Harivamsha Purana
134
अध्याय 134 / 318

Parva 2, Adhyāya 79

72 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ72 श्लोक

अध्याय 134

श्लोक 1

पुण्यकव्रतसम्बन्धी नियमस्य एवं दानस्य वर्णनं एवं पुत्रादिनिमित्ते क्रियमाणानि अन्यानि व्रतदानादीनां प्रतिपादनं उमोवाच ।विधिनैतेन कृत्स्नेन स्त्री सदा भर्तृदेवता ।चरेत् संवत्सरं दान्ता षण्मासान् मासमेव च

puṇyakavratasambandhī niyamasya evaṃ dānasya varṇanaṃ evaṃ putrādinimitte kriyamāṇāni anyāni vratadānādīnāṃ pratipādanaṃ umovāca | vidhinaitena kṛtsnena strī sadā bhartṛdevatā | caret saṃvatsaraṃ dāntā ṣaṇmāsān māsameva ca

हिन्दी अर्थ

तमो 5ध्याय: स्स्स्‍्स्‍्स्‍्स्स्‍्स्स्स्ससाण वर्णन तथा पुत्र आदिके निमित्त किये व॑ दानका प्रतिपादन उमा कहती हैं—देवि! पतित्रता स्त्री इस सम्पूर्ण विधिके साथ एक वर्ष या छ: मास अथवा एक मासतक सदा इन्द्रिय-संयमपूर्वक व्रतका आचरण करे

अध्याय 134

श्लोक 2

स्त्रियो ह्यावाहयेत् साध्वीरेकादश समाधिना ।स्वयं चैव विधिर्दृष्टो व्रतकानां मया शुभः

striyo hyāvāhayet sādhvīrekādaśa samādhinā | svayaṃ caiva vidhirdṛṣṭo vratakānāṃ mayā śubhaḥ

हिन्दी अर्थ

इसमें ग्यारह साध्वी स्त्रियोंको बुलाना चाहिये। मैंने स्वयं ही समाधिके द्वारा ब्रतोंके इस शुभ विधानका साक्षात्कार किया है

अध्याय 134

श्लोक 3

अद्भिर्दद्यात् सतीः सर्वा या मूलव्रतिनी भवेत् ।तासां तु निष्क्रयो देयः कालदेशानुरूपतः

adbhirdadyāt satīḥ sarvā yā mūlavratinī bhavet | tāsāṃ tu niṣkrayo deyaḥ kāladeśānurūpataḥ

हिन्दी अर्थ

मूल ब्रतका अनुष्ठान करनेवाली प्रधान स्त्री अपने यहाँ आमन्त्रि की गयी उन समस्त ग्यारह सतियोंका दान करे और देश-कालके अनुसार उनका निष्क्रय दे दे*

अध्याय 134

श्लोक 4

ततो मासान्तशुक्लस्य तिथौ च नवमी तथा ।आराधयित्वा कर्तव्यं व्रतकस्यापवर्जनम्

tato māsāntaśuklasya tithau ca navamī tathā | ārādhayitvā kartavyaṃ vratakasyāpavarjanam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर मासके अन्तमें शुक्ल- पक्षकी नवमी तिथिको देवाराधना करके बव्रतको समाप्त करना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 5

उपवासमहोरात्रं व्रतकं चापि निश्चितम् ।आदौ चान्ते च कुर्वीत व्रतकस्यापि सिद्धये

upavāsamahorātraṃ vratakaṃ cāpi niścitam | ādau cānte ca kurvīta vratakasyāpi siddhaye

हिन्दी अर्थ

ब्रतके उद्देश्यसे उसकी सिद्धिके लिये आदि और अन्तमें निश्चितरूपसे एक दिन और रातका उपवास करना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 6

क्षुरकर्म ततो भर्तुरात्मनश्चैव कारयेत् ।उत्सादनं च स्नानं च तस्मिन्नहनि संस्मृतम्

kṣurakarma tato bharturātmanaścaiva kārayet | utsādanaṃ ca snānaṃ ca tasminnahani saṃsmṛtam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर अपने पतिकी हजामत बनवावे और अपना भी नखमात्र कटा ले। उसी दिन ब्रतान्त स्नान तथा ब्रतके उद्यापन या उत्सर्गका विधान है

अध्याय 134

श्लोक 7

ततो विवाहवत्स्नानं विहितं पुण्यके शुभे ।मण्डनं चैव विहितं माल्यधारणमेव च

tato vivāhavatsnānaṃ vihitaṃ puṇyake śubhe | maṇḍanaṃ caiva vihitaṃ mālyadhāraṇameva ca

हिन्दी अर्थ

शुभे ! पुण्यक-ब्रतमें भी विवाहके समान ही विधिपूर्वक स्नान करनेकी आज्ञा है। उसमें शुज्ार और माला धारण करनेका विधान है

अध्याय 134

श्लोक 8

कुम्भैस्तु स्नाप्यमानेमं साध्वी मन्त्रमुदीरयेत् ।भर्तुः पादौ नमस्कृत्य मनसा वाथ वा गिरा

kumbhaistu snāpyamānemaṃ sādhvī mantramudīrayet | bhartuḥ pādau namaskṛtya manasā vātha vā girā

हिन्दी अर्थ

ग्यारह सती स्त्रियोंका उनके पतियोंकी अनुमतिसे आवाहन किया देती है। देश-कालके अनुरूप निष्क्रय देकर पहले उन्हें अपनी कर दानजनित पुण्यकी भागिनी होती है। तमोउध्याय: + द्द्५ घड़ोंके जलसे नहलायी जाती हुई ब्रतपरायणा साध्वी स्त्री अपने पतिके दोनों चरणोंको मन अथवा वाणीद्वारा नमस्कार करके निम्नाड्जित मन्त्रका उच्चारण करे—

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श्लोक 9

आपो देव्य ऋषीणां हि विश्वधात्र्यो दिव्या मदन्त्यो याः शङ्करा धर्मधात्र्यः ।हिरण्यवर्णाः पावकाः शिवतमेन रसेन श्रेयसो मां जुषन्तु

āpo devya ṛṣīṇāṃ hi viśvadhātryo divyā madantyo yāḥ śaṅkarā dharmadhātryaḥ | hiraṇyavarṇāḥ pāvakāḥ śivatamena rasena śreyaso māṃ juṣantu

हिन्दी अर्थ

माता, आकाशसे प्रकट होनेवाली, हर्ष प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी, धर्मके पोषणमें तत्पर, सुवर्णके समान वर्णवाली, निर्मल तथा सबको पावन बनानेवाली है । वह अपने परम कल्याणमय रसके द्वारा मुझे श्रेयका भागी बनाये

अध्याय 134

श्लोक 10

अपामेव स्मृतो मन्त्रः सर्वत्रान्यत्र मे शृणु ।मन्त्राः पुराणविहिताः स्त्रीणां सर्वाङ्गशोभने

apāmeva smṛto mantraḥ sarvatrānyatra me śṛṇu | mantrāḥ purāṇavihitāḥ strīṇāṃ sarvāṅgaśobhane

हिन्दी अर्थ

सवडज्धिशोभने देवि ! यह जलसम्बन्धी मन्त्र सर्वत्र उपयोगमें लाया जाता है । अन्यत्र स्त्रियोंके स्नानके लिये पुराणविहित मन्त्र उपलब्ध होते हैं। उन्हें मुझसे सुनो

अध्याय 134

श्लोक 11

शुभाव्यया गुणिनी युक्तधर्मा भर्त्रा साकं मम दास्या वरेण ।मा कर्मणा मनसा वापि वाचा भर्तुर्भवेयं रुषती स्यां वशङ्गा

śubhāvyayā guṇinī yuktadharmā bhartrā sākaṃ mama dāsyā vareṇa | mā karmaṇā manasā vāpi vācā bharturbhaveyaṃ ruṣatī syāṃ vaśaṅgā

हिन्दी अर्थ

मैं पतिके लिये कल्याणकारिणी होऊँ। धन आदिसे कभी क्षीण न होऊँ। सद्गुणवत्ती होऊँ। सदा पतिके साथ धर्ममें संलग्न रहूँ। मैं अपने स्वामीके साथ दासीके समान रहकर उनकी छोटी-से-छोटी भी सेवा- टहल स्वयं ही करूँ। सदा पतिके अधीन रहूँ और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा भी कभी उनसे रुष्ट न होऊँ

अध्याय 134

श्लोक 12

सपत्नीनामधि नित्यं भवेयं सपुत्रा स्यां सुभगा चारुरूपा ।सम्पन्नहस्ता गुणवादिनी च सर्वात्मना स्यां मा दरिद्रा भवेयम्

sapatnīnāmadhi nityaṃ bhaveyaṃ saputrā syāṃ subhagā cārurūpā | sampannahastā guṇavādinī ca sarvātmanā syāṃ mā daridrā bhaveyam

हिन्दी अर्थ

सपत्तियोंमें मेरा स्थान सदा सबसे ऊपर हो। मैं पुत्रवती, सौभाग्यवती और मनोहर रूपवाली होऊँ। मेरा हाथ सदा सम्पन्न रहे अर्थात्‌ मैं मुक्तहस्त होकर दान कर सकूँ। मैं सम्पूर्ण हदयसे सदा दूसरोंके गुणोंका ही बखान करूँ और कभी दरिद्र न होऊँ

अध्याय 134

श्लोक 13

पतिश्च मे स्यात् सुमुखो मत्प्रतीक्षो नित्यं मद्भक्तः स्यान्मन्मतिर्मद्गतिश्च ।प्रीतिश्च नौ स्याच्चक्रवाकानुरूपा मनोविरागो न भवेत्साधुवत्स्यात्

patiśca me syāt sumukho matpratīkṣo nityaṃ madbhaktaḥ syānmanmatirmadgatiśca | prītiśca nau syāccakravākānurūpā manovirāgo na bhavetsādhuvatsyāt

हिन्दी अर्थ

मेरे पति भी सदा प्रसन्नमुख रहकर मेरी प्रतीक्षा करनेवाले हों, उनका सदा मुझमें अनुराग बना रहे। उनकी मति और गति मेरी ही ओर रहे। हम दोनोंमें चकवा और चकवीके समान प्रेम बना रहे। हमारे मनमें कभी एक-दूसरेके प्रति विरक्ति न हो और हमारा व्यवहार सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके समान हो

अध्याय 134

श्लोक 14

लोकान्साध्वीनामुत्तमानां व्रजेयं याभिः सर्वं धार्यते विश्वरूपम् ।उभे कुले याः शुभाः पावयन्ति पितुर्भर्तुश्च पतिभक्त्योर्जिताश्च

lokānsādhvīnāmuttamānāṃ vrajeyaṃ yābhiḥ sarvaṃ dhāryate viśvarūpam | ubhe kule yāḥ śubhāḥ pāvayanti piturbhartuśca patibhaktyorjitāśca

हिन्दी अर्थ

जो शुभलक्षणा देवियाँ पतिभक्तिके प्रभावसे शक्तिशालिनी होकर पिता और पति दोनोंके कुलोंको पावन बनाती हैं तथा जो अपने धर्मसे इस सम्पूर्ण विश्वको धारण करती हैं, उन्हीं उत्तम पतित्रता देवियोंके लोकोंमें मैं जाऊँ

अध्याय 134

श्लोक 15

भूमिर्वायुर्जलमाकाशमग्निरन्तः क्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्यो महांश्च ।अहङ्कारश्च मम साक्ष्ये नियुक्ताः स्मरेयुर्मे निश्चयं च व्रतं च

bhūmirvāyurjalamākāśamagnirantaḥ kṣetrajñaḥ prakṛtiryo mahāṃśca | ahaṅkāraśca mama sākṣye niyuktāḥ smareyurme niścayaṃ ca vrataṃ ca

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, अन्तर्यामी क्षेत्रज्, प्रकृति, महत्तत्व और अहड्डार- इन सबको मैंने अपना साक्षी बनाया है। ये मेरे इस निश्चय और ब्रतको स्मरण रखें

अध्याय 134

श्लोक 16

यैरारब्धो देहिनां भौतिकोऽयं विधिः सत्त्वाद्यैर्भूतयुक्तैः सबीजैः ।भवन्त्येते मे साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम्

yairārabdho dehināṃ bhautiko'yaṃ vidhiḥ sattvādyairbhūtayuktaiḥ sabījaiḥ | bhavantyete me sākṣiṇaḥ sarvasaṃsthā vrate cāsmin niścaye cāpi nityam

हिन्दी अर्थ

जिन सत्त्व आदि गु्णोंने भूतों और उनके कर्मबीजोंसे युक्त हो देहधारियोंके इस भौतिक शरीरका निर्माण किया है, वे और उनके अभिमानी देवता जो सबमें स्थित हैं, मेरे इस व्रत और निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें

अध्याय 134

श्लोक 17

चन्द्रादित्यौ पुण्यसाक्षी यमश्च दिशः सर्वा दश चात्मा च मेऽयम् ।सन्त्वेते वै साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन्निश्चये चापि नित्यम्

candrādityau puṇyasākṣī yamaśca diśaḥ sarvā daśa cātmā ca me'yam | santvete vai sākṣiṇaḥ sarvasaṃsthā vrate cāsminniścaye cāpi nityam

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यके साक्षी यम, सम्पूर्ण दसों दिशाएँ और मेरा यह आत्मा-ये सबमें स्थित रहनेवाले देवता मेरे इस ब्रत एवं निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें

अध्याय 134

श्लोक 18

मन्त्रैरेतैः पुराणोक्तैः सर्वद्रव्याभिमन्त्रणम् ।व्रतचर्यात् प्रभृति वै पुराणे समुदाहृतम्

mantrairetaiḥ purāṇoktaiḥ sarvadravyābhimantraṇam | vratacaryāt prabhṛti vai purāṇe samudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

ब्रतके आरम्भसे लेकर प्रतिदिन इन पुराणोक्त मन्त्रोंद्वारा समस्त द्रव्योंको अभिमन्त्रित करना चाहिये। यह पुराणमें कहा गया है

अध्याय 134

श्लोक 19

स्नात्वाथ वाससी दद्याद्भर्तुः कर्त्य स्वयं शुभे ।अथात्मकर्तितं न स्याच्छुभे विघ्नेन केनचित्

snātvātha vāsasī dadyādbhartuḥ kartya svayaṃ śubhe | athātmakartitaṃ na syācchubhe vighnena kenacit

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

शुभे! स्नान करके अपने पतिको स्वयं ही सूत कातकर बनाये हुये दो वस्त्र भेंट करे। यदि किसी विश्नविशेषके कारण अपने ही काते हुए सूतका वस्त्र न हो तो दूसरा ही वस्त्र दे दे। वह वस्त्र शुद्ध, नवीन, उत्तम और थ्रेतवर्ण- का होना चाहिये। उस वस्त्रके साथ अपना काता हुआ सूत भी मिला दे

अध्याय 134

श्लोक 20

वासोऽन्यदेव दद्याच्च श्वेतं मुख्यं नवं शुचि ।स्वकर्तितं च सूत्रं तु वाससा तेन मिश्रयेत्

vāso'nyadeva dadyācca śvetaṃ mukhyaṃ navaṃ śuci | svakartitaṃ ca sūtraṃ tu vāsasā tena miśrayet

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 21

ततो द्विजं शुचिं दान्तं ज्ञानविज्ञानकोविदम् ।भोजयेच्च यथाशक्त्या सह भर्त्रा सुमध्यमे

tato dvijaṃ śuciṃ dāntaṃ jñānavijñānakovidam | bhojayecca yathāśaktyā saha bhartrā sumadhyame

हिन्दी अर्थ

सुमध्यमे ! तदनन्तर ज्ञान- विज्ञानकोविद, पवित्र, जितेन्द्रिय ब्राह्मणको अपने पतिके साथ बिठाकर यथाशक्ति भोजन कराये

अध्याय 134

श्लोक 22

ब्राह्मणस्यापि दातव्यं वासोयुग्मं महातपे ।शय्यासनं गृहं धान्यं दासं दासीं तथैव च

brāhmaṇasyāpi dātavyaṃ vāsoyugmaṃ mahātape | śayyāsanaṃ gṛhaṃ dhānyaṃ dāsaṃ dāsīṃ tathaiva ca

श्लोक 22–24 का हिन्दी अर्थ

महान्‌ तप करनेवाली देवि ! अरुन्धति! ब्राह्मणको भी यथासम्भव जोड़ा वस्त्र, शय्या, आसन, गृह, धान्य, दास-दासी, आभूषण, सब प्रकारके धान्यों और विशेषत: तिलोंके मिश्रित रतमय पर्वत, जो नाना रंगके वस्त्रोंसे आच्छादित हो, यथाशक्ति दान करना चाहिये। सम्भव हो तो हाथी-घोड़ोंका समूह दिया जाय अन्यथा एक गौका ही दान कर दिया जाय। यथाशक्ति दान देना आवश्यक है

अध्याय 134

श्लोक 23

अलङ्कारः शक्तितश्च रत्नपर्वत एव च ।सर्वथान्यसमुन्मिश्रस्तिलैश्च सविशेषतः

alaṅkāraḥ śaktitaśca ratnaparvata eva ca | sarvathānyasamunmiśrastilaiśca saviśeṣataḥ

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 24

वासोभिश्च प्रतिच्छन्नो नानावर्णैररुन्धति ।हस्त्यश्वावचयश्चैव देया गौरेव च धुवम्

vāsobhiśca praticchanno nānāvarṇairarundhati | hastyaśvāvacayaścaiva deyā gaureva ca dhuvam

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 25

लवणप्रतिमां दद्यान्नवनीतस्य चापराम् ।गुडस्य मधुनश्चैव सुवर्णस्य च शोभनाम्

lavaṇapratimāṃ dadyānnavanītasya cāparām | guḍasya madhunaścaiva suvarṇasya ca śobhanām

हिन्दी अर्थ

नमक, माखन, गुड़, मधु और सुवर्णकी बनी हुई पृथक्‌-पृथक्‌ उमा-महेश्वरकी सुन्दर प्रतिमाका भी दान करना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 26

तथैव सर्वगन्धानां रसानां पृथगेव च ।तथा सुमनसां दद्याद् रौप्यस्यौदुम्बरस्य च

tathaiva sarvagandhānāṃ rasānāṃ pṛthageva ca | tathā sumanasāṃ dadyād raupyasyaudumbarasya ca

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

नन्दिनि! उसी तरह सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थों, रसों, फूलों, चाँदी, सम्पूर्ण फल, वस्त्र, चित्र और काष्ठकी प्रतिमाका भी यथासम्भव दान करना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 27

फलानां चैव सर्वेषां वाससामपि नन्दिनि ।चित्रप्रतिकृतिं चैव काष्ठस्य प्रतिमां तथा

phalānāṃ caiva sarveṣāṃ vāsasāmapi nandini | citrapratikṛtiṃ caiva kāṣṭhasya pratimāṃ tathā

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 28

शिलां प्रतिकृतिं चैव दध्नोऽथ पयसस्तथा ।सर्पिषा दूर्वया चैव या चान्यामप्यभीप्सति

śilāṃ pratikṛtiṃ caiva dadhno'tha payasastathā | sarpiṣā dūrvayā caiva yā cānyāmapyabhīpsati

हिन्दी अर्थ

प्रस्तर, दूध, दही, घी और दूर्वाकी प्रतिमाको तथा और तरहकी प्रतिमाको भी, जिसे तुम देना चाहो, दे सकती हो

अध्याय 134

श्लोक 29

कालदेशानुरूपं च देयं विभवतः सति ।अल्पं वा बहुलं वापि भर्तुश्छन्देन सर्वदा

kāladeśānurūpaṃ ca deyaṃ vibhavataḥ sati | alpaṃ vā bahulaṃ vāpi bhartuśchandena sarvadā

हिन्दी अर्थ

पतित्रते ! अगर घरमें वैभव हो तो स्वामीकी आज्ञाके अनुसार सदा देश-कालके अनुरूप थोड़ा-बहुत दान अवश्य देना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 30

तिलपात्रं प्रदातव्यं न देयं ननु शोभने ।गौस्त्ववश्यं प्रदातव्या कपिला कांस्यमेव च

tilapātraṃ pradātavyaṃ na deyaṃ nanu śobhane | gaustvavaśyaṃ pradātavyā kapilā kāṃsyameva ca

हिन्दी अर्थ

शोभने! तिलसे भरा हुआ पात्र भी देना चाहिये; परंतु स्वामीकी आज्ञाके बिना कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये। उनकी आज्ञा मिल जानेपर कपिला गौ तथा काँस्यपात्रका दान अवश्य करना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 31

कृष्णाजिनं च सुभगे सतिलं वाससान्वितम् ।आदर्शश्चैव कूर्चश्च तथाजिनमनिन्दिते

kṛṣṇājinaṃ ca subhage satilaṃ vāsasānvitam | ādarśaścaiva kūrcaśca tathājinamanindite

श्लोक 31–34 का हिन्दी अर्थ

द्६७ सुभगे! अनिन्दिते! काला मृगचर्म, तिल, वस्त्र, दर्पण, कुशासन और मृगचर्मका भी दान करना चाहिये। वरवर्णिनि! इन सब वस्तुओंका दान करके नारी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है और नारियोंमें अग्रगप्य, पुत्रवती, सौभाग्यवती, रूपवती, शुद्ध हाथवाली, धनात्य तथा निर्मल नेत्रवाली होती है। वह इच्छामात्रसे ऐसी कन्याएँ प्राप्त कर लेती है, जो रूप-गुणसे सम्पन्न, सुभगा, आश्चर्ययुक्त गुणवाली, अग्रगण्य, पुत्रवती, धनाढ्य तथा सदा सुशील होती हैं

अध्याय 134

श्लोक 32

एतद् दत्त्वा सर्वकामानाप्नोति वरवर्णिनि ।पुरोऽधिका पुत्रवती सुभगा रूपभागिनी

etad dattvā sarvakāmānāpnoti varavarṇini | puro'dhikā putravatī subhagā rūpabhāginī

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 33

मृष्टहस्ता धनाढ्या च स्त्री भवत्यमलेक्षणा ।इच्छया लभते चैव कन्या रूपगुणान्विताः

mṛṣṭahastā dhanāḍhyā ca strī bhavatyamalekṣaṇā | icchayā labhate caiva kanyā rūpaguṇānvitāḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 34

भवन्ति सुभगाश्चर्यास्तथैव च पुरोऽधिकाः ।पुत्रवत्यो धनाढ्याश्च शीलवत्यश्च नित्यदा

bhavanti subhagāścaryāstathaiva ca puro'dhikāḥ | putravatyo dhanāḍhyāśca śīlavatyaśca nityadā

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 35

अरुन्धति कृतं ह्येतन्मयैव प्रथमं यतः ।उमाव्रतकमित्येव ख्यातमत्र महीतले

arundhati kṛtaṃ hyetanmayaiva prathamaṃ yataḥ | umāvratakamityeva khyātamatra mahītale

हिन्दी अर्थ

अरुन्धति! मैंने ही पहले इस व्रतका आचरण किया है, इसलिये इस पृथ्वीपर यह उमाब्रतके नामसे विख्यात होगा

अध्याय 134

श्लोक 36

एतदेवोत्तमं स्त्रीणां व्रतं तस्मान् समाचरेत् ।सर्वकामानवाप्नोति दत्त्वैवैतदनिन्दिते

etadevottamaṃ strīṇāṃ vrataṃ tasmān samācaret | sarvakāmānavāpnoti dattvaivaitadanindite

हिन्दी अर्थ

स्त्रियोंके लिये यही सबसे उत्तम व्रत है, अत: इसका आचरण अवश्य करे। अनिन्दिते! इस ब्रतके लिये विहित यह दान देकर नारी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है

अध्याय 134

श्लोक 37

एतद्व्रतकरो ह्येव देवदेवो वृषध्वजः ।पुराभिषिक्तवान् सौम्ये प्रियार्थं मम सर्वकृत्

etadvratakaro hyeva devadevo vṛṣadhvajaḥ | purābhiṣiktavān saumye priyārthaṃ mama sarvakṛt

हिन्दी अर्थ

सौम्ये! इसी ब्रतके पुण्यसे मैंने देवाधिदेव भगवान्‌ वृषध्वज शिवको खरीद-सा लिया है। उन सर्वस्रष्ट महादेवजीने मेरा प्रिय करनेके लिये पूर्वकालमें मुझे पट्टमहिषीके पदपर अभिषिक्त किया था

अध्याय 134

श्लोक 38

व्रतकस्यावसानेऽथ देयं भोज्यं च नित्यदा ।स्त्रीणां कामाः प्रदेयाश्च सदृशाः कालदेशयोः

vratakasyāvasāne'tha deyaṃ bhojyaṃ ca nityadā | strīṇāṃ kāmāḥ pradeyāśca sadṛśāḥ kāladeśayoḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रतके अन्तमें सदा भोज्य-पदार्थोंका दान करना चाहिये । स्त्रियोंकी अभीष्ट वस्तुओंका भी, जो देश-कालके अनुरूप हों, दान करना उचित है

अध्याय 134

श्लोक 39

एकैकस्य प्रदातव्यं व्रतकं वरवर्णिनि ।छन्दतो ब्राह्मणानां तु देयमन्नं सदक्षिणम्

ekaikasya pradātavyaṃ vratakaṃ varavarṇini | chandato brāhmaṇānāṃ tu deyamannaṃ sadakṣiṇam

हिन्दी अर्थ

वरवर्णिनि ! ब्रतके जो उपकरण द्रव्य हैं, उनका बराबर विभाग करके प्रत्येक ब्राह्मणको उसे देना चाहिये तथा ब्राह्मणोंकी इच्छाके अनुसार उन्हें दक्षिणासहित अन्नका दान करना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 40

पायसं तत्र दातव्यं व्रतके नान्यदिष्यते ।नात्र प्राणिवधः कार्यः पुराणे नियता श्रुतिः

pāyasaṃ tatra dātavyaṃ vratake nānyadiṣyate | nātra prāṇivadhaḥ kāryaḥ purāṇe niyatā śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

उस ब्रतमें खीरका दान करना चाहिये। दूसरा कोई अन्न अभीष्ट नहीं है। इसमें प्राणियोंकी हिंसा कदापि नहीं करनी चाहिये। यह पुराणमें निश्चितरूपसे कहा गया श्रुतिका सिद्धान्त है

अध्याय 134

श्लोक 41

अथ द्वितीयं वक्ष्यामि व्रतं सोमसमुद्भवे ।महादेवप्रसादेन दृष्टवत्यस्मि यच्छुभे

atha dvitīyaṃ vakṣyāmi vrataṃ somasamudbhave | mahādevaprasādena dṛṣṭavatyasmi yacchubhe

हिन्दी अर्थ

चन्द्रकुमारी ! शुभे! अब मैं दूसरे ब्रतका वर्णन करूँगी, जिसका महादेवजीकी कृपासे मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है

अध्याय 134

श्लोक 42

सर्वाः पुत्रफला नार्यः सद्भिरेतदुदाहृतम् ।तस्मादन्विष्यती दद्यात् सपुत्रकरकाञ्छुभे

sarvāḥ putraphalā nāryaḥ sadbhiretadudāhṛtam | tasmādanviṣyatī dadyāt saputrakarakāñchubhe

हिन्दी अर्थ

शुभे! सत्पुरुषोंका कथन है कि सारी स्त्रियाँ पुत्ररूप फलवाली होती हैं अर्थात्‌ पुत्रको जन्म देनेसे ही उनका नारीत्व सफल होता है; अत: पुत्रकी इच्छा रखनेवाली स्त्री पुत्रार्थिनी नारियोंद्वारा देनेयोग्य करकों (कमण्डलुओं )-का दान करे

अध्याय 134

श्लोक 43

ज्येष्ठाषाढौ शुभौ मासौ पुरोक्तं विधिमाचरेत् ।अथवा ज्येष्ठमेवैकमाषाढं वा समाचरेत्

jyeṣṭhāṣāḍhau śubhau māsau puroktaṃ vidhimācaret | athavā jyeṣṭhamevaikamāṣāḍhaṃ vā samācaret

हिन्दी अर्थ

पहले जो विधि बतलायी गयी है, उसका पुत्रार्थिनी स्त्री ज्येष्ठ और आषाढ़ इन दो शुभ मासोंतक पालन करे अथवा केवल ज्येष्ठ या आषाढ़ एक ही महीनेतक उसका आचरण करे

अध्याय 134

श्लोक 44

ततो मासद्वये पूर्णे मासे वा वरवर्णिनि ।सपुत्रकरकान् दद्यात् फाणितप्रतिपूरितान्

tato māsadvaye pūrṇe māse vā varavarṇini | saputrakarakān dadyāt phāṇitapratipūritān

हिन्दी अर्थ

वरवर्णिनि! फिर ब्रतके दो मास अथवा एक ही मास पूर्ण होनेपर पुत्रार्थिनी स्त्रियोंद्वारा देनेयोग्य करकों (कमण्डलुओं ) -का दान करे। उन सबमें शीरे अथवा चीनीके शरबत भरे होने चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 45

सर्पिषः पयसश्चैव दध्नोऽथ मधुनोऽनघे ।जलस्य च तथा दद्यात् पूरयित्वा शशिप्रभे

sarpiṣaḥ payasaścaiva dadhno'tha madhuno'naghe | jalasya ca tathā dadyāt pūrayitvā śaśiprabhe

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके समान कान्तिवाली निष्पाप अरुन्धति! घी, दूध, दही तथा जलसे भी कमण्डलुओंको भरकर उनका दान करे

अध्याय 134

श्लोक 46

एकस्मै ज्ञानवृद्धाय सुव्रताय जितात्मने ।सपुत्रकरकान् दद्याद् यावन्तो मनसः प्रियाः

ekasmai jñānavṛddhāya suvratāya jitātmane | saputrakarakān dadyād yāvanto manasaḥ priyāḥ

हिन्दी अर्थ

नारीको चाहिये कि वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा मनको वशमें रखनेवाले एक ही ज्ञानवृद्ध ब्राह्मणको पुत्रार्थिनी स्थ्रियोंद्वारा देनेयोग्य उतने कमण्डलु प्रदान करे, जितने उसके मनको अभीष्ट हों

अध्याय 134

श्लोक 47

इच्छेत स्त्री दुहितरं स्त्रीणां कामकरं ततः ।किञ्चिद्द्रव्यं सुताकामात् सुतां प्राप्नोत्यसंशयः

iccheta strī duhitaraṃ strīṇāṃ kāmakaraṃ tataḥ | kiñciddravyaṃ sutākāmāt sutāṃ prāpnotyasaṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जो नारी पुत्री प्रात्त करना चाहती हो, वह पुत्रीकी कामनासे ब्राह्मणी स्त्रियोंको कोई ऐसा द्रव्य दे, जो उनकी इच्छा पूर्ण करनेवाला हो, ऐसा करनेसे उसे पुत्रीकी प्राप्ति होती है। इसमें संशय नहीं है

अध्याय 134

श्लोक 48

गौर्वाथ काञ्चनं वापि दक्षिणार्थं प्रशस्यते ।विप्रस्याच्छादनं देयमवश्यं तु शुचिस्मिते

gaurvātha kāñcanaṃ vāpi dakṣiṇārthaṃ praśasyate | viprasyācchādanaṃ deyamavaśyaṃ tu śucismite

हिन्दी अर्थ

दक्षिणाके लिये गौ अथवा सुवर्णको अच्छा बताया जाता है। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस ब्रतमें ब्राह्मणको ओढ़नेके लिये वस्त्र अवश्य देना चाहिये

अध्याय 134

श्लोक 49

यज्ञोपवीतं व्रतके दद्यान्नारी शुचिव्रता ।सपुत्रकरकाणां तु विधिरुक्तो विपश्चिता

yajñopavītaṃ vratake dadyānnārī śucivratā | saputrakarakāṇāṃ tu vidhirukto vipaścitā

हिन्दी अर्थ

पतित्रतापूर्वक ब्रतका पालन करनेवाली नारी ब्रतमें यज्ञोपवीतका दान करे। विद्वान्‌ पुरुष इसमें पुत्रार्थिनी स्त्रियोंके लिये नियत करकोंके दानका विधान बताते हैं

अध्याय 134

श्लोक 50

अपत्याख्यानयोगेन ब्राह्मणेभ्यः शुचिव्रता ।संवत्सरं सुसम्पूर्णं व्रतधर्मानुपालिनी

apatyākhyānayogena brāhmaṇebhyaḥ śucivratā | saṃvatsaraṃ susampūrṇaṃ vratadharmānupālinī

श्लोक 50–53 का हिन्दी अर्थ

शुभे! ब्रत-धर्मका निरन्तर पालन करनेवाली पवित्र ब्रतधारिणी स्त्री अपत्याख्यान-योगसे अर्थात्‌ पुँल्लिज्॒ संतान (पुत्र)-की कामना होनेपर पुँल्लिद्ध नक्षत्र (पुष्य, हस्त और श्रवण) -के योगमें और स्त्रीलिड्ध संतान (पुत्री)-की इच्छा होनेपर (रोहिणी आदि) स्त्रीलिज्॒नक्षत्रके योगमें पूरे सालभरतक सदा पतिकी आज्ञासे करकों (करवों )-का दान करे। सत्यवादिनी अरुन्धति! वर्ष पूर्ण होनेपर कार्तिककी पूर्णिमाके दिन ्राह्मणको सुवर्णसूत्र (यज्ञोपवीत )-का दान करना चाहिये। कामनापूर्वक किये जानेवाले इस ब्रतको समाप्त करके ब्राह्मणको यज्ञोपवबीत, कमण्डलु और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। जो सती-साध्वी ब्राह्मणी स्त्रियोंको उनकी रुचिके अनुकूल वस्तुओंका दान करती है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है

अध्याय 134

श्लोक 51

करकानपि दद्याच्च पूर्णे संवत्सरे शुभे ।अनुज्ञया सदा भर्तुः सत्यवादिन्यरुन्धति

karakānapi dadyācca pūrṇe saṃvatsare śubhe | anujñayā sadā bhartuḥ satyavādinyarundhati

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 52

सुवर्णसूत्रं विप्राय कौमुद्यां दातुमर्हति ।यज्ञोपवीतं विप्रस्य व्रतं संस्थाप्य कामिकम्

suvarṇasūtraṃ viprāya kaumudyāṃ dātumarhati | yajñopavītaṃ viprasya vrataṃ saṃsthāpya kāmikam

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 53

यज्ञोपवीतं करकं दक्षिणां च स्वशक्तितः ।प्रयच्छती सती स्त्रीभ्यः सर्वान्कामान्समश्नुते

yajñopavītaṃ karakaṃ dakṣiṇāṃ ca svaśaktitaḥ | prayacchatī satī strībhyaḥ sarvānkāmānsamaśnute

अर्थ श्लोक 50 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 54

नवं न भक्षयेत् किञ्चिन्नारी धान्यमथो फलम् ।पुष्पाणि नोपयुञ्जीत यावदेवं समाचरेत्

navaṃ na bhakṣayet kiñcinnārī dhānyamatho phalam | puṣpāṇi nopayuñjīta yāvadevaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

नारी जबतक इस प्रकार व्रतका आचरण करे, तबतक कोई नया अन्न अथवा फल न खाय और नये फूलोंका भी उपयोग न करे

अध्याय 134

श्लोक 55

एकभक्तेन धर्मज्ञे पुण्यकं कर्तुमर्हति ।ब्राह्मणाय तथा देयं भर्तुश्च तदनन्तरम्

ekabhaktena dharmajñe puṇyakaṃ kartumarhati | brāhmaṇāya tathā deyaṃ bhartuśca tadanantaram

हिन्दी अर्थ

धर्मजे! एक समय भोजन करके पुण्यक- ब्रत करना चाहिये तथा पहले ब्राह्मणको भोजन देना चाहिये, उसके बाद पतिको

अध्याय 134

श्लोक 56

एवं संवत्सरं कृत्वा सुभगा रूपशालिनी ।भवत्यविधवा चैव स्त्री धनस्य तथेश्वरी

evaṃ saṃvatsaraṃ kṛtvā subhagā rūpaśālinī | bhavatyavidhavā caiva strī dhanasya tatheśvarī

हिन्दी अर्थ

एक वर्षतक ऐसा करके नारी सौभाग्यवती, रूप- सौन्दर्यशालिनी, अविधवा और धनकी स्वामिनी होती है

अध्याय 134

श्लोक 57

वार्ताकानि न खादेद् या स्त्री पूर्णं परिवत्सरम् ।न सा पुत्रविनाशं हि पश्यतीत्यवगम्यताम्

vārtākāni na khāded yā strī pūrṇaṃ parivatsaram | na sā putravināśaṃ hi paśyatītyavagamyatām

हिन्दी अर्थ

जो स्त्री पूरे एक वर्षतक बैगन नहीं खाती है, वह अपने पुत्रका विनाश नहीं देखती है, यह निश्चित रूपसे जान लो

अध्याय 134

श्लोक 58

शशकं मृगमांसं वा नित्यमेव विवर्जयेत् ।नाप्नोति मरणं नारी प्राप्नोति पतिदेवताम्

śaśakaṃ mṛgamāṃsaṃ vā nityameva vivarjayet | nāpnoti maraṇaṃ nārī prāpnoti patidevatām

हिन्दी अर्थ

स्त्रीको चाहिये कि वह खरगोश, हिरन अथवा अन्य प्राणियोंका मांस सदाके लिये त्याग दे। ऐसा करनेवाली स्त्री (अकाल) मृत्यु या अल्पायुको नहीं प्राप्त होती और पातिब्रत्य धर्मके पालनका फल पाती है

अध्याय 134

श्लोक 59

अलाबुं वर्जयेन्नारी तथैवोत्पादिकामपि ।कलम्बीं काञ्चनं नाद्याद्या भर्तुः सुखमिच्छति

alābuṃ varjayennārī tathaivotpādikāmapi | kalambīṃ kāñcanaṃ nādyādyā bhartuḥ sukhamicchati

हिन्दी अर्थ

जो स्त्री पतिका सुख चाहती है, वह लौकी और पोईको त्याग दे। सागका डंठल और गूलर भी न खाय

अध्याय 134

श्लोक 60

पूर्णे संवत्सरे दद्यादेकैकं शाकमादृता ।सदक्षिणं पुत्रवती भवत्येका पुरोऽधिका

pūrṇe saṃvatsare dadyādekaikaṃ śākamādṛtā | sadakṣiṇaṃ putravatī bhavatyekā puro'dhikā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रत्येक शाकका दक्षिणासहित आदरपूर्वक दान करे। ऐसा करनेवाली स्त्री एक (सपत्नीरहित), पुत्रवती तथा अग्रगण्या होती है

अध्याय 134

श्लोक 61

अयं प्रक्षालयाना स्त्री स्वपादावेवमादितः ।प्रतिष्ठां लभते नित्यमुद्वेगं नाधिगच्छति

ayaṃ prakṣālayānā strī svapādāvevamāditaḥ | pratiṣṭhāṃ labhate nityamudvegaṃ nādhigacchati

हिन्दी अर्थ

जो इस प्रकार ब्रतमें स्थित हो आरम्भसे ही अपने पैरोंको स्वयं ही धोती है, उसे सदा प्रतिष्ठा प्रात होती है और वह कभी उद्वेगमें नहीं पड़ती

अध्याय 134

श्लोक 62

दिवा या सूर्यपूतेन वर्तयेत् स्त्री पतिव्रता ।एकं संवत्सरं पूर्णं रात्रावन्नं विवर्जयेत्

divā yā sūryapūtena vartayet strī pativratā | ekaṃ saṃvatsaraṃ pūrṇaṃ rātrāvannaṃ vivarjayet

श्लोक 62–63 का हिन्दी अर्थ

देवोपम कान्तिवाली देवि! जो पतित्रता नारी पूरे एक वर्षतक दिनमें सूर्यसे पवित्र हुए अन्नके द्वारा निर्वाह करती है और रातमें भोजन त्याग देती है, वह चिरंजीवी पुत्रॉंसे युक्त और सौभाग्यशालिनी होती है तथा सारी सौतोंपर अधिकार रखती है; इसमें संशय नहीं है

अध्याय 134

श्लोक 63

सा जीवपुत्रा सुभगा भवत्यमरवर्णिनि ।अधितिष्ठति सर्वाश्च सपत्न्यो नात्र संशयः

sā jīvaputrā subhagā bhavatyamaravarṇini | adhitiṣṭhati sarvāśca sapatnyo nātra saṃśayaḥ

अर्थ श्लोक 62 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 64

पूर्णे संवत्सरे दद्यात् सौवर्णं सूर्यमुत्तमम् ।ब्राह्मणायाभिरूपाय दरिद्राय यशस्विने

pūrṇe saṃvatsare dadyāt sauvarṇaṃ sūryamuttamam | brāhmaṇāyābhirūpāya daridrāya yaśasvine

हिन्दी अर्थ

एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह रूपवान्‌, दरिद्र और यशस्वी ब्राह्मणको सूर्यकी सुवर्णमयी उत्तम प्रतिमाका दान करे

अध्याय 134

श्लोक 65

फलानि वाथ पुष्पाणि भक्ष्याण्यपि च सुव्रता ।दद्यादनस्तमितके चरितव्रतका तथा

phalāni vātha puṣpāṇi bhakṣyāṇyapi ca suvratā | dadyādanastamitake caritavratakā tathā

हिन्दी अर्थ

अथवा उस ब्रतका आचरण करनेवाली वह सुत्रता नारी सूर्यके अस्त होनेसे पूर्व ही फल-फूल और भक्ष्य पदार्थोका दान करे

अध्याय 134

श्लोक 66

या तथास्तमिते सूर्ये भुङ्क्ते स्त्री नियता सती ।चन्द्रनक्षत्रपूतानि भोज्यानि वरवर्णिनि

yā tathāstamite sūrye bhuṅkte strī niyatā satī | candranakṣatrapūtāni bhojyāni varavarṇini

श्लोक 66–67 का हिन्दी अर्थ

वरवर्णिनि! जो सती स्त्री पूर्वोक्त रूपसे व्रत लेकर सूर्यास्त होनेपर ही चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे पवित्र हुए भोज्य पदार्थोका आहार करती है, वह वर्ष पूर्ण होनेपर सुयोग्य एवं रूपवान्‌ ब्राह्मणको सुवर्णमय चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंकी प्रतिमाका दान करे; साथ ही उत्तम लक्षणसे युक्त वस्त्र भी दे

अध्याय 134

श्लोक 67

सा दद्यात् काञ्चनं चन्द्रं नक्षत्राणि ग्रहानपि ।अभिरूपाय विप्राय वासश्च लवणान्वितम्

sā dadyāt kāñcanaṃ candraṃ nakṣatrāṇi grahānapi | abhirūpāya viprāya vāsaśca lavaṇānvitam

अर्थ श्लोक 66 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 68

चन्द्रशीतलगात्री सा भवत्यमरवर्णिनी ।सुभगा दर्शनीया च पुत्रवत्यपि भाविनी

candraśītalagātrī sā bhavatyamaravarṇinī | subhagā darśanīyā ca putravatyapi bhāvinī

हिन्दी अर्थ

वह नारी चन्द्रमाके समान शीतल गात्रवाली, देवोपम कान्तिसे सुशोभित, सौभाग्यवती, दर्शनीया, पुत्रवती तथा पतिके प्रति अनुरक्त होती है

अध्याय 134

श्लोक 69

पौर्णमास्यां तु सततं प्राप्ते सोमोदयेऽङ्गना ।अर्घ्यं दद्यात् सुमनसां साक्षतं सकुशं तथा

paurṇamāsyāṃ tu satataṃ prāpte somodaye'ṅganā | arghyaṃ dadyāt sumanasāṃ sākṣataṃ sakuśaṃ tathā

श्लोक 69–70 का हिन्दी अर्थ

वह कल्याणमयी स्त्री सदा पूर्णिमाको चन्द्रोदय होनेपर अक्षत और कुशके साथ देवताओंको अर्घ्य प्रदान करे तथा दहीके साथ यावक (पूआ) -का नैवेद्य अर्पण करे। जो स्त्री नित्य नियमपूर्वक ऐसा करती है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेती है

अध्याय 134

श्लोक 70

यावकं च बलिं दद्याद् दध्ना च सह संयुतम् ।एवं या कुरुते नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्

yāvakaṃ ca baliṃ dadyād dadhnā ca saha saṃyutam | evaṃ yā kurute nityaṃ sarvānkāmānavāpnuyāt

अर्थ श्लोक 69 के साथ

अध्याय 134

श्लोक 71

अदृष्ट्वा या तु नाश्नाति सूर्यं नारी पतिव्रता ।दुर्दिने वाथवा व्यभ्रे सेष्टान् कामानवाप्नुयात्

adṛṣṭvā yā tu nāśnāti sūryaṃ nārī pativratā | durdine vāthavā vyabhre seṣṭān kāmānavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

जो पतित्रता नारी आकाशमें मेघोंकी घटा छायी हो अथवा बादलोंसे रहित स्वच्छ आकाश हो, सूर्यका रर्शन किये बिना भोजन नहीं करती है, वह अभीष्ट क्रामनाओंको प्राप्त कर लेती है

अध्याय 134

श्लोक 72

काञ्चनं शक्तितो दद्यात्सा विप्राय मनस्विनी ।सुभगा दर्शनीया च भवत्यमरवर्णिनी

kāñcanaṃ śaktito dadyātsā viprāya manasvinī | subhagā darśanīyā ca bhavatyamaravarṇinī

हिन्दी अर्थ

वह मनस्विनी पती अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणको सुवर्ण दान करे, सा करके वह सौभाग्यवती, दर्शनीया और देवोपम क्रान्तिसे सुशोभित होती है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

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शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.