः: आपको वहाँ अवश्य उपस्थित होना चाहिये

अध्याय 127

श्लोक 26

तथेति कश्यपश्चोक्त्वा सम्प्रस्थाप्य बृहस्पतिम् ।जगामार्चयितुं देवं रुद्रं भूतगणेश्वरम्

tatheti kaśyapaścoktvā samprasthāpya bṛhaspatim | jagāmārcayituṃ devaṃ rudraṃ bhūtagaṇeśvaram

हिन्दी अर्थ

में देख लेना चाहिये। कश्यपजीने 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पतिको वहाँसे भेज दिया और स्वयं वे भूतगणोंके स्वामी रुद्रदेवकी आराधना करनेके लिये चले गये

अध्याय 127

श्लोक 27

तत्र सौम्यं महात्मानमानर्च वृषभध्वजम् ।वरार्थी कश्यपो धीमानदित्या सहितः प्रभुः

tatra saumyaṃ mahātmānamānarca vṛṣabhadhvajam | varārthī kaśyapo dhīmānadityā sahitaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ अदितिके साथ बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ कश्यपने वरप्राप्तिकी इच्छा रखकर सौम्यरूपधारी परमात्मा वृषभध्वज शिवकी पूजा की

अध्याय 127

श्लोक 28

तुष्टाव च तमीशानं मारीचः कश्यपस्तदा ।वेदोक्तैः स्वकृतैश्चैव स्तवैः स्तुत्यं जगद्गुरुम्

tuṣṭāva ca tamīśānaṃ mārīcaḥ kaśyapastadā | vedoktaiḥ svakṛtaiścaiva stavaiḥ stutyaṃ jagadgurum

हिन्दी अर्थ

उस समय मरीचिनन्दन कश्यपने स्तुति करनेके योग्य जगद्‌गुरु भगवान्‌ शंकरका वेदोक्त मन्त्रों तथा स्वरचित स्तोत्रोंद्वारा स्तवन किया

अध्याय 127

श्लोक 29

उरुक्रमं विश्वकर्माणमीशं जगत्स्रष्टारं धर्मदृश्यं वरेशम् ।सं सर्वं त्वां धृतिमद्धाम दिव्यं विश्वेश्वरं भगवन्तं नमस्ये

urukramaṃ viśvakarmāṇamīśaṃ jagatsraṣṭāraṃ dharmadṛśyaṃ vareśam | saṃ sarvaṃ tvāṃ dhṛtimaddhāma divyaṃ viśveśvaraṃ bhagavantaṃ namasye

हिन्दी अर्थ

कश्यपजी बोले—जो विष्णुरूपसे वामन-अवतारके समय महान्‌ पग बढ़ाकर त्रिलोकीको नाप लेनेमें समर्थ हुए हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है, जो सबके ईश्वर हैं, जगत्‌की सृष्टि करनेवाले हैं, धर्मके द्वारा जिनका साक्षात्कार होता है, जो अभीष्ट मनोरथोंके स्वामी तथा उनकी पूर्ति करनेवाले हैं, जो सर्वस्वरूप, सात्त्विकी धृतिवाले योगियोंके जो ये चिन्मय धामस्वरूप हैं,उन दिव्यस्वरूप आप भगवान्‌ विश्वेधरको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 30

यो देवानामधिपः पापहर्ता ततं विश्वं येन जगन्मयत्वात् ।आपो गर्भं यस्य शुभा धरित्र्यो विश्वेश्वरं तं शरणं प्रपद्ये

yo devānāmadhipaḥ pāpahartā tataṃ viśvaṃ yena jaganmayatvāt | āpo garbhaṃ yasya śubhā dharitryo viśveśvaraṃ taṃ śaraṇaṃ prapadye

हिन्दी अर्थ

जो देवताओंके अधिपति और पापहर्ता हैं, जो जगत्स्वरूप होनेके कारण सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं, शुभ जल (जलात्मक वीर्यसे प्रकट होनेवाले शरीर) जिनके गर्भ (अंशभूत चैतन्य) -को धारण करते हैं, उन भगवान्‌ विश्वेधरकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 31

शालावृकान्यो यतिरूपो निजघ्ने दत्तानिन्द्रेण प्रणुदो हितानाम् ।विरूपाक्षं सुदर्शनं पुण्ययोनिं विश्वेश्वरं शरणं यामि मूर्ध्ना

śālāvṛkānyo yatirūpo nijaghne dattānindreṇa praṇudo hitānām | virūpākṣaṃ sudarśanaṃ puṇyayoniṃ viśveśvaraṃ śaraṇaṃ yāmi mūrdhnā

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने यतिरूप होकर—जितेन्द्रिय बनकर इन्द्रके भेजे हुए इन्द्रियरूपी भेड़ियोंको, जो शम-दम आदि हितैषी मित्रोंको दबा देनेवाले हैं, नष्ट कर दिया, जिनके नेत्र विरूप हैं, जो देखनेमें बड़े सुन्दर तथा पुण्यकी योनि हैं, उन भगवान्‌ विश्वेध्वरकी मैं शरण लेता हूँ और उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 32

भुङ्क्ते य एको विभुर्जगतो विश्वमग्र्यं धाम्नां धाम सुकृतित्वान्न धृष्यः ।पुष्यात् स मां महसा शाश्वतेन सोमपानां मरीचिपानां वरिष्ठः

bhuṅkte ya eko vibhurjagato viśvamagryaṃ dhāmnāṃ dhāma sukṛtitvānna dhṛṣyaḥ | puṣyāt sa māṃ mahasā śāśvatena somapānāṃ marīcipānāṃ variṣṭhaḥ

हिन्दी अर्थ

जो एकमात्र इस जगत्‌के स्वामी हैं तथा श्रेष्ठ विश्वका पालन करते ( अथवा इसे अपने उपभोगमें लाते) हैं, जो धाम (नेत्र एवं सूर्य आदि)- के भी धाम (आश्रय अथवा प्रकाश) हैं तथा सुकृति (पुण्यरूप अथवा सुकृतनामधारी* ब्रह्वरूप) होनेके कारण सबके लिये अजेय हैं, सोमपान करनेवाले कर्मठों और चन्द्ररश्मियोंका पान करनेवाले महामुनियोंमें जिनका सबसे ऊँचा और गौरवपूर्ण स्थान है, वे भगवान्‌ विश्वेश्वर अपने सनातन तेजसे मेरा पोषण करें

अध्याय 127

श्लोक 33

अथर्वाणं सुशिरसं भूतयोनिं कृतिनं वीरं दानवानां च बाधम् ।यज्ञे हुतिं यज्ञियं संस्कृतं वै विश्वेश्वरं शरणं यामि देवम्

atharvāṇaṃ suśirasaṃ bhūtayoniṃ kṛtinaṃ vīraṃ dānavānāṃ ca bādham | yajñe hutiṃ yajñiyaṃ saṃskṛtaṃ vai viśveśvaraṃ śaraṇaṃ yāmi devam

हिन्दी अर्थ

सुकृत' है। ध्ड्दे जिनका अथर्ववेदके द्वारा प्रतिपादन किया गया है, जिनके पश्टकोशरूप पाँच सुन्दर मस्तक हैं, जो सम्पूर्ण भूतोंकी योनि अर्थात्‌ समस्त जगत्‌के कारण हैं, जो विद्वान, वीर तथा दानवोंके बाधक हैं, यजमें जिनके लिये आहुति दी जाती है, यज्ञसम्बन्धी संस्कारयुक्त हविष्य जिनका स्वरूप है, उन विश्वेश्वरदेवकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 34

जगज्जालं विततं यत्र विश्वं विश्वात्मानं प्रीतिदेवं गतानाम् ।य ऊर्ध्वगं रथमास्थाय याति विश्वेश्वरः स सुमना मेऽस्तु नित्यम्

jagajjālaṃ vitataṃ yatra viśvaṃ viśvātmānaṃ prītidevaṃ gatānām | ya ūrdhvagaṃ rathamāsthāya yāti viśveśvaraḥ sa sumanā me'stu nityam

हिन्दी अर्थ

जिनके ऊपर यह सारा जगत्रूपी इन्द्रजाल फैला हुआ है, जो सम्पूर्ण विश्वके आत्मा हैं, शरणागतोंके लिये प्रीति एवं सुखको प्रकाशित _ करनेवाले हैं तथा जो ऊर्ध्वगामी (आकाशचारी) रथपर आरूढ़ हो यात्रा करते हैं, वे भगवान्‌ विश्वेश्वर मुझपर सदा प्रसन्नचित्त रहें

अध्याय 127

श्लोक 35

अन्तश्चरं रोचनं चारुशाखं महाबलं धर्मनेतारमीड्यम् ।सहस्रनेत्रं शतवर्त्मानमुग्रं महादेवं विश्वसृजं नमस्ये

antaścaraṃ rocanaṃ cāruśākhaṃ mahābalaṃ dharmanetāramīḍyam | sahasranetraṃ śatavartmānamugraṃ mahādevaṃ viśvasṛjaṃ namasye

हिन्दी अर्थ

जो अन्तर्यामी आत्मारूपसे सबके भीतर विचरते हैं, प्रकाशमान (चिन्मय) हैं, वेदमयी मनोहर शाखाएँ जिनसे प्रकट हुई हैं, जो महान्‌ बलशाली, धर्मके प्रवर्तक तथा स्तवन करने योग्य हैं। जिनके सहसों नेत्र हैं और जिन्हें पानेके लिये सैकड़ों मार्ग हैं (अथवा जो शतपथविहित कर्मफलके दाता हैं) उन उग्रस्वरूप विश्वस्ष्टा महादेवजीको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 36

शुचिं योगं शंसनं शान्तपापं शर्वं शम्भुं शङ्करं भूतनाथम् ।धुरन्धरं गोपतिं चन्द्रचिह्नं हृषीकाणामयनं यामि मूर्ध्ना

śuciṃ yogaṃ śaṃsanaṃ śāntapāpaṃ śarvaṃ śambhuṃ śaṅkaraṃ bhūtanātham | dhurandharaṃ gopatiṃ candracihnaṃ hṛṣīkāṇāmayanaṃ yāmi mūrdhnā

हिन्दी अर्थ

जो शुचि (पवित्र एवं असज्ञ), योगसे प्राप्त होनेवाले, विभिन्न योगोंके प्रतिपादक, पापशून्य, संहारक, सुखके उत्पत्तिस्थान, कल्याणकारी और सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं, जो अकेले ही सम्पूर्ण विश्वका भार वहन करते हैं, इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा चन्द्रमाको चिह्नके रूपमें अपने मस्तकपर धारण करते हैं, ज्ञानेन्द्रियोंके औआश्रयरूप उन भगवान्‌ शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता और उनकी शरणमें जाता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 37

आशुःशिशानं वृषभं रोरुवाणं कृतं धर्मं वितथं चाशुशेषम् ।वसुन्धरं समृजीकं समं त्वां धृतव्रतं शूलधरं प्रपद्ये

āśuḥśiśānaṃ vṛṣabhaṃ roruvāṇaṃ kṛtaṃ dharmaṃ vitathaṃ cāśuśeṣam | vasundharaṃ samṛjīkaṃ samaṃ tvāṃ dhṛtavrataṃ śūladharaṃ prapadye

हिन्दी अर्थ

जो शीघ्र फल देनेवाला, राग आदि दोषोंको शान्त करनेवाला, अभीष्ट मनोरथोंका वर्षक (पूरक), प्रात: सबन आदिके क्रमसे शब्दायमान और अनुष्ठानमें लाया हुआ जो यज्ञादिरूप धर्म है, वह यदि सकामभावसे किया जाय तो नश्वर फल देनेके कारण व्यर्थ हो जाता है और फलभोगके द्वारा उसकी शीघ्र ही समाप्ति हो जाती है; किंतु वही धर्म यदि निष्कामभावसे किया जाय तो वह आत्मशुद्धि-सम्पादनके साथ ही पुण्यरूपी धनको सुस्थिर रखनेबाला होता है—यह दोनों प्रकारका धर्म आपका ही स्वरूप है। आप सभी अवस्थाओंगें सम हैं। उत्तम ब्रतको धारण करनेवाले आप त्रिशूलधारी रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 38

अनन्तवीर्यं धृतकर्माणमाद्यं यज्ञाशेषं यजतां चाभियाज्यम् ।हविर्भुजं भुवनानां सदैव ज्येष्ठं द्विजं धर्मभृतां प्रपद्ये

anantavīryaṃ dhṛtakarmāṇamādyaṃ yajñāśeṣaṃ yajatāṃ cābhiyājyam | havirbhujaṃ bhuvanānāṃ sadaiva jyeṣṭhaṃ dvijaṃ dharmabhṛtāṃ prapadye

हिन्दी अर्थ

आपके बल-पराक्रमका कहीं अन्त नहीं है, आप दी समस्त कर्मोको धारण करनेवाले आधार हैं अर्थात्‌ भाप ही समस्त कर्मों और उनके फलोंके साक्षी हैं। अन्य देवताओंकी भाँति आप यज्ञके अज्भ नहीं हैं । आप दी सबके आदि कारण हैं । यजमान अपने यज्ञोंद्वारा जिन पज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, उनके वे आराध्यदेव भाप ही हैं। आप ही सदा समस्त जगत्‌के हविष्यभोक्ता भग्रिरूप हैं और आप ही धर्मात्माओंमें ज्येष्ठ द्विज ब्राह्मण) हैं, मैं आपकी शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 39

परं गुणेभ्यः पृश्निगर्भस्वरूपं यशः शृङ्गं व्यूहनं कान्तरूपम् ।शुद्धात्मानं पुरुषं सत्यधामं सम्मोहनं दुष्कृतिनां नमस्ये

paraṃ guṇebhyaḥ pṛśnigarbhasvarūpaṃ yaśaḥ śṛṅgaṃ vyūhanaṃ kāntarūpam | śuddhātmānaṃ puruṣaṃ satyadhāmaṃ sammohanaṃ duṣkṛtināṃ namasye

हिन्दी अर्थ

आप [णोंसे परे तथा विष्णुस्वरूप हैं। आप यशके समान यापक हैं । सारे प्रपश्नको व्याप्त करके भी सींगके समान इससे ऊपर उठे हुए हैं। आप ही समस्त प्राणियोंके भज्ध-प्रत्यज्ञको सुगठित करनेवाले हैं। आपका रूप भ्रत्यन्त कमनीय (मनोहर) है। आप विशुद्ध आत्मस्वरूप पन्तरयामी तथा सत्यधाम (अबाधित चैतन्यस्वरूप अथवा कुण्ठादि नित्यधामस्वरूप) हैं। आप दुराचारियोंको पोह (महान्‌ दुःख) -में डालनेवाले हैं। मैं आपको नमस्कार ररता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 40

युक्तोङ्कारं स्वशिरसं चारुकर्म दृढव्रतं दृदधन्वानमाजम् ।शूरं वेत्तारं धनुषोऽस्त्रातिरेकं पतिं पशूनां शमनं नमस्ये

yuktoṅkāraṃ svaśirasaṃ cārukarma dṛḍhavrataṃ dṛdadhanvānamājam | śūraṃ vettāraṃ dhanuṣo'strātirekaṃ patiṃ paśūnāṃ śamanaṃ namasye

हिन्दी अर्थ

आप योगियोंके लिये प्रणवरूप हैं । भपने स्वरूपभूत ओंकारके सिर अर्थात्‌ उसकी अर्द्धमात्रा माप ही हैं । आपका कर्म हिंसाशून्य होनेके कारण बड़ा गी मनोहर है । आप दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले । आपका धनुष अत्यन्त सुदृढ़ है। आप बाणोंको रतक फेंकनेवाले, शूरवीर, धनुर्वेदके ज्ञाता और अस्त्र- वजज्ञानमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं। समस्त पशुओं (जीवों )- » पति (पालक) तथा जगत्‌का संहार करनेवाले आप गगवान्‌ शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 41

एको रातिश्चैव भूतं भविष्यं सर्वातिथिर्यो हि जुषत्यरिघ्नः ।अरिन्तुदोऽनुत्तमः संविभागी विभाजको मां भगवान्पातु देवः

eko rātiścaiva bhūtaṃ bhaviṣyaṃ sarvātithiryo hi juṣatyarighnaḥ | arintudo'nuttamaḥ saṃvibhāgī vibhājako māṃ bhagavānpātu devaḥ

हिन्दी अर्थ

जो बके एकमात्र मित्र हैं, भूत और भविष्य जिनका ही वरूप है, जो सबके अतिथि (अग्नि)-रूपसे हविष्यका वन करते हैं, काम आदि शत्रुओंका नाश करनेवाले तथा शत्रुभाव रखनेवाले राक्षसोंको पीड़ा देते हैं, जनसे उत्तम दूसरा कोई नहीं है, जो यज्ञमें भाग पाते गौर स्वयं भी भागोंका विभाजन करते हैं, वे भगवान्‌ हादेव मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 42

य एको याति जगतां विश्वमीशो य एकोऽदान्मरुतां प्राणमग्र्यम् ।येनानृशंस्याच्छाश्वतं साम जुष्टं स मां जुष्यात्सुकृतिश्रेयसेऽद्य

ya eko yāti jagatāṃ viśvamīśo ya eko'dānmarutāṃ prāṇamagryam | yenānṛśaṃsyācchāśvataṃ sāma juṣṭaṃ sa māṃ juṣyātsukṛtiśreyase'dya

हिन्दी अर्थ

जो जगदीथर एक होकर ी सम्पूर्ण विश्वमें प्रविष्ट हैं तथा जिन अद्वितीय परमात्माने णस्वरूप मरुद्रणोंको भी उत्तम प्राण प्रदान किया है र्थात्‌ जो प्राणके भी प्राण हैं, जिन्होंने दयालु होनेके गरण सबके साथ सनातन मैत्री जोड़ रखी है, वे गगवानू शिव आज उत्तम कार्य और कल्याणके लिये झपर कृपादृष्टि करें

अध्याय 127

श्लोक 43

ब्रह्मासृजद् यो भुवनोत्तमोत्तमं तृप्तो विद्वान्ब्राह्मणः षड्गुणस्य ।सृष्ट्वा रसं व्याहृतिस्थं समग्रं स मां पायादिह बहुरूपोऽरिहाङ्गैः

brahmāsṛjad yo bhuvanottamottamaṃ tṛpto vidvānbrāhmaṇaḥ ṣaḍguṇasya | sṛṣṭvā rasaṃ vyāhṛtisthaṃ samagraṃ sa māṃ pāyādiha bahurūpo'rihāṅgaiḥ

हिन्दी अर्थ

द्देप्‌ जिन्होंने ब्रह्मा होकर समस्त भुवनोंमें उत्तमोत्तम दिव्यलोककी रचना की है, जो विद्वान्‌ ब्रह्मवेत्ता होनेके कारण छः गुणों (ऐश्वर्य, ज्ञान, यश, श्री, वैराग्य और धर्म)-से परिपूर्ण हैं, व्याहहतियोंमें स्थित रस तथा उसकी तीन मात्राओंसे उपलक्षित समस्त प्रपश्नकी सृष्टि करके _ जो इसके भीतर व्याप्त हैं, वे अनेक रूपधारी,कामादि शत्रुके नाशक, अपने अज्लोंद्वारा मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 44

व्यञ्जनोऽजनोऽथ विद्वान् समग्रः स्पृशिः शम्भुः प्राणदः कृत्तिवासाः ।रसो ध्रुवः पवमानस्य भर्ता सपत्नीशः शङ्करः सारधाता

vyañjano'jano'tha vidvān samagraḥ spṛśiḥ śambhuḥ prāṇadaḥ kṛttivāsāḥ | raso dhruvaḥ pavamānasya bhartā sapatnīśaḥ śaṅkaraḥ sāradhātā

हिन्दी अर्थ

जो अतीन्द्रिय विषयोंका भी ज्ञान करानेवाले, अजनमा, विद्वान्‌ तथा सर्वस्वरूप हैं, व्यापक होनेके कारण जो सबका स्पर्श करनेवाले, कल्याणकारी तथा प्राणदाता हैं, जो अपने शरीरपर वस्त्रके स्थानमें गजचर्म धारण करते हैं, ध्रुव रस-अक्षय परमानन्द जिनका स्वरूप है, जो वायुके भी भरण-पोषण करनेवाले हैं, पत्नी और पति (यजमान और उसकी पत्नी)-के साथ रहकर अर्थात्‌ आत्मारूपसे उनके प्रेरक होकर यज्ञादि कर्मोका सम्पादन करते हैं तथा सार तत्त्वको धारण करनेवाले हैं, वे भगवान्‌ शंकर मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 45

त्र्यम्बकं पुष्टिदं विब्रुवाणं धर्मं विप्राणां वरदं यज्वनां च ।वराद् वरं रणजेतारमीशं देवं देवानां शरणं यामि रुद्रम्

tryambakaṃ puṣṭidaṃ vibruvāṇaṃ dharmaṃ viprāṇāṃ varadaṃ yajvanāṃ ca | varād varaṃ raṇajetāramīśaṃ devaṃ devānāṃ śaraṇaṃ yāmi rudram

हिन्दी अर्थ

जो त्रिनेत्रधारी तथा सबको पुष्टि प्रदान करनेवाले हैं, विप्रों-विद्वानोंको भी धर्मका उपदेश करते हैं और यज्ञ करनेवाले यजमानोंको अभीष्ट वर देते हैं, जो श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ, संग्रामविजयी, ईश्वर तथा देवताओंके भी देवता हैं, उन भगवान्‌ रुद्रकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 46

आस्यं देवानामन्तकं दुष्कृतीनां त्रिवृत्स्तोमं वृक्षहं कर्मसाक्ष्यम् ।भूतायनं भूतपतिं गुणज्ञं गुणाकारं शरणं यामि रुद्रम्

āsyaṃ devānāmantakaṃ duṣkṛtīnāṃ trivṛtstomaṃ vṛkṣahaṃ karmasākṣyam | bhūtāyanaṃ bhūtapatiṃ guṇajñaṃ guṇākāraṃ śaraṇaṃ yāmi rudram

हिन्दी अर्थ

जो अग्निरूपसे देवताओंके मुख, दुराचारियोंका अन्त करनेवाले, त्रिवृत आदि स्तोत्रोंसे युक्त सोमयागस्वरूप, संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाले, कर्मोके साक्षी, भूतोंके लयस्थान, भूतनाथ, गुणज्ञ और गुणस्वरूप हैं, उन रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 47

अनुद्धृतं यज्ञकर्तारमन्तं मध्यं चाद्यं यज्ञकृतां साम्यरूपम् ।वेदव्रतेषु बहुधा गीतमीशमभित्रिविष्टपं शरणं यामि रुद्रम्

anuddhṛtaṃ yajñakartāramantaṃ madhyaṃ cādyaṃ yajñakṛtāṃ sāmyarūpam | vedavrateṣu bahudhā gītamīśamabhitriviṣṭapaṃ śaraṇaṃ yāmi rudram

हिन्दी अर्थ

जिन्हें कोई प्रबलसे भी प्रबल शत्रु उखाड़ नहीं सकता, जो यज्ञका सम्पादन करनेवाले तथा यजमानोंके आदि, मध्य और अन्त हैं, प्रकृतिकी साम्यावस्था जिनका स्वरूप है, वेदोक्त ब्रतों (यज्ञों ) -में अनेकानेक देवताओंके रूपमें जिनका गान किया गया है तथा जो भूतलसे लेकर स्वर्गतक तीनों लोकोंके ईश्वर हैं, उन भगवान्‌ रुद्रकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 48

महाजिनं व्रतिनं मेखलालं सुतोषणं क्रोधधवं विपापम् ।भूतं क्षेत्रज्ञं गुणिनं वा कपर्दिनं नतोऽस्मीशं वन्दनं वन्दनानाम्

mahājinaṃ vratinaṃ mekhalālaṃ sutoṣaṇaṃ krodhadhavaṃ vipāpam | bhūtaṃ kṣetrajñaṃ guṇinaṃ vā kapardinaṃ nato'smīśaṃ vandanaṃ vandanānām

हिन्दी अर्थ

जो महान्‌ गजचर्म धारण करनेवाले, उत्तम ब्रतधारी, मेखलासे अलंकृत, अनायास ही संतुष्ट होनेवाले, क्रोधके स्वामी, पाप-तापसे रहित, नित्य सिद्ध, क्षेत्रज्र, गुणवानू, जटाजूटधारी तथा वन्दनीयोंके भी वन्दनीय हैं, उन भगवान्‌ शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 49

देवं देवानां पावनं पावनानां कृतिं कृतीनां महतो महान्तम् ।शतात्मानं संस्तुतं गोपतीनां पतिं देवं शरणं यामि रुद्रम्

devaṃ devānāṃ pāvanaṃ pāvanānāṃ kṛtiṃ kṛtīnāṃ mahato mahāntam | śatātmānaṃ saṃstutaṃ gopatīnāṃ patiṃ devaṃ śaraṇaṃ yāmi rudram

हिन्दी अर्थ

जो देवताओंके भी देवता, पावनोंके भी पावन, कृतियोंकी भी कृति, यज्ञोंके भी यज्ञ—अर्थात्‌ यजनीयों के भी यजनीय हैं, जो महान्‌से भी महान्‌ शान्तस्वरूप हैं, तथा ृन्द्रियोंके अधिष्ठात देवताओंके लिये भी स्तवनीय हैं, उन सबके पालक रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 50

अन्तश्चरं पुरुषं गुह्यसंज्ञं प्रभास्वन्तं प्रणवं विप्रदीपम् ।हेतुं परं परमस्याक्षरस्य शुभं देवं गुणिनं सन्नतोऽस्मि

antaścaraṃ puruṣaṃ guhyasaṃjñaṃ prabhāsvantaṃ praṇavaṃ vipradīpam | hetuṃ paraṃ paramasyākṣarasya śubhaṃ devaṃ guṇinaṃ sannato'smi

हिन्दी अर्थ

जो सबके अन्त:करणमें विचरनेवाले अन्तर्यामी पुरुष, जिन्हें [हा कहा गया है, जो दूसरे प्रकाशसे रहित स्वयं प्रकाशरूप हैं, प्रणव (3कार) जिनका नाम है, जो परम अक्षर जीव) -के भी परम कारण हैं, उन मज़लकारी गुणवान्‌ रैवता भगवान्‌ शिवको मैं प्रणाम करता हूँ

अध्याय 127

श्लोक 51

प्रसूतिरुभयोर्न प्रसूतश्च सूक्ष्मः पृथग्भूतेभ्यो न पृथक्यैकभूतः ।स्वयं भूतः पातु मां सर्वसादः प्रदः स्वादः सम्पदः पातु रत्नम्

prasūtirubhayorna prasūtaśca sūkṣmaḥ pṛthagbhūtebhyo na pṛthakyaikabhūtaḥ | svayaṃ bhūtaḥ pātu māṃ sarvasādaḥ pradaḥ svādaḥ sampadaḥ pātu ratnam

हिन्दी अर्थ

जो नगत्‌ और जीव दोनोंकी योनि हैं, फिर भी समस्त कारणों से अतीत होनेके कारण जो उनकी योनि नहीं हैं, भतएव सूक्ष्म (कठिनतासे समझमें आनेवाले ) हैं; सम्पूर्ण भूतोंसे पृथक्‌ हैं और उन सबसे एकभूत अभिन्न होनेके कारण पृथक नहीं भी हैं, जो स्वयं ही समस्त जगत्‌के ूपमें प्रकट हुए हैं और सबके लयस्थान भी हैं तथा जो त्तम दाता, स्वाद (रुचि), हर्ष तथा रमणीय रत्रूप हैं, बे भगवान्‌ शंकर मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 52

आसन्नः सन्नतरः साधनानां श्रद्धावतां श्राद्धवृत्तिप्रणेता ।पतिर्गणानां महतां सत्कृतीनां पायान्मेषः पूरणः षड्गुणानाम्

āsannaḥ sannataraḥ sādhanānāṃ śraddhāvatāṃ śrāddhavṛttipraṇetā | patirgaṇānāṃ mahatāṃ satkṛtīnāṃ pāyānmeṣaḥ pūraṇaḥ ṣaḍguṇānām

हिन्दी अर्थ

जो अन्तर्यामी गनेके कारण सबके निकट हैं तथा साधनशील पुरुषोंके लिये सन्नतर—अनावृत अर्थात्‌ अपरोक्ष हैं, श्रद्धालु मनुष्योंको नकी श्रद्धाके अनुरूप वृत्ति (ज्ञान एवं भक्ति) प्रदान ररनेवाले हैं तथा जो महान्‌ पुण्यात्मा प्रमथगणोंके अधिपति गौर अभीष्ट मनोरथों एवं सर्वज्ञञा आदि छः गुणोंकी पूर्ति ररनेवाले हैं, वे भगवान्‌ शिव मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 53

अन्तर्बहिर्वृजिनानां निहन्ता स्वयं कर्ता भूतभावी विकुर्वन् ।धृतायुधः सुकृतिनामुत्तमौजाः प्रणुद्यान्मे वृजिनं देवदेवः

antarbahirvṛjinānāṃ nihantā svayaṃ kartā bhūtabhāvī vikurvan | dhṛtāyudhaḥ sukṛtināmuttamaujāḥ praṇudyānme vṛjinaṃ devadevaḥ

हिन्दी अर्थ

जो ाहर-भीतरके पाप-तापोंका नाश करनेवाले तथा स्वयं गी जगत्‌के कर्ता (निमित्त कारण) हैं, पज्न भूतोंके माकारमें अपने-आपको प्रकट करना जिनका स्वभाव है र्थात्‌ जो स्वयं ही जगत्‌का उपादान कारण बनते हैं और गायुध धारण करके क्रोधादि विकारोंको प्रकट करते हैं, जिनका ओज (बल-पराक्रम) सबसे उत्तम है तथा जो वताओंके भी देवता हैं, वे परमेश्वर शिव पुण्यात्मा रुषोंका तथा मेरा भी पाप-ताप दूर करें

अध्याय 127

श्लोक 54

येनोद्धतास्त्रैः पुरा मायिनो वै दग्धा घोरेण वितथान्ताः शरेण ।महत्कुर्वन्तो वृजिनं देवतानां ज्यायानीशः पातु विश्वोदधाता

yenoddhatāstraiḥ purā māyino vai dagdhā ghoreṇa vitathāntāḥ śareṇa | mahatkurvanto vṛjinaṃ devatānāṃ jyāyānīśaḥ pātu viśvodadhātā

हिन्दी अर्थ

जो वताओंका महान्‌ अपराध किया करते थे, उन मायावी ससुरोंको जिन्होंने पूर्वकालमें अपने अस्त्रोंद्वारा काँटोंकी ति उखाड़ फेंका था, अपने भयानक बाणसे उनके नों पुरोंको जलाकर उन्हें भी भस्म कर दिया और इस कार शस्त्रों द्वारा न मारे जानेके कारण उन असुरोंकी मृत्यु यर्थ हो गयी थी—यह सब जिनके प्रभावसे सम्भव हुआ था जो सबके कारणभूत प्रकृति या प्रधानके भी आश्रय , वे सबसे ज्येष्ठ परमेश्वर शिव मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 55

भागीयसां भागमतोऽन्तमिच्छन् मखो दाक्षो येन कृत्तोऽन्वधावत् ।विद्वान्यज्ञस्यादिरथान्तः स देवः पायादीशो मां दक्षयज्ञान्तहेतुः

bhāgīyasāṃ bhāgamato'ntamicchan makho dākṣo yena kṛtto'nvadhāvat | vidvānyajñasyādirathāntaḥ sa devaḥ pāyādīśo māṃ dakṣayajñāntahetuḥ

हिन्दी अर्थ

तमो5ध्याय: + ६३७ दक्षके यज्ञमें अधिक भाग ग्रहण करनेवाले देवताओंके भागको जिन्होंने नष्ट करनेकी इच्छा की थी, जिनके द्वारा विच्छिन्न हुआ दक्षका यज्ञ वहीं यज्ञेधवरकी शरणमें गया था, जो यज्के ज्ञाता, आदि और अन्त हैं तथा दक्षयज्ञके विनाशमें हेतु बने हुए हैं, वे सर्वेधर महादेवजी मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 56

अन्यो धन्यः संस्कृतश्चोत्तमश्च जगत्सृष्ट्वा योऽत्ति सर्वातिगुह्यः ।स मां मुखप्रमुखे पातु नित्यं विचिन्वानः प्रथमः षड्गुणानाम्

anyo dhanyaḥ saṃskṛtaścottamaśca jagatsṛṣṭvā yo'tti sarvātiguhyaḥ | sa māṃ mukhapramukhe pātu nityaṃ vicinvānaḥ prathamaḥ ṣaḍguṇānām

हिन्दी अर्थ

जो ब्रह्मारूपसे जगत्‌की सृष्टि करके रुद्ररूपसे उसका संहार करते हैं, जो सबकी अपेक्षा अत्यन्त गोपनीय हैं, जड जगत्से भिन्न (विलक्षण) हैं, शम आदि संस्कारोंसे सम्पन्न होनेके कारण धन्य हैं, सबसे उत्तम हैं, जो इन्द्र और अग्निकी प्रधानतावाले यज्में सदा यजमानोंकी पुण्यराशिका संचय करते हैं और ऐश्वर्य आदि छ: गुणोंके मुख्य आश्रय हैं, वे परमेश्वर मेरी तथा मेरी संततिकी प्रतिदिन रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 57

गुणत्रैकाल्यं यस्य देवस्य नित्यं सत्त्वोद्रेको यस्य भावात्प्रसूतः ।गोप्ता गोप्तॄणां सन्नदो दुष्कृतीनामाद्यो विश्वस्य बाधमानस्य क्रुद्धः

guṇatraikālyaṃ yasya devasya nityaṃ sattvodreko yasya bhāvātprasūtaḥ | goptā goptṝṇāṃ sannado duṣkṛtīnāmādyo viśvasya bādhamānasya kruddhaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन परमात्माके गुण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें सदा बने रहते हैं अथवा जिनमें सृष्टि पालन और संहार कालसम्बन्धी गुण प्रवाहरूपसे नित्य बने रहते हैं; जिनमें सत्त्वगगुणकी अधिकता है अर्थात्‌ जो विष्णुरूपसे स्थित हैं, जिनके स्वरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्ण, इन्द्र आदि रक्षकोंके भी रक्षक हैं, जो काल रुद्र बनकर दुराचारियोंको विनाशका कष्ट प्रदान करनेवाले हैं और विश्वके आदिकारण (एवं माता-पिताके समान पालक) होकर भी जो इस जगत्‌को पीड़ा देनेवाले लोगोंपर कुपित हो उनका विनाश कर डालते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें

अध्याय 127

श्लोक 58

धाम्नो यस्य हरिरग्रोऽथ विश्वो ब्रह्मा पुत्रैः सहितश्च द्विजाश्च ।पराभूता भवने यस्य सोमो जुषत्वेष श्रेयसे साधुगोप्ता

dhāmno yasya hariragro'tha viśvo brahmā putraiḥ sahitaśca dvijāśca | parābhūtā bhavane yasya somo juṣatveṣa śreyase sādhugoptā

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णु जिनके तेज:पुझके प्रमुख भाग हैं तथा विश्व (विराट्)-रूप ब्रह्मा, साथ ही उनके पुत्र सनकादि और मरीचि आदि अन्य ब्रह्मर्षि जिनसे प्रकट हुए हैं तथापि वे जिनके भवनमें पराभूत होकर प्रवेश नहीं करने पाते हैं, वे सत्पुरुषोंके रक्षक उमासहित महादेवजी हमारा कल्याण करनेके लिये हमपर प्रसन्न हों

अध्याय 127

श्लोक 59

यस्माद्भूतानां भूतिरन्तोऽथ मध्यं धृतिर्भूतिर्यश्च गुहाश्रुतिश्च ।गुहाभिभूतस्य पुरुषेश्वरस्य महात्मनः सम्मृडवेद्यस्य तस्य

yasmādbhūtānāṃ bhūtiranto'tha madhyaṃ dhṛtirbhūtiryaśca guhāśrutiśca | guhābhibhūtasya puruṣeśvarasya mahātmanaḥ sammṛḍavedyasya tasya

हिन्दी अर्थ

जिनसे आकाश आदि पाँचों भूतोंकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त होते हैं (वे भगवान्‌ शिव हमपर प्रसन्न हों) । जो किसीके द्वारा हार्दिक तिरस्कारसे पीड़ित हो एकमात्र सुखदायक भगवान्‌ शिवको ही महान्‌ आश्रय जानकर उनकी शरण लेता है, वह पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं महात्मा है, उसे उन्हीं भगवान्‌ शड्रसे धृति (धैर्य) और भूति (ऐश्वर्य) आदि अनुग्रहकी उपलब्धि होती है तथा उसे उन्हींसे गुह्ा वस्तुका श्रवण (उपदेश) प्राप्त होता है। (अत: संकटके समयमें अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकका कष्ट वे . | अवश्य दूर करेंगे-ऐसा मेरा विश्वास है)

अध्याय 127

श्लोक 60

यल्लिङ्गाङ्कं त्र्यम्बकः सर्वमीशो भगलिङ्गाङ्कं यद्ध्युमा सर्वधात्री ।नान्यत् तृतीयं जगतीहास्ति किञ्चिन्महादेवात् सर्वसर्वेश्वरोऽसौ

yalliṅgāṅkaṃ tryambakaḥ sarvamīśo bhagaliṅgāṅkaṃ yaddhyumā sarvadhātrī | nānyat tṛtīyaṃ jagatīhāsti kiñcinmahādevāt sarvasarveśvaro'sau

हिन्दी अर्थ

संसारमें लिड्॒(पुरुषत्वसूचक चिह्म)-से अड्ित ही भी शरीर-समुदाय है, वह सब त्रिनेत्रधारी भगवान्‌ ड्ररका स्वरूप है और भग (स्त्रीत्वसूचक) चिह्से तह्नित जो शरीरसमूह है, वह सब सर्वजननी भगवती माका प्रतीक है। इस जगतमें इन दोके सिवा तीसरी गई वस्तु नहीं है। महादेवजी (और उमा)-से भिन्न छ नहीं है; वे ही सर्वसर्वेर हैं। (वे हमारी रक्षा रैं)

अध्याय 127

श्लोक 61

इति संस्तूयमानस्तु भगवान् वृषभध्वजः ।दर्शयामास धर्मात्मा कश्यपं धर्मधृग्वरम्

iti saṃstūyamānastu bhagavān vṛṣabhadhvajaḥ | darśayāmāsa dharmātmā kaśyapaṃ dharmadhṛgvaram

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जिनकी स्तुति की जा रही , उन धर्मात्मा भगवान्‌ वृषभध्वज (शिव) -ने धर्मात्माओंमं ष्ठ महर्षि कश्यपको दर्शन दिया

अध्याय 127

श्लोक 62

उवाच चैनं देवेशः प्रसन्नेनान्तरात्मना ।येन संस्तौषि कार्येण त्वं तज्जाने प्रजापते

uvāca cainaṃ deveśaḥ prasannenāntarātmanā | yena saṃstauṣi kāryeṇa tvaṃ tajjāne prajāpate

हिन्दी अर्थ

दर्शन देकर वेश्वर महादेवजीने उनसे प्रसन्नचित्तसे कहा—' प्रजापते ! म जिस कार्यसे मेरी स्तुति कर रहे हो, उसे मैं जानता

अध्याय 127

श्लोक 63

इन्द्रोपेन्द्रौ महात्मानौ देवौ प्रकृतिमेष्यतः ।पारिजातं तु धर्मात्मा नयिष्यति जनार्दनः

indropendrau mahātmānau devau prakṛtimeṣyataḥ | pārijātaṃ tu dharmātmā nayiṣyati janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र और उपेन्द्र दोनों महामनस्वी देवता त्राभाविक स्थितिमें आ जायेगे; परंतु धर्मात्मा जनार्दन रिजात-वृक्षको अवश्य ले जायेंगे

अध्याय 127

श्लोक 64

अपध्यातो महेन्द्रो हि मुनिना देवशर्मणा ।अस्याकाङ्क्षत्पुरा भार्या तपोदीप्तस्य कश्यप

apadhyāto mahendro hi muninā devaśarmaṇā | asyākāṅkṣatpurā bhāryā tapodīptasya kaśyapa

हिन्दी अर्थ

कश्यप! त्रकालमें मुनिवर देवशर्माने महेन्द्रका अनिष्ट-चिन्तन या था; क्योंकि तपस्यासे उद्दीस तेजवाले उन हर्षिकी पत्नीको इन्द्रने प्रात करनेकी अभिलाषा की [। यही उनकी वर्तमान पराजयका कारण है

अध्याय 127

श्लोक 65

गम्यतां तत्र धर्मज्ञ दाक्षायण्या सह त्वया ।अदित्या शक्रसदनं श्रेयस्ते पुत्रयोर्धुवम्

gamyatāṃ tatra dharmajña dākṣāyaṇyā saha tvayā | adityā śakrasadanaṃ śreyaste putrayordhuvam

हिन्दी अर्थ

पज्ञ! तुम दक्षकन्या अदितिके साथ वहाँ इन्द्रभवनमें ओ। तुम्हारे दोनों पुत्रोंका अवश्य कल्याण होगा'

अध्याय 127

श्लोक 66

इति हरवचनं निशम्य विद्वान् कमलभवात्मजसूनुरप्रमेयः ।त्रिदशगणगुरुं प्रणम्य रुद्रं मुदितमनाः सुमनौकसं जगाम

iti haravacanaṃ niśamya vidvān kamalabhavātmajasūnuraprameyaḥ | tridaśagaṇaguruṃ praṇamya rudraṃ muditamanāḥ sumanaukasaṃ jagāma

हिन्दी अर्थ

तर प्रकार भगवान्‌ शड्टरका कथन सुनकर ब्रह्मकुमार ीचिके पुत्र अप्रतिम शक्तिशाली विद्वान्‌ महर्षि कश्यप देवगुरु भगवान्‌ रुद्रको प्रणाम करके प्रसन्नचित्त देवलोकको चले गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.