Harivamsha Purana
146
अध्याय 146 / 318

Parva 2, Adhyāya 91

54 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ54 श्लोक

अध्याय 146

श्लोक 1

वज्रनाभस्य तपःकरणं एवं वरप्राप्तिः, तस्य त्रिभुवनविजयाय उद्योगं, इन्द्रस्य श्रीकृष्णेन सह वार्ता, भद्रनामानं नटं मुनिभिः वरदानं, इन्द्रेण हंसानां आवश्यकं कर्तव्यं कथयित्वा वज्रनाभपुरे प्रेषणं भानुमत्यापहरणं विजयं केशवस्य च ।छालिक्यनयनं चैव देवलोकान्महामुने

vajranābhasya tapaḥkaraṇaṃ evaṃ varaprāptiḥ, tasya tribhuvanavijayāya udyogaṃ, indrasya śrīkṛṣṇena saha vārtā, bhadranāmānaṃ naṭaṃ munibhiḥ varadānaṃ, indreṇa haṃsānāṃ āvaśyakaṃ kartavyaṃ kathayitvā vajranābhapure preṣaṇaṃ bhānumatyāpaharaṇaṃ vijayaṃ keśavasya ca | chālikyanayanaṃ caiva devalokānmahāmune

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

पोडध्याय: डा विजयके लिये उद्योग, इद्की श्रीकृष्णसे वार्ता, ' आवश्यक कर्तव्य बताकर वज़नाभपुरमें भेजना जनमेजयने कहा—धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामुने ! भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्णकी विजय, देवलोकसे छालिक्य गान्धर्वका आनयन और अत्यन्त तेजस्वी वृष्णिवंशियोंकी समुद्रमें होनेवाली दिव्यक्रीड़ा—इन सबका अत्यन्त आश्चर्ययुक्त वर्णन मैंने सुना है

अध्याय 146

श्लोक 2

क्रीडां च सागरे दिव्यां वृष्णीनामतितेजसाम् ।अश्रौषं परमाश्चर्यं मुने धर्मभृतां वर

krīḍāṃ ca sāgare divyāṃ vṛṣṇīnāmatitejasām | aśrauṣaṃ paramāścaryaṃ mune dharmabhṛtāṃ vara

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 3

वज्रनाभवधो ह्युक्तो निकुम्भवधकीर्तने ।तन्मे कौतूहलं श्रोतुं प्रसादाद् भवतो मुने

vajranābhavadho hyukto nikumbhavadhakīrtane | tanme kautūhalaṃ śrotuṃ prasādād bhavato mune

हिन्दी अर्थ

मुने ! निकुम्भ-वधका वर्णन करते समय आपने वज्नाभके वधकी भी चर्चा की है। आपकी कृपासे उसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल हो रहा है

अध्याय 146

श्लोक 4

हन्त ते वर्तयिष्यामि वज्रनाभवधं नृप ।विजयं चैव कामस्य साम्बस्यैव च भारत

hanta te vartayiṣyāmi vajranābhavadhaṃ nṛpa | vijayaṃ caiva kāmasya sāmbasyaiva ca bhārata

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—नरेश्वर! भरतनन्दन! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें वज़नाभके वधका वृत्तान्त बताऊँगा। पाथ ही प्रध्युप्न और साम्बकी विजयका भी वर्णन करूँगा

अध्याय 146

श्लोक 5

मेरोः सानौ नरपते तपश्चक्रे महासुरः ।वज्रनाभ इति ख्यातो निश्चितः समितिञ्जयः

meroḥ sānau narapate tapaścakre mahāsuraḥ | vajranābha iti khyāto niścitaḥ samitiñjayaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेन्द्र! वज़नाभ नामसे विख्यात महान्‌ असुर निश्चय ही युद्धमें विजय पानेवाला था। एक समय उसने मेरुपर्वतके शिखरपर बड़ी भारी तपस्या की

अध्याय 146

श्लोक 6

तस्य तुष्टो महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः ।वरेण च्छन्दयामास तपसा परितोषितः

tasya tuṣṭo mahātejā brahmā lokapitāmahaḥ | vareṇa cchandayāmāsa tapasā paritoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

उसकी तपस्यासे महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने प्रसन्न होकर उससे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा

अध्याय 146

श्लोक 7

अवध्यत्वं स देवेभ्यो वव्रे दानवसत्तमः ।पुरं वज्रपुरं चापि सर्वरत्नमयं शुभम्

avadhyatvaṃ sa devebhyo vavre dānavasattamaḥ | puraṃ vajrapuraṃ cāpi sarvaratnamayaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

तब उस श्रेष्ठ दानवने देवताओंसे भवध्य होनेका वर माँगा; साथ ही सम्पूर्ण रत्लोंके बने हुए सुन्दर वज़पुर नामक नगरकी भी याचना की

अध्याय 146

श्लोक 8

स्वच्छन्देन प्रवेशश्च न वायोरपि भारत ।अचिन्तितेन कामानामुपपत्तिर्नराधिप

svacchandena praveśaśca na vāyorapi bhārata | acintitena kāmānāmupapattirnarādhipa

हिन्दी अर्थ

पारत ! उस नगरमें स्वच्छन्दतापूर्वक वायुका भी प्रवेश नहीं होता था। नरेश्वर! बिना चिन्तन किये ही वहाँ सम्पूर्ण ननोवाज्छित भोगोंकी प्राप्ति होती रहती थी

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श्लोक 9

शाखानगरमुख्यानां संवाहानां शतानि च ।नगरस्याप्रमेयस्य समन्ताज्जनमेजय

śākhānagaramukhyānāṃ saṃvāhānāṃ śatāni ca | nagarasyāprameyasya samantājjanamejaya

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! उस अप्रमेय नगरके चारों ओर शाखा- नगरोंके मुख्य-मुख्य सैकड़ों उद्यान शोभा पाते थे, जो चहारदीवारियोंसे घिरे हुए थे

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श्लोक 10

तथा तदभवत् तस्य वरदानेन भारत ।उवास वज्रनगरे वज्रनाभो महासुरः

tathā tadabhavat tasya varadānena bhārata | uvāsa vajranagare vajranābho mahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

भारत ! उसको मिले हुए वरदानसे ही वह नगर उस रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था। महान्‌ असुर वज्नाभ उस वज़नगरमें निवास करता था

अध्याय 146

श्लोक 11

कोटिशो वरलब्धं तमसुराः परिवार्य ते ।ऊषुर्वज्रपुरे राजन् संवाहेषु तथैव च

koṭiśo varalabdhaṃ tamasurāḥ parivārya te | ūṣurvajrapure rājan saṃvāheṣu tathaiva ca

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वर पाये हुए वज़नाभको सब ओरसे घेरकर करोड़ों देवद्रोही असुर हृष्ट, पुष्ट और आनन्दित हो वज्पुरमें तथा उसके शाखानगरोंके मुख्य-मुख्य घिरे हुए उद्यानोंमें निवास करते थे

अध्याय 146

श्लोक 12

शाखानगरमुख्येषु रम्येषु च नराधिप ।हृष्टपुष्टप्रमुदिता नृप देवस्य शत्रवः

śākhānagaramukhyeṣu ramyeṣu ca narādhipa | hṛṣṭapuṣṭapramuditā nṛpa devasya śatravaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 13

वज्रनाभोऽथ दुष्टात्मा वरदानेन दर्पितः ।पुरस्य चात्मनश्चैव जगद् बाधितुमुद्यतः

vajranābho'tha duṣṭātmā varadānena darpitaḥ | purasya cātmanaścaiva jagad bādhitumudyataḥ

हिन्दी अर्थ

अपनेको तथा अपने नगरको प्राप्त हुए वरदानसे घमंडमें भरा हुआ दुष्टात्मा वज्नाभ सम्पूर्ण जगत्‌्को कष्ट देनेके लिये उद्यत हो गया

अध्याय 146

श्लोक 14

महेन्द्रमब्रवीद् गत्वा देवलोकं विशाम्पते ।अहमीशितुमिच्छामि त्रैलोक्यं पाकशासन

mahendramabravīd gatvā devalokaṃ viśāmpate | ahamīśitumicchāmi trailokyaṃ pākaśāsana

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ! वह देवलोकमें जाकर महेन्द्रसे बोला—' पाकशासन! मैं तीनों लोकोंपर शासन करना चाहता हूँ

अध्याय 146

श्लोक 15

अथवा मे प्रयच्छस्व युद्धं देवगणेश्वर ।सामान्यं हि जगत्कृत्स्नं काश्यपानां महात्मनाम्

athavā me prayacchasva yuddhaṃ devagaṇeśvara | sāmānyaṃ hi jagatkṛtsnaṃ kāśyapānāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

देवगणेश्वर! (या तो मेरे लिये देवलोक खाली कर दो) अथवा मुझे युद्ध प्रदान करो; क्योंकि सम्पूर्ण जगतूपर सभी महामनस्वी कश्यपपुत्रों का समान अधिकार है'

अध्याय 146

श्लोक 16

स बृहस्पतिना सार्द्धं मन्त्रयित्वा महेश्वरः ।वज्रनाभं सुरश्रेष्ठः प्रोवाच कुरुवंशज

sa bṛhaspatinā sārddhaṃ mantrayitvā maheśvaraḥ | vajranābhaṃ suraśreṣṭhaḥ provāca kuruvaṃśaja

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! तब सुरश्रेष्ठ महेश्वर इन्द्रने बुहस्पतिजीके साथ सलाह करके वज्जनाभसे कहा—

अध्याय 146

श्लोक 17

सत्रेषु दीक्षितः सौम्य कश्यपो नः पिता मुनिः ।तस्मिन् वृत्ते यथान्याय्यं तथा स हि करिष्यति

satreṣu dīkṣitaḥ saumya kaśyapo naḥ pitā muniḥ | tasmin vṛtte yathānyāyyaṃ tathā sa hi kariṣyati

हिन्दी अर्थ

सौम्य! हम सबके पिता कश्यपमुनि यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं। उनका वह यज्ञ पूर्ण हो जानेपर वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा हमलोगोंके लिये निर्णय कर देंगे'

अध्याय 146

श्लोक 18

ततः स पितरं गत्वा कश्यपं दानवोऽब्रवीत् ।यथोक्तं देवराजेन तमुवाचाथ कश्यपः

tataḥ sa pitaraṃ gatvā kaśyapaṃ dānavo'bravīt | yathoktaṃ devarājena tamuvācātha kaśyapaḥ

हिन्दी अर्थ

तब उस दानवने अपने पिता कश्यपके पास जाकर देवराज इन्द्रने जो कुछ कहा था, सब कह सुनाया। उसकी बात सुनकर कश्यपजीने कहा-

अध्याय 146

श्लोक 19

सत्रे वृत्ते करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति ।त्वं तु वज्रपुरे पुत्र वस गच्छ समाहितः

satre vṛtte kariṣyāmi yathā nyāyyaṃ bhaviṣyati | tvaṃ tu vajrapure putra vasa gaccha samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

वत्स! यज्ञ समाप्त हो जानेपर जैसा उचित होगा, वैसा करूँगा। तबतक तुम वत्रपुरमें चलकर सावधान होकर रहो'

अध्याय 146

श्लोक 20

एवमुक्ते वज्रनाभः स्वमेव नगरं गतः ।महेन्द्रोऽपि ययौ देवो द्वारकां द्वारशालिनीम्

evamukte vajranābhaḥ svameva nagaraṃ gataḥ | mahendro'pi yayau devo dvārakāṃ dvāraśālinīm

हिन्दी अर्थ

पिताके ऐसा कहनेपर वज़नाभ अपने ही नगरको चला गया। उधर महेन्द्रदेव भी सुन्दर द्वारसे सुशोभित होनेवाली द्वारकापुरीको गये

अध्याय 146

श्लोक 21

गत्वा चान्तर्हितो देवो वासुदेवमथाब्रवीत् ।वज्रनाभस्य वृत्तान्तं तमुवाच जनार्दनः

gatvā cāntarhito devo vāsudevamathābravīt | vajranābhasya vṛttāntaṃ tamuvāca janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ जाकर अदृश्य होकर ही इन्द्रदेवने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे वज्रनाभका सारा वृत्तान्त कह सुनाया । तब श्रीकृष्ण उनसे बोले—

अध्याय 146

श्लोक 22

शौरेरुपस्थितो देव वाजिमेधो महाक्रतुः ।तस्मिन् वृत्ते वज्रनाभं पातयिष्यामि वासव

śaurerupasthito deva vājimedho mahākratuḥ | tasmin vṛtte vajranābhaṃ pātayiṣyāmi vāsava

हिन्दी अर्थ

देव! वासव! मेरे पिताजीका अश्वमेध नामक महान्‌ यज्ञ उपस्थित है। उसके पूर्ण हो जानेपर मैं वज्नाभको अवश्य मार गिराऊँगा

अध्याय 146

श्लोक 23

तत्रोपायं प्रवेशे तु चिन्तयावः सतां गते ।नानिच्छया प्रवेशोऽस्ति तत्र वायोरपि प्रभो

tatropāyaṃ praveśe tu cintayāvaḥ satāṃ gate | nānicchayā praveśo'sti tatra vāyorapi prabho

हिन्दी अर्थ

सत्पुरुषोंके आश्रयदाता प्रभो ! उसके नगरमें प्रवेश करनेका क्या उपाय है—यह हम दोनों सोचें; क्योंकि वज्नाभकी इच्छाके बिना वहाँ वायुका भी प्रवेश नहीं हो सकता!

अध्याय 146

श्लोक 24

ततो गतो देवराजो वासुदेवेन सत्कृतः ।वाजिमेधे च सम्प्राप्ते वसुदेवस्य भारत

tato gato devarājo vāsudevena satkṛtaḥ | vājimedhe ca samprāpte vasudevasya bhārata

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ श्रीकृष्णके द्वारा सत्कार पाकर देवराज इन्द्र चले गये। भारत! जब वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ प्रात हुआ (तब उसमें देवराज इन्द्र भी पधारे ।)

अध्याय 146

श्लोक 25

तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने प्रवेशार्थं सुरोत्तमौ ।चिन्तयामासतुर्वीरौ देवराजाच्युतावुभौ

tasmin yajñe vartamāne praveśārthaṃ surottamau | cintayāmāsaturvīrau devarājācyutāvubhau

हिन्दी अर्थ

जब वह यज्ञ चालू हुआ, उस समय सुरश्रेष्ठ वीर देवराज इन्द्र और श्रीकृष्ण दोनों वज़पुरमें प्रवेश करनेके लिये कोई उपाय सोचने लगे

अध्याय 146

श्लोक 26

तत्र यज्ञे वर्तमाने सुनाट्येन नटस्तदा ।महर्षीस्तोषयामास भद्रनामेति नामतः

tatra yajñe vartamāne sunāṭyena naṭastadā | maharṣīstoṣayāmāsa bhadranāmeti nāmataḥ

हिन्दी अर्थ

उस यज्में भद्रनामा नामक एक नटने अपने उत्तम नाट्यके द्वारा महर्षियोंको संतुष्ट किया

अध्याय 146

श्लोक 27

तं वरेण मुनिश्रेष्ठाश्छन्दयामासुरात्मवत् ।स वव्रे तु नटो भद्रो वरं देवेश्वरोपमः

taṃ vareṇa muniśreṣṭhāśchandayāmāsurātmavat | sa vavre tu naṭo bhadro varaṃ deveśvaropamaḥ

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

तब उन श्रेष्ठ मुनियोंने उसे अपने योग्य वर माँगनेके लिये कहा । तब देवेन्द्र तथा श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार सरस्वतीसे प्रेरित हो अश्वमेथ यजमें पधारे हुए मुनिवरोंको प्रणाम करके देवेन्द्रतुल्य भद्र नामक नटने इस प्रकार वर माँगा

अध्याय 146

श्लोक 28

देवेन्द्रकृष्णच्छन्देन सरस्वत्या प्रचोदितः ।प्रणिपत्य मुनिश्रेष्ठानश्वमेधे समागतान्

devendrakṛṣṇacchandena sarasvatyā pracoditaḥ | praṇipatya muniśreṣṭhānaśvamedhe samāgatān

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 29

भोज्यो द्विजानां सर्वेषां भवेयं मुनिसत्तमाः ।सप्तद्वीपां च पृथिवीं विचरेयमिमामहम्

bhojyo dvijānāṃ sarveṣāṃ bhaveyaṃ munisattamāḥ | saptadvīpāṃ ca pṛthivīṃ vicareyamimāmaham

श्लोक 29–30 का हिन्दी अर्थ

नट बोला—मुनिवरो! मैं समस्त द्विजोंके लिये भोजनीय होऊँ अर्थात्‌ सब द्विज मुझे सादर भोजन करायें अथवा समस्त ब्राह्मण मेरा अन्न भोजन करें। सातों ट्वीपोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर मैं विचरण कर सकूँ। आकाशमें चलने-फिरनेकी उत्कृष्ट शक्ति मुझे प्राप्त हो। मैं विशेष शक्तिशाली रहकर स्थावर-जज्म सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होऊँ

अध्याय 146

श्लोक 30

प्रसिद्धाकाशगमनः शक्नुवंश्च विशेषतः ।अवध्यः सर्वभूतानां स्थावरा ये च जङ्गमाः

prasiddhākāśagamanaḥ śaknuvaṃśca viśeṣataḥ | avadhyaḥ sarvabhūtānāṃ sthāvarā ye ca jaṅgamāḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 31

यस्य यस्य च वेषेण प्रविशेयमहं खलु ।मृतस्य जीवतो वापि भाव्येनोत्पादितस्य वा

yasya yasya ca veṣeṇa praviśeyamahaṃ khalu | mṛtasya jīvato vāpi bhāvyenotpāditasya vā

श्लोक 31–32 का हिन्दी अर्थ

जो मर गया है, जीवित है अथवा जो भविष्यरूपसे मेरे द्वारा तत्काल उत्पन्न किया गया है, ऐसे लोगोंमेंसे जिस-जिसके वेषसे मैं कहीं प्रवेश करना चाहूँ, मैं वाद्योंसहित ठीक वैसा ही हो जाऊँ! जरा और रोग मुझे छू न सकें । मुझपर ऋषि-मुनि तथा अन्य लोग भी नित्य-निरन्तर संतुष्ट हैं

अध्याय 146

श्लोक 32

सतूर्यस्तादृशः स्यां वै जरारोगविवर्जितः ।तुष्येयुर्मुनयो नित्यमन्ये च मम सर्वदा

satūryastādṛśaḥ syāṃ vai jarārogavivarjitaḥ | tuṣyeyurmunayo nityamanye ca mama sarvadā

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 33

एवमस्त्विति सम्प्रोक्तो ब्राह्मणैर्नृपते नटः ।सप्तद्वीपां वसुमतीं पर्यटत्यमरोपमः

evamastviti samprokto brāhmaṇairnṛpate naṭaḥ | saptadvīpāṃ vasumatīṃ paryaṭatyamaropamaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्र ! तब ब्राह्मणोंने ' एवमस्तु' कहकर उस नटको अभीष्ट वरदान दे दिया। तबसे वह देवोपम शक्तिशाली नट सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीपर विचरण करता हता है

अध्याय 146

श्लोक 34

पुराणि दानवेन्द्राणामुत्तरांश्च कुरूंस्तथा ।भद्राश्वान् केतुमालांश्च कालाम्रद्वीपमेव च

purāṇi dānavendrāṇāmuttarāṃśca kurūṃstathā | bhadrāśvān ketumālāṃśca kālāmradvīpameva ca

हिन्दी अर्थ

वह दानवेन्द्रोंकें नगरोंमें तथा उत्तर-कुरु, पद्राशव, केतुमाल तथा कालाम्र द्वीपोंगें घूमा करता था

अध्याय 146

श्लोक 35

पर्वणीषु तु सर्वासु द्वारकां यदुमण्डिताम् ।आयाति वरदत्तः स लोकवीरो महानटः

parvaṇīṣu tu sarvāsu dvārakāṃ yadumaṇḍitām | āyāti varadattaḥ sa lokavīro mahānaṭaḥ

हिन्दी अर्थ

वह वर पाया हुआ लोकवीर महानट सभी र्वॉपर यादवोंसे अलंकृत द्वारकापुरीमें आया करता था

अध्याय 146

श्लोक 36

ततो हंसान् धार्तराष्ट्रान् देवलोकनिवासिनः ।उवाच भगवाञ्छक्रः सान्त्वयित्वा सुरेश्वरः

tato haṃsān dhārtarāṣṭrān devalokanivāsinaḥ | uvāca bhagavāñchakraḥ sāntvayitvā sureśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर देवलोकमें निवास करनेवाले हंसोंको, नो धृतराष्ट्री एवं कश्यपके वंशज थे, देवराज इन्द्रने बुलवाया और उन्हें सान्त्वना देकर कहा—

अध्याय 146

श्लोक 37

भवन्तो भ्रातरोऽस्माकं काश्यपा देवपक्षिणः ।विमानवाहा देवानां सुकृतीनां तथैव च

bhavanto bhrātaro'smākaṃ kāśyapā devapakṣiṇaḥ | vimānavāhā devānāṃ sukṛtīnāṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

हंसो! तुम लोकपिता कश्यपजीकी संतति होनेके कारण हमारे भाई हो, देवपक्षी हो तथा देवताओं और [ण्यात्माओंके विमानवाहक हो

अध्याय 146

श्लोक 38

देवानामस्ति कर्तव्यं कार्यं शत्रुवधान्वितम् ।तत्कर्तव्यं न मन्त्रश्च भेत्तव्यो वः कथञ्चन

devānāmasti kartavyaṃ kāryaṃ śatruvadhānvitam | tatkartavyaṃ na mantraśca bhettavyo vaḥ kathañcana

हिन्दी अर्थ

इस समय देवताओंके सामने शत्रुवध-सम्बन्धी कार्य उपस्थित है, जो हम सबके लिये आवश्यक कर्तव्य है। उस कार्यको तुम्हें पूरा करना है और इस गुप्त मन्त्रको किसी तरह फूटने नहीं देना है

अध्याय 146

श्लोक 39

न कुर्वतां देवताज्ञामुग्रो दण्डः पतेदपि ।सर्वत्राप्रतिषिद्धं वो गमनं हंससत्तमाः

na kurvatāṃ devatājñāmugro daṇḍaḥ patedapi | sarvatrāpratiṣiddhaṃ vo gamanaṃ haṃsasattamāḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंकी इस आज्ञाका पालन न करनेपर तुम्हारे ऊपर भयानक दण्ड भी पड़ सकता है। श्रेष्ठ हंसो! तुम्हारी सर्वत्र अप्रतिहत गति है

अध्याय 146

श्लोक 40

गत्वा प्रवेश्यमन्येषां वज्रनाभपुरोत्तमम् ।इतोऽन्तःपुरवापीषु चरध्वमुचितं हि वः

gatvā praveśyamanyeṣāṃ vajranābhapurottamam | ito'ntaḥpuravāpīṣu caradhvamucitaṃ hi vaḥ

हिन्दी अर्थ

वज़नाभके श्रेष्ठ नगरमें प्रवेश करना दूसरोंके लिये असम्भव है। तुम वहाँ जाकर अन्तःपुरकी बावड़ियोंमें विचरो, क्योंकि यह कार्य तुम्हारे ही योग्य है

अध्याय 146

श्लोक 41

तस्यास्ति कन्यारत्नं हि त्रैलोक्यातिशयं शुभम् ।नाम्ना प्रभावती नाम चन्द्राभेव प्रभावती

tasyāsti kanyāratnaṃ hi trailokyātiśayaṃ śubham | nāmnā prabhāvatī nāma candrābheva prabhāvatī

हिन्दी अर्थ

व्रजनाभके एक रत्रस्वरूपा कन्या है, जो त्रिलोकीमें अतिशय सुन्दरी है। उसका नाम प्रभावती है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो चन्द्रमाकी आभा ही उसकी प्रभा बनकर प्रकाशित हो रही हो

अध्याय 146

श्लोक 42

वरदानेन सा लब्धा मात्रा किल वरानना ।हैमवत्या महादेव्याः सकाशादिति नः श्रुतम्

varadānena sā labdhā mātrā kila varānanā | haimavatyā mahādevyāḥ sakāśāditi naḥ śrutam

हिन्दी अर्थ

उसकी माताने गिरिराज हिमवान्‌की पुत्री महादेवी उमासे मिले हुए वरदानके प्रभावसे उस सुन्दर मुखवाली कन्याको प्राप्त किया है, ऐसा हमारे सुननेमें आया है

अध्याय 146

श्लोक 43

स्वयंवरा च सा कन्या बन्धुभिः स्थापिता सती ।आत्मेच्छया पतिं हंसा वरयिष्यति शोभना

svayaṃvarā ca sā kanyā bandhubhiḥ sthāpitā satī | ātmecchayā patiṃ haṃsā varayiṣyati śobhanā

हिन्दी अर्थ

हंसो! अपने बन्धुओंद्वारा सुरक्षित हुई वह सुन्दरी कन्या प्रभावती स्वयंवरा है । स्वयंवरमें अपनी इच्छाके अनुसार पतिका वरण करेगी

अध्याय 146

श्लोक 44

तद्भवद्भिर्गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।सद्भूताः कुलरूपस्य शीलस्य वयसस्तथा

tadbhavadbhirguṇā vācyāḥ pradyumnasya mahātmanaḥ | sadbhūtāḥ kularūpasya śīlasya vayasastathā

हिन्दी अर्थ

अत: तुमलोग प्रभावतीके सम्मुख महात्मा प्र्युप्नके उत्तम कुल, सुन्दर रूप, अच्छे शील-स्वभाव तथा नयी अवस्थाके श्रेष्ठ गुणोंका बखान करो

अध्याय 146

श्लोक 45

यदा सा रक्तभावा च वज्रनाभसुता सती ।तस्याः सकाशात् सन्देशो नयितव्यः समाधिना

yadā sā raktabhāvā ca vajranābhasutā satī | tasyāḥ sakāśāt sandeśo nayitavyaḥ samādhinā

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

व्रजनाभकी वह सती-साध्वी पुत्री जब प्रदयुम्नके प्रति हृदयसे अनुरक्त हो जाय, तब एकाग्रचित्त होकर उसका संदेश तुम्हें प्रद्युप्रके पास पहुँचाना चाहिये; फिर वहाँसे तुमलोग उस संदेशका उत्तर लाया करो। साथ ही, अपनी बुद्धिसे भी सोच-विचारकर अवसरके अनुरूप कार्य करके मेरा हित-साधन करो

अध्याय 146

श्लोक 46

प्रद्युम्नस्य पुनस्तस्मादानयध्वं तथैव च ।स्वबुद्ध्या प्राप्तकालं च संविधेयं हितं मम

pradyumnasya punastasmādānayadhvaṃ tathaiva ca | svabuddhyā prāptakālaṃ ca saṃvidheyaṃ hitaṃ mama

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 47

नेत्रवक्त्रप्रसादश्च कर्तव्यस्तत्र सर्वथा

netravaktraprasādaśca kartavyastatra sarvathā

श्लोक 47–48 का हिन्दी अर्थ

तुम्हें वहाँ अपने नेत्रों और मुखके द्वारा सब प्रकारसे प्रसन्नता प्रकट करनी चाहिये। महात्मा प्रद्युप्नके गुणोंको उसी-उसी प्रकारसे बताना चाहिये, जिससे प्रभावतीका मन उनमें पूर्णत: अनुरक्त हो जाय

अध्याय 146

श्लोक 48

तथा तथा गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।यथा यथा प्रभावत्या मनस्तत्र भवेत् स्थितम्

tathā tathā guṇā vācyāḥ pradyumnasya mahātmanaḥ | yathā yathā prabhāvatyā manastatra bhavet sthitam

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 146

श्लोक 49

वृत्तान्तश्चानुदिवसं प्रदेयो मम सर्वथा ।द्वारवत्यां च कृष्णस्य भ्रातुर्मम यवीयसः

vṛttāntaścānudivasaṃ pradeyo mama sarvathā | dvāravatyāṃ ca kṛṣṇasya bhrāturmama yavīyasaḥ

हिन्दी अर्थ

इन सब बातोंका समाचार तुम्हें प्रतिदिन मुझे और द्वारकामें मेरे छोटे भाई श्रीकृष्णको भी बताना चाहिये

अध्याय 146

श्लोक 50

तावद्यत्नश्च कर्तव्यः प्रद्युम्नो यावदात्मवित् ।पर्यावर्तेद् वरारोहां वज्रनाभसुतां विभुः

tāvadyatnaśca kartavyaḥ pradyumno yāvadātmavit | paryāvarted varārohāṃ vajranābhasutāṃ vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

सुन्दरी पुत्री प्रभावतीको अपनी न बना लें तबतक तुम्हारा प्रयत्न चालू रहना चाहिये

अध्याय 146

श्लोक 51

अवध्यास्ते तु देवानां ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।देवपुत्रैर्हि हन्तव्याः प्रद्युम्नप्रमुखैर्युधि

avadhyāste tu devānāṃ brahmaṇo varadarpitāḥ | devaputrairhi hantavyāḥ pradyumnapramukhairyudhi

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके वरदानसे घमंडमें भरे रहनेवाले वज्नाभ आदि सारे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं। वे युद्धमें प्रद्युम्म आदि देवकुमारोंद्वारा ही मारे जा सकते हैं

अध्याय 146

श्लोक 52

नटो दत्तवरस्तस्य वेषमास्थाय यादवाः ।प्रद्युम्नाद्या गमिष्यन्ति वज्रनाभविनाशनाः

naṭo dattavarastasya veṣamāsthāya yādavāḥ | pradyumnādyā gamiṣyanti vajranābhavināśanāḥ

हिन्दी अर्थ

मोड 'मुनियोंका वर प्राप्त करनेवाला जो भद्रनामा नट है, उसीका वेष धारण करके प्रद्यु्म आदि यादव वज्रनाभका विनाश करनेके लिये उसके नगरमें जायेँगे

अध्याय 146

श्लोक 53

एतच्च सर्वं कर्तव्यमन्यच्च सर्वमेव हि ।प्राप्तकालं विधातव्यमस्माकं प्रियकाम्यया

etacca sarvaṃ kartavyamanyacca sarvameva hi | prāptakālaṃ vidhātavyamasmākaṃ priyakāmyayā

हिन्दी अर्थ

ये तथा और भी जो समयोचित कर्तव्य प्राप्त हों, उन सबको हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुमलोगोंको पूर्ण करना चाहिये

अध्याय 146

श्लोक 54

प्रवेशस्तत्र देवानां नास्ति हंसाः कथञ्चन ।वज्रनाभेप्सिते तत्र प्रदेशे खलु सर्वथा

praveśastatra devānāṃ nāsti haṃsāḥ kathañcana | vajranābhepsite tatra pradeśe khalu sarvathā

हिन्दी अर्थ

हंसो! वहाँ वज़नाभके अभीष्ट प्रदेशमें देवताओंका किसी तरह भी प्रवेश नहीं हो सकता। यह सर्वथा निश्चित है'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.