Harivamsha Purana
148
अध्याय 148 / 318

Parva 2, Adhyāya 93

61 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ61 श्लोक

अध्याय 148

श्लोक 1

नटवेशधारिणां यादवानां सुपुरे एवं वज्रपुरे सफलं अभिनयं, दानवानां तोषयित्वा तेभ्यः उपायनानां प्राप्तिः, प्रद्युम्नस्य प्रभावत्याः गृहे प्रवेशः ततः सुपुरवासीनामसुराणां नराधिप ।ददावाज्ञां वज्रनाभो दीयतां गृहमुत्तमम्

naṭaveśadhāriṇāṃ yādavānāṃ supure evaṃ vajrapure saphalaṃ abhinayaṃ, dānavānāṃ toṣayitvā tebhyaḥ upāyanānāṃ prāptiḥ, pradyumnasya prabhāvatyāḥ gṛhe praveśaḥ tataḥ supuravāsīnāmasurāṇāṃ narādhipa | dadāvājñāṃ vajranābho dīyatāṃ gṛhamuttamam

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—नरेधर ! तदनन्तर वज़नाभने पुरवासी असुरोंको आज्ञा दी कि इन नटोंके लिये तम गृह प्रदान करो

अध्याय 148

श्लोक 2

आतिथ्यं क्रियतामेषां बहुरत्नमुपायनम् ।वासांसि सुविचित्राणि सुखाय जनरञ्जनम्

ātithyaṃ kriyatāmeṣāṃ bahuratnamupāyanam | vāsāṃsi suvicitrāṇi sukhāya janarañjanam

हिन्दी अर्थ

इन सबका आतिथ्य- त्कार करो। इन्हें उपहारमें बहुत-से रत्न तथा सुन्दर तर विचित्र वस्त्र प्रदान करो। साथ ही इन्हें सुख ुँचानेके लिये ऐसी सामग्री भेंट करो, जो मनुष्यमात्रके को प्रसन्न करनेवाली हो'

अध्याय 148

श्लोक 3

भर्तुराज्ञां समालभ्य तथा चक्रुश्च सर्वशः ।पूर्वश्रुतो नटः प्राप्तः कौतूहलमजीजनत्

bharturājñāṃ samālabhya tathā cakruśca sarvaśaḥ | pūrvaśruto naṭaḥ prāptaḥ kautūhalamajījanat

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

स्वामीकी आज्ञा कर उन असुरोंने सब कुछ वैसा ही किया। पहले सके विषयमें सुना गया था, वही नट आया है; इस वनाने सबके मनमें नयी उत्कण्ठा उत्पन्न कर दी थी ॥ ॥ दैत्योंने भद्र नामक नटको बड़ी प्रसन्नताके साथ तम सत्कार प्रदान किया। उन्होंने वेश-धारणके लिये पे बहुत-से रत्न दिये

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श्लोक 4

नटस्याथ ददुर्दैत्याः सत्कारं परया मुदा ।पर्यायार्थे ददुश्चापि रत्नानि सुबहून्यथ

naṭasyātha dadurdaityāḥ satkāraṃ parayā mudā | paryāyārthe daduścāpi ratnāni subahūnyatha

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 148

श्लोक 5

ततः स ननृते तत्र वरदत्तो नटस्तथा ।सुपुरे पुरवासीनां परं हर्षं समादधत्

tataḥ sa nanṛte tatra varadatto naṭastathā | supure puravāsīnāṃ paraṃ harṣaṃ samādadhat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वर प्राप्त किये ए उस नटने वहाँ सुपुरमें नृत्य किया और पुरवासियोंके में महान्‌ हर्ष भर दिया

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श्लोक 6

रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया

rāmāyaṇaṃ mahākāvyamuddiśya nāṭakaṃ kṛtam | janma viṣṇorameyasya rākṣasendravadhepsayā

हिन्दी अर्थ

उसने रामायण नामक डाकाव्यकी कथावस्तुको लेकर वहाँ एक नाटक किया। पमें यह दिखाया गया कि राक्षसराज रावणके वधकी छासे अप्रमेयस्वरूप भगवान्‌ विष्णुका भूतलपर अवतार भा

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श्लोक 7

लोमपादो दशरथ ऋष्यशृङ्गं महामुनिम् ।शान्तामप्यानयामास गणिकाभिः सहानघ

lomapādo daśaratha ṛṣyaśṛṅgaṃ mahāmunim | śāntāmapyānayāmāsa gaṇikābhiḥ sahānagha

हिन्दी अर्थ

अनघ! लोमपादने महामुनि ऋष्यशरुद्धको णकाओंके साथ अपने यहाँ बुलवाया; फिर महाराज गरथने ऋष्यश्रुद्धके साथ उनकी पत्नी शान्ताको भी पने यहाँ निमन्त्रित किया

अध्याय 148

श्लोक 8

रामलक्ष्यणशत्रुघ्ना भरतश्चैव भारत ।ऋष्यशृङ्गश्च शान्ता च तथारूपैर्नटैः कृताः

rāmalakṣyaṇaśatrughnā bharataścaiva bhārata | ṛṣyaśṛṅgaśca śāntā ca tathārūpairnaṭaiḥ kṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! राम, क्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत, ऋष्यश्रुद्ध तथा शान्ताका वेश हींके-जैसे रूपवाले नटोंने धारण किया था

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श्लोक 9

तत्कालजीविनो वृद्धा दानवा विस्मये गताः ।आचचक्षुश्च तेषां वै रूपतुल्यत्वमच्युत

tatkālajīvino vṛddhā dānavā vismaye gatāḥ | ācacakṣuśca teṣāṃ vai rūpatulyatvamacyuta

हिन्दी अर्थ

ऊध्याय: + ७३९ राजन्‌ ! जो रामके समयमें जीवित थे, वे बूढ़े रनव भी उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो गये और कहने लगे, इनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियोंके तुल्य है

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श्लोक 10

संस्फाराभिनयौ तेषां प्रस्तावानां च धारणम् ।दृष्ट्वा सर्वे प्रवेशं च दानवा विस्मयं गताः

saṃsphārābhinayau teṣāṃ prastāvānāṃ ca dhāraṇam | dṛṣṭvā sarve praveśaṃ ca dānavā vismayaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

उनके संस्कार (वेश-धारण), अभिनय, प्रस्तावों क्रिया-प्रसड्लों ) -का धारण तथा प्रवेश (पात्रोंका प्रथम दर्शन) देखकर सभी दानव बड़े विस्मयमें पड़ गये पे

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श्लोक 11

ते रक्ता विस्मयं नेदुरसुराः परया मुदा ।उत्थायोत्थाय नाट्यस्य विषयेषु पुनः पुनः

te raktā vismayaṃ nedurasurāḥ parayā mudā | utthāyotthāya nāṭyasya viṣayeṣu punaḥ punaḥ

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

उस नाटकमें अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य विषयों में बारम्बार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ भाश्चर्ययुक्त कोलाहल करते और संतुष्ट हो नटोंको वस्त्र, लेका भूषण, कड्ण, मनोहर हेमवैदूर्यभूषित हार देते थे

अध्याय 148

श्लोक 12

ददुर्वस्त्राणि तुष्टाश्च ग्रैवेयवलयानि च ।हारान् मनोहरांश्चैव हेमवैडूर्यभूषितान्

dadurvastrāṇi tuṣṭāśca graiveyavalayāni ca | hārān manoharāṃścaiva hemavaiḍūryabhūṣitān

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 148

श्लोक 13

पृथगर्थेषु दत्तेषु लोकैस्ते तुष्टुवुर्नटाः ।असुरांश्च मुनींश्चैव गोत्रैरभिजनैरपि

pṛthagartheṣu datteṣu lokaiste tuṣṭuvurnaṭāḥ | asurāṃśca munīṃścaiva gotrairabhijanairapi

हिन्दी अर्थ

लोगोंके इस प्रकार पृथकू-पृथक्‌ वस्तुओंकी ैंट देनेपर वे नट बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उनके गोत्रों भर पूर्वजोंका उल्लेख करके उन असुरों और ऋषि- पुनियोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की

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श्लोक 15

प्रेषितं वज्रनाभस्य शाखानगरवासिभिः ।नटस्य दिव्यरूपस्य नरेन्द्रागमनं तदा ॥ १४॥।पुरा श्रुतार्थो दैत्येन्द्रः प्रेषयामास भारत ।आनीयतां वज्रपुरं नटोऽसाविति हर्षितः

preṣitaṃ vajranābhasya śākhānagaravāsibhiḥ | naṭasya divyarūpasya narendrāgamanaṃ tadā || 14||| purā śrutārtho daityendraḥ preṣayāmāsa bhārata | ānīyatāṃ vajrapuraṃ naṭo'sāviti harṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

गारत! दैत्यराजने पहले ही यह समाचार सुन लिया था। अत: उसने अत्यन्त हर्षित होकर यह संदेश भेजा के उस नटको वज़पुरमें ले आया जाय

अध्याय 148

श्लोक 16

दानवेन्द्रवचः श्रुत्वा शाखानगरवासिभिः ।नीता वज्रपुरं रम्यं नटवेषेण यादवाः

dānavendravacaḥ śrutvā śākhānagaravāsibhiḥ | nītā vajrapuraṃ ramyaṃ naṭaveṣeṇa yādavāḥ

हिन्दी अर्थ

दानवराजका ह आदेश सुनकर शाखानगरनिवासी असुर नटवेशधारी पादवोंको रमणीय वज़पुरमें ले गये

अध्याय 148

श्लोक 17

आवासश्च ततो दत्तः सुकृतो विश्वकर्मणा ।एष्टव्यं यश्च तत् सर्वं दत्तं शतगुणोत्तरम्

āvāsaśca tato dattaḥ sukṛto viśvakarmaṇā | eṣṭavyaṃ yaśca tat sarvaṃ dattaṃ śataguṇottaram

हिन्दी अर्थ

दैत्यराजने न्हें ठहरनेके लिये विश्वकर्माका बनाया हुआ सुन्दर वन प्रदान किया और जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा पा आवश्यकता होती है, उन सबको उन्होंने सौ गुना मधिक करके दे दिया

अध्याय 148

श्लोक 18

अथ कालोत्सवं चक्रे वज्रनाभो महासुरः ।कारयामास रम्यं च चमूवाटं प्रहृष्टवान्

atha kālotsavaṃ cakre vajranābho mahāsuraḥ | kārayāmāsa ramyaṃ ca camūvāṭaṃ prahṛṣṭavān

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर महान्‌ असुर ज़नाभने महाकाल नामक रुद्रदेवका उत्सव आरम्भ केया। उसमें उसने बड़े हर्षमें भरकर रमणीय चमूवाट सैनिकोंके मनोरज्जनका स्थान) बनवाया

अध्याय 148

श्लोक 19

ततस्तान् परिविश्रान्तान् प्रेक्षार्थाय प्रचोदयत् ।दत्त्वा रत्नानि भूरीणि वज्रनाभो महाबलः

tatastān pariviśrāntān prekṣārthāya pracodayat | dattvā ratnāni bhūrīṇi vajranābho mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ बब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुके, तब महाबली ज़नाभने उन्हें बहुत-से रत्न देकर नाट्यकलाका प्रदर्शन रनेके लिये आज्ञा दी

अध्याय 148

श्लोक 20

उपविष्टश्च तान् द्रष्टुं सह ज्ञातिभिरात्मवान् ।छन्ने चान्तःपुरं स्थाप्य चक्षुर्दृश्ये नराधिप

upaviṣṭaśca tān draṣṭuṃ saha jñātibhirātmavān | channe cāntaḥpuraṃ sthāpya cakṣurdṛśye narādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! अन्तःपुरकी स्त्रयोंको पर्देकी ओटमें जहाँसे वे अपने नेत्रोंद्वारा सब कुछ देख सकती थीं, बिठाकर मनस्वी वज़नाभ स्वयं भी जाति-भाइयोंके साथ उन नटोंका अभिनय देखनेके लिये बैठा

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श्लोक 21

भैमापि बद्धनेपथ्या नटवेषधरास्तथा ।कार्यार्थे भीमकर्माणो नृत्यार्थमुपचक्रमुः

bhaimāpi baddhanepathyā naṭaveṣadharāstathā | kāryārthe bhīmakarmāṇo nṛtyārthamupacakramuḥ

हिन्दी अर्थ

भयंकर कर्म करनेवाले वे यादवकुमार ही उपयुक्त श्रज्धार करके नटवेश धारण किये नृत्यका पक्रम करने लगे

अध्याय 148

श्लोक 22

ततो घनं ससुषिरं मुरजानकभूषितम् ।तन्त्रीस्वरगणैर्विद्धानातोद्यानन्ववादयन्

tato ghanaṃ sasuṣiraṃ murajānakabhūṣitam | tantrīsvaragaṇairviddhānātodyānanvavādayan

हिन्दी अर्थ

फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि), सुषिर (मुरली आदि), मुरज (मृदज्भ), आनक (ढोल या नगाड़ा) तथा वीणाके स्वरोंसे मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नर्ोंद्वारा बजाये जाने लगे

अध्याय 148

श्लोक 23

ततस्तु देवगान्धारं छालिक्यं श्रवणामृतम् ।भैमस्त्रियः प्रजगिरे मनःश्रोत्रसुखावहम्

tatastu devagāndhāraṃ chālikyaṃ śravaṇāmṛtam | bhaimastriyaḥ prajagire manaḥśrotrasukhāvaham

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ यादवकुमारोंकि साथ आयी हुई वाराज़नाएँ देवगान्धार नामक छालिक्य गान्धर्वका गान करने लगीं, जो कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोताके मन और कान दोनोंको सुख देनेवाला था

अध्याय 148

श्लोक 24

आगान्धारग्रामरागं गङ्गावतरणं तथा ।विद्धमासारितं रम्यं जगिरे स्वरसम्पदा

āgāndhāragrāmarāgaṃ gaṅgāvataraṇaṃ tathā | viddhamāsāritaṃ ramyaṃ jagire svarasampadā

हिन्दी अर्थ

गान्धार आदि सातों स्वरोंको व्याप्त करके स्थित होनेवाले जो त्रिविध* ग्राम (कतिपय स्वरोंके समूह ), वसन्त आदि राग तथा गड़ावतरण नामक गीतविशेष हैं, उन्हें रागान्तरसे मिश्रित, व्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वरसम्पत्तिके द्वारा गाने लगीं

अध्याय 148

श्लोक 25

लयतालसमं श्रुत्वा गङ्गावतरणं शुभम् ।असुरांस्तोषयामासुरुत्थायोत्थाय भारत

layatālasamaṃ śrutvā gaṅgāvataraṇaṃ śubham | asurāṃstoṣayāmāsurutthāyotthāya bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! लय और तालके अनुरूप सुन्दर गड़ावतरणको सुनकर (प्रद्युमन, गद और साम्ब-अये तीनों बीच-बीचमें) खड़े हो-होकर असुरोंको संतोष प्रदान करते थे

अध्याय 148

श्लोक 26

नान्दिं च वादयामासुः प्रद्युम्नो गद एव च ।साम्बश्च वीर्यसम्पन्नः कार्यार्थं नटतां गतः

nāndiṃ ca vādayāmāsuḥ pradyumno gada eva ca | sāmbaśca vīryasampannaḥ kāryārthaṃ naṭatāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

कार्यवश नटभावको प्राप्त हुए पराक्रमसम्पन्न प्रध्युप्, गद और साम्ब नान्दी* बजाने लगे

अध्याय 148

श्लोक 27

नान्द्यन्ते च तदा श्लोकं गङ्गावतरणाश्रितम् ।रौक्मिणेयस्तदोवाच सम्यक् स्वभिनयान्वितम्

nāndyante ca tadā ślokaṃ gaṅgāvataraṇāśritam | raukmiṇeyastadovāca samyak svabhinayānvitam

हिन्दी अर्थ

उस समय नान्दी (माज़लिक पद्यपाठ)- के अन्तमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने गड्ावतरणसे सम्बन्ध रखनेवाले श्लोकका उत्तम अभिनयके साथ पाठ किया

अध्याय 148

श्लोक 28

रम्भाभिसारं कौबेरं नाटकं ननृतुस्ततः ।शूरो रावणरूपेण रम्भावेषा मनोवती

rambhābhisāraṃ kauberaṃ nāṭakaṃ nanṛtustataḥ | śūro rāvaṇarūpeṇa rambhāveṣā manovatī

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ कुबेरलोकसम्बन्धी रम्भाभिसार नामक नाटकका वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावणरूपसे उपस्थित हुए। मनोवती नामक वाराज़नाने रम्भाका वेष धारण किया

अध्याय 148

श्लोक 29

नलकूबरस्तु प्रद्युम्नः साम्बस्तस्य विदूषकः ।कैलासो रूपितश्चापि मायया यदुनन्दनैः

nalakūbarastu pradyumnaḥ sāmbastasya vidūṣakaḥ | kailāso rūpitaścāpi māyayā yadunandanaiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रद्युम्न ही नलकूबर बने । साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादवकुमारेंने मायासे वहाँ कैलासको ही मूर्तिमानू कर दिया

अध्याय 148

श्लोक 30

शापश्च दत्तः क्रुद्धेन रावणस्य दुरात्मनः ।नलकूबरेण च यथा रम्भा चाप्यथ सान्त्विता

śāpaśca dattaḥ kruddhena rāvaṇasya durātmanaḥ | nalakūbareṇa ca yathā rambhā cāpyatha sāntvitā

श्लोक 30–32 का हिन्दी अर्थ

अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियोंके पाद-विश्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और अभिनयसे संतुष्ट हुए दानवंवीर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे

अध्याय 148

श्लोक 31

एतत् प्रकरणं वीरा ननृतुर्यदुनन्दनाः ।नारदस्य मुनेः कीर्तिं सर्वज्ञस्य महात्मनः

etat prakaraṇaṃ vīrā nanṛturyadunandanāḥ | nāradasya muneḥ kīrtiṃ sarvajñasya mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 148

श्लोक 32

पादोद्धारेण नृत्येन तथैवाभिनयेन च ।तुष्ढुवुर्दानवा वीरा भैमानामतितेजसाम्

pādoddhāreṇa nṛtyena tathaivābhinayena ca | tuṣḍhuvurdānavā vīrā bhaimānāmatitejasām

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 148

श्लोक 33

ते ददुर्वस्त्रमुख्यानि रत्नान्याभरणानि च ।हारांस्तरलविद्धांश्च वैडूर्यमणिभूषितान्

te dadurvastramukhyāni ratnānyābharaṇāni ca | hārāṃstaralaviddhāṃśca vaiḍūryamaṇibhūṣitān

हिन्दी अर्थ

के थैलेके समान होता है और उसके मुखपर शिववाहन नन्दीके गोंके मतमें बारह पटहों (नगाड़ों )-की ध्वनिको ही नान्दि कहते दिकी शुभाशंसा करनेवाली जो पद्य अथवा गीतमयी वाक्यावली नदी है। उस नान्दीके अन्तमें सूत्रधार नाटककी प्रस्तावना करता है। उन्होंने अच्छे-अच्छे वस्त्र, रत्तमय आभूषण तथा तुलाकार मणिसे विद्ध एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित हार दये

अध्याय 148

श्लोक 34

विमानानि विचित्राणि रथांश्चाकाशगामिनः ।गजानाकाशगांश्चैव दिव्यनागकुलोद्भवान्

vimānāni vicitrāṇi rathāṃścākāśagāminaḥ | gajānākāśagāṃścaiva divyanāgakulodbhavān

हिन्दी अर्थ

विचित्र विमान, आकाशगामी रथ और दृव्य नागोंके कुलमें उत्पन्न हुए आकाशचारी हाथी भी दान किये

अध्याय 148

श्लोक 35

चन्दनानि च दिव्यानि शीतानि रसवन्ति च ।गुरूण्यगुरुमुख्यानि गन्धाढ्यानि च भारत

candanāni ca divyāni śītāni rasavanti ca | gurūṇyagurumukhyāni gandhāḍhyāni ca bhārata

श्लोक 35–37 का हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन ! उन दानवोंने यादवकुमारोंको दव्य शीतल एवं सरस चन्दन, अगुरु आदि श्रेष्ठ [गन्धित पदार्थ तथा चिन्तन करनेमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको नेवाले उदार चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये। पुरुषप्रवर ! रेश्वर! वहाँ बहुत बार नाटक देखनेको अवसर मिले। न सभी अवसरों पर दानवों तथा प्रधान-प्रधान दानवोंकी प्त्रयोंने इतने उपहार दिये कि वे सब-के-सब न तथा रलोंसे रहित हो गये

अध्याय 148

श्लोक 36

चिन्तामणीनुदारांश्च चिन्तिते सर्वकामदान् ।प्रेक्षासु तासु बह्वीषु ददन्तो दानवास्तथा

cintāmaṇīnudārāṃśca cintite sarvakāmadān | prekṣāsu tāsu bahvīṣu dadanto dānavāstathā

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 148

श्लोक 37

धनरत्नैर्विरहिताः कृताः पुरुषसत्तम ।स्त्रियो दानवमुख्यानां तथैव च जनेश्वर

dhanaratnairvirahitāḥ kṛtāḥ puruṣasattama | striyo dānavamukhyānāṃ tathaiva ca janeśvara

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 148

श्लोक 38

ततो हंसी प्रभावत्याः सखी प्राह प्रभावतीम् ।गतास्मि द्वारकां रम्यां भैमगुप्तामनिन्दिते

tato haṃsī prabhāvatyāḥ sakhī prāha prabhāvatīm | gatāsmi dvārakāṃ ramyāṃ bhaimaguptāmanindite

हिन्दी अर्थ

तब भावतीकी सखी हंसीने प्रभावतीसे कहा—' अनिन्दिते! | यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें गयी थी

अध्याय 148

श्लोक 39

प्रद्युम्नश्च मया दृष्टो विविक्ते चारुलोचने ।भक्तिश्च कथिता तस्य मया तव शुचिस्मिते

pradyumnaśca mayā dṛṣṭo vivikte cārulocane | bhaktiśca kathitā tasya mayā tava śucismite

हिन्दी अर्थ

चारुलोचने ! वहाँ एकान्तमें मैंने प्रदयुप्रसे भेंट की। [चिस्मिते ! तुम्हारी प्रद्युम्नके प्रति जो भक्ति है, उसकी ही मैंने उनसे चर्चा की

अध्याय 148

श्लोक 40

तेन हृष्टेन कालश्च कृतः कमललोचने ।अद्य प्रदोषसमये त्वया सह समागमे

tena hṛṣṭena kālaśca kṛtaḥ kamalalocane | adya pradoṣasamaye tvayā saha samāgame

हिन्दी अर्थ

कमललोचने! मेरी ात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने आज प्रदोषकालमें तुमसे मिलनेका समय निश्चित किया

अध्याय 148

श्लोक 41

तदद्य रुचिरश्रोणि तव प्रियसमागमः ।न ह्यात्मवति भाषन्ति मिथ्या भैमकुलोद्भवाः

tadadya ruciraśroṇi tava priyasamāgamaḥ | na hyātmavati bhāṣanti mithyā bhaimakulodbhavāḥ

हिन्दी अर्थ

अत: सुश्रोणि! आज ही तुम्हारी अपने णवल्लभसे भेंट होगी; क्योंकि यदुकुलमें उत्पन्न हुए रुष अपने प्रेमीजनोंके प्रति कोई मिथ्या संदेश नहीं ते हैं '

अध्याय 148

श्लोक 42

ततः प्रभावती हृष्टा हंसीं तामिदमब्रवीत् ।उषितासि ममावासे स्वप्तुमर्हसि सुन्दरि

tataḥ prabhāvatī hṛṣṭā haṃsīṃ tāmidamabravīt | uṣitāsi mamāvāse svaptumarhasi sundari

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर प्रभावतीको बड़ा हर्ष हुआ। ह उस हंसीसे इस प्रकार बोली-'सुन्दरि! तुम पहले ी मेरे घरमें रह चुकी हो। उसी तरह आज भी मेरे क्‍ महलमें शयन करो

अध्याय 148

श्लोक 43

त्वयाहं सहिताऽऽवासे द्रष्टुमिच्छामि कैशविम् ।निःसाध्वसा भविष्यामि त्वया सह विहङ्गमे

tvayāhaṃ sahitā''vāse draṣṭumicchāmi kaiśavim | niḥsādhvasā bhaviṣyāmi tvayā saha vihaṅgame

हिन्दी अर्थ

विहज्औमे! आज इस रमें तुम्हारे साथ रहकर ही मैं केशवकुमार प्रद्युप्रका शन करना चाहती हूँ। तुम्हारे साथ होनेसे मैं निर्भय हूँगी '

अध्याय 148

श्लोक 44

हंसी तथेति चोवाच सखीं कमललोचनाम् ।आरुरोह च तद्धर्म्यं प्रभावत्या विहङ्गमा

haṃsī tatheti covāca sakhīṃ kamalalocanām | āruroha ca taddharmyaṃ prabhāvatyā vihaṅgamā

हिन्दी अर्थ

तब आकाशचारिणी हंसीने अपनी मललोचना सखी प्रभावतीसे कहा-'बहुत अच्छा, आज यहीं सोऊँगी ।' फिर वह प्रभावतीकी अट्टालिकापर पारूढ़ हुई

अध्याय 148

श्लोक 45

विश्वकर्मकृते तत्र हर्म्यपृष्ठे प्रभावती ।संविधानं चकाराशु प्रद्युम्नागमनक्षमम्

viśvakarmakṛte tatra harmyapṛṣṭhe prabhāvatī | saṃvidhānaṃ cakārāśu pradyumnāgamanakṣamam

हिन्दी अर्थ

विश्वकमकि बनाये हुए प्रासादपृष्ठमें भावतीने शीघ्र ही प्रद्युम़के आगमनके योग्य सजावट र दी

अध्याय 148

श्लोक 46

तस्मिन् कृते संविधाने काममानयितुं ययौ ।प्रभावतीमनुज्ञाप्य हंसी वायुसमा गतौ

tasmin kṛte saṃvidhāne kāmamānayituṃ yayau | prabhāvatīmanujñāpya haṃsī vāyusamā gatau

हिन्दी अर्थ

वह सजावट हो जानेपर वायुके समान व्र वेगसे चलनेवाली हंसी प्रभावतीसे पूछकर प्रद्युम्नको | आनेके लिये गयी

अध्याय 148

श्लोक 47

नटवेषधरं कामं गत्वोवाच शुचिस्मिता ।अद्य भूतः स भगवन् समयो वर्तते निशि

naṭaveṣadharaṃ kāmaṃ gatvovāca śucismitā | adya bhūtaḥ sa bhagavan samayo vartate niśi

हिन्दी अर्थ

पवित्र मुसकानवाली वह सी नटवेषधारी प्रद्युप्नके पास जाकर बोली—' भगवन्‌ ! पने पहलेसे जो समय निश्चित कर रखा है, वह ाजकी ही रातमें आ रहा है'

अध्याय 148

श्लोक 48

तथेति प्राह तां कामः सा निवृत्ताथ पक्षिणी ।अभ्यागता च सा हंसी प्रभावतिमथाब्रवीत् ।अभ्येति रौक्मिणेयोऽसावाश्वसायतलोचने

tatheti prāha tāṃ kāmaḥ sā nivṛttātha pakṣiṇī | abhyāgatā ca sā haṃsī prabhāvatimathābravīt | abhyeti raukmiṇeyo'sāvāśvasāyatalocane

हिन्दी अर्थ

तब प्रद्युम्नने उससे कहा- बहुत अच्छा! उनका यह उत्तर सुनकर पश्चषिणी लौट गयी। महलमें लौटकर हंसीने प्रभावतीसे कहा—विशाललोचने ! धीरज धारण करो। वे रुक्मिणीनन्दन तुम्हारे पास आ रहे हैं

अध्याय 148

श्लोक 49

प्रद्युम्नो नीयमानं तु ददृशे माल्यमात्मवान् ।भ्रमरैरावृतं वीरः सुगन्धमरिमर्दनः

pradyumno nīyamānaṃ tu dadṛśe mālyamātmavān | bhramarairāvṛtaṃ vīraḥ sugandhamarimardanaḥ

हिन्दी अर्थ

उधर शत्रुमर्दन मनस्वी वीर प्रद्युप्नने देखा कि प्रभावतीके यहाँ सुगन्धित पुष्पमाला ले जायी जा रही है, जिसपर बहुत-से भ्रमर आ बैठे हैं

अध्याय 148

श्लोक 50

निलिल्ये तत्र माल्ये तु भूत्वा मधुकरस्तदा ।प्रभावत्या नीयमाने विदितार्थः प्रतापवान्

nililye tatra mālye tu bhūtvā madhukarastadā | prabhāvatyā nīyamāne viditārthaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

फिर तो सर्वज्ञ एवं प्रतापी वीर प्रद्युप्न प्रभावतीके यहाँ ले जायी जानेवाली मालामें भ्रमर होकर छिप गये

अध्याय 148

श्लोक 51

प्रवेशितं च तन्माल्यं स्त्रीभिर्मधुकरायुतम् ।उपनीतं प्रभावत्यै स्त्रीभिस्तद् भ्रमरावृतम्

praveśitaṃ ca tanmālyaṃ strībhirmadhukarāyutam | upanītaṃ prabhāvatyai strībhistad bhramarāvṛtam

हिन्दी अर्थ

स्त्रियोंने भ्रमरोंसे आवृत हुई उस मालाको प्रभावतीके महलमें पहुँचा दिया । फिर दूसरी स्त्रियोंने वह भ्रमरावृत माला प्रभावतीके हाथमें दे दी

अध्याय 148

श्लोक 52

अविदूरे च विन्यस्तं प्रभावत्या जनाधिप ।भ्रमरास्ते ययुः सौम्य सन्ध्याकाले ह्युपस्थिते

avidūre ca vinyastaṃ prabhāvatyā janādhipa | bhramarāste yayuḥ saumya sandhyākāle hyupasthite

हिन्दी अर्थ

नरेथर! प्रभावतीने उसे पास ही रख लिया। सौम्य ! संध्याकाल उपस्थित होनेपर वे भ्रमर चले गये

अध्याय 148

श्लोक 53

स भैमप्रवरो वीरस्तैः सहायैर्विहीनतः ।कर्णोत्पले प्रभावत्या निलिल्ये शनकैरिव

sa bhaimapravaro vīrastaiḥ sahāyairvihīnataḥ | karṇotpale prabhāvatyā nililye śanakairiva

हिन्दी अर्थ

उन अपने सहायकोंसे बिछुड़कर वीर यदुश्रेष्ठ प्र्युम्न धीरेसे प्रभावतीके कानमें पहने गये कमलमें छिप गये

अध्याय 148

श्लोक 54

ततः प्रभावती हंसीमुवाच वदतां वरा ।उद्यतं पूर्णचन्द्रं सा समीक्ष्यातिमनोहरम्

tataḥ prabhāvatī haṃsīmuvāca vadatāṃ varā | udyataṃ pūrṇacandraṃ sā samīkṣyātimanoharam

हिन्दी अर्थ

तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभावतीने अत्यन्त मनोहर पूर्ण चन्द्रको उदित हुआ देख हंसीसे कहा—

अध्याय 148

श्लोक 55

सखि दह्यन्ति मेऽङ्गानि मुखं च परिशुष्यति ।औत्सुक्यं हृदि चातीव कोऽयं व्याधिरनौषधः

sakhi dahyanti me'ṅgāni mukhaṃ ca pariśuṣyati | autsukyaṃ hṛdi cātīva ko'yaṃ vyādhiranauṣadhaḥ

हिन्दी अर्थ

सखि! मेरे तो सारे अड्ध जले जा रहे हैं। मुँह सूख रहा है। हदयमें अत्यन्त उत्कण्ठा बढ़ गयी है। यह कौन-सा रोग लग गया, जिसकी कोई दवा ही नहीं है?

अध्याय 148

श्लोक 56

दधद् द्विगुणमौत्सुक्यमसौ पूर्णनिशाकरः ।नवोदितः शीतरश्मिः सख्यं हरति च प्रियः

dadhad dviguṇamautsukyamasau pūrṇaniśākaraḥ | navoditaḥ śītaraśmiḥ sakhyaṃ harati ca priyaḥ

हिन्दी अर्थ

वह शीतल किरणोंवाला नवोदित पूर्ण चन्द्र दूनी उत्सुकता बढ़ा रहा है। वह देखनेमें प्रिय लगता है; परंतु मित्रभावका अपहरण कर रहा है—अप्रियवत्‌ बर्ताव करने लगा है

अध्याय 148

श्लोक 57

न दृष्टपूर्वो हि मया श्रुतमात्रेण काङ्क्षितः ।अहो धूमयतेऽङ्गानि स्त्रीस्वभावस्य धिक् खलु

na dṛṣṭapūrvo hi mayā śrutamātreṇa kāṅkṣitaḥ | aho dhūmayate'ṅgāni strīsvabhāvasya dhik khalu

हिन्दी अर्थ

अहो ! जिसे मैंने पहले कभी देखा नहीं है, केवल नाम सुनकर उसे चाहने लगी हूँ तो भी वह मेरे सारे अड्डोंगें आग सुलगा रहा है। मुझे धूमाच्छन्न किये देता है। नारीके इस स्वभावको धिक्कार है

अध्याय 148

श्लोक 58

कल्पयामि यथाबुद्ध्या यदि नाभ्येति मे प्रियः ।कुमुद्वतीगतं मार्गं हा गमिष्याम्यकिञ्चना

kalpayāmi yathābuddhyā yadi nābhyeti me priyaḥ | kumudvatīgataṃ mārgaṃ hā gamiṣyāmyakiñcanā

हिन्दी अर्थ

जैसा कि मैं बुद्धिसे सोच रही हूँ, यदि मेरे प्रियतम नहीं आये तो मैं अकिज्ञन नारी उसी मार्गको अपनाऊँगी, जिसपर कुमुद्वती चल चुकी है अर्थात्‌ प्रियतम पतिके जीते जी ही युवावस्थामें मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा । हा! यह कितने कष्टकी बात है ?

अध्याय 148

श्लोक 59

मदनाशीविषेणास्मि हा हा दष्टा मनस्विनी ।शीतवीर्याः प्रकृत्यैव जगतो ह्रादनाः सुखाः ।दहन्ति मम गात्राणि किं नु चन्द्रगभस्तयः

madanāśīviṣeṇāsmi hā hā daṣṭā manasvinī | śītavīryāḥ prakṛtyaiva jagato hrādanāḥ sukhāḥ | dahanti mama gātrāṇi kiṃ nu candragabhastayaḥ

हिन्दी अर्थ

हाय ! हाय ! ! मुझ मनस्विनी नारीको कामदेवरूपी विषधर सर्पने डँस लिया है, अन्यथा शीतलता ही जिनकी शक्ति है, जो स्वभावसे ही जगत्‌को आह्वाद एवं सुख प्रदान करनेवाली हैं, वे चन्द्रमाकी किरणें मेरे अज्ञोंको क्यों जला रही हैं ?

अध्याय 148

श्लोक 60

प्रकृत्या शीतलो वायुर्नानापुष्परजोवहः ।दावाग्निसदृशो मेऽद्य दन्दहीति शुभां तनुम्

prakṛtyā śītalo vāyurnānāpuṣparajovahaḥ | dāvāgnisadṛśo me'dya dandahīti śubhāṃ tanum

हिन्दी अर्थ

5 ध्याय: + ७४३ पोंकी सुगन्धित रज लेकर बहती है, वही वायु आज . लिये दावानलके समान होकर मेरे सुन्दर शरीरको त्यन्त दग्ध किये देती है

अध्याय 148

श्लोक 61

ततः सङ्कल्पये एव स्थैर्यं कार्यमिवात्मनः ।नावतिष्ठति निर्वीर्यं मनः सकल्पधर्षितम्

tataḥ saṅkalpaye eva sthairyaṃ kāryamivātmanaḥ | nāvatiṣṭhati nirvīryaṃ manaḥ sakalpadharṣitam

हिन्दी अर्थ

मैं बारम्बार संकल्प र रही हूँ कि मुझे अपने मनको स्थिर कर लेना चाहिये; तु मेरा मन कामसे मधित होकर अत्यन्त निर्बल हो पा है; अत: स्थिर नहीं हो पाता है

अध्याय 148

श्लोक 62

विमनस्कास्मि मुह्यामि वेपथुर्मे महान् हृदि ।बम्भ्रमीति च मे दृष्टिर्हा हा यामि ध्रुवं क्षयम्

vimanaskāsmi muhyāmi vepathurme mahān hṛdi | bambhramīti ca me dṛṣṭirhā hā yāmi dhruvaṃ kṣayam

हिन्दी अर्थ

उन्मनी हुई रही हूँ, मुझपर मोह छा रहा है। मेरे हृदयमें महान्‌ पपन हो रहा है और मेरी दृष्टि बास्बार घूम रही है। थ! हाय! अब निश्चय ही मैं नष्ट हो जाऊँगी '

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.