Harivamsha Purana
145
अध्याय 145 / 318

Parva 2, Adhyāya 90

78 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ78 श्लोक

अध्याय 145

श्लोक 1

तेषां क्रीडावसक्तानां यदूनां पुण्यकर्मणाम् ।छिद्रमासाद्य दुर्बुद्धिर्देवशत्रुर्दुरासदः

teṣāṃ krīḍāvasaktānāṃ yadūnāṃ puṇyakarmaṇām | chidramāsādya durbuddhirdevaśatrurdurāsadaḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब पुण्यकर्मा यदुवंशी जलक्रीड़ामें आसक्त हो रहे थे, उसी समय मौका पाकर दुर्जय देवद्रोही दुर्बुद्धि दानव निकुम्भने मानो अपने ही वधकी इच्छासे भानु नामक यादवकी पुत्री भानुमतीका अपहरण कर लिया

अध्याय 145

श्लोक 2

कन्यां भानुमतीं नाम भानोर्दुहितरं नृप ।जहारात्मवधाकाङ्क्षी निकुम्भो नाम दानवः

kanyāṃ bhānumatīṃ nāma bhānorduhitaraṃ nṛpa | jahārātmavadhākāṅkṣī nikumbho nāma dānavaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 145

श्लोक 3

अन्तर्हितो मोहयित्वा यदूनां प्रमदाजनम् ।मायावी मायया राजन् पूर्ववैरमनुस्मरन्

antarhito mohayitvā yadūnāṃ pramadājanam | māyāvī māyayā rājan pūrvavairamanusmaran

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! अदृश्यरूपसे अन्तःपुरमें पहुँचकर मायाद्वारा यादवोंकी स्त्रयोंको मोहित करके उस मायावी दानवने पहलेके वैरको याद रखते हुए ही भानुमतीका अपहरण किया था

अध्याय 145

श्लोक 4

भ्रातुर्हिं वज्रनाभस्य तस्य कन्या प्रभावती ।प्रद्युम्नेन हृता वीर वज्रनाभस्तथा हतः

bhrāturhiṃ vajranābhasya tasya kanyā prabhāvatī | pradyumnena hṛtā vīra vajranābhastathā hataḥ

हिन्दी अर्थ

वीर नरेश! उसके भाई वज़्नाभकी एक कन्या थी, जो प्रभावतीके नामसे विख्यात थी। प्रद्युम्नने उसे हर लिया और वज़नाभको भी मार डाला

अध्याय 145

श्लोक 5

भानोरेव तथारण्ये वसत्यवसरेण हि ।अस्वाधीने दुराधर्षे छिद्रज्ञो दानवाधमः

bhānoreva tathāraṇye vasatyavasareṇa hi | asvādhīne durādharṣe chidrajño dānavādhamaḥ

हिन्दी अर्थ

तबसे वह नीच दानव अवसरकी खोजके लिये भानुके ही उपवनमें रहा करता था। भानुका कन्यापुर यद्यपि बड़ा ही दुर्धष था, तथापि उस समय किसी रक्षकके अधीन नहीं था। उसकी इस दुर्बलताको दानवाधम निकुम्भ जानता था; (इसलिये उसे कन्याको हर लेनेका अवसर मिल गया)

अध्याय 145

श्लोक 6

कन्यापुरे महानादः सहसा समुपस्थितः ।तस्यां ह्रियन्त्यां कन्यायां रुदन्त्यां समितिञ्जय

kanyāpure mahānādaḥ sahasā samupasthitaḥ | tasyāṃ hriyantyāṃ kanyāyāṃ rudantyāṃ samitiñjaya

हिन्दी अर्थ

शत्रुविजयी नरेश ! जब उस भानुकुमारीका अपहरण होने लगा और वह रोने-चिल्लाने लगी, उस समय सहसा कन्यापुरमें बड़े जोरसे कोलाहल मच गया

अध्याय 145

श्लोक 7

वसुदेबाहुकौ वीरौ दंशितौ निर्गतावुभौ ।आर्तनादमुपश्रुत्य भानोः कन्यापुरे तदा

vasudebāhukau vīrau daṃśitau nirgatāvubhau | ārtanādamupaśrutya bhānoḥ kanyāpure tadā

हिन्दी अर्थ

भानुके कन्यापुरमें होनेवाले आर्तनादको सुनकर वीर वसुदेव और उग्रसेन दोनों कवच धारण करके तत्काल बाहर निकले

अध्याय 145

श्लोक 8

न दृष्टिगोचरे तौ तु ददृशातेऽपकारिणम् ।तथैव दंशितौ यातौ यत्र कृष्णो महाबलः

na dṛṣṭigocare tau tu dadṛśāte'pakāriṇam | tathaiva daṃśitau yātau yatra kṛṣṇo mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु जहाँतक उनकी दृष्टि गयी, वहाँतक किसी अपराधीको उन्होंने नहीं देखा; फिर वे दोनों उसी तरह कवच बाँधे उस स्थानपर गये, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे

अध्याय 145

श्लोक 9

श्रुतार्थः स्वं विमानं तदारुरोह जनार्दनः ।पार्थेन सहितस्तार्क्ष्यं नागशत्रुमरिन्दमः

śrutārthaḥ svaṃ vimānaṃ tadāruroha janārdanaḥ | pārthena sahitastārkṣyaṃ nāgaśatrumarindamaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके मुखसे द्वारकापुरका सब समाचार सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनके साथ अपने वाहन सर्पशत्रु गरुड़पर आरूढ़ हुए

अध्याय 145

श्लोक 10

रथी त्वमनुगच्छेति सन्दिश्य मकरध्वजम् ।त्वरेति गरुडं वीरः सन्दिदेश च काश्यपम्

rathī tvamanugaccheti sandiśya makaradhvajam | tvareti garuḍaṃ vīraḥ sandideśa ca kāśyapam

हिन्दी अर्थ

फिर वे वीर श्रीकृष्ण प्रद्युप्रको यह आदेश देकर कि तुम रथपर बैठकर मेरे साथ आओ, कश्यपनन्दन गरुड़से बोले, शीघ्रता करो

अध्याय 145

श्लोक 11

वज्रं नगरमायान्तं निकुम्भं रणदुर्जयम् ।पार्थकृष्णौ महात्मानावासेदतुररिन्दमौ

vajraṃ nagaramāyāntaṃ nikumbhaṃ raṇadurjayam | pārthakṛṣṇau mahātmānāvāsedaturarindamau

हिन्दी अर्थ

वर नामक नगरकी ओर जाते हुए रणदुर्जय निकुम्भको शत्रुओंका दमन करनेवाले महात्मा अर्जुन और श्रीकृष्णने स्तेमें ही पा लिया

अध्याय 145

श्लोक 12

प्रद्युम्नश्च महातेजा मायिनां प्रवरो नृप ।निकुम्भश्चाथ तान् दृष्ट्वा त्रिधाऽऽत्मानमथाकरोत्

pradyumnaśca mahātejā māyināṃ pravaro nṛpa | nikumbhaścātha tān dṛṣṭvā tridhā''tmānamathākarot

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! मायावियोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी प्रद्युप्न भी उसके पास जा पहुँचे। निकुम्भने उन तीनोंको देखकर अपने तीन रूप बना लिये

अध्याय 145

श्लोक 13

तान् सर्वान् योधयामास निकुम्भः प्रहसन्निव ।बहुकण्टकगुर्वीभिर्गदाभिरमरोपमः

tān sarvān yodhayāmāsa nikumbhaḥ prahasanniva | bahukaṇṭakagurvībhirgadābhiramaropamaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ देवोपम वीर निकुम्भ अनेक काँटोंसे भरी हुई भारी गदाके द्वारा उन सबके साथ हँसता हुआ-सा युद्ध करने लगा

अध्याय 145

श्लोक 14

सव्येनालम्ब्य हस्तेन कन्यां भानुमतीं नृप ।दक्षिणेनाथ हस्तेन गदया प्राहरत् पुनः

savyenālambya hastena kanyāṃ bhānumatīṃ nṛpa | dakṣiṇenātha hastena gadayā prāharat punaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेधर! बायें हाथसे यादवकन्या भानुमतीको पकड़कर (उसे ढालकी भाँति सामने रखकर) तरह दाहिने हाथसे बारम्बार गदाका प्रहार करता था

अध्याय 145

श्लोक 15

कन्यार्थं न च कृष्णौ वा कामो वा नृपसत्तम ।निर्दयं प्रहरन्ति स्म निकुम्भे च महासुरे

kanyārthaṃ na ca kṛṣṇau vā kāmo vā nṛpasattama | nirdayaṃ praharanti sma nikumbhe ca mahāsure

हिन्दी अर्थ

पश्रेष्ठ ! कन्याकी रक्षाके लिये ही श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा ्युम्न उस निकुम्भ नामक महान्‌ असुरपर निर्दयतापूर्वक हार नहीं करते थे

अध्याय 145

श्लोक 16

समर्थास्ते महात्मानः शत्रुं हन्तुं दुरासदाः ।निशश्वसुर्नरपते दयाभारावपीडिताः

samarthāste mahātmānaḥ śatruṃ hantuṃ durāsadāḥ | niśaśvasurnarapate dayābhārāvapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! वे दुर्जय महात्मा इस शत्रुका वध करनेमें सर्वथा समर्थ थे तो भी दयाके परसे दबे होनेके कारण वे निःश्चास लेकर रह जाते पे

अध्याय 145

श्लोक 17

श्रेष्ठो धनुष्मतां पार्थः सर्वथा कुशलो युधि ।नागोष्ट्रविधिना दैत्यं शरपङ्क्त्या जघान ह

śreṣṭho dhanuṣmatāṃ pārthaḥ sarvathā kuśalo yudhi | nāgoṣṭravidhinā daityaṃ śarapaṅktyā jaghāna ha

हिन्दी अर्थ

धनुधरियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन युद्धमें सर्वथा कुशल पे; अत: वे नगिोष्ट-विधिसे अपने बाणसमूहद्वारा उस त्यको घायल करने लगे

अध्याय 145

श्लोक 18

ते तु वैतस्तिकैर्बाणैर्विविधान् दानवान् युधि ।न कन्यां कलया युक्त्या शिक्षया च महीपते

te tu vaitastikairbāṇairvividhān dānavān yudhi | na kanyāṃ kalayā yuktyā śikṣayā ca mahīpate

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ ! वे श्रीकृष्ण भादि वीर अपनी कला, युक्ति और शिक्षाके प्रभावसे [क-एक बित्तेके बाणोंद्वारा नाना प्रकारके दानवोंको उस युद्धमें घायल करते थे; किंतु राजकन्याको चोट नहीं नगने देते थे

अध्याय 145

श्लोक 19

ततः स कन्यया सार्द्ध तत्रैवान्तरधीयत ।आसुरीमाश्रितो मायां न च तां वेत्ति कश्चन

tataḥ sa kanyayā sārddha tatraivāntaradhīyata | āsurīmāśrito māyāṃ na ca tāṃ vetti kaścana

हिन्दी अर्थ

तब वह आसुरी मायाका आश्रय नेकर कन्याके साथ वहीं अन्तर्धान हो गया। उस पयाको उन तीनोंमेंसे कोई नहीं जानता था

अध्याय 145

श्लोक 20

तं कृष्णौ रौक्मिणेयश्च पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ।हारितः शकुनो भूत्वा तस्थावथ महासुरः

taṃ kṛṣṇau raukmiṇeyaśca pṛṣṭhato'nuyayustadā | hāritaḥ śakuno bhūtvā tasthāvatha mahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युप्न तीनोंने ही तत्काल उस शनवका पीछा किया। आगे जाकर वह महान्‌ असुर गरित पक्षी होकर बैठ गया

अध्याय 145

श्लोक 21

तं बाणैः पुनरेवाथ वीरो भूयो धनञ्जयः ।वैतस्तिकैर्मर्मभिद्भिः कन्यां रक्षन्नताडयत्

taṃ bāṇaiḥ punarevātha vīro bhūyo dhanañjayaḥ | vaitastikairmarmabhidbhiḥ kanyāṃ rakṣannatāḍayat

हिन्दी अर्थ

शरीरपर अजगर सर्प लिपट गया था। यह देख किसी धनुर्धर र तो मारा गया, किंतु ऊँट बाल-बाल बच गया। यही नागोष्ट- थे, किंतु कन्याके शरीरपर आँच नहीं आने देते थे। तब वीर धनज्यने पुनः: कन्याकी रक्षा करते हुए वैतस्तिक नामक मर्मभेदी बाणोंद्वारा उस दैत्यपर प्रहार किया

अध्याय 145

श्लोक 22

स इमां पृथिवीं कृत्स्नां सप्तद्वीपां महासुरः ।बभ्रामानुगतश्चैव तैर्वीरैररिमर्दनः

sa imāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ saptadvīpāṃ mahāsuraḥ | babhrāmānugataścaiva tairvīrairarimardanaḥ

हिन्दी अर्थ

तब वह शत्रुमर्दन महान्‌ असुर इस सात ट्वीपोंसे युक्त सारी पृथ्वीपर चक्कर लगाने लगा और वे गीनों वीर निरन्तर उसका पीछा करते रहे

अध्याय 145

श्लोक 23

गोकर्णस्योपरिष्टात्तु पर्वतस्य महासुरः ।पपात वेलां गङ्गायाः पुलिने सह कन्यया

gokarṇasyopariṣṭāttu parvatasya mahāsuraḥ | papāta velāṃ gaṅgāyāḥ puline saha kanyayā

हिन्दी अर्थ

वह महान्‌ असुर जब गोकर्ण पर्वतके ऊपरसे होकर निकलने लगा, उस समय कन्यासहित गड़ातटपर समुद्रके किनारे गेर पड़ा

अध्याय 145

श्लोक 24

न देवा नासुराश्चापि लङ्घयन्ति तपोधनाः ।गोकर्णं तेजसा गुप्तं महादेवस्य भारत

na devā nāsurāścāpi laṅghayanti tapodhanāḥ | gokarṇaṃ tejasā guptaṃ mahādevasya bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! गोकर्ण पर्वत महादेवजीके नेजसे सुरक्षित है। उसे देवता, असुर तथा तपोधन महर्षि भी नहीं लाँघ सकते हैं

अध्याय 145

श्लोक 25

एतदन्तरमासाद्य प्रद्युम्नः शीघ्रविक्रमः ।कन्यां भानुमतीं भैमो जग्राह रणदुर्जयः

etadantaramāsādya pradyumnaḥ śīghravikramaḥ | kanyāṃ bhānumatīṃ bhaimo jagrāha raṇadurjayaḥ

हिन्दी अर्थ

यह अवसर पाकर भीमकुलभूषण शीघ्रपराक्रमी रणदुर्जय वीर प्रद्युक्नने उस कन्या भानुमतीको अपने साथ ले लिया

अध्याय 145

श्लोक 26

असुरः सोऽर्दितो राजन् कृष्णाभ्यां निशितैः शरैः ।त्यक्त्वाथोत्तरगोकर्णं निकुम्भो दक्षिणां दिशम् ।जगाम पृष्ठतो यातौ कृष्णौ तार्क्ष्यगतौ तदा

asuraḥ so'rdito rājan kṛṣṇābhyāṃ niśitaiḥ śaraiḥ | tyaktvāthottaragokarṇaṃ nikumbho dakṣiṇāṃ diśam | jagāma pṛṣṭhato yātau kṛṣṇau tārkṣyagatau tadā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! श्रीकृष्ण और अर्जुनद्वारा तीखे बाणोंसे पीड़ित किया गया भसुर निकुम्भ उत्तर गोकर्णको त्यागकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया। गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन भी उस समय उसके पीछे-पीछे गये

अध्याय 145

श्लोक 27

विवेश षट्पुरं चैव ज्ञातीनामालयं तदा ।तत्र वीरौ गुहाद्वारि कृष्णौ रात्रै तदोषतुः

viveśa ṣaṭpuraṃ caiva jñātīnāmālayaṃ tadā | tatra vīrau guhādvāri kṛṣṇau rātrai tadoṣatuḥ

हिन्दी अर्थ

निकुम्भ अपने सजातीय बन्धुओंके निवासस्थान षट्पुरमें जा घुसा । श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीर रातमें वहाँ गुफाके द्वारपर बैठे रहे

अध्याय 145

श्लोक 28

रौक्मिणेयोऽपि कृष्णेन सन्दिष्टो द्वारकां पुरीम् ।अनयद् भानुतनया प्रहृष्टेनान्तरात्मना

raukmiṇeyo'pi kṛṣṇena sandiṣṭo dvārakāṃ purīm | anayad bhānutanayā prahṛṣṭenāntarātmanā

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर रुक्मिणीनन्दन युम्नने प्रसन्न-मनसे भानुकुमारी भानुमतीको द्वारकापुरीमें हुँचा दिया

अध्याय 145

श्लोक 29

नयित्वा चाययौ वीरः षट्पुरं दानवाकुलम् ।ददर्श च गुहाद्वारि कृष्णौ भीमपराक्रमौ

nayitvā cāyayau vīraḥ ṣaṭpuraṃ dānavākulam | dadarśa ca guhādvāri kṛṣṇau bhīmaparākramau

हिन्दी अर्थ

उसे पहुँचाकर वीर प्र्युम्न पुनः दानवोंसे भरे हुए षट्पुरमें आये और वहाँ गुफाके द्वारपर भयंकर पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनसे मिले

अध्याय 145

श्लोक 30

ऊषतुर्द्वारमाक्रम्य षटपुरस्य महाबलौ ।कृष्णौ प्रद्युम्नसहितौ निकुम्भवधकाङ्क्षक्षिणौ

ūṣaturdvāramākramya ṣaṭapurasya mahābalau | kṛṣṇau pradyumnasahitau nikumbhavadhakāṅkṣakṣiṇau

हिन्दी अर्थ

निकुम्भके त्धकी इच्छा रखनेवाले महाबली श्रीकृष्ण और अर्जुन ््युम्नके साथ षट्पुरका दरवाजा घेरकर बैठे थे

अध्याय 145

श्लोक 31

ततोऽनन्तरमेतस्माद् बिलादतिबलस्तदा ।निर्जगाम बली योद्धुं निकुम्भो भीमविक्रमः

tato'nantarametasmād bilādatibalastadā | nirjagāma balī yoddhuṃ nikumbho bhīmavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

दनन्तर भयंकर पराक्रमी अत्यन्त बलशाली बली निकुम्भ पुद्धके लिये उस बिलसे बाहर निकला

अध्याय 145

श्लोक 32

तस्य निर्गच्छतस्तस्माद् बिलात्पार्थो विशाम्पते ।रुरोध सर्वतो मार्गं शरैर्गाण्डीवनिःसृतैः

tasya nirgacchatastasmād bilātpārtho viśāmpate | rurodha sarvato mārgaṃ śarairgāṇḍīvaniḥsṛtaiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ ! इस बिलसे निकलते समय निकुम्भके मार्गको आअर्जुनने एण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा चारों ओरसे अवरुद्ध कर दिया

अध्याय 145

श्लोक 33

सोऽभिसृत्य गदां घोरामुद्यम्य बहुकण्टकाम् ।शिरस्यताडयत् पार्थं निकुम्भो बलिनां वरः

so'bhisṛtya gadāṃ ghorāmudyamya bahukaṇṭakām | śirasyatāḍayat pārthaṃ nikumbho balināṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

तब बलवानोंमें श्रेष्ठ निकुम्भने निकट भाकर बहुतेरे कण्टकोंसे भरी हुई अपनी भयानक गदाकों ठाकर अर्जुनके मस्तकपर दे मारा

अध्याय 145

श्लोक 34

अदृष्टेनाहतो वीरः शिरस्यथ मुमोह सः ।गदयाभिहते पार्थे रक्तं वमति मुह्यति

adṛṣṭenāhato vīraḥ śirasyatha mumoha saḥ | gadayābhihate pārthe raktaṃ vamati muhyati

श्लोक 34–35 का हिन्दी अर्थ

उसने अदृश्य हकर यह आघात किया था। सिरपर गदाकी चोट पड़नेसे और अर्जुन मूर््छित हो गये । वे रक्त वमन करते हुए जब भचेत हो गये, तब उस घमंडी एवं मायावी असुरने सकर मायावियोंमें श्रेष्ठ वीर रुक्मिणीकुमारको चोट पहुँचायी । ते पूर्वाभिमुख होकर खड़े थे; अत: उस असुरको उन्होंने देखा नहीं था। उस अदृश्य असुरके द्वारा सिरपर आघात ीनेसे वीर प्रद्युम्नको भी मूर्च्छां आ गयी

अध्याय 145

श्लोक 35

हसित्वा सोऽसुरो दृप्तो रौक्मिणेयमताडयत् ।तं प्राङ्मुखमुखं वीरं मायावी मायिनां वरम् ।अदृष्टेनाहतो वीरः शिरस्यथ मुमोह सः

hasitvā so'suro dṛpto raukmiṇeyamatāḍayat | taṃ prāṅmukhamukhaṃ vīraṃ māyāvī māyināṃ varam | adṛṣṭenāhato vīraḥ śirasyatha mumoha saḥ

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 145

श्लोक 36

तयागतौ तु दृष्ट्वा तौ मुह्यमानौ सुताडितौ ।अभिदुद्राव गोविन्दो निकुम्भं क्रोधमूर्छितः

tayāgatau tu dṛṣṭvā tau muhyamānau sutāḍitau | abhidudrāva govindo nikumbhaṃ krodhamūrchitaḥ

श्लोक 36–38 का हिन्दी अर्थ

भारी आघातसे पीड़ित हो अचेत पड़े हुए उन दोनों वीरोंको देखकर भगवान्‌ श्रीकृष्णका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे गदके बड़े भाई गोविन्द कौमोदकी गदा उठाकर निकुम्भकी ओर दौड़े। वे दोनों दुर्धष वीर गर्जना करते हुए एक-दूसरेपर टूट पड़े। ऐरावतपर बैठे हुए इन्द्र समस्त देवताओंके साथ आकर उस समय देवताओं और असुरोंके उस घोर महायुद्धको देखने लगे

अध्याय 145

श्लोक 37

कौमोदकीं समुद्यम्य गदपूर्वोद्भवो गदाम् ।तावन्योन्यं दुराधर्षौ गर्जन्तावभिपेततुः

kaumodakīṃ samudyamya gadapūrvodbhavo gadām | tāvanyonyaṃ durādharṣau garjantāvabhipetatuḥ

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 145

श्लोक 38

ऐरावतगतः शक्रः सर्वैर्देवगणैः सह ।ददर्श तन्महायुद्धं घोरं देवासुरं तदा

airāvatagataḥ śakraḥ sarvairdevagaṇaiḥ saha | dadarśa tanmahāyuddhaṃ ghoraṃ devāsuraṃ tadā

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 145

श्लोक 39

दृष्ट्वा देवान् हृषीकेशश्चित्रैर्युद्धैररिन्दमः ।इयेष दानवं हन्तुं देवानां हितकाम्यया

dṛṣṭvā devān hṛṣīkeśaścitrairyuddhairarindamaḥ | iyeṣa dānavaṃ hantuṃ devānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

देवताओंको देखकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्णने उनके हितकी कामनासे विचित्र पुद्धोंद्वारा उस दानवको मार डालनेकी इच्छा की

अध्याय 145

श्लोक 40

स मण्डलानि चित्राणि दर्शयामास केशवः ।कौमोदकीं महाबाहुर्लालयन् युद्धकोविदः

sa maṇḍalāni citrāṇi darśayāmāsa keśavaḥ | kaumodakīṃ mahābāhurlālayan yuddhakovidaḥ

हिन्दी अर्थ

पुद्धकलाकोविद ॒महाबाहु श्रीकृष्ण अपनी कौमोदकी गदाका लालन करते हुए विचित्र मण्डल (पैंतरे ) दिखाने नगे

अध्याय 145

श्लोक 41

तथैवासुरमुख्योऽपि गदां तां बहुकण्टकाम् ।शिक्षया भ्रामयाणोऽथ मण्डलानि चचार ह

tathaivāsuramukhyo'pi gadāṃ tāṃ bahukaṇṭakām | śikṣayā bhrāmayāṇo'tha maṇḍalāni cacāra ha

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार असुरोंमें श्रेष्ठ निकुम्भ भी अपनी बरहुत-से कण्टकोंवाली गदाको शिक्षाके अनुसार घुमाता हुआ पैंतरे दिखाने लगा

अध्याय 145

श्लोक 42

वृषभाविव गर्जन्तौ बृहन्ताविव कुञ्जरौ ।इषितान्तरमासाद्य क्रुद्धौ शालावृकाविव

vṛṣabhāviva garjantau bṛhantāviva kuñjarau | iṣitāntaramāsādya kruddhau śālāvṛkāviva

हिन्दी अर्थ

जैसे वासिता—मैथुनकी च्छावाली गायको अपने बीचमें पाकर दो साँड हँकड़ते हुए आपसमें लड़ते हैं; जैसे वासिता हथिनीके लिये दो हाथी चिग्घाड़ते हुए परस्पर युद्ध करते हैं तथा जैसे दो पेड़िये किसी माँदा भेड़ियाके लिये परस्पर जूझते हैं, उसी प्रकार वे श्रीकृष्ण और निकुम्भ क्रोधमें भरकर एक-दूसरेसे भिड़े हुए थे

अध्याय 145

श्लोक 43

आजघान निकुम्भस्तु गदया गदपूर्वजम् ।स्पष्टाष्टघण्टया वीर नादं मुक्त्वातिदारुणम्

ājaghāna nikumbhastu gadayā gadapūrvajam | spaṣṭāṣṭaghaṇṭayā vīra nādaṃ muktvātidāruṇam

हिन्दी अर्थ

वीर नरेश! निकुम्भने ्रत्यन्त भयंकर सिंहनाद करके जिसमें आठ घण्टियाँ पष्ट दिखायी देती थीं, ऐसी गदाके द्वारा भगवान्‌ गदाग्रजपर भाघात किया

अध्याय 145

श्लोक 44

तत्कालमेव कृष्णोऽपि भ्रामयित्वा महागदाम् ।निकुम्भमूर्द्धनि तदा पातयामास भारत

tatkālameva kṛṣṇo'pi bhrāmayitvā mahāgadām | nikumbhamūrddhani tadā pātayāmāsa bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! भगवान्‌ श्रीकृष्णने त्काल ही अपनी विशाल गदा घुमाकर उस समय नकुम्भके मस्तकपर दे मारी

अध्याय 145

श्लोक 45

अवष्टभ्य मुहूर्तं तु हरिः कौमोदकीं गदाम् ।तस्थौ जगद्गुरुर्धीमान् मुमोह पतितः क्षितौ

avaṣṭabhya muhūrtaṃ tu hariḥ kaumodakīṃ gadām | tasthau jagadgururdhīmān mumoha patitaḥ kṣitau

हिन्दी अर्थ

उस समय बुद्धिमान्‌ नगदूगुरु भगवान्‌ श्रीकृष्ण दो घड़ीतक कौमोदकी गदाकों पामे हुए खड़े रहे। तत्पश्चात्‌ (अपनी ही इच्छासे) ूर््छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े

अध्याय 145

श्लोक 46

हाहाभूतं जगत् सर्वं तत्कालमभवत् तदा ।तथागते वासुदेवे नरदेव महात्मनि

hāhābhūtaṃ jagat sarvaṃ tatkālamabhavat tadā | tathāgate vāsudeve naradeva mahātmani

हिन्दी अर्थ

नरदेव ! उस समय हहात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी वैसी अवस्था हो जानेपर तत्काल सारे जगत्‌में हाहाकार मच गया

अध्याय 145

श्लोक 47

आकाशगङ्गातोयेन शीतेन च सुगन्धिना ।सिषेचामृतमिश्रेण कृष्णं देवेश्वरः स्वयम्

ākāśagaṅgātoyena śītena ca sugandhinā | siṣecāmṛtamiśreṇa kṛṣṇaṃ deveśvaraḥ svayam

हिन्दी अर्थ

स्वयं वेश्वर इन्द्रने अमृतमिश्रित आकाशगड़ाके शीतल एवं ुगन्धित जलसे श्रीकृष्णका अभिषेक किया

अध्याय 145

श्लोक 48

नूनमात्मेच्छया कृष्णस्तथा चक्रे सुरोत्तमः ।को हि शक्तो महात्मानं युद्धे मोहयितुं हरिम्

nūnamātmecchayā kṛṣṇastathā cakre surottamaḥ | ko hi śakto mahātmānaṃ yuddhe mohayituṃ harim

हिन्दी अर्थ

नेश्रय ही सुर्रेष्ठ श्रीकृष्णने अपनी इच्छासे ही ऐसा मूर््छाका अभिनय) किया था; अन्यथा युद्धमें उन हहात्मा श्रीहरिको मूर्च्छित कर देनेकी शक्ति किसमें 2

अध्याय 145

श्लोक 49

कृष्णः प्रत्यागतप्राणश्चक्रमुद्यम्य भारत ।प्रतीच्छेति दुरात्मानमुवाच रिपुनाशनः

kṛṣṇaḥ pratyāgataprāṇaścakramudyamya bhārata | pratīccheti durātmānamuvāca ripunāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! सचेत होनेपर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने क्र उठाकर उस दुरात्मासे कहा-'अरे! अब इस रक्रकी चोट सहन कर

अध्याय 145

श्लोक 50

निकुम्भोऽप्यतिमायावी उत्पपात दुरासदः ।शरीरं तत् परित्यज्य न तु तं वेत्ति केशवः

nikumbho'pyatimāyāvī utpapāta durāsadaḥ | śarīraṃ tat parityajya na tu taṃ vetti keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

उनकी यह बात सुनकर अत्यन्त मायावी दुर्जय वीर निकुम्भ भी अपने उस शरीरको वहीं त्यागकर ऊपरकी ओर उड़ गया। श्रीकृष्णको उसकी इस चालका पता न लगा

अध्याय 145

श्लोक 51

मुमूर्षति मृतो वायमिति मत्वा जनार्दनः ।ररक्ष स्मरमाणोऽथ वीरो वीरव्रतं विभो

mumūrṣati mṛto vāyamiti matvā janārdanaḥ | rarakṣa smaramāṇo'tha vīro vīravrataṃ vibho

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! यह मरना चाहता है अथवा मर गया है—ऐसा समझकर वीर-व्रतका स्मरण रखते हुए वीर जनार्दनने उसकी रक्षा की (गिरे हुए उस दानवके शरीरपर अपना अस्त्र नहीं चलाया)

अध्याय 145

श्लोक 52

अथ प्रद्युम्नकौन्तेयावागतौ लब्धचेतनौ ।स्थितौ नारायणाभ्याशे निकुम्भवधनिश्चितौ

atha pradyumnakaunteyāvāgatau labdhacetanau | sthitau nārāyaṇābhyāśe nikumbhavadhaniścitau

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर प्रद्युम्न और अर्जुन दोनों सचेत हो श्रीकृष्णके निकट आकर खड़े हो गये। उन दोनोंने निकुम्भके वधका निश्चय कर लिया था

अध्याय 145

श्लोक 53

प्रद्युम्नोऽप्यथ मायावी विदितः कृष्णमब्रवीत् ।निकुम्भस्तात नास्त्यत्र गतः क्वापि सुदुर्मतिः

pradyumno'pyatha māyāvī viditaḥ kṛṣṇamabravīt | nikumbhastāta nāstyatra gataḥ kvāpi sudurmatiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रद्युम्न भी मायावी थे; अत: उन्होंने निकुम्भकी मायाको पहचान लिया और श्रीकृष्णसे कहा-'तात! निकुम्भ यहाँ नहीं है। वह दुर्बुद्धि कहीं चला गया'

अध्याय 145

श्लोक 54

प्रद्युम्नेनैवमुक्ते तु तन्ननाश कलेवरम् ।प्रजहासाथ भगवानर्जुनेन सह प्रभुः

pradyumnenaivamukte tu tannanāśa kalevaram | prajahāsātha bhagavānarjunena saha prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

प्रद्युमषके इतना कहते ही निकुम्भका वह कलेवर अदृश्य हो गया। यह देख अर्जुनके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे

अध्याय 145

श्लोक 55

तदायुतसहस्राणि निकुम्भानां जनाधिप ।ददृशुस्ते ततो वीराः क्षितौ दिवि च सर्वतः

tadāyutasahasrāṇi nikumbhānāṃ janādhipa | dadṛśuste tato vīrāḥ kṣitau divi ca sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! इतनेहीमें उन वीरोंने पृथ्वीपर, आकाशमें तथा सब ओर सहस्रों अयुत (एक करोड़) निकुम्भके शरीर देखे

अध्याय 145

श्लोक 56

सहस्राण्येव कृष्णं तु तथा पार्थमरिन्दम ।रौक्मिणेयं तथा वीरं तदद्भुतमिवाभवत्

sahasrāṇyeva kṛṣṇaṃ tu tathā pārthamarindama | raukmiṇeyaṃ tathā vīraṃ tadadbhutamivābhavat

हिन्दी अर्थ

शत्रुदमन नरेश ! श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्यु्रके भी सहसत्रं शरीर दिखायी दिये। वह अद्धुत-सा दृश्य प्रकट हुआ

अध्याय 145

श्लोक 57

पाण्डवस्य धनुः केचित्केचिदस्य महाशरान् ।अन्येऽस्य जगृहुर्हस्तावन्ये पादौ महासुराः

pāṇḍavasya dhanuḥ kecitkecidasya mahāśarān | anye'sya jagṛhurhastāvanye pādau mahāsurāḥ

हिन्दी अर्थ

किन्हीं महान्‌ू असुरोंने अर्जुनका धनुष ले लिया, किन्हींने उनके बड़े-बड़े बाण छीन लिये, दूसरोंने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये और अन्य असुरोंने उनके दोनों पैर

अध्याय 145

श्लोक 58

एवं ग्रहाय तं वीरमगमंस्ते विहायसि ।पार्थानामपि कोट्यस्तु गृहीतानां तदाभवन्

evaṃ grahāya taṃ vīramagamaṃste vihāyasi | pārthānāmapi koṭyastu gṛhītānāṃ tadābhavan

हिन्दी अर्थ

इस तरह वीर अर्जुनको पकड़कर वे सब आकाशमें ले गये; फिर उन असुरोंद्वारा पकड़े गये अर्जुनके करोड़ों रूप हो गये

अध्याय 145

श्लोक 59

नान्तं ददर्श कृष्णश्च कार्ष्णिश्च रिपुनाशनौ ।विच्छिद्य तौ शरैर्वीरौ निकुम्भं पार्थवर्जितौ

nāntaṃ dadarśa kṛṣṇaśca kārṣṇiśca ripunāśanau | vicchidya tau śarairvīrau nikumbhaṃ pārthavarjitau

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण और प्रद्युम्न दोनों वीरोंने पार्थसे रहित हो अपने बाणोंसे निकुम्भको काट डाला तो भी उसका अन्त होता नहीं देखा

अध्याय 145

श्लोक 60

एकैकस्तु द्विधा च्छिन्नो द्वेधा भवति भारत ।दिव्यज्ञानस्तदा कृष्णो भगवाननुदृष्टवान्

ekaikastu dvidhā cchinno dvedhā bhavati bhārata | divyajñānastadā kṛṣṇo bhagavānanudṛṣṭavān

हिन्दी अर्थ

भारत ! एक-एक निकुम्भके दो टुकड़े कर देनेपर वह एकसे दो रूप धारण कर लेता था। उस समय दिव्यज्ञानसम्पन्न भगवान्‌ श्रीकृष्णने बारम्बार उसके विषयमें विचार किया

अध्याय 145

श्लोक 61

निकुम्भं तत्त्वतश्चापि ददर्श मधुसूदनः ।स्रष्टारं सर्वमायानां हर्तारं फाल्गुनस्य च

nikumbhaṃ tattvataścāpi dadarśa madhusūdanaḥ | sraṣṭāraṃ sarvamāyānāṃ hartāraṃ phālgunasya ca

हिन्दी अर्थ

तब भगवान्‌ मधुसूदनने सम्पूर्ण मायाओंके ख्रष्टा तथा अर्जुनका अपहरण करनेवाले निकुम्भको यथार्थ रूपसे देखा

अध्याय 145

श्लोक 62

स चक्रेण शिरस्तस्य चकर्तासुरसूदनः ।पश्यतां सर्वभूतानां भूतभव्यभवो हरिः

sa cakreṇa śirastasya cakartāsurasūdanaḥ | paśyatāṃ sarvabhūtānāṃ bhūtabhavyabhavo hariḥ

हिन्दी अर्थ

भूत, वर्तमान और भविष्यको उत्पन्न करनेवाले असुरसूदन श्रीहरिने समस्त प्राणियोंके देखते-देखते अपने चक्रसे निकुम्भका सिर काट लिया

अध्याय 145

श्लोक 63

स मुक्त्वा फाल्गुनं राजञ्छिन्ने शिरसि भारत ।पपातासुरमुख्योऽथ च्छिन्नमूल इव द्रुमः

sa muktvā phālgunaṃ rājañchinne śirasi bhārata | papātāsuramukhyo'tha cchinnamūla iva drumaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! भरतनन्दन! सिर कट जानेपर वह मुख्य असुर अर्जुनको छोड़कर जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा

अध्याय 145

श्लोक 64

अथाकाशगतं पार्थं पतमानं विहायसः ।कृष्णवाक्येन जग्राह कार्ष्णिर्वियति मानद

athākāśagataṃ pārthaṃ patamānaṃ vihāyasaḥ | kṛṣṇavākyena jagrāha kārṣṇirviyati mānada

हिन्दी अर्थ

मानद! उस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे प्रद्यु्नने आकाशमें पहुँचकर वहाँसे गिरते हुए अर्जुनको पकड़ लिया

अध्याय 145

श्लोक 65

निकुम्भे पतिते भूमौ समाश्वास्य धनञ्जयम् ।जगाम द्वारकां देवः पार्थकामसमन्वितः

nikumbhe patite bhūmau samāśvāsya dhanañjayam | jagāma dvārakāṃ devaḥ pārthakāmasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

निकुम्भके धराशायी हो जानेपर अर्जुनको आश्वासन दे उनके और प्रद्युम्मके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण द्वारकाको चले गये

अध्याय 145

श्लोक 66

समियाय दशार्होऽथ द्वारकां मुदितो विभुः ।नारदं च महात्मानं ववन्दे यदुनन्दनः

samiyāya daśārho'tha dvārakāṃ mudito vibhuḥ | nāradaṃ ca mahātmānaṃ vavande yadunandanaḥ

हिन्दी अर्थ

दशार्हवंशी यदुकुलनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्वारकामें पदार्पण किया और वहाँ महात्मा नारदजीको मस्तक झुकाया

अध्याय 145

श्लोक 67

नारदोऽथ महातेजा भानुं यादवमब्रवीत् ।भानो मा कार्षीर्मन्युं त्वं श्रूयतां भैमनन्दन

nārado'tha mahātejā bhānuṃ yādavamabravīt | bhāno mā kārṣīrmanyuṃ tvaṃ śrūyatāṃ bhaimanandana

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने भानु नामक यादवसे कहा—* भैमनन्दन! भानो! कन्याका अपहरण होनेके कारण मनमें खेद न करो | मेरी बात सुनो

अध्याय 145

श्लोक 68

क्रीडन्त्या रैवतोद्याने दुर्वासाः कोपितोऽनया ।स शशाप ततो रोषान्मुनिर्दुहितरं तव

krīḍantyā raivatodyāne durvāsāḥ kopito'nayā | sa śaśāpa tato roṣānmunirduhitaraṃ tava

हिन्दी अर्थ

यह भानुमती किसी दिन रैवतवनके उद्यानमें खेल रही थी। वहाँ इसने दुर्वासा मुनिको क्रोध दिला दिया। तब मुनिने क्रोधवश आपकी पुत्रीको शाप दे दिया—

अध्याय 145

श्लोक 69

अतिदुर्ललितैः कन्या शत्रुहस्तं गमिष्यति ।सुतार्थे ते मया सार्द्धं मुनिभिः स प्रसादितः

atidurlalitaiḥ kanyā śatruhastaṃ gamiṣyati | sutārthe te mayā sārddhaṃ munibhiḥ sa prasāditaḥ

श्लोक 69–70 का हिन्दी अर्थ

यह कन्या अपनी दुर्ललित चेष्टाओंसे शत्रुके हाथमें पड़ जायगी।' उस समय मैंने तथा दूसरे पुनियोंने आपकी इस पुत्रीके लिये दुर्वासाकों प्रसन्न किया और कहा-“मुने! यह बाला ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाली कन्या है। इसने आपका कोई अपराध भी नहीं किया है; फिर आपने इसे कैसे शाप दे दिया ? धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मज्ञ महर्षे! इस कन्यापर अनुग्रह कीजिये । इसके लिये हमलोग यहाँ प्रार्थना करते हें '

अध्याय 145

श्लोक 70

बालां व्रतवतीं कन्यामनागसमिमां मुने ।शप्तवानसि धर्मज्ञ कथं धर्मभृतां वर ।अनुग्रहं विधत्स्वात्र वयं विज्ञापयामहे

bālāṃ vratavatīṃ kanyāmanāgasamimāṃ mune | śaptavānasi dharmajña kathaṃ dharmabhṛtāṃ vara | anugrahaṃ vidhatsvātra vayaṃ vijñāpayāmahe

अर्थ श्लोक 69 के साथ

अध्याय 145

श्लोक 71

अस्माभिरेवमुक्तस्तु दुर्वासा भैमनन्दन ।उवाचाधोमुखो भूत्वा मुहूर्तं कृपयान्वितः

asmābhirevamuktastu durvāsā bhaimanandana | uvācādhomukho bhūtvā muhūrtaṃ kṛpayānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

भैमनन्दन ! हमारे ऐसा कहनेपर दुर्वासाजी पीचे मुँह किये दो घड़ीतक मौन रहे; फिर दयापूर्वक ब्रोले—

अध्याय 145

श्लोक 72

यदवोचमहं वाक्यं तत् तथा न तदन्यथा ।रिपुहस्तमवश्यं हि गमिष्यति न संशयः

yadavocamahaṃ vākyaṃ tat tathā na tadanyathā | ripuhastamavaśyaṃ hi gamiṣyati na saṃśayaḥ

श्लोक 72–73 का हिन्दी अर्थ

महर्षियो! मैंने जो बात कही है, वह उसी तरह होगी। उसे कोई बदल नहीं सकता। यह शन्नुके हाथमें अवश्य पड़ेगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु पह भी निश्चय है कि यह दूषित नहीं होने पायगी और धर्मके अनुसार पतिको प्राप्त करेगी । इसके बहुत-से पुत्र होंगे। यह बहुत धनसे सम्पन्न और सौभाग्यवती होगी

अध्याय 145

श्लोक 73

अदूषिता नु धर्मेण भर्तारमुपलप्स्यति ।बहुपुत्रा बहुधना सुभगा च भविष्यति

adūṣitā nu dharmeṇa bhartāramupalapsyati | bahuputrā bahudhanā subhagā ca bhaviṣyati

अर्थ श्लोक 72 के साथ

अध्याय 145

श्लोक 74

सुगन्धगन्धा च सदा कुमारी च पुनः पुनः ।न च शोकमिमं घोरं तन्वङ्गी धारयिष्यति

sugandhagandhā ca sadā kumārī ca punaḥ punaḥ | na ca śokamimaṃ ghoraṃ tanvaṅgī dhārayiṣyati

हिन्दी अर्थ

इसके शरीरकी गन्ध सदा सुगन्धित होगी। यह पति-समागमके पश्चात्‌ बारम्बार कुमारी ही बनी रहेगी। इस कृशाड़ी कन्याको अपने अपहरण- जनित घोर शोकका स्मरण नहीं रहेगा''

अध्याय 145

श्लोक 75

एवं भानुमती वीर सहदेवाय दीयताम् ।श्रद्दधानः स शूरश्च धर्मशीलश्च पाण्डवः

evaṃ bhānumatī vīra sahadevāya dīyatām | śraddadhānaḥ sa śūraśca dharmaśīlaśca pāṇḍavaḥ

हिन्दी अर्थ

वीर मानो! तुम मेरी बात मानकर भानुमतीका सहदेवके पाथ ब्याह कर दो; क्योंकि पाण्डुपुत्र सहदेव श्रद्धालु, ग्रवीर तथा धर्मशील हैं ''

अध्याय 145

श्लोक 76

ततो भानुमतीं भानुर्ददौ माद्रीसुताय वै ।सहदेवाय धर्मात्मा नारदस्य वचः स्मरन्

tato bhānumatīṃ bhānurdadau mādrīsutāya vai | sahadevāya dharmātmā nāradasya vacaḥ smaran

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर नारदजीके तचनोंको याद रखते हुए धर्मात्मा भानुने अपनी कन्या पानुमती माद्रीकुमार सहदेवको दे दी

अध्याय 145

श्लोक 77

आनीतः सहदेवश्च प्रेषितश्चक्रपाणिना ।विवाहे च तदा वृत्ते सभार्यः स पुरीं गतः

ānītaḥ sahadevaśca preṣitaścakrapāṇinā | vivāhe ca tadā vṛtte sabhāryaḥ sa purīṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

मो$ध्याय: + ७२९ चक्रपाणि भगवान्‌ श्रीकृष्णने सहदेवको बुलवाया और उस समय विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर उन्हें पत्नीसहित विदा कर दिया, फिर वे अपनी पुरीको चले गये

अध्याय 145

श्लोक 78

इमं कृष्णस्य विजयं यः पठेच्छृणुयादथ ।विजयं सर्वकृत्येषु श्रद्दधानो लभेन्नरः

imaṃ kṛṣṇasya vijayaṃ yaḥ paṭhecchṛṇuyādatha | vijayaṃ sarvakṛtyeṣu śraddadhāno labhennaraḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान्‌ श्रीकृष्णकी इस विजय-वार्ताको पढ़ेगा या सुनेगा, वह सभी कार्योंमें विजय प्राप्त करेगा

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.