Harivamsha Purana
135
अध्याय 135 / 318

Parva 2, Adhyāya 80

52 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ52 श्लोक

अध्याय 135

श्लोक 1

नानाप्रकाराणां व्रतानां विधानं निर्वेष्टव्यं शरीरं यैर्व्रतकैः पुण्यकैरपि ।अरुन्धति प्रवक्ष्यामि सहैताभिर्वरेण तु

nānāprakārāṇāṃ vratānāṃ vidhānaṃ nirveṣṭavyaṃ śarīraṃ yairvratakaiḥ puṇyakairapi | arundhati pravakṣyāmi sahaitābhirvareṇa tu

हिन्दी अर्थ

उध्याय: शा तोंका विधान भगवती उमा कहती हैं—अरुन्धति! जिन वब्रतों मौर पुण्योंके द्वारा इस शरीरको परम सुखकी प्रासिके पोग्य बनाया जा सकता है, उन्हें इन तिथियों और ष्ठ फलके साथ बताती हूँ, सुनो

अध्याय 135

श्लोक 2

कृष्णाष्टमीं या क्षिपति स्याद्वा मूलफलाशिनी ।ब्राह्मणायैकमशनं स्वं दत्त्वा भर्तृदेवता

kṛṣṇāṣṭamīṃ yā kṣipati syādvā mūlaphalāśinī | brāhmaṇāyaikamaśanaṃ svaṃ dattvā bhartṛdevatā

श्लोक 2–5 का हिन्दी अर्थ

पवित्र ब्रतका पालन करनेवाली देवि! जो पतित्रता नारी कृष्णपक्षकी मष्टमी तिथिको अपना एक समयका भोजन ब्राह्मणको कर स्वयं उपवासपूर्वक व्यतीत करती है अथवा उस देन फल-मूल खाकर रहती है, श्वेत वस्त्र धारण करके पदाचारके पालनपूर्वक गुरुजनों तथा देवताओंकी पूजा रती है और इस प्रकार एक वर्षतक इसी नियमका ालन करके वह अन्तमें सुरही गायके पूँछके बालकी स्सीसे अच्छी तरह बनाया हुआ चर्वर, ध्वज तथा क्षिणासहित मिष्टानन यथाशक्ति ब्राह्मणको देती है, उस तिभक्ता नारीके केश कटि-प्रदेशके नीचेतक लटककर हराया करते हैं और उनके अग्रभाग घुँघराले हो जाते

अध्याय 135

श्लोक 3

शुक्लवस्त्रा शुभाचारा गुरुदैवतपूजका ।एवं संवत्सरं कृत्वा ततो दद्याद् द्विजातये

śuklavastrā śubhācārā gurudaivatapūjakā | evaṃ saṃvatsaraṃ kṛtvā tato dadyād dvijātaye

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 4

गोवालरज्जुसुकृतं चामरं च ध्वजं तथा ।दक्षिणापूर्णमिष्टान्नं शक्त्या वापि शुचिव्रते

govālarajjusukṛtaṃ cāmaraṃ ca dhvajaṃ tathā | dakṣiṇāpūrṇamiṣṭānnaṃ śaktyā vāpi śucivrate

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 5

ऊर्मिमन्तः स्वरालाग्राः श्रोणिदेशावलम्बिनः ।तस्या भवन्ति केशास्तु भक्तिमत्या हि भर्तरि

ūrmimantaḥ svarālāgrāḥ śroṇideśāvalambinaḥ | tasyā bhavanti keśāstu bhaktimatyā hi bhartari

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 6

शिरो निर्वेष्टुकामा तु गोमयेन शिरः शती ।प्रक्षालयेन्मलं धात्र्या बिल्वेन श्रीफलेन च

śiro nirveṣṭukāmā tu gomayena śiraḥ śatī | prakṣālayenmalaṃ dhātryā bilvena śrīphalena ca

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

वरवर्णिनि! जो सिरको सुख पहुँचाना आाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री गोबर, आँवला, कच्चा ल और श्रीफल (पक्का बेल)—इन सबको सम मात्रामें पलाकर उसके द्वारा सिरको धोये। उसकी मैल दूर रे। सदा गोमूत्रका पान करे और सिरके ऊपरसे स्त्रान रते समय उस जलमें गोमूत्रको भी मिला ले। प्रत्येक ष्णा चतुर्दशीको इस नियमका पालन करना चाहिये । ऐसा करनेवाली स्त्री विधवा नहीं होती; सौभाग्यवती बनी रहती है। उसे ज्वर आदि रोग नहीं सताते तथा उसके शरीरमें सिर-सम्बन्धी रोगोंसे कष्ट नहीं होता

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श्लोक 7

गोमूत्रं च सदा प्राश्येच्छिरःस्नानं च मिश्रयेत् ।कृष्णां चतुर्दशीं त्वेतत् कर्तव्यं वरवर्णिनि

gomūtraṃ ca sadā prāśyecchiraḥsnānaṃ ca miśrayet | kṛṣṇāṃ caturdaśīṃ tvetat kartavyaṃ varavarṇini

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 8

भवत्यविधवा चैव सुभगा विज्वरा तथा ।शिरोरोगैर्नैव चास्याः शरीरमभितप्यते

bhavatyavidhavā caiva subhagā vijvarā tathā | śirorogairnaiva cāsyāḥ śarīramabhitapyate

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 9

दर्शनीयं ललाटं या काङ्क्षति स्त्री शुचिस्मिते ।तिथिं प्रतिपदं नित्यं सा क्षिपेदेकभोजना

darśanīyaṃ lalāṭaṃ yā kāṅkṣati strī śucismite | tithiṃ pratipadaṃ nityaṃ sā kṣipedekabhojanā

श्लोक 9–13 का हिन्दी अर्थ

पवित्र मुसकानवाली अरुून्धति! जो स्त्री अपने ललाटको दर्शनीय (शोभासे सम्पन्न) बनाये रखना चाहती है, वह प्रत्येक प्रतिपदा तिथिको एक समय भोजन करके बिताये एवं दूधके साथ भात खाकर रहे। जबतक एक वर्ष पूरा न हो, तबतक ऐसा करती रहे। तदनन्तर ब्राह्मणको सुन्दर सुवर्णमय पट* दान करे। ऐसा करनेवाली सुन्दर कटिप्रदेशवाली स्त्री मनोहर रूप-सौन्दर्यसे युक्त ललाट पाती है। निष्पाप _ अरुन्थति! तुम्हारा भला हो, जो भौंहोंका सौन्दर्य चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री सदा द्वितीया तिथिको एक समय उपवास करके साग-भात खाकर रहे। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सुन्दर पके हुए फल, एक माशा सुवर्णकी दक्षिणा, नमक और घीसे भरा हुआ पात्र देकर ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये

अध्याय 135

श्लोक 10

पयसा च तथाश्नीयाद् यावत्संवत्सरो गतः ।ब्राह्मणाय ततो दद्यात् पटं रूप्यमयं शुभम्

payasā ca tathāśnīyād yāvatsaṃvatsaro gataḥ | brāhmaṇāya tato dadyāt paṭaṃ rūpyamayaṃ śubham

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 11

ललाटं रूपसम्पन्नमाप्नोति स्त्री सुमध्यमा ।सततं स्त्री द्वितीयायां भ्रुवोरिच्छेत्सुरूपताम्

lalāṭaṃ rūpasampannamāpnoti strī sumadhyamā | satataṃ strī dvitīyāyāṃ bhruvoricchetsurūpatām

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 12

अनन्तरोपवासेन शाकभक्ताशना सती ।ततः संवत्सरे पूर्णे ब्राह्मणं स्वस्ति वाचयेत्

anantaropavāsena śākabhaktāśanā satī | tataḥ saṃvatsare pūrṇe brāhmaṇaṃ svasti vācayet

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 13

फलैः परिणतैः सौम्यैर्माषाणां दक्षिणान्वितैः ।लवणेन च भद्रं ते घृतपात्रेण चानघे

phalaiḥ pariṇataiḥ saumyairmāṣāṇāṃ dakṣiṇānvitaiḥ | lavaṇena ca bhadraṃ te ghṛtapātreṇa cānaghe

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 14

आत्मनः शोभनौ कर्णाविच्छती स्त्री सुमध्यमा ।नक्षत्रे श्रवणे प्राप्ते ध्रुवं भुञ्जीत यावकम्

ātmanaḥ śobhanau karṇāvicchatī strī sumadhyamā | nakṣatre śravaṇe prāpte dhruvaṃ bhuñjīta yāvakam

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

जो सुन्दर करटिप्रदेशवाली स्त्री अपने कानोंको सुन्दर एवं शोभासम्पन्न बनाये रखना चाहती हो, वह श्रवण नक्षत्र प्राप्त होनेपर अवश्य यावक (जौके आटेका हलवा या पूआ) भोजन करे। इस तरह एक वर्ष पूरा होनेपर दो सुवर्णमय कान बनवाकर उन्हें दुग्धमिश्रित घीमें रखकर ब्राह्मणको दान कर दे

अध्याय 135

श्लोक 15

ततः संवत्सरे पूर्णे कर्णौ दद्याद्धिरण्मयौ ।घृते प्रक्षिप्य विप्राय पयसा सहिते शुभे

tataḥ saṃvatsare pūrṇe karṇau dadyāddhiraṇmayau | ghṛte prakṣipya viprāya payasā sahite śubhe

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 16

नासामिच्छेल्लाटान्तामव्यङ्गां व्याधिवर्जिताम् ।तिलगुल्मं सदा सिञ्चेद् यावत् पुष्प्येद्धि रक्षित

nāsāmicchellāṭāntāmavyaṅgāṃ vyādhivarjitām | tilagulmaṃ sadā siñced yāvat puṣpyeddhi rakṣita

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरी नासिका ललाटसे संलग्न हो, उसमें किसी तरहकी विकृति न आये और वह सदा रोग-व्याधिसे रहित एवं सुन्दर बनी रहे तो वह सदा तिलके पौधोंको सींचे और तबतक सींचती रहे जबतक कि उसके द्वारा सुरक्षित हुए उन पौधोंमें फूल तथा फल न लग जायँँ। जिस दिनसे सींचना आरम्भ करे, उसके एक दिन पहले उपवास कर ले; फिर निरन्तर जलसे सींचती रहे। जब उन पौषधोंमें फूल लग जायेँ तो उनसे फूल ले घीमें डालकर उस घीका दान कर दे

अध्याय 135

श्लोक 17

अनन्तरोपवासेन सेक्तव्यः सलिलैः सदा तस्मादवाप्य पुष्पाणि घृते प्रक्षिप्य दापयेत्

anantaropavāsena sektavyaḥ salilaiḥ sadā tasmādavāpya puṣpāṇi ghṛte prakṣipya dāpayet

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 18

स्वक्षी भवेयमिति या स्त्री काङ्क्षत्यमृतोद्भवे ।अनन्तरं वै भुञ्जाना पयसाथ घृतेन वा

svakṣī bhaveyamiti yā strī kāṅkṣatyamṛtodbhave | anantaraṃ vai bhuñjānā payasātha ghṛtena vā

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

धिती हैं । अमृतमय चन्द्रमासे उत्पन्न हुई अरुन्धति! जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरे नेत्र सुन्दर हों, वह निरन्तर दूध अथवा घीसे ही भोजन करे। पवित्र मुसकानवाली देवि! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो कमल और कुमुदके पत्तोंको दूधमें डाले और जब वे उसमें तैरने लगें, तब वह सती उन पत्तोंसहित उस दूधका ब्राह्मणको दान कर दे। पतित्रते! वह दान देकर नारी कृष्णसार मृगके समान नेत्रवाली हो जाती है

अध्याय 135

श्लोक 19

ततः संवत्सरे पूर्णे पद्मपत्राणि मण्डिता ।तथैवोत्पलपत्राणि न्यसेत् क्षीरे शुचिस्मिते

tataḥ saṃvatsare pūrṇe padmapatrāṇi maṇḍitā | tathaivotpalapatrāṇi nyaset kṣīre śucismite

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 20

प्लवमानानि विप्राय ततो दद्यात्सती सति ।कृष्णसारसमानाक्षी तद् दत्त्वा भवति स्म वै

plavamānāni viprāya tato dadyātsatī sati | kṛṣṇasārasamānākṣī tad dattvā bhavati sma vai

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 21

इच्छेदोष्ठौ चारुरूपौ या स्त्री धर्मगुणान्विता ।सा मृन्मयेन तु पिबेदुदकं वत्सरं सती

icchedoṣṭhau cārurūpau yā strī dharmaguṇānvitā | sā mṛnmayena tu pibedudakaṃ vatsaraṃ satī

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

जो धर्मरूपी गुणसे युक्त सती-साध्वी स्त्री यह चाहती हो कि मेरे ओठ बड़े सुन्दर हों, वह एक वर्षतक मिट्टीके बर्तनसे पानी पीये और धर्मकी भागिनी होकर प्रत्येक नवमी तिथिको बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर उसे मूँगा दान करना चाहिये

अध्याय 135

श्लोक 22

अयाचितेन भुञ्जीत नवम्यां धर्मभागिनी ।ततः संवत्सरे पूर्णे विद्रुमं दातुमर्हति

ayācitena bhuñjīta navamyāṃ dharmabhāginī | tataḥ saṃvatsare pūrṇe vidrumaṃ dātumarhati

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 23

तेन बिम्बफलाभौष्ठी स्त्री भवत्येव शोभने ।सुभगाथ वपुःपुत्रधनाढ्या गोमती तथा

tena bimbaphalābhauṣṭhī strī bhavatyeva śobhane | subhagātha vapuḥputradhanāḍhyā gomatī tathā

हिन्दी अर्थ

शोभने! ऐसा करनेसे उस स्त्रीके ओठ अवश्य ही बिम्बफलके समान लाल हो जाते हैं तथा वह सौभाग्यवती, रूपवती, पुत्रवती, धनाब्य और गौओंसे युक्त होती है

अध्याय 135

श्लोक 24

या चारुरूपानिच्छेत दन्तानमरवर्णिनि ।शुक्लाष्टमीं न साश्नीयाद् भक्तद्वयमनिन्दिता

yā cārurūpāniccheta dantānamaravarṇini | śuklāṣṭamīṃ na sāśnīyād bhaktadvayamaninditā

हिन्दी अर्थ

अमरवर्णिनि! जो चाहती हो कि मेरे दाँत बहुत ही सुन्दर और स्वच्छ हों, वह साध्वी स्त्री शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको दोनों समय भोजन त्याग दे

अध्याय 135

श्लोक 25

ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याद् रौप्यमयान् सती ।दन्तान् प्राक्षिप्य धर्मज्ञे पयस्यतिगुणोदिते

tataḥ saṃvatsare pūrṇe dadyād raupyamayān satī | dantān prākṣipya dharmajñe payasyatiguṇodite

हिन्दी अर्थ

धर्मज्ते! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह सती नारी चाँदीके दाँत बनवाकर उन्हें अत्यन्त उत्तम गुणवाले दूधमें डाल दे और दाँतॉंसहित उस दुग्धका ब्राह्मणको दान कर दे

अध्याय 135

श्लोक 26

तेन सा जातिपुष्पाभान्दन्तान्प्राप्नोति सा सती ।सौभाग्यमपि चाप्नोति सपुत्रत्वं तथानघे

tena sā jātipuṣpābhāndantānprāpnoti sā satī | saubhāgyamapi cāpnoti saputratvaṃ tathānaghe

हिन्दी अर्थ

अनघे! ऐसा करनेसे वह सती- साध्वी स्त्री चमेलीके फूल-जैसे श्रेत दाँत पाती है और सौभाग्य तथा पुत्र लाभ करती है

अध्याय 135

श्लोक 27

सर्वमेव मुखं कान्तमिच्छेद् या रुचिरानने ।सा पूर्णमास्यां स्नात्वा तु प्राप्य चन्द्रोदये शुभे

sarvameva mukhaṃ kāntamicched yā rucirānane | sā pūrṇamāsyāṃ snātvā tu prāpya candrodaye śubhe

श्लोक 27–29 का हिन्दी अर्थ

रुचिरानने ! जो स्त्री सम्पूर्ण मुख-मण्डलको ही कमनीय कान्तिसे युक्त देखना चाहे, वह भामिनी पूर्णिमाको स्नान करके शुभ चन्द्रोदय होनेपर दूधमें तैयार किये गये यावकका ब्राह्मणको दान दे। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सोने या चाँदीकी चन्द्रमाकी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर पी ध्याय: + ६७३ उसे कमलके फूलपर रखे और ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उसका दान कर दे। वह शुभलक्षणा स्त्री उस दानके द्वारा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली हो जाती है

अध्याय 135

श्लोक 28

यावकं पयसा सिद्धं दत्त्वा विप्राय भामिनी ।ततः संवत्सरे पूर्णे चन्द्रं रूप्यमयं शुभम्

yāvakaṃ payasā siddhaṃ dattvā viprāya bhāminī | tataḥ saṃvatsare pūrṇe candraṃ rūpyamayaṃ śubham

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 29

पद्मे फुल्ले तु विन्यस्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् ।पूर्णचन्द्रमुखी तेन दानेन स्त्री शुभा भवेत्

padme phulle tu vinyasya brāhmaṇān svasti vācayet | pūrṇacandramukhī tena dānena strī śubhā bhavet

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 30

स्तनाविच्छति या नारी तृणराजफलोपमौ ।अयाचितं दशम्यां सा नित्यमश्नीत वाग्यता

stanāvicchati yā nārī tṛṇarājaphalopamau | ayācitaṃ daśamyāṃ sā nityamaśnīta vāgyatā

श्लोक 30–32 का हिन्दी अर्थ

जो नारी यह चाहती है कि मेरे दोनों स्तन ताड़के फलोंके समान पीन हों, वह प्रत्येक दशमी तिथिको सदा मौन रहकर बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर जो सोनेके बने हुए दो सुन्दर बेल जितात्मा ब्राह्मणको दक्षिणासहित दानमें देती है, वह परम सौभाग्य एवं बहुत-से पुत्र प्राप्त करती है। देवोपम कान्तिवाली देवि! वह स्त्री सदा ऊँचे स्तन धारण करती है

अध्याय 135

श्लोक 31

संवत्सरे ततः पूर्णे द्वे बिल्वे काञ्चने शुभे ।सदक्षिणे ब्राह्मणाय प्रयच्छति धृतात्मने

saṃvatsare tataḥ pūrṇe dve bilve kāñcane śubhe | sadakṣiṇe brāhmaṇāya prayacchati dhṛtātmane

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 32

सौभाग्यं परमाप्नोति बहुपुत्रांस्तथैव च ।सदोन्नतौ स्तनौ सा स्त्री बिभर्त्यमरवर्णिनि

saubhāgyaṃ paramāpnoti bahuputrāṃstathaiva ca | sadonnatau stanau sā strī bibhartyamaravarṇini

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 33

शातोदरत्वमिच्छन्ती क्षिपेदेकान्तभोजिनी ।पञ्चम्यां तत्र भोक्तव्यमन्नं तोयेन नित्यदा

śātodaratvamicchantī kṣipedekāntabhojinī | pañcamyāṃ tatra bhoktavyamannaṃ toyena nityadā

हिन्दी अर्थ

जो कृशोदरी होना चाहती है ( अर्थात्‌ जिसकी यह इच्छा है कि मेरा पेट उभड़ने या बढ़ने न पाये, भीतरकों दबा रहे), वह एकान्तमें भोजन करे और पश्चमीको सदा केवल जलसे अन्न ग्रहण करे

अध्याय 135

श्लोक 34

ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याज्जातिलतां शुभे ।फुल्लां सदक्षिणां धन्ये ब्राह्मणाय धृतात्मने

tataḥ saṃvatsare pūrṇe dadyājjātilatāṃ śubhe | phullāṃ sadakṣiṇāṃ dhanye brāhmaṇāya dhṛtātmane

हिन्दी अर्थ

शुभे! धन्ये! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर जितात्मा ब्राह्मणको खिली हुई चमेलीकी लताका दक्षिणासहित दान करे

अध्याय 135

श्लोक 35

हस्ताविच्छति या नारी रूपयुक्तौ सुमध्यमे ।द्वादशीं सा क्षिपत्वेवं शाकैः सर्वैरनिन्दितैः

hastāvicchati yā nārī rūpayuktau sumadhyame | dvādaśīṃ sā kṣipatvevaṃ śākaiḥ sarvairaninditaiḥ

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

सुमध्यमे ! जो नारी अपने दोनों हाथोंको सुन्दर रूपसे युक्त देखना चाहती है, वह द्वादशी तिथिको सब प्रकारके अनिन्दित (उत्तम) शाकोंद्वारा आहार करके व्यतीत करे। इस तरह एक वर्ष व्यतीत होनेपर वह सुवर्णमय कमलपर दो खिले हुए कमलके फूल रखकर उन सबका सुन्दर एवं सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे

अध्याय 135

श्लोक 36

संवत्सरे ततः प्राप्ते रौक्मे पद्मे ददातु सा ।ब्राह्मणायाभिरूपाय तथा पद्मद्वयं शुभम्

saṃvatsare tataḥ prāpte raukme padme dadātu sā | brāhmaṇāyābhirūpāya tathā padmadvayaṃ śubham

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 37

श्रोणीं विशालामन्विच्छेत् स्त्री क्षिपत्वेव सुव्रते ।त्रयोदशीमेकभक्तमश्नात्वेवमयाचितम्

śroṇīṃ viśālāmanvicchet strī kṣipatveva suvrate | trayodaśīmekabhaktamaśnātvevamayācitam

हिन्दी अर्थ

उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो नारी विशाल नितम्ब चाहती हो, वह त्रयोदशी तिथिको केवल एक बार अयाचित अन्न भोजन करे और इसी तरह प्रत्येक ज्रयोदशीको व्यतीत करे

अध्याय 135

श्लोक 38

ततः संवत्सरे पूर्णे लवणं सम्प्रयच्छतु ।प्रजापतिमुखाकारं कृत्वा तत्र वरानने

tataḥ saṃvatsare pūrṇe lavaṇaṃ samprayacchatu | prajāpatimukhākāraṃ kṛtvā tatra varānane

हिन्दी अर्थ

वरानने! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रजापति ब्रह्माजीके मुखकी-सी आकृतिवाली नमककी राशिका दान करे

अध्याय 135

श्लोक 39

काञ्चनं चैव दातव्यं तदाकारस्य सर्वदा ।अञ्जनेन च धर्मज्ञा शनकैरवचूर्णयेत्

kāñcanaṃ caiva dātavyaṃ tadākārasya sarvadā | añjanena ca dharmajñā śanakairavacūrṇayet

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार प्रजापतिके मुखके आकारका ही सुवर्ण भी सदा दान करना चाहिये । धर्मज्ञ नारी धीरे-धीरे अज्जनसे किसी ब्राह्मणीके नेत्रोंमें काजल लगाये

अध्याय 135

श्लोक 40

रत्नानि चैव पूर्णानि वासो रक्तं च दापयेत् ।तेन श्रोणीमभिमतां स्त्री सौम्ये प्रतिपद्यते

ratnāni caiva pūrṇāni vāso raktaṃ ca dāpayet | tena śroṇīmabhimatāṃ strī saumye pratipadyate

हिन्दी अर्थ

सौम्ये ! पूर्ण रत्र और लाल रंगका वस्त्र भी दे। इससे वह स्त्री अपने मनके अनुकूल नितम्ब पाती है

अध्याय 135

श्लोक 41

मधुरां वाचमिच्छन्ती वर्जयेल्लवणं सती ।संवत्सरं वा मासं वा प्रयच्छेल्लवणं ततः

madhurāṃ vācamicchantī varjayellavaṇaṃ satī | saṃvatsaraṃ vā māsaṃ vā prayacchellavaṇaṃ tataḥ

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

मधुर वाणीकी इच्छा रखनेवाली सती नारी एक वर्ष या एक मासतक नमक खाना छोड़ दे और वाणीके अतिशय माधुर्यकी इच्छा रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित नमक दान करे । अमरवर्णिनि ! ऐसा करनेसे उसकी वाणीकी मिठास तोतेकी वाणीसे सौ गुनी अधिक हो जाती है

अध्याय 135

श्लोक 42

सदक्षिणं ब्राह्मणाय परं माधुर्यमिच्छती ।शुकवाक्याच्छतगुणं भवत्यमरवर्णिनि

sadakṣiṇaṃ brāhmaṇāya paraṃ mādhuryamicchatī | śukavākyācchataguṇaṃ bhavatyamaravarṇini

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 43

गूढगुल्फशिरौ पादाविच्छन्त्या सोमनन्दिनि ।षष्ठ्यां षष्ठयां वरारोहे भोक्तव्यं सलिलौदनम्

gūḍhagulphaśirau pādāvicchantyā somanandini | ṣaṣṭhyāṃ ṣaṣṭhayāṃ varārohe bhoktavyaṃ salilaudanam

हिन्दी अर्थ

सोमनन्दिनि! वरारोहे! जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरे पैरोंके गुल्फ (घुद्दियाँ या गट्टे) और नस- नाड़ियाँ ढकी रहें, वह प्रत्येक षष्ठी तिथिको केवल पानीके साथ भात खाय

अध्याय 135

श्लोक 44

अग्निर्वा ब्राह्मणो वापि न स्प्रष्टव्यः पदा सदा ।यदा पदा स्पृशेत् तं च वन्देत तपसान्विते

agnirvā brāhmaṇo vāpi na spraṣṭavyaḥ padā sadā | yadā padā spṛśet taṃ ca vandeta tapasānvite

हिन्दी अर्थ

तपस्विनि! यह व्रत लेनेवाली स्त्रीको सदा ही उचित है कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणका पैरसे स्पर्श न करे। यदि कभी स्पर्श हो जाय तो उनको प्रणाम करे

अध्याय 135

श्लोक 45

पादेन न च वै पादं प्रक्षालयितुमर्हति ।एतैर्नित्यव्रतैर्युक्ता धर्मज्ञा पतिदेवता

pādena na ca vai pādaṃ prakṣālayitumarhati | etairnityavratairyuktā dharmajñā patidevatā

श्लोक 45–47 का हिन्दी अर्थ

उसे पैरसे पैरको नहीं धोना (रगड़ना) चाहिये। इन नित्य ब्रतोंसे युक्त हुई धर्मज्ञ पतित्रता नारी सोने या चाँदीके दो कछुए बनवाये। निष्पाप पतितब्रते! फिर उन दोनों कछुओंको घीमें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान कर दे। नन्दिनि! इसके सिवा दो कमलोंको उनके मुख नीचेकी ओर करके रखे, उन्हें लाल रंगके गन्धादि द्रव्योंसे संयुक्त करके सुवर्णसे अलंकृत करे; तत्पश्चात्‌ उनका ब्राह्मणको दान कर दे

अध्याय 135

श्लोक 46

कूर्मौ रूप्यमयौ दद्याद् ब्राह्मणाय पतिव्रते ।तौ वराय ब्राह्मणाय स्थापयित्वा घृतेऽनघे

kūrmau rūpyamayau dadyād brāhmaṇāya pativrate | tau varāya brāhmaṇāya sthāpayitvā ghṛte'naghe

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 47

पद्मे चाधोमुखे कृत्वा दद्याद् विप्राय नन्दिनि ।रक्तैर्द्रव्यैर्मिश्रयित्वा काञ्चनेनाभ्यलङ्कृते

padme cādhomukhe kṛtvā dadyād viprāya nandini | raktairdravyairmiśrayitvā kāñcanenābhyalaṅkṛte

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 135

श्लोक 48

सर्वमेव तु या गात्रमिच्छत्यतिमनोहरम् ।त्रिरात्रं पुष्पकाले सा करोतु पतिदेवता

sarvameva tu yā gātramicchatyatimanoharam | trirātraṃ puṣpakāle sā karotu patidevatā

हिन्दी अर्थ

जो पतिदेवता नारी अपने पम्पूर्ण शरीरको ही अत्यन्त मनोहर बनाना चाहती हो, वह रजोदर्शनके अवसरपर तीन रात उपवास करे

अध्याय 135

श्लोक 49

कौमुद्यामथवाषाढ्यां माघ्यां चाश्वयुजे तथा ।मातरं पितरं चैव मन्यतेऽतिथिदैवतम्

kaumudyāmathavāṣāḍhyāṃ māghyāṃ cāśvayuje tathā | mātaraṃ pitaraṃ caiva manyate'tithidaivatam

हिन्दी अर्थ

वह कार्तिक, आषाढ़, माघ तथा आश्विनकी यूर्णिमाको माता, पिता, अतिथि और देवताका आदर- पतत्कार एवं पूजन करे

अध्याय 135

श्लोक 50

घृतं च नित्यं विप्रेभ्यो ददातु लवणं तथा ।सम्मार्जनं गृहे चैव करोतु पतिदेवता

ghṛtaṃ ca nityaṃ viprebhyo dadātu lavaṇaṃ tathā | sammārjanaṃ gṛhe caiva karotu patidevatā

हिन्दी अर्थ

वह पतित्रता ब्राह्मणोंको प्रतिदिन नमक और घी दान करे। नित्य घरमें झाड़ू नगाये

अध्याय 135

श्लोक 51

उपलेपनं च धर्मज्ञे बलिकर्म च मानिनि ।वाग्दुष्टा चैव मा शुभ्रे भक्त्वात्मार्थपण्डिता

upalepanaṃ ca dharmajñe balikarma ca mānini | vāgduṣṭā caiva mā śubhre bhaktvātmārthapaṇḍitā

हिन्दी अर्थ

धर्मजे! मानिनि! शुभ्रे! अपने स्वार्थको परमझनेमें कुशल नारी घरमें लीपने-पोतने तथा देवताओंको बलि (उपहार-सामग्री) अर्पण करनेका कर्म भी करे। तरह कभी दुर्वचनका प्रयोग न करे

अध्याय 135

श्लोक 52

पर्यश्नातु च सा कञ्चिदपि शाकं यशस्विनि ।बलिं सृजत्वतथ्यं च परित्यजतु भामिनि

paryaśnātu ca sā kañcidapi śākaṃ yaśasvini | baliṃ sṛjatvatathyaṃ ca parityajatu bhāmini

हिन्दी अर्थ

यशस्विनि ! तरह किसी एक शाकका ही भक्षण करे। भामिनि! तरह देवताओंके लिये उपहार दे और असत्य भाषणका याग करे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.